हमला –  कविता कृष्ण पल्लवी

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हमला हो चुका है…

बर्बर हमलावरों ने हमला बोल दिया है।
आगे बढ़ रहे हैं वे लगातार
सृजन, विचारों, कल्‍पनाओं और स्वप्नों को रौंदते हुए
तर्क की मृत्यु की घोषणा करते हुए
धर्मध्वजा लहराते हुए

शिक्षा, कला, संस्कृति और जन संचार के
सभी प्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाते हुए
उन्हें जेलों में बदलते हुए
मिथकों को इतिहास बनाते हुए
ज़ुबानों पर ताले लगाते हुए
विवेक की गुप्तचरी करते हुए
विवेक के पक्ष में मुख़र आवाज़ों की गुप्त हत्याएँ करते हुए,
वास्तविक दुनिया में वास्तविक और आभासी दुनिया में शाब्दिक हिंसा के
नये-नये तरीके ईजाद करते हुए।
मध्ययुगीन अंधकार में लिपटे हुए
वित्तीय पूँजी के प्यादे
हर तरह की उर्वरता, हरेपन, और सपनों को
जलाकर राख़ कर देने का मंसूबा लिए
हर बस्ती के आसपास
बारूदी सुरंगे बिछा रहे हैं।
याचनाओं, अनुरोधों से उन्‍हें रोका नहीं जा सकता।
चुप्पियों से बचाव नामुमकिन है।
दो ही रास्‍ते हैं —

या तो हमें घुटनों के बल बैठकर
उनके सफेद दस्‍ताने चढ़े खूनी हाथों को चूम लेना होगा
फिर पुरस्कृत होकर उस जुलूस में शामिल हो जाना होगा
जो पहले रात में निकलता था
और अ‍ब दिन के उजाले में निकलता है,
जिसमें हत्यारों के साथ चलते हैं
विचारक और सुधी कलावंत गण,
या फिर हमें पकड़े हुए एक-दूसरे के हाथ
तमाम आत्मिक और भौतिक सम्पदाओं के निर्माताओं के साथ
खड़ा होना होगा तनकर, उनके ऐन सामने
उनकी राह रोककर।
बेशक़, मुमकिन है कि हम मारे जायें
इस कोशिश में
लेकिन हमारी वह मौत भी एक चोट होगी
बर्बरों पर मारक,
हमारी हार भी यदि हो तो
आने वाले जीत के दिनों की भविष्यवाणी
दर्ज़ करेगी वक्त की छाती पर।
दुबककर, चुप रहकर, माफी माँगकर या
अराजनीतिक कला का पैरोकार बनकर जीना
यानी अपनी आने वाली पीढ़ि‍यों की नज़रों में
बन जाना हरामी, कायर और कमीना।
जीवन की भविष्योन्मुख यात्रा के पक्ष में
लड़ते हुए मरना
यानी ज़‍ि‍न्दगी की खूबसूरती को तृप्त होकर जीना
और आने वाली पीढ़ि‍यों में जीत का विश्वास भरना।
विकल्प अधिक नहीं हैं
चुनना होगा इन्हीं दोनों में से किसी एक को हमें।


2. अख़बार

इतने सारे,

इतने सारे पेड़ों को काटते हैं लगातार

इतने सारे कारख़ानों में
इतने सारे मज़दूरों की श्रमशक्ति को निचोड़कर
तैयार करते हैं इतना सारा काग़ज
जिनपर दिन-रात चलते छापाखाने
छापते हैं इतना सारा झूठ
रोज़ सुबह इतने सारे दिमागों में उड़ेल देने के लिए।
इतने सारे पेड़ कटते हैं
झूठ की ख़ातिर।
इतनी सारी मशीनें चलती हैं
झूठ की ख़ातिर।
इतने सारे लोग खटते हैं महज़ ज़ि‍न्‍दा रहने के लिए
झूठ की ख़ातिर
ताकि लोग पेड़ बन जायें,
ताकि लोग मशीनों के कल पुर्जे़ बन जायें,
ताकि लोग, जो चल रहा है उसे
शाश्‍वत सत्‍य की तरह स्‍वीकार कर लें।
लेकिन लोग हैं कि सोचने की आदत
छोड़ नहीं पाते
और शाश्‍वत सत्‍य का मिथक
टूटता रहता है बार-बार
और वर्चस्‍व को कभी नहीं मिल पाता है अमरत्‍व।


3.पूँजी

कारखानों में खेतों में करती है श्रमशक्ति की चोरी
वह मिट्टी में ज़हर घोलती है
हवा से प्राणवायु सोखती है
ओजोन परत में छेद करती है
और अार्कटिक की बर्फीली टोपी को सिकोड़ती जाती है।
वह इंसान को अकेला करती है
माहौल में अवसाद भरती है
मण्‍डी के जच्‍चाघर में राष्‍ट्रवाद का उन्‍माद पैदा करती है
स्‍वर्ग के तलघर में नर्क का अँधेरा रचती है।
आत्‍मसंवर्धन के लिए वह पूरी पृथ्‍वी पर
कृत्‍या राक्षसी की भाँति भागती है
वह अनचीते पलों में
दिमाग पर चोट करती है
युद्धों की भट्ठी में मनुष्‍यता को झोंकती है।
वह कभी मादक चाहत तो कभी
आत्‍मघाती इच्‍छा की तरह दिमाग में बसती है
युद्ध के दिनों में हिरोशिमा
और शान्ति के दिनों में
भोपाल रचती है।


4.कवि का मूल निवास

एक कवि अगर गुम होना चाहे
तो जगहों की कमी नहीं।
गुम हो सकता है जैसलमेर-बाड़मेर के रेगिस्तानों के किसी सुदूर गाँव में,
या केरल या ओडिशा के समुद्र-तट की किसी बस्ती में,
सरगुजा और जगदलपुर के जंगलों में,
उत्तर-पूर्व के वर्षा-वनों में,
या हिमाचल या उत्तराखंड के पहाड़ों-घाटियों में कहीं
पर सबसे अच्छा है गुम हो जाना
रहस्यमय, अँधेरे गर्भ में ज्वालामुखियों को छिपाए
उस जन-समुद्र में
जो हर कवि का मूल निवास होता है
और जिसे वह भूल चुका है।


Kavita KrishnapallaviName: कविता कृष्ण पल्लवी
City: देहरादून

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