Sunday, April 19, 2026
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नासिरा शर्मा द्वारा अनूदित तलत सोकैरत की कहानी – नारंगी

हिंदी साहित्य में नासिरा शर्मा के नाम और क़द को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। हम नासिरा जी की कहानियाँ और उपन्यास तो पढ़ते ही रहे हैं, लेकिन अब पुरवाई उनमें छिपे अनुवादक से अपने पाठकों को परिचित करवाने जा रही है। आज हम लेबनान में पैदा हुए प्रसिद्ध लेखक तलत सोकैरत की कहानी का नासिरा शर्मा जी द्वारा किया गया अनुवाद अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। यह सिलसिला आगे के अंकों में में भी जारी रहेगा। प्रस्तुत है।

युद्ध किसी भी कोण से प्रशंसा के योग क़दम नहीं है| चाहे हथियार के बड़े बड़े आविष्कार हो रहे हों | फ़िलिसतीन जहाँ सात पीढ़ियों ने युद्ध की विभीक्षा  देखी है और उजड़ते घरों की तबाही को सहा है | प्रियजनों की लाशों को दफ़नाया है | उनकी यादों में उनके पीछे छूटे बाग़ और खेत उन्हें मरते दम तक बेचैन किये रखते हैं | उनके लिए युद्ध एक ‘क़ब्ज़ा “व ‘हथियाने’ का हथकंडा नहीं है बल्कि अपनी ज़मीन पर जीने का बुनियादी सवाल है | उनका मातृभूमि  से प्रेम उन्हें चैन से बैठने नहीं देता है| और वह अपने इस अधिकार के लिये आवाज़  उठानें को बाध्य हैं | या फिर जगह छोड़ने पर मजबूर कर दिये जाते हैं ! ‘नारंगी’ कहानी उसी पीड़ा की अभिव्यक्ति है कि किस तरह वह पीछे छूटे अतीत की तड़प के साथ वहाँ इंसान आख़री साँस लेते हैं।

कहानीकार – तलत सोकैरत
अनुवाद – नासिरा शर्मा
कोई न हिसाब लगा पा रहा था और न समझ पा रहा था, उसकी बची हुई साँसों को और न उसकी आँखों से लगातार बहते आँसुओं को, जो उसके गालों पर फैल रहे थे। सिर्फ़ अब्दुल ख़ैर स्वयं महसूस कर रहा था कि अब उसकी ज़िंदगी के कुछ पल ही बचे हैं। जबकि डॉक्टरों ने उसकी पत्नी को आश्वासन दे रखा था कि वह जल्द ही ठीक हो जाएगा। अब्दुल ख़ैर गहरी सोच में डूबा हुआ था। उसकी ज़िंदगी के पेड़ को पत्तियां झड़ चुकी थीं, आख़िरी पत्ती भी डाल छोड़नेवाली थी। यह उसे साफ़ नज़र आ रहा था । वह किसलिए रो रहा था, उसको बयान करना बचे हुए लम्हों में कठिन था।
अब्दुल ख़ैर ने अपनी आँखें बन्द कर लीं। पत्नी, बच्चों और रिश्तेदारों की शक्लें धुँधली पड़ने लगीं। वह धीरे से बुदबुदाया।
“तुम में से कौन है जो मेरे लिए नारंगी ला सकता है?”
“लेकिन बाबा…” सभी उसकी इच्छा सुनकर चकित रह गए। केवल बड़ा बेटा हिम्मत करके बोला तो उसकी बात बीच में ही काटकर उसने कहा, “मैं जानता हूँ कि यह नारंगी का मौसम नहीं है लेकिन मुझे नारंगी चाहिए। मेरे लिए बिना नारंगी के मरना मुश्किल है।”
सभी ने गर्दन और हाथ हिलाए और नहीं समझ पाए कि सत्तर वर्ष के इस बुज़ुर्ग को नारंगी क्यों चाहिए। उसकी बीबी उम्मअलख़ैर ने मन ही मन सोचा की उसका पति मरने से पहले कुछ ख़ास बात करना चाहता है शायद,सो वह पति के चेहरे पर झुककर धीरे से पूछने लगी, “तुम कुछ कहना चाहते हो, लिल्लाह कुछ बोलो, जो तुम्हारे दिल में है साफ़–साफ़ कह डालो।”
उसने अपनी आँखें खोलीं। पत्नी के चेहरे पर नज़र डाली मगर पानी भरी आँखों ने पत्नी का चेहरा धुंधला दिया। वह धीरे से बुदबुदाया, “आह! उम्मअलखैर! मैं वहीं मरना चाहता हूँ। तुम तो जानती हो मेरी इस ख्वाहिश को जो हमेशा से मेरे दिल में मचलती रही है अपने गली–कूचों और नारंगी के बगीचे से दूर?”
अब्दुल ख़ैर के मुख से ये शब्द किसी बम की तरह बेटों, रिश्तेदारों के दिल व दिमाग़ पर गिरे। जाने कब से रुके आँसू उम्मअलख़ैर की आँखों से उबल पड़े और वह हिचकियाँ ले रो पड़ी। मृत्युशैया पर पड़े उस बूढ़े आदमी ने मुस्कुराना चाहा, उसकी आँखों के सामने से सड़कें, घर, अपने शहर गाँव के लोगों के चेहरे गुजरने लगे और हज़ार तरह की बातें याद आने लगीं। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ये सारे वर्ष किस शीघ्रता से गुज़र गए। उसने अपनी प्रिय सड़क पर ख़ुद को मटरगश्ती करते देखा। संध्या गीत में उसने विशेष महक को महसूस किया।
सच पूछा जाए तो कुछ वर्षों तक उसने महसूस ही नहीं किया था कि वह अपने वतन फ़िलिस्तीन से दूर है। तब वह आँखें बन्द कर लेता और जब चाहता अपने प्यारे वतन में दाख़िल हो जाता था। मगर कुछ वर्षों बाद उसे फ़िदाईन मोर्चों में हिस्सा लेना पड़ा। जब कभी वह देश की सीमा रेखा के समीप पहुँचता तो उसका पूरा वजूद विरह की आग में सुलग उठता था। उसका मन करता था कि वह मौत को लगे लगा ले ताकि इसी बहाने से वह अपनी सरज़मीन का स्पर्श कर सकता है। वह अकसर यह वाक्य दोहराता रहता था कि फ़िलिस्तीन से दूर मरना दो बार मरने के बराबर है।
फ़िलिस्तीन से दूर मरने की कल्पना ने उसमें विचित्र सी शक्ति भर दी और वह तेज़ी से उठकर बैठ गया और जूतों में पर डालने लगा। उसे लगा उसके हाथ पैर उसके दिल में छुपी इच्छा को पूरा करने का बल रखते हैं। उसमें आई स्फूर्ति को देख पलंग के चारों तरफ़ खड़े लोग हतप्रभ हो उसकी तरफ़ लपके।
“तुम लोग नहीं समझ सकते हो मैं वहाँ जाकर मारना चाहता हूँ।” अपने को छुड़ाते हुए वह बोला।
“खुदा के लिए तुम सब लोग इन्हें अकेला छोड़ दो”, उम्मअलख़ैर ने रोते हुए कहा।
अब्दुल ख़ैर बड़ी मुश्किल से अपने बिस्तर से उठ पाया और लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ा। बच्चों ने आगे बढ़कर उसे सहारा देना चाहा मगर उसने मना कर दिया। उसने डगमगाते क़दम से आगे बढ़ दरवाज़ा खोला और लंबी साँस खींच वह किसी बच्चे की तरह खुशी से चीखा, “ख़ुदा की कसम मैंने नारंगी की ख़ुशबू को महसूस किया है।”
सड़क लंबी थी। वह चलते–चलते रुका। उसका दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था, उसका साँस लेना कठिन हो रहा था, उसकी मांसपेशियां शिथिल पड़ रही थी, उसकी आँखें मुंदने लगीं और वह गिर पड़ा।
“पल बड़े लंबे हैं” उसने हाँफते हुए कहा।
पत्नी के आँसू रुक गए। उसने अपनी आँखें खोली और पत्नी का हाथ हाथों में लेकर धीरे से कहा, ‘हम मिले थे वहां,पहली बार, हम साथ ही वहाँ लौटेंगे।’
उम्मअलख़ैर को लगा कि उसका हाथ गर्म है। फिर एकाएक लगा कि ठंडा पड़ गया है। वह समझ गई कि वह निकल पड़ा है चहलकदमी के लिए सुदूर रास्तों में से एक रास्ते पर।
लेखक परिचय :- तलत सोकैरत 1953 में त्रिपोली लेबनान की ओर वाला, में पैदा हुए। दमिश्क़ में उनकी शिक्षा हुई। 1979 में उन्हें विश्वविद्यालय की तरफ़ से सम्मानित भी किया गया। सोकैरत पेशे से पत्रकार और मन से लेखक हैं। इनके दो उपन्यास हैं, धुँधली यादों के साये (1979) और मसूद की बातें(1984)। इनके कहानी–संग्रह हैं – खेमा(1987) , चाक़ू (1987), कदबान (1996) , इमकानात (1998)आदि । तलत सोकैरत की विशेषता है कि वह लघु नहीं,बल्कि अति लघु कहानियाँ लिखने में माहिर हैं।
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1 टिप्पणी

  1. काफी मार्मिक कहानी है नासीरा जी!
    युद्ध कभी किसी चीज का हल नहीं रहा। ताकतवर देशों की महत्वाकांक्षाओं में कितने ही लोगों को क्या कुछ नहीं खोना पड़ता है!अपनी सरजमीं से किसे प्यार नहीं होता!लेबनान में पैदा हुए प्रसिद्ध लेखक तलत सोकैरत जी की बेहद मार्मिक कहानी को अनुवाद के माध्यम से पढ़ पाए। अपना अतीत अपनी जड़ की ओर लौटना चाहता है ।उससे उसकी गहरी मोहब्बत और यादें जुड़ी रहती हैं। अपनी मातृभूमि,अपनी जमीन किसे प्यारी नहीं होती! अंत तो बहुत ही मार्मिक रहा। अपनी धरती से प्रेम महसूस करने वाली चीज है। बहुत-बहुत शुक्रिया नासिरा जी। आपके माध्यम से आज एक अच्छी कहानी पढ़ पाए।

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