डॉक्टर एम. फ़ीरोज़ अहमद मेरे आत्मीय भाई और मित्र हैं। ऐसा मैं किसी जज्बात में आकर नहीं कह रहा।ये हिन्दी के ऐसेधुनी युवा संपादक और प्राध्यापक हैं जो अंधेरे में गुम हो चुके महत्वपूर्ण मुस्लिम रचनाकारों के उद्धारक बन चुके हैं। एक लंबी सूची है इनके पास जिनकी रचनाओं को तलाशना, संपादित करना और पत्रिका विशेषांकों तथा पुस्तकों के रूप में लाकर ही दम लेना इनका संकल्प है। न धन की परवाह, न समय की।
हिन्दी के असांप्रदायिक चरित्र को रूपायित करने में मुस्लिम रचनाकारों का कितना बड़ा योगदान है, इसका अहसास आपको तब होगा, जब हिन्दी नवजागरण के लेखकों द्वारा हुए संकलनों को देखियेगा। स्त्री कवियों की कविताओं के अनेक छपे संकलनों में उनकी रचनाएँ देखिये।गंगाप्रसाद सिंह विशारद के हिन्दी के मुसलमान कवि को तरुण लेखक वरुण भारती ने प्रस्तुत किया है, उसमें 152 मुस्लिम हिन्दी कवि हैं। यह किताब अनन्य प्रकाशन से छपी है।
जिस तरह कथाकार इसराइल, नफ़ीस आफ़रीदी और ताहिर साहब के बाद फ़ीरोज़ जी ने द्विवेदी युग के मशहूर कथाकार और बाल साहित्य के अपने समय में लोकप्रिय लेखक ज़हूर बख्श साहब पर ” वाङ् मय ” पत्रिका का विशेषांक निकाला है, उसके लिए पूरी हिन्दी को उनका अहसानमंद होना चाहिए। ज़हूर बख्श साहब जबलपुर के प्रसिद्ध वैयाकरण कामताप्रसाद गुरु के शिष्य थे। उनकी भाषा अपने समय से आगे की थी। वे सामाजिक जागरुकता वाले कथाकार थे। अपने समय में वे पूरे हिन्दी जगत् में समादृत थे। इनके पास हिन्दी का बड़ा ही दुर्लभ पुस्तकालय था।उसमें हिन्दी के मशहूर लेखकों के बहुत सारे पत्र थे।विपुल पत्रिकाएँ थीं । सागर के दंगाइयों ने उसे जला दिया।भीष्म साहनी ने इस घटना पर जो कहानी लिखी है वह उनके संग्रह ” निशाचर ” में शामिल है। मैंने इनकी कहानियों के छपने वाले संग्रह की भूमिका लिखी है। उनको पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगता रहा कि यह हम सबका कितना बड़ा सौभाग्य है कि हमारी भाषा की विरासत असाधारण रूप से महान् और बेहद समृद्ध है। मैं फ़ीरोज़ जी का बार-बार अभिनंदन करता हूँ इस उम्मीद के साथ कि वे अपने निश्चय पर अडिग रहें। याद रहे हम सब त्याग नहीं कर रहे क्योंकि ऐसे हमारे बुजुर्ग तपस्वियों का बलिदान हमारे किये सेबहुत बड़ा है। हमें याद रखना चाहिए कि अपना सर्वस्व खोकर इन लोगों ने आज हिन्दी को इस स्तर तक पहुँचाया है।
यह ऐसा संकलन है जिसमें उन पर लिखे विभिन्न लेखकों के लेख के अलावे उनकी चयनित कहानियाँ भी। मेरी समझ में यह विशेषांक एकदम संग्रहणीय है। मोबाइल: 7007606806 [email protected] पृष्ठ 324 मूल्य: 275=00
बहुत कर्मठ हैं संपादक एम.फिरोज़ अहमद। बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है।हिंदी साहित्य में खोए हुए को जगह दिलवाने का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है।जो उन्हें अपने लेख में जगह दे वो भी काबिले तारीफ़ है।
इधर वर्षों से संपादक भाई फिरोज ने काल के गर्त से कुछ ऐसे मोती चुनें हैं,जो भारतीयता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। कलात्मक रूप से भी किसी से कम नहीं।इस रूप में वांग्मय पत्रिका का योगदान ऐतिहासिक है।
वांग्मय पत्रिका के संपादक और हम सबके मित्र डॉक्टर एम फिरोज खान जी ने एक ऐसे दुरूह कार्य का बीड़ा उठाया है जो शायद साहित्य के धरातल पर नया और गुरूतर कार्य है। जिन साहित्यकारों को पाठकों ने कभी सुना होगा या शायद न भी जानते होंगे उन साहित्यकारों को वक्त की जमी बर्फ से निकालकर आम जनमानस तक पहुंचाने का डॉ खान ने जो संकल्प लिया है उसकी साहित्य जगत में भूरि भूरि प्रशंशा होनी चाहिए। मेरे विचार से सत साहित्य के नवोन्मेष में डॉक्टर एम फिरोज खान का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आपने जो लिखा वह पूरी शिद्दत और जज्बे के साथ लिखा और सार्थक लिखा। आदिवासी विमर्श हो या किन्नर विमर्श या अब मुस्लिम विमर्श सबपर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी का जादू चलाया। उत्कर्ष पब्लिशर्स परिवार आपके इस प्रयास का मुक्त कंठ से स्वागत करता है और आशा करता है कि आप भविष्य में भी ऐसी ही विभूतियों से पाठकों और शोधार्थियों को कुछ लीक से हटकर देने का कार्य करते रहेंगे। आपके इस पुनीत कार्य के लिए आप बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं।
वांग्मय पत्रिका के संपादक और हम सबके मित्र डॉक्टर एम फिरोज खान जी ने एक ऐसे दुरूह कार्य का बीड़ा उठाया है जो शायद साहित्य के धरातल पर नया और गुरूतर कार्य है। जिन साहित्यकारों को पाठकों ने कभी सुना होगा या शायद न भी जानते होंगे उन साहित्यकारों को वक्त की जमी बर्फ से निकालकर आम जनमानस तक पहुंचाने का डॉ खान ने जो संकल्प लिया है उसकी साहित्य जगत में भूरि भूरि प्रशंशा होनी चाहिए। मेरे विचार से सत साहित्य के नवोन्मेष में डॉक्टर एम फिरोज खान का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आपने जो लिखा वह पूरी शिद्दत और जज्बे के साथ लिखा और सार्थक लिखा। आदिवासी विमर्श हो या किन्नर विमर्श या अब मुस्लिम विमर्श सबपर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी का जादू चलाया। उत्कर्ष पब्लिशर्स परिवार आपके इस प्रयास का मुक्त कंठ से स्वागत करता है और आशा करता है कि आप भविष्य में भी ऐसी ही विभूतियों से पाठकों और शोधार्थियों को कुछ लीक से हटकर देने का कार्य करते रहेंगे। आपके इस पुनीत कार्य के लिए आप बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं।
सच में डॉ. फिरोज़ सर की मेहनत प्रशंसनीय है। इधर बीच उन्होंने कई गुमनाम कथाकारों को अपनी पत्रिका के माध्यम से सामने लाकर महनीय कार्य किया है। इसके लिए फिरोज़ सर बधाई के पात्र हैं। वह निरंतर इसी तरह साहित्य की सेवा करते रहें…..इसके लिए मैं शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं। सादर प्रणाम
आदरणीय कर्मेंन्दु जी!एम. फ़िरोज़ अहमद जी के बारे में आपके माध्यम से पढ़कर ही जान पाए। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि वे इतने अधिक समर्पित है हिंदी साहित्य के प्रति कि उन्होंने अंधेरे में गुम हो चुके महत्वपूर्ण मुस्लिम रचनाकारों का उद्धार किया। आजकल तो लोग सिर्फ अपना स्वार्थ देखते हैं ऐसे समय में अपना समय और अपना पैसा दूसरों के हित के लिए खर्च करने वाले लोग चिराग देखकर ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे। ऐसी स्थिति में समय और धन खर्च करके दूसरों के लिए सोचना बहुत बड़ी बात होती है। ऐसे महापुरुष को हमारा सादर प्रणाम और आपका शुक्रिया उनसे परिचय करवाने के लिये। पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
बहुत ही अच्छा अंक है
बहुत कर्मठ हैं संपादक एम.फिरोज़ अहमद। बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है।हिंदी साहित्य में खोए हुए को जगह दिलवाने का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है।जो उन्हें अपने लेख में जगह दे वो भी काबिले तारीफ़ है।
इधर वर्षों से संपादक भाई फिरोज ने काल के गर्त से कुछ ऐसे मोती चुनें हैं,जो भारतीयता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। कलात्मक रूप से भी किसी से कम नहीं।इस रूप में वांग्मय पत्रिका का योगदान ऐतिहासिक है।
थैंक्स
वाङ्गय पत्रिका की समीक्षा छापने के लिए धन्यवाद।
वांग्मय पत्रिका के संपादक और हम सबके मित्र डॉक्टर एम फिरोज खान जी ने एक ऐसे दुरूह कार्य का बीड़ा उठाया है जो शायद साहित्य के धरातल पर नया और गुरूतर कार्य है। जिन साहित्यकारों को पाठकों ने कभी सुना होगा या शायद न भी जानते होंगे उन साहित्यकारों को वक्त की जमी बर्फ से निकालकर आम जनमानस तक पहुंचाने का डॉ खान ने जो संकल्प लिया है उसकी साहित्य जगत में भूरि भूरि प्रशंशा होनी चाहिए। मेरे विचार से सत साहित्य के नवोन्मेष में डॉक्टर एम फिरोज खान का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आपने जो लिखा वह पूरी शिद्दत और जज्बे के साथ लिखा और सार्थक लिखा। आदिवासी विमर्श हो या किन्नर विमर्श या अब मुस्लिम विमर्श सबपर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी का जादू चलाया। उत्कर्ष पब्लिशर्स परिवार आपके इस प्रयास का मुक्त कंठ से स्वागत करता है और आशा करता है कि आप भविष्य में भी ऐसी ही विभूतियों से पाठकों और शोधार्थियों को कुछ लीक से हटकर देने का कार्य करते रहेंगे। आपके इस पुनीत कार्य के लिए आप बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं।
थैंक्स
वांग्मय पत्रिका के संपादक और हम सबके मित्र डॉक्टर एम फिरोज खान जी ने एक ऐसे दुरूह कार्य का बीड़ा उठाया है जो शायद साहित्य के धरातल पर नया और गुरूतर कार्य है। जिन साहित्यकारों को पाठकों ने कभी सुना होगा या शायद न भी जानते होंगे उन साहित्यकारों को वक्त की जमी बर्फ से निकालकर आम जनमानस तक पहुंचाने का डॉ खान ने जो संकल्प लिया है उसकी साहित्य जगत में भूरि भूरि प्रशंशा होनी चाहिए। मेरे विचार से सत साहित्य के नवोन्मेष में डॉक्टर एम फिरोज खान का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आपने जो लिखा वह पूरी शिद्दत और जज्बे के साथ लिखा और सार्थक लिखा। आदिवासी विमर्श हो या किन्नर विमर्श या अब मुस्लिम विमर्श सबपर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी का जादू चलाया। उत्कर्ष पब्लिशर्स परिवार आपके इस प्रयास का मुक्त कंठ से स्वागत करता है और आशा करता है कि आप भविष्य में भी ऐसी ही विभूतियों से पाठकों और शोधार्थियों को कुछ लीक से हटकर देने का कार्य करते रहेंगे। आपके इस पुनीत कार्य के लिए आप बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं।
थैंक्स
सच में डॉ. फिरोज़ सर की मेहनत प्रशंसनीय है। इधर बीच उन्होंने कई गुमनाम कथाकारों को अपनी पत्रिका के माध्यम से सामने लाकर महनीय कार्य किया है। इसके लिए फिरोज़ सर बधाई के पात्र हैं। वह निरंतर इसी तरह साहित्य की सेवा करते रहें…..इसके लिए मैं शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं। सादर प्रणाम
थैंक्स
आदरणीय कर्मेंन्दु जी!एम. फ़िरोज़ अहमद जी के बारे में आपके माध्यम से पढ़कर ही जान पाए। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि वे इतने अधिक समर्पित है हिंदी साहित्य के प्रति कि उन्होंने अंधेरे में गुम हो चुके महत्वपूर्ण मुस्लिम रचनाकारों का उद्धार किया। आजकल तो लोग सिर्फ अपना स्वार्थ देखते हैं ऐसे समय में अपना समय और अपना पैसा दूसरों के हित के लिए खर्च करने वाले लोग चिराग देखकर ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे। ऐसी स्थिति में समय और धन खर्च करके दूसरों के लिए सोचना बहुत बड़ी बात होती है। ऐसे महापुरुष को हमारा सादर प्रणाम और आपका शुक्रिया उनसे परिचय करवाने के लिये। पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
थैंक्स