छांव में जिसकी खेले बचपन,
जिसकी छाया में बीते जीवन,
आज वही पेड़ खड़ा अकेला,
बता रहा है अपना मन का ग़म।
टहनी-टहनी बिखरी स्मृति,
पत्तों में छुपी हैं कहानियाँ कितनी।
कभी था वह गाँव की शान,
अब अनदेखा, जैसे अनजान।
जड़ें कहती हैं, “मैंने सींचा,
हर धूप-छांव में तुमको सीखा।
फिर क्यों आज तुम भूल गए,
मुझसे मुँह मोड़ दूर हो गए?”
न खेलते अब बच्चे झूले,
न कोई थक कर आ बैठता है।
कभी जिस तने से लगते थे दिल,
अब उसी पे कुल्हाड़ी चलती है।
कहता है पेड़ —
“मैं बूढ़ा हूँ, पर जीवित हूँ,
हर पत्ता अब भी कविता लिखता है।
मुझे मत काटो, मत ठुकराओ,
मैं तुम्हारे कल के लिए जीता हूँ।”
2. जंगल ये जंगल
जंगल ये जंगल, हरियाली का घर,
पेड़ों की छाया, नदियों का स्वर।
पंछी जो चहके, जैसे गीत गाएँ,
हर कोना बोले, बस शांति सुनाएँ।
झरनों की बातें, फूलों की खुशबू,
धरती की गोदी में सजी है सबू।
हिरन की छलांगें, मोर की अदा,
प्रकृति का ये रूप है सबसे जुदा।
नीम, पीपल, साल, बबूल,
खड़े हैं प्रहरी बन, रहते हैं कूल।
जानवर, पक्षी, कीड़े भी यहाँ,
सबका है हिस्सा, सबका है जहां।
पर खतरे में है अब ये जादू भरा,
मानव की लालच ने इसे भी मारा।
कटते हैं पेड़, सिमटती हैं राहें,
घटती हैं साँसें, मिटती हैं चाहें।
संभालो इसे, बचालो इसे,
जंगल की पुकार को सुनो ज़रा।
ये सांसें हैं अपनी, ये जीवन का रंग,
जंगल ये जंगल, है धरती का संग।
3. बचपन की वो गलियाँ
बचपन की वो गलियाँ, वो मिट्टी की खुशबू,
नंगे पाँव दौड़ना, बारिश में भीगना खूब।
कंचे, लट्टू, पतंगों की उड़ान,
हर खेल में छुपा था कोई अनजान गुमान।
न किताबों का बोझ, न जिम्मेदारियाँ भारी,
हर दिन था उत्सव, हर शाम थी प्यारी।
रूठना मनाना, फिर गले लग जाना,
बिना मतलब के भी घंटों बतियाना।
माँ की गोद में दुनिया बस जाती थी,
पिता की उँगली थाम, हिम्मत आ जाती थी।
एक चॉकलेट पर हो जाती थी दीवानगी,
छोटे-छोटे ख्वाबों में बसती थी ज़िंदगी।
ना मोबाइल, ना नेट का जाल,
फिर भी दिलों में था सच्चा हालचाल।
अब तो बचपन जैसे कहीं खो गया है,
वो मासूम हँसी, बस यादों में रह गया है।
काश लौट आए वो पल सुहाने,
जहाँ न था दिखावा, न झूठे बहाने।
बस दिल से जिया करते थे हम,
बचपन था जैसे खुद में एक मौसम।
डॉ. मुल्ला आदम अली
जन्म तिथि : 26 सितंबर
तिरुपति, आंध्र प्रदेश
शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., डी.एफ़.ए.च एण्ड टी., एचपीटी.,
प्रकाशित कृतियाँ : “मेरी अपनी कविताएं” “हिंदी कथा-साहित्य में देश-विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता” “युग निर्माता प्रेमचंद और उनका साहित्य”, 24 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेख प्रकाशित, 30 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिया गया है, कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां और कविताएं प्रकाशित।
पुरस्कार व सम्मान : एंटी करप्शन फाउन्डेशन द्वारा “नेशनल एजुकेशन आइकन अवॉर्ड – 2019”
सोसाइटी फॉर यूथ डेवलेपमेंट द्वारा “स्वामी विवेकानंद युवा सम्मान – 2019”, विश्व संवाद परिषद की ओर से हिंदी साहित्य एवं काव्य सभा (प्रकोष्ठ) के लिए अवैतनिक प्रदेश अध्यक्ष (आंध्र प्रदेश) 2021.
तीनों कविताएं बेहद सौद्देश्यता पूर्ण अंदाज़ में बड़ी ही संवेदनशीलता से लिखी गई हैं।
‘पुरवाई’ पत्रिका में मेरी कविताओं को जगह देने के लिए संपादक महोदय का दिल से धन्यवाद। यह मेरे लिए गर्व और हौसले की बात है।”