“रात मैं ने देखा मेरे सामने एक शीशा रखा है,” थाली में आधी गाजर कद्दूकस कर चुकने के बाद ही मैं अपना मुंह खोलने की हिम्मत दिखाती हूं, “और शीशे में एक मुंह है जिस के दांत कुछ चबा रहे हैं……”
“गाजर का हलवा?” कांति, मेरी सौतेली मां हंस पड़ती है।
मेरी गुलामी के क्षण उसे खूब गुदगुदाते हैं।
“गाजर तो आज आयी है,” अपनी मुस्कराहट मैं दबा लेती हूं, “वह भरा हुआ मुंह तो मैं ने कल रात में देखा…..”
“मालूम है?” कांति अपनी लहर में बहने लगती है, “मुकुंद और सुभाष जामुनी गाजर भी लाए हैं। कांजी के वास्ते।”
मुकुंद और सुभाष उस के भाई हैं। सुभाष सोलह का है और मुकुंद चौदह का। उधर उन लोग की सब्ज़ी की आढ़त है। जहां पास- पड़ोस के गाँवो- कस्बों के लदे ट्रकों की सब्ज़ी ये लोग थोक में खरीदते हैं और फिर आगे बेच देते हैं, बड़े- छोटे बटखरों के तोल। कांति के पिता निरंतर बढ़ रहे अपने दमे के कारण बेशक अपने परिवार के कारोबार से अलग कर दिए गए हैं लेकिन इधर आते समय कांति के भाई मौसम की सब्ज़ी ज़रूर ही थोक में उठा लाते हैं। अपने दादा के सौजन्य से।
“मेरी बात आगे सुनिए,” मैं अधीर हो उठती हूं, “उस शीशे के भरे मुंह पर मेरी नज़र जो जाती है तो फिर वहीं गढ़ जाती है। उस भरे मुंह के अंदर मैं हूं और उस के जबड़े और दांत आप के…..”
“क्या…या….या?” गाजर छील रहे कांति के हाथ रुक जाते हैं।
उस की दहल मेरे अंदर घुमड़ रही हंसी को बाहर ले आती है।
“मेरा मुंह क्यों?” कांति मुझ पर झपट पड़ती है, “चुड़ैल तो तू है। जो अपनी मां को चबा गई। अब क्या मुझे चबाएगी?”
मैं रो पड़ती हूं।
पिछले दिसंबर की वह धुंध भरी सुबह मेरे सामने आ खड़ी होती है जब मां मुझे स्कूल पहुंचाने अपनी स्कूटी पर मुझे आगे बिठाए हुए थी और ऊंचे पुल की ढलान पर सामने से आ रहे एक अज्ञात ट्रक हमारे कानों में आन भड़भड़ाया था और मां मेरे ऊपर औंधी आन गिरी थीं : दम तोड़तीं हुईं।
“दीदी,” सुभाष कांति को मुझ से अलग कर रहा है, “टकी- सी जान पर इतना अत्याचार? सोचो तो, यह मुकुंद से भी छोटी है…..”
“तू इस की तरफ़दारी न कर,” कांति दोबारा मुझ पर लपकना चाहती है- लेकिन सुभाष हम दोनों से दो हाथ ऊंचा है, “तू कुछ नहीं जानता। यह लड़की चुड़ैल है। मुझे चबा लेना चाहती है…..”
“आप जाओ यहां से,” सुभाष मुझ से कहता है, “दीदी को मैं समझा लूंगा।”
“मुझ से ठिठोली करती है,” कांति चिल्लाती है, “चोटी कहीं की…..”
मैं बाहर आ जाती हूं।
गाजर से छुट्टी पाकर मैं प्रसन्न हूं। गाजर क्या, किसी भी सब्ज़ी को काटने- पीटने में मेरी तनिक रुचि नहीं।
बावन कदम पर खड़ी चालीस सीढियों के पार पापा बैठे हैं। इस बौएज़ स्कूल की लाइब्रेरी में। मां ने यहां तेरह साल काम किया है। बल्कि आज भी जिस मकान में हम रहते हैं उस में मां ही के नाम की तख्ती है : श्रीमती सुधा दीक्षित, लाइब्रेरियन।
पापा उसी तख्ती पर अपना नाम लिखवाने का इरादा रखते हैं। लाइब्रेरी सांइस की उन की पढ़ाई पूरी होने ही वाली है और स्कूल का मैनेजमेंट बोर्ड भी उन्हें मां वाली नौकरी देने के पक्ष में है। जभी तो लाइब्रेरियन का पद वे लोग साल भर से खाली रखे हैं। और पापा अपनी क्लर्क वाली कम तनख्वाह पर भी पूरी लाइब्रेरी संभाल रहे हैं।
“आओ,” नई किताबों से घिरे पापा उन के लिए लेबल काट रहे हैं, “क्या खबर लाई हो?”
“मम्मी ने आज फिर मुझ पर हाथ उठाया,” मेरी आवाज़ रोंआसी है।
“क्यों?” पापा सतर्क हो लिए हैं। कांति के बारे में कही- सुनी हर बात वह एकाग्रता से सुनते हैं।
“उन के कहने पर अच्छी- भली गाजर कद्दूकस कर रही थी कि…..”
“ गाजर? गाजर कहां से आई?
“सुभाष और मुकुंद लाए हैं। उधर मंडी से। मम्मी उन का हलवा बनाएंगी। दूध और खोया इधर से मंगवा ली हैं।
“दूध के साथ खोया भी?” पापा खीझ लिए हैं।
“और गाजर कद्दूकस मुझ से करवा रही थीं ……”
“फिर मारा किस बात पर?”
“मेरे उन्हें अपना सपना सुनाने पर…..”
“सपना? कैसा सपना?”
“कल रात मैं ने अजीब सपना देखा था। एक शीशा है और मम्मी मुझे अपने मुंह में भर कर मुझे चबा रही हैं…..”
“क्या..या…या?”पापा बुरी तरह चौंक गए हैं। उन की कैंची उन के हाथ से छूट जाती है।
मैं भी चौंकती हूं।
मां की डायरियां उन्हों ने पढ़ रखी हैं क्या?
कांति के लिए मां की आलमारी खाली करते समय जो मेरे हाथ लगीं थीं? जिन में मां के कई भेद,कई घाव दर्ज थे : आधे खुले, आधे ढंके?
“यह सपना तुम्हारा नहीं हो सकता,” पापा कांप रहे हैं, “यह सपना तुम्हारा है ही नहीं। यह सपना तो सुधा का है। उस का आखिरी सपना। उस आखिरी सुबह जब वह पांच बजे अलार्म बजने पर रोज़ की तरह उठी थी। नहायी- धोयी थी। फिर पूजा में बैठी थी और साढ़े छः बजे जब मेरी चाय मेरे पास लायी थी तो वहीं कुर्सी पर बैठ ली थी और कहे थी, आज अजीब सपना देखा मैं ने। एक शीशा है। शीशे में एक भरा मुंह है और मुंह के अंदर मैं हूं…..”
मेरी झुरझुराहट दुगुनी हो चली है। मां की डायरी में यह बात फिर क्यों और कैसे दर्ज रही थी? और वह भी आखिरी पन्नों में नहीं? न ही सपने के रूप में? सीधे- सीधे वहां लिखा रहा था— एक भरे मुंह का निवाला हूं मैं! और मुझे चबाया जा रहा है। रोज़- ब- रोज़। शीशा दिखाऊंगी कभी…..
“मैं ने मां का यह सपना सुना था,” मैं पापा की बात बीच में काट देती हूं, “और आप की डपट भी। आप मां को बहुत डपटते थे,पापा। क्यों? पापा?”
“वह मुझे छोटा आदमी समझती थी। अल्पबुद्धि और निकम्मा। सदियों, सदियों से दुनिया भर की औरतें जिन कामों में दिलचस्पी लेती रहीं थीं, वही काम वह बेदिली और बेरुखी से करती थी। तुम्हें याद नहीं क्या? मैं जब भी कहता, आज पकौड़े खांए जांए, चटनी भी बनाई जाए तो वह हर बार मेरा कहा- बेकहा रहने देती थी…..”
“मैं इन किताबों पर लेबल चिपका देती हूं,” पापा का ध्यान मैं मां से हटा देना चाहती हूं। उन के मुंह से मां की बुराई मुझ से सुनी नहीं जाती।
“लेबल लग जांएगे,” पापा अपनी कुर्सी से उठ खड़े होते हैं, “पहले घर चला जाए…..”
“चलिए,” मैं उन के साथ हो लेती हूं।
उन के कदम से कदम मिलाती
हुई।
(2)
“गाड़ी कहां है?” मां की स्कूटी को उस की जगह पर न देख कर पापा पूछते हैं।
“सुभाष और मुकुंद उसे ले गए हैं,” कांति तत्काल रसोई से हमारे पास आन खड़ी होती है,“हलवे के लिए कुछ मेवा लाने।”
“टक्कर लगाने के वास्ते?” पापा गुस्से पर सवार हो लिए हैं, “चालान करवाने के वास्ते ? या फिर मरने- मराने के वास्ते?”
स्कूटी के मामले में पापा बहुत पक्के हैं। शुरू ही से वह इसे अपने कब्ज़े में, अपने अधिकार में रखते रहे हैं। उन से पूछे बिना मां भी उसे कहीं नहीं ले जा सकती थी। हालांकि उसे मां ने ही खरीदा था। सात साल पहले। मुुझे मेरे नए स्कूल पहुंचाने-लिवाने। जो यहां से दूर पड़ता है। इस बौएज़ स्कूल की अपनी छः साल की नौकरी के बल पर लोन ले कर। जिसे उतारने में उन्हें आगामी पांच साल लगे थे।
“शुभ- शुभ बोलिए, जी। मेरे भाई गाड़ी चलाना जानते हैं,” कांति पापा की बांह अपने अंक में भर लेती है। पापा और कांति एक दूसरे को दुलारते रहते हैं। अक्सर और खूब।
“टक्कर क्यों होगी?जी ? चालान क्यों होगा? जी? और आप की तो फिर भी हल्की गाड़ी है। स्कूटी। उधर वह भारी गाड़ी चलाते हैं। भांत- भांत के स्कूटर क्या और मोटर साइकिल क्या…..”
“बक मत,” पापा अपनी बांह छुड़ा लेते हैं, “बाप तेरा भिखमंगा। चौबीसों घंटे चारपाई पर पड़ा रहता है। और ये शहज़ादे स्कूटर चलाते हैं? मोटर साइकिल चलाते हैं?”
“हां, चलाते हैं। मेरे बाबूजी अपनी बीमारी की वजह से नहीं चला पाते तो क्या हुआ? उधर बाबूजी के पास न सही मगर घर में ताऊ लोग के स्कूटर हैं न! चाचा लोग के मोटर…..”
“धौंस दिखाती है?” पापा कांति के चेहरे पर एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाते हैं, “अकड़ दिखाती है? उन टुच्चों के बल पर? जिन्हों ने तुझे इधर खाली हाथ भेज दिया?”
अपनी गाल अपने हाथ से ढांप कर कांति रसोई की ओर चल देती है।
पापा उस का पीछा करते हैं।
पापा का गुस्सा तेज़ है और बुरा भी। मां की डायरी में एक जगह लिखा भी रहा था : ‘इन में धैर्य की भी कमी है और क्षमा की भी। इस लिए इन्हें गुस्सा बहुत आता है और बहुत जल्दी आता है…..’
“भिखमंगों का प्लान तो देखो। गाजर लिए चलो। बहन के घर पर दूध है। चीनी है। खोया है। गैस है। हलवा कैसे नहीं मिलेगा?”
“मुझे अब हलवा बनाना ही नहीं,” कांति रोने लगती है।
“इधर आओ, वीरा,” पापा मुझे पुकारते हैं और दूध के दो पैकट और पुुरानी अखबार में लिपटा खोया मेरी ओर बढ़ा देते हैं, “ दोनों चीज़ वापस कर आओ। हलवा जब बनना ही नहीं तो इन्हें क्यों बरबाद किया जाए?”
“ठीक है,” मैं उन के हाथ खाली कर देती हूं।
दूध की दुकान इस स्कूल के परिसर के गेट पर है। लगभग तीन सौ कदम की दूरी पर।
पापा के संग उस दुकानदार की अच्छी लिहाज़दारी है और वह दोनों चीज़ लौटा ले लेता है। और उन के दाम मुझे पकड़ा देता है।
घर में मैं कदम रखती हूं तो स्कूटी को उस की जगह पर वापस पाती हूं।
लेकिन घर में सन्नाटा है।
(3)
मैं बरामदा पार करती हूं तो कांति की हिचकियां मुझ तक चली आती हैं। उस के कमरे से। पापा वहां नहीं हैं।
“ये रुपए वापस हुए हैं,”कांति का दरवाज़ा मैं तभी लांघती हूं जब उसे लांघने की मेरे पास ठोस वजह रहती है।
कांति बुरी हालत में है। चकनाचूर और अस्त- व्यस्त।
“भैया लोग दिखाई नहीं दे रहे?” मैं उस के पास जा खड़ी होती हूं।
“उन्हें मैं ने भेज दिया वापस,”
वह अपना माथा पीटने लगती है, “वे भी समझ गए इस घर में मेरी कोई मर्ज़ी नहीं। मेरी कोई जगह नहीं…..”
“मेरी मां को भी अपना भाई वापस भेज देना पड़ता था,” मैं उस के हाथ पकड़ लेती हूं, “मत करिए ऐसे…..”
बारह वर्षीय मेरे हाथ बाइस वर्षीय उस के हाथों को घेर लेने में सफल रहते हैं।
मैं उसे ढाढ़स बंधाना चाहती हूं। सुभाष की खातिर।
सुभाष से कुछ देर मैं अभी और मिलना चाहती थी।
और उस का यों सहसा चले जाना मुझे खल रहा है।
रसोई में जब कांति मुझ पर अचानक टूट पड़ी थी तो सुभाष का वहां अकस्मात पहुंच कर मुझे अपनी ओट में ले लेना मुुझे भला लगा था।
“क्यों?” कांति की जिज्ञासा उस की क्लांति पर हावी हो रही है, “वह भी मेरी तरह किसी अभागे पिता की संतान रही? एक लाचार की?”
मैं उसे बताना नहीं चाहती मां अपने पिता को अपने बचपन ही में गंवा चुकी थीं। और नानी ही ने उन्हें तथा उन के भाई को अपनी स्कूल अध्यापिकी के बूते पर बढ़ाया- पढ़ाया था।
उत्तर में उस के हाथों पर मैं अपने हाथों का दबाव बढ़ा देती हूं, “पापा की सोच ऐसी ही रही। हमेशा कहते,मायके वालों को लड़की के घर से कुछ नहीं लेना चाहिए, न खाना, न कपड़ा, न रुपया…..”
“और वह मान जातीं?” कांति की उत्सुकता बढ़ गई है। पापा से उस की शादी को आठ महीने होने जा रहे हैं लेकिन मां के प्रति उस में इतनी जिज्ञासा ,इतनी उत्सुकता मैं पहली बार देख रही हूं।
“नहीं। नहीं मानतीं। बहुत चीखतीं।बहुत चिल्लातीं। बहुत रोतीं…..”
“फिर? फिर क्या होता?” कांति अपने क्लेश से बाहर आ रही है।
“आधे-एक घंटे बाद मां अपने को संभाल लेतीं और फिर अपने काम में जुट जातीं…..”
“अपने काम में? उन का अपना क्या काम रहा करता था?”
“उन्हें उधर लाइब्रेरी का बहुत काम रहा करता,” अपने हाथ मैं खींच लेती हूं।
मां के भेद की रक्षा करने हेतू।
कांति को मैं नहीं बता सकती मां डायरी रखतीं थीं। उस में रोज़ लिखती थीं।
उन की आखिरी डायरी के उस एक पृष्ठ पर वह क्या लिखा था?
‘यह युद्ध- स्थल कैसा है? जहां वह स्वयं को युद्ध- नेता मान कर चलता है और मुझे अपनी पैदल सेना? उस के ‘दांए मुड़’ पर मुझे ‘दांए’ ही मुड़ना है? और ‘बांए मुड़’ पर ‘बांए’ ही? और ‘सामने देख’ पर ‘सामने’ ही ‘देखना’ है?’
“मैं सोचती हूं मैं भी कोई काम पकड़ लूं,” कांति अपने बिस्तर से उठ खड़ी होती है, “बारहवीं कर चुकी हूं।कंप्यूटर सीख लूं और कोई नौकरी पकड़ लूं…..”
मैं कोई उत्तर नहीं देती हूं।
वह बेआरामी जो कांति और मेरे बीच अभी कुछ पलों के लिए खिसक गई थी, फिर पलट रही है…..
पसर रही है…..
हमारे देश की स्त्री के अक्सर यही हालात रहते हैं अगर अनपढ़ हों तो पुरुष उनको हीन समझ कर तिरस्कृत करता है और यदि पढ़ी- लिखी और कमाऊ हों तो स्वयं हीन भावना से ग्रस्त हो कर उसपर अत्याचार करता है। उसे स्त्री की भावनाओं का मान रखना कम ही आता है। सचमुच एक विवाहित औरत युद्ध में एक सिपाही की तरह ही होती है जो अपने कप्तान के इशारे पर चलती रहती है। ख़ूबसूरत कहानी।
—ज्योत्स्ना सिंह
आदरणीय दीपक दीदी!
आपकी कहानी पढ़ी।
पढ़कर एक अलग ही स्थिति नजर आई। शायद पीछे के 60-70 के दशकों में पहुँच गए हों ,या शायद आज भी कहीं ऐसा होता होगा।
पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्गत या फिर निम्न स्तरीय मध्यम वर्ग में दहेज लोभी पुरुषों का व्यवहार लगभग ऐसा रहता है कि वह स्त्री को पैर की जूती समझते हैं।
कहानी एक बारह वर्षीय बच्ची की है। किशोर वय में प्रवेश करती बच्ची स्कूटी में माँ के साथ स्कूल जाते हुए एक्सीडेंट में अपनी माँ को खो देती है।
सौतेली माँ के लिये अपनी माँ का कमरा खाली करते हुए उसे माँ की डायरी मिल जाती है।
इसमें लिखा था “एक भरे मुँह का निवाला हूँ मैं! और मुझे चबाया जा रहा है रोज़-ब-रोज़। शीशा दिखाऊंगी कभी…..।”
वक्त कभी-कभी बच्चों को समय से पहले बड़ा कर देता है।
बच्ची जानती थी कि उसके पिताजी उसकी माँ को कितना और किस तरह प्रताड़ित करते थे।
माँ के यह कथ्य उसके दिमाग में बैठ जाते हैं।
और वह सौतेली माँ के सताने पर। यही बात उससे बोल देती है।
जब उसकी सौतेली मां उसे मारती है और पिता के पूछने पर वह बताती है की माँ ने सपना सुनाने पर मारा।
और उसके बताने पर की कौन सा सपना? पिता कहते हैं कि यह सपना तुम्हारा हो ही नहीं सकता तुम्हारी माँ का था। बच्ची को भी समझ में आ जाता है कि पिता ने भी डायरी पढ़ ली है।
कहानी का संपूर्ण सार कहानी के अंत में उजागर होता है।
जब वह अपनी सौतेली माँ को पूरी कहानी सुनाती है कि किस तरह पिताजी उसकी माँ को भी इसी तरह पर प्रताड़ित करते थे। जबकि माँ नौकरी करती थीं।
और तब सौतेली माँ भी नौकरी करने पर विचार करती हैं।
60- 70 के दशक में इसी तरह की सोच थी की लड़कियों के मायके वालों को ससुराल वालों से कुछ नहीं लेना चाहिये। ऐसा होने पर ताने सुनने को मिला करते थे। हमने उस समय को महसूस किया है। और यह कहने में हमें जरा भी गुरेज नहीं के होते हुए भी देखा है।
कहानी को पढ़ते हुए यह पीड़ा महसूस हुई।
स्त्री के बिना पुरुष रह भी नहीं पाते। लेकिन स्त्री को इंसान समझ नहीं पाते।अपना नहीं समझ पाते। वास्तव में बहुतायत में ऐसा होता था कि पत्नी वस्तु की तरह होती, जिसे ठोकर मार कर कहीं भी फेंका जा सकता था। एक खत्म हुई दूसरी को ले आए।पर फितरत नहीं बदलती।
शीर्षक सार्थक है। वीरा की माँ के जाने के बाद वही सब सौतेली की माँ के साथ होने लगा।
यह दूसरे दौर का प्रारंभ था!
पता नहीं क्यों इस कहानी को पढ़ते हुए बंगाली परिवार जैसा आभास हुआ।
बांग्ला साहित्यकार शरत्चंद्र हमारे प्रिय लेखक रहे और हमने उन्हें बहुत पढ़ा, फिर बंकिम चंद्र और रविंद्रनाथ टैगोर को बहुत पढ़ा।
और हमने महसूस किया की महिलाओं को वहाँ पर तो बहुत ही प्रताड़ित किया गया।
रवींद्रनाथ टैगोर का एक कहानी संग्रह हमने खरीदा था। लेकिन कहानियों को पढ़कर इतना अधिक डर-सहम गए कि दो-तीन कहानी पढ़ कर ही हमने उस किताब को बंद करके रख दिया। उसे किताब को फिर हमने घर में भी नहीं रखा।
यह कहानी भी उनसे तो कमतर लेकिन उनके आसपास ही लगी।
अतीत की परछाइयों को वर्तमान में दिखाने के लिए कि, एक वक्त ऐसा भी था,आपका शुक्रिया। ऐसी कहानियाँ दुख देती हैं लेकिन अब समय बदल रहा है। स्थितियाँ पूरी तो नहीं लेकिन धीरे-धीरे बदल रही हैं।
आने वाला समय जाने का कि पीछे की दुनिया महिलाओं के लिये कितनी तकलीफों से भरी हुई थी।