Monday, March 9, 2026
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संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’ की कविता – रिश्ते

कुछ रिश्ते होते हैं खट्टे-मीठे चटपटे से
हाशिए पर खड़े बतियाते रहते हैं
देकर इक दूजे को सहारा
हौले -हौले से मुस्काते रहते हैं…
लेकिन
कोई रिश्ता हो जाए जब नीम की निंबोली सा कड़वा
तो कब ताउम्र निभ पाया है
रेत की नींव पर
पत्थर का महल कब टिक पाया है ?
लड़खड़ाता रिश्ता औंधे मुँह गिर,
फिर कब खड़ा हो पाया है
स्वार्थ की बैसाखी पकड़े वह कब चल पाया है…
कभी गैरों से छला कभी अपनों से हारा है
जब भी किया मेरा तुम्हारा है
या जिम्मेदारियों को नकारा है…
देखा है रिश्तो को मैंने
मतलब के पैरहन में बँधते हुए
घुटनों के बल चलते हुए
रोते हुए सिसकते हुए
कई बार चीख सुनी है उनकी
दम घुटते हुए भी देखा है उनका…
लेकिन परे इनके भी
होते हैं कुछ मासूम से रिश्ते
साँस लेते… धड़कते रिश्ते
प्यार की खुशबू से महकते रिश्ते
किसी को अपना बनाने की चाहत में
उम्मीद की रोशनी में सँवरते रिश्ते
कभी रूठते कभी हँसते
समर्पण की आँच में पिघलते रिश्ते
विश्वास की भट्टी में तप कर कुंदन बन जाते हैं
चमकते हैं
दमकते हैं
गम हो या खुशी
इक संग लहकते हैं
मीठी बोली सा चहकते हैं
मन की हर बात कहने से कभी न हिचकते हैं…
संग इनके मुस्कुराती सृष्टि सारी है
सुनाई देती झरनों की गूँज प्यारी है
ओस की बूँदें भी पत्तों पर बरस जाती है
चाँदनी भी चारों और छिटक जाती है
नदिया की लहरें झूम-झूम गाती हैं
पुरवइया गीत अनूठे सुनाती है
ऐसे रिश्तों पर ही चलती दुनिया सारी है
ऐसा रिश्ता सदियों में नजर आता है
जिस पर बिखरी शबनम है ।
पर नजर आ जाता है…
यही क्या कम है…!!

संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’
संस्थापिका -अंजुमन ए पंखुड़ी अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक मंच
Email: [email protected]
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