Thursday, July 23, 2026
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उखड़ती साँसों को पहनाईं हथकड़ियां..

यदि मैंने स्वयं यह वीडियो टीवी पर नहीं देखा होता, तो मैं कभी विश्वास नहीं कर सकता था कि किसी देश की पुलिस इतनी अधिक क्रूर और निर्दयी हो सकती है। यह वीडियो 18 वर्षीय श्वेत युवा हेनरी नोवाक की हत्या से संबंधित था, जिसकी 23 वर्षीय सिख युवक विक्रम डिगवा ने चाकू से गोदकर हत्या कर दी थी। ख़ून से लथपथ हेनरी नोवाक गिड़गिड़ाकर कह रहा था, “मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ…”, मगर पुलिस अधिकारी उसके हाथ पीठ के पीछे ले जाकर उसे हथकड़ी लगा रहा था और उसे बता रहा था कि उसे गिरफ़्तार किया जा रहा है तथा उसके कानूनी अधिकार क्या हैं।

दरअसल, यह हादसा दिसंबर 2025 में साउथैम्प्टन क्षेत्र में घटित हुआ था। रात के समय भारतीय मूल के सिख परिवार का 22/23 वर्षीय युवक विक्रम डिगवा अपने कुछ दोस्तों के साथ सड़क किनारे मौज-मस्ती कर रहा था। उसी दौरान हेनरी नोवाक अकेले कहीं से वापस अपने घर की ओर जा रहा था। विक्रम के समूह ने नोवाक पर कुछ टिप्पणियाँ कीं, जिससे बहस शुरू हो गई। इसके बाद विक्रम डिगवा ने अपना कृपाणनुमा छुरा निकालकर हेनरी नोवाक पर जानलेवा हमला कर दिया।

हेनरी नोवाक वहीं ज़मीन पर गिर गया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, हालात से घबराकर विक्रम या उसके भाई ने स्थानीय पुलिस को फ़ोन किया और कहा कि एक गोरे युवक ने उन पर नस्ली टिप्पणियाँ करते हुए हमला किया तथा उसकी पगड़ी गिरा दी। पुलिस ने नस्ली हमले की सूचना मिलते ही तत्काल कार्रवाई की। आरोप है कि उन्होंने परिस्थितियों को समझने के बजाय विक्रम की बात को सच मानते हुए हेनरी नोवाक को हथकड़ी पहनानी शुरू कर दी। उनके लिए नस्ली टिप्पणी, छुरा मारने की घटना से अधिक गंभीर प्रतीत हुई। हालाँकि, हेनरी नोवाक की मृत्यु के बाद उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

ध्यान रहे कि हेनरी नोवाक साउथैम्प्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा था, जबकि विक्रम डिगवा के संबंध में न तो किसी शैक्षणिक रिकॉर्ड की जानकारी उपलब्ध है और न ही किसी नौकरी या व्यवसाय की। पुलिस ने विक्रम डिगवा को गिरफ़्तार कर लिया। साथ ही उसकी माँ किरण कौर को भी हत्या में प्रयुक्त हथियार को छिपाने तथा साक्ष्य मिटाने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया।

दिसंबर की उस घटना पर अदालत का निर्णय जून 2026 में आया, जिसके अनुसार विक्रम को उम्रकैद, यानी कि 21 वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई। मगर उसकी माँ किरण कौर को अभी सज़ा सुनाई जानी है। ऐसे में पुलिस ने वह वीडियो जारी कर दिया, जिसमें हेनरी नोवाक के जीवन के अंतिम पल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। पुलिस का क्रूर स्वरूप साफ़ देखा जा सकता था। इससे पुलिस की मानसिकता का भी भली-भाँति अनुमान लगाया जा सकता है।
इस वीडियो ने ब्रिटेन के मीडिया में एक तूफ़ान-सा ला दिया। राजनीतिज्ञ इस हत्या और उस पर पुलिस के व्यवहार को लेकर सरकार से सवाल पूछने लगे। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चुप्पी साधे रहे और अंततः राजनीतिक दबाव के चलते उन्होंने संसद में इस हत्या की दबे शब्दों में निंदा की। मीडिया में वर्तमान प्रधानमंत्री का वह वक्तव्य भी वायरल हो गया, जो उन्होंने अमेरिका के एक अपराधी जॉर्ज फ़्लॉयड की पुलिस हिरासत में मृत्यु पर दिया था। उस समय सर कीर स्टार्मर विपक्ष के नेता थे।

वर्तमान प्रधानमंत्री और उनकी सहयोगी एंजेला रेनर ने उस समय लेबर पार्टी के सभी कर्मचारियों को भेजे गए एक संयुक्त संदेश में कहा था कि वे “पुलिस हिरासत में जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत से स्तब्ध और क्रोधित हैं” तथा “यह देखकर भयभीत हैं कि शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने के अपने अधिकार का प्रयोग कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया है।”
“समाजवादी और नस्लवाद-विरोधी होने के नाते, हम अश्वेत लोगों के प्रति पुलिस की बर्बरता के विरुद्ध खड़े होने वालों के साथ पूरी एकजुटता से खड़े हैं।” दोनों नेताओं ने अमेरिकी पुलिस के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कहा।
उन्होंने आगे कहा, “हम राष्ट्रपति ट्रम्प की प्रतिक्रिया तथा जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के मद्देनज़र उनकी कार्रवाई की निंदा करने में हमारी अपनी सरकार की विफलता से स्तब्ध हैं।”

उन दिनों ब्रिटेन में एक वाक्य बहुत अधिक वायरल हुआ था- “अश्वेत जीवन भी मायने रखता है” (Black lives also matters)।

ब्रिटेन में नस्लवादी टिप्पणी को एक गंभीर अपराध माना जाता है। पुलिस के व्यवहार से ऐसा सोचना वाजिब लगता है कि वहाँ स्थानीय श्वेत निवासियों और प्रवासी समुदायों को लेकर पुलिस और कानून की सोच अलग-अलग है। अर्थात् नस्ली भेदभाव केवल बहुसंख्यक श्वेत ही कर सकते हैं। इस मामले में गोरों के लिए अलग कानून है और प्रवासी समुदायों के लिए अलग।

‘पुरवाई’ पत्रिका को वह विधेयक भी याद आता है, जिसे भारत की संसद में कांग्रेस सरकार ने प्रस्तुत किया था और जिसे ‘सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011’ कहा गया था। इसके अनुसार सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति में उस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी को उत्तरदायी माना जाएगा। ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिटेन की लेबर पार्टी और भारत का वर्तमान विपक्ष कुछ समान सोच रखते हैं।

वैसे, हेनरी नोवाक की हत्या हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में हुई सूर्या चौहान की हत्या की भी याद दिलाती है, जिसे ईद के अवसर पर असद नामक युवक ने अपने मित्रों के साथ मिलकर अंजाम दिया था। कहा जाता है कि जैसे विक्रम के मामले में उसकी माँ किरण कौर पर भी आरोप लगे, उसी प्रकार इस मामले में असद के पिता पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है।

ज़ाहिर है कि राजनीतिज्ञ परिस्थितियों का लाभ उठाते ही हैं। ब्रिटेन की रिफ़ॉर्म पार्टी के नेता नाइजल फ़राज ने वर्तमान सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी। नाइजल फ़राज ने कहा कि पुलिस द्वारा चाकू से घायल व्यक्ति के साथ किए गए व्यवहार पर उन्हें “तीव्र आक्रोश” है, क्योंकि बॉडीकैम फ़ुटेज में मृतक किशोर को ग़लत तरीके से हथकड़ी पहनाते हुए देखा जा सकता है।

दक्षिणपंथी नेता टॉमी रॉबिन्सन ने X पर दावा किया कि हेनरी नोवाक की “नस्लवादी पुलिस नीतियों के कारण हत्या हुई, जो श्वेत लोगों को निशाना बनाती हैं।” साथ ही, टॉमी रॉबिन्सन ने एक रैली का भी आह्वान किया। अमेरिकी अरबपति एलॉन मस्क ने इस पोस्ट को साझा किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक आंदोलनकारी और ऑनलाइन समूह इस प्रकार की घटनाओं को किस प्रकार बढ़ावा दे सकते हैं। एलॉन मस्क ने यह प्रस्ताव भी रखा कि एक निजी जासूस की सेवाएँ लेकर इस हत्याकांड की स्वतंत्र जाँच कराई जाए। इस पर होने वाला व्यय वहन करने की इच्छा भी उन्होंने व्यक्त की।

हर तरफ़ एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है कि उन पुलिस अधिकारियों पर मुक़दमा चलाया जाए, जिन्होंने हेनरी नोवाक के साथ अमानवीय व्यवहार किया। उच्चाधिकारी संबंधित पुलिसकर्मियों का बचाव करते दिखाई दे रहे हैं, किंतु उनका प्रयास सफल नहीं हो पा रहा है।

मगर एक बात हैरान करने वाली है कि पूरे सिख समुदाय ने इस हत्या की निंदा की है और गुज़ारिश भी की है कि इस बेवकूफ़ी भरी हरकत के कारण पूरी सिख कौम को कटघरे में ना खड़ा किया जाए। गुरुद्वारे के ज्ञानियों से लेकर भारतीय मूल के सांसदों ने भी यही अपील की है।

एक बात हैरान करती है कि ब्रिटेन में आम नागरिक और विपक्षी दल चाहते हैं कि सभी के लिए समान नियम और कानून हों, जबकि भारत में विपक्षी दल नहीं चाहते कि सभी के लिए समान नियम-कानून लागू किए जाएँ। एक भारतीय मूल का व्यक्ति, जो ब्रिटेन में रहता है और दोनों देशों से प्रेम करता है, हैरानी से यह सब देख रहा है और सोच रहा है कि वास्तव में सही क्या है।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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37 टिप्पणी

  1. यह संपादकीय नस्लवाद ,नस्ली हिंसा ,नस्ली सोच और राजनीति को अवसरवादिता और स्वार्थपरता को एक समीकरण में तौलता और पड़ताल करता है।यह बात अब आईने की तरह साफ है कि अल्प संख्यक समुदाय अब क्या इंग्लैंड क्या भारत क्या अमेरिका ,, और इनके बल पर जीते राजनीतिज्ञ एक भयावह संस्करण होते जा रहे हैं।
    संपादक ने भारत का संदर्भ भी औचित्य पूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत किया है कि समान कानून लाना सभी और देश के हित में है।वरना सन 2011में कांग्रेस का कानून लाना कि यदि कोई हमला या उपद्रव होता है तो स्थानीय जन बहुल अाबादी को जिम्मेंवार ठहराया जायेगा ।
    ब्रिटेन और भारत की राजनीति अब एक समानता की ओर बढ़ती जा रही है और कहावत भी याद आती है ,,,हम करें सो लीला ,,तुम करो उत्पात,,,,इसे वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री साहब की अमेरिकन नस्ली हिंसा की टिप्पणियों से साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया है ।ताकि पाठक विवेकपूर्ण और औचित्यपूर्ण ढंग से इस संपादकीय को पढ़ें और समझें।
    एक निर्भीक और खरे खरे परंतु मर्यादित संपादकीय हेतु पुरवाई को बधाई।

    • भाई सूर्य कांत जी, इतनी त्वरित एवं सार्गर्भित टिप्पणी हमारे लिये उत्साहवर्धक है… आपने संपादकीय को सही परखा है।

  2. बेहद ग़लत और निंदनीय आचरण तो इसमें भारतीय विद्रूप स्थितियों का संदर्भ आपकी सम्पादकीय को बड़ा और गंभीर बना देता है, ऐसा लगता है पुलिस का आचरण मानवता के खिलाफ़ होता है और राजनीतिक व्यक्ति बहुत ही पक्षपाती

  3. सादर नमस्कार सर…
    बहुत संवेदनशील घटना… क्या हो गया आजकल के युवाओं को… सोचने समझने की शक्ति खो बैठे हैं…
    इसके लिए जो भी दंड विधान है लागू करने के बाद भी मानसिकता नहीं बदलती… आपका अंतिम प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है… हमारे देश में अब विपक्ष वही चाहता है… जो विनाशकारी प्रक्रिया अन्य देशों में चल रही है…।
    सर… जब हम स्वयं को नहीं सुधारते हैं….तो सिस्टम को क्यों दोष देंगे?

    साधुवाद……

  4. आज के बेहद विद्रुप समय और समाज को सामने लानेवाला बेहद चिंतनीय स्थिति को प्रस्तुत करता संपादकीय।
    संतुलित और विचारणीय

  5. Injustice any where is a threaten to justice every where किसी फ़िल्म का डायलॉग है लेकिन जब तब दिमाग़ में कौंधता है । अल्पसंख्यक समुदाय की गरिमा को बनाए रखने के लिए सरकारें प्रतिबद्ध होती हैं सामान्यत:, होना भी चाहिए क्योंकि बहुसंख्यक की भाँति अल्पसंख्यक भी देश के नागरिक होते हैं लेकिन इसका मतलब यह तो कतई नहीं है कि बहुसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक होने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। आज हर देश में माहौल ऐसा बनता जा रहा है कि मनुष्य होने से पहले जाति धर्म वर्ण प्राथमिक हो गए हैं , किसी की सहायता तब की जाएगी जब वो इस बिरादरी का होगा , कोई फ़लाँ धर्म या जाति का है तो वह गुनहगार होगा ही , हमारी यह पूर्व धारणाएँ पूर्वाग्रह टूटने का नाम नहीं ले रहे बल्कि और बढ़ रहे हैं । साफ़ शब्दों में कहा जाए तो मनुष्य आज से सौ साल पहले , जब कम शिक्षा थी ,कम साधन थे ,कम तकनीक थी ,कम संसाधन थे ,कम विकास था ,जितना बँटा हुआ था उससे कई गुना ज़्यादा आज बंटा हुआ है । सबसे भयावह यह है कि आने वाली पीढ़ी को विरासत में भी हम यही दे रहे हैं – यह बहुत खतरनाक होता जा रहा हैजैसे सब बारूद के ढेर पर बैठे हैं । जहाँ तहाँ बस वैमनस्य बढ़ाने वाली बातें या प्रपंची उपदेश । कोफ़्त होती है कि क्या यह समय का दंश है कि तिलक माथा देख कर लगाया जाएगा । फिर तो सारा साहित्य , कला , विज्ञान , प्रगति निर्मूल है । क्या हम फिर से आदिम युग की ओर बढ़ रहे हैं ?
    हाँ एक और बात -उस विधेयक का हवाला क्यों ही देना जो ख़ुद अपनी कमज़ोरी के कारण पारित नहीं हो पाया ।
    आप लगातार अपनी वैश्विक सोच से रचे गए संपादकीय के माध्यम से हम जैसे निहायत देसी बंदों को वैश्विकता से जोड़ रहे हैं , साधुवाद

    • बबीता जी, आपने संपादकीय के मर्म को समझ कर एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। हार्दिक धन्यवाद।

  6. आदरणीय शर्मा जी,
    सादर अभिवादन।
    आपका संपादकीय कानून के विवेकपूर्ण पालन का सन्देश देता है। मानव समाज को सुधारने/दण्डित करने के लिए बना कोई भी कानून अपने आप में श्रेष्ठ, सुधार से परे और अद्वितीय नहीं होता। कानून के पालन में लागू करने वाले व्यक्ति या संस्था की परिस्थिति की समझ और विवेक उसके उचित, अनुचित परिणाम के लिए जिम्मेदार होते हैं। एक महत्वपूर्ण विषय पर केंद्रित तथा मार्गदर्शी संपादकीय लिखने के लिए आप को बधाई एवं भविष्य में इसी प्रकार के लेखन हेतु हार्दिक शुभकामनाएं।

  7. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    आज के संपादकीय ने स्तब्ध कर दिया। बहुत दुख हुआ पढ़ कर।
    क्रूरता और निर्दयता की हद है।नस्लभेद,रंग-भेद , पुलिस, मानवीयता राजनीति, क्रूरता!!!! कानून इतना अधिक अंधा, बहराऔर लापरवाह क्यों होता है ?

    जिसकी संतान जाती है उसके दुख का क्या? वास्तव में मानवीयता से ऊपर कुछ नहीं है। पर मानवीयता कहाँ है?

    सिख समुदाय ने जो बात कही है हम इससे सहमत हैं। किसी एक की गलती की सजा के लिये,वह भी जानबूझकर की गई गलती की सजा के लिये प्रवास में रहते हुए यह एक सही निर्णय है।

    हम इस बात से भी सहमत हैं कि हर जगह सबके लिये नियम और कानून एक समान ही होना चाहिये।

    सूर्य चौहान की हत्या दुखद थी उसके लिए भी इतना ही अफसोस हुआ था, भले ही उसका स्वरूप सांप्रदायिक था।
    आजकल लोग जरा जरा में मारपीट करने पर उतारू हो जाते हैं! कैसे जेब में छुरा लेकर घूमते हैं पता ही नहीं चलता!!

    किसी के भी चाहने या न चाहने से कुछ भी नहीं होता।सारा खेल राजनीतिक हित से जुड़े होते हैं। वहाँ का तो नहीं पता,लेकिन भारत में तो यह तय है कि सारे नियम और कानून राजनीति और चुनाव से ही जुड़े हैं।

    भारत में तो एक नस्ल गरीबी नाम की भी है। पता नहीं इंसान,इंसान कब बन पाएगा।

    एक भारतीय मूल के व्यक्ति की पीड़ा महसूस हुई।

    इस बेबाक संपादकीय के लिये आपकी हिम्मत को सलाम सर जी!

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपको संपादकीय पसंद आया और आपने संपादकीय में शामिल मुद्दों पर गहरायी से चर्चा की… आपका हार्दिक धन्यवाद।

  8. सादर प्रणाम भाई,
    आज के संपादकीय ने.स्तब्ध कर दिया। जिनके ऊपर रक्षा का दायित्व है वही क्रूर और अमानवीय व्यवहार कर सकते हैं सहसा विश्वास नहीं होता।हालांकि पुलिस का क्रुर व्यवहार कोई नयी बात नहीं रह गई है भारत में और चाहे विश्व में कहीं भी। सभी पक्ष चाहे सामाजिक मुद्दों से जुडे हों या सामयिक, राजनीतिक गलियारों में केवल स्वार्थ और सत्ता लोलुपता की ही जय.होती है।वहां की बात कुछ अलग है क्योंकि नस्लीय भेदभाव वहां घोर अपराध की श्रेणी में आता है परंतु हमारे देश में तो जाति वर्ग संप्रदाय को लेकर बहस और संघर्ष के मुद्द हमारे राजनेता ही बनाते हैं।मानवीयता की बात कम होती है। सिख युवक विक्रम डिगवा द्वारा छात्र हेनरी नोवाक की हत्या और पुलिस का उसके प्रति क्रूर व्यवहार मानवता को शर्मसार करता है। मैं इस समय केवल मानवता के हित की ही बात सोच रही हूं।कानून और न्याय को और सशक्त बनाना होगा।जाति और नस्लीय भेदभाव के नाम पर उचित सजा एवं सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी।
    एक बार पुन: इस बड़े मुद्दे को समाज और न्याय,व्यव्स्था के सामने लाने का साहस आपने संपादकीय के माध्यम से किया।बहुत बहुत बधाई, आभार भाई।
    सादर प्रणाम।

    • प्रिय पद्मा, आप पुरवाई के हर संपादकीय पर गहरी दृष्टि डालती हैं और भावनाओं एवं तर्क को मिला कर अपनी टिप्पणी लिखती हैं। दिल से शुक्रिया।

  9. आपने अपने संपादकीय में फिर इस बार एक गंभीर सामयिक विषय को चर्चा के लिए लिया है उसके लिए आपको साधुवाद। दरअसल यह मात्र इंग्लैंड की सामाजिक और कानून व्यवस्था को ही नहीं इंगित करता बल्कि भारत समेत विश्व के कई देश इस स्थिति से सुचारू रूप से निबटने में प्रयत्नशील हैं। जैसा कि इस घटना में देखा गया कि एक झूठी कहानी गढ़ के अपराधी ने पीड़ित को ही दोषी ठहरा कानून को गुमराह करने की कोशिश की जिसमें न केवल घटना स्थान पर मौजूद उसके साथी, बल्कि उसकी मां ने भी उस षडयंत्र में अपनी गंभीर भूमिका निभाई। यह सब मुमकिन हुआ क्योंकि वहां का कानून इस पूर्वाग्रह से ग्रसित था कि नस्लवादी भेदभाव केवल बहुसंख्यक समाज ही अपना सकता है। इस पूर्वाग्रह के चलते पुलिस को पीड़ित की नाजुक स्थिति को बिल्कुल नकारते हुए उसे हथकड़ी पहना कर उसके अधिकारों के बारे में ज्ञान देने में समय नष्ट करना, न कि उसे शीघ्रता से किसी अस्पताल में फौरी इलाज के लिए ले जाना दर्शाता है कि न केवल पुलिस में ऐसी धारणाओं, सीमित दृष्टिकोण और आरोपियों के प्रति कार्रवाही के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल में तुरंत बदलाव की ज़रूरत है बल्कि समाज को भी नई वास्तविकता को समझना होगा। अपने कनाडा पोस्टिंग के दिनों वर्ष 1993 की एक घटना याद आती है। एक बार एक अफ्रीकी मूल की महिला को वहां की TTC बस के श्वेतवर्णीय चालक को बेहिसाब भद्दी भद्दी गालियां देते और अपनी हिंसक प्रवृत्तियों का प्रदर्शन करते देखा जबकि उस चालक का कोई कसूर नहीं था, शायद वह उससे टिकट लेने के लिए कह बैठा था। वह बेचारा, चुपचाप, बिना किसी प्रतिक्रिया के उसके पागलपन को सहता रहा क्योंकि नस्लवाद संबंधित पूर्वग्रहों के चलते अधिकारियों द्वारा उसे ही दोषी करार दिया जाता। हमारे यहां भी जितने कानून दलितों, स्त्रियों और दूसरे वंचित वर्गों के लिए समय समय पर बनाए गए हैं, अक्सर उनका दुरुपयोग ही होता देखा है जिसके चलते उनमें से कुछ को तो न्यायालय की अनुशंसा पर सरकार को संशोधित करना पड़ा। इंग्लैंड और दूसरे देशों को भी अब प्रवासी अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपात का पीला चश्मा उतार कर वास्तविकता को देखना होगा।

    • बिमल सर, आपके अनुभव इतने व्यापक हैं कि आप किसी भी विषय की भीतरी जानकारी रखते हैं। इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  10. ‘उखड़ती सांसों को पहनाईं हथकड़ी’ संपादकीय बहुत दुखद और दिमाग में तनाव पैदा करने वाला है। एक श्वेत युवा की थोड़ी सी बहस में विक्रम डिगवा द्वारा हत्या कर देना क्रूरता है। विदेश में जाकर प्रवासी बेटे का उच्छृंखल व्यवहार और ऊपर से हत्या जैसा जघन्य कृत्य शर्मिंदा करता है।
    वहां की पुलिस भी कम दोषी नहीं है। श्वेत युवा हेनरी नोवाक खून में लथपथ पड़ा है। उसे सांस लेने में कठिनाई हो रही है और पुलिस अस्पताल पहुंचाने के बजाय उसका अपराध बताकर हथकड़ियां पहना रही है। माना कि नस्लीय टिप्पणियां वहां अपराध की श्रेणी में आती हैं पर परिस्थिति भी देखी जानी चाहिए थी।
    इसी जून में वहां की अदालत ने हेनरी नोवाक को न्याय देकर अच्छा काम किया। विक्रम डिगवा को उसके अपराध के लिए 21 साल की सजा सुनाई गई।
    सिक्ख समुदाय ने इस दुखद घटना की निंदा की है, जो कि भारत के लिए तथा प्रवासी भारतीयों के लिए राहत पहुंचाने वाली बात है।
    प्रवासी भारतीयों को यह समझना चाहिए कि जिस देश में जाते हो वहां भाईचारा बनाकर रखना होगा। खराब हरकतों से कोई अपने यहां ठहरने न देगा। मैं दब्बूपन की बात नहीं कर रहा हूं कि आप दब्बू बनकर रहें। वहां के सिस्टम के साथ मिलकर उन्नति की बात कर रहा हूं।
    विदेशों में हम इसलिए जाते हैं कि हमारा जीवनयापन अधिक सुगम हो। हम अपनी प्रतिभा का सही उपयोग कर सकें।
    मेरा निजी मत तो यह है कि सभी के लिए नियम कानून एक जैसे होने चाहिए जिसमें निष्पक्षता हो। अलग-अलग नियम कानून अलगाव पैदा करते हैं। घर में ही देख लीजिए… बच्चों के बीच थोड़ा सा भी अलग व्यवहार हो जाता है तो वे विद्रोह पर उतर आते हैं। कुछ देशों (विकासशील देशों) में आर्थिक असमानता बहुत अधिक है। इसके लिए पिछड़ चुके लोगों को कुछ संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं। यह एक तरह से ठीक है।
    इस दुखद घटना को संपादकीय के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाकर अच्छा काम किया है। पत्रकारिता को यह विश्वसनीयता प्रदान करता है।

    • प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, आपने अपनी टिप्पणी के अंत में लिखा है – इस दुखद घटना को संपादकीय के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाकर अच्छा काम किया है। पत्रकारिता को यह विश्वसनीयता प्रदान करता है।… आपका हृदयतल से आभार।

  11. आदरणीय , समसामयिक मानवीय संवेदना और विमर्श धर्मिता पर केंद्रित आपका ये संपादकीय, जिसके अंतर्गत ब्रिटेन की चर्चित घटना के माध्यम से नस्लवाद, पुलिस की कार्य शैली, न्याय प्रणाली व राजनीतिक व्यवस्था पर गहन और विचारणीय प्रश्न उठाया गया है।लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के अंतर्गत कानून, न्याय व्यवस्था किसी भी जाति, नस्ल धर्म अथवा समुदाय के आधार पर नहीं अपितु नागरिकों के समान अधिकारों के सिद्धांत पर ही गठित होनी चाहिए।
    इस विचारोत्तेजक संपादकीय में कानूनी समानता और निष्पक्ष न्याय की आवश्यकता आपकी वैचारिक स्पष्टता को सुदृढ़ करती है और साथ ही सामाजिक सौहार्द की वैश्विक अनिवार्यता को भी प्रमाणित करती है।
    प्रभावशाली व्यंग्यात्मक यह लेख वास्तव में लोकतांत्रिक समाज की ज्वलंत समस्याओं पर गंभीर विमर्श को गति प्रदान करता है।
    बधाई और शुभकामनाएँ

  12. बहुत बढ़िया संपादकीय, ऐसी घटनाएँ बहुत उदास करती है। कठोर कानून बनना चाहिए। हार्दिक धन्यवाद।

  13. उखड़ती सांसों को पहनाई गई हथकड़ियाँ -संपादकीय में आपने पुलिस की क्रूरता की मिसाल पेश की है। जिसमें 23 वर्षीय सिख विक्रम डिगवा ने 18 वर्षीय श्वेत युवा हेनरी नोवाक की हत्या की कोशिश की थी। ख़ून से लथपथ हेनरी नोवाक के “मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ…” कहने के बावजूद पुलिस अधिकारी उसके हाथ पीठ के पीछे ले जाकर हथकड़ी लगाने से बाज नहीं आये।
    आपके संपादकीय से यह पता चलता है कि भारत की तरह ब्रिटेन में भी बहुसंख्यक ही दोषी होते हैं, अल्पसंख्यक नहीं।
    आपने अपनी बात स्पष्ट रूप से समझाने के लिए भारत की संसद में पारित विधेयक ‘सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011’ की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया है जिसे कांग्रेस सरकार ने प्रस्तुत किया था। इस विधेयक के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति में उस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी को उत्तरदायी माना जाएगा।
    आपने हेनरी नोवाक के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में हुई सूर्या चौहान की हत्या का भी जिक्र किया है जिसे ईद के अवसर पर असद ने अपने घर बुलाकर उसकी हत्या कर दी थी।

    न जाने यह वैमनस्य कब मिटेगा? कब इंसान, इंसान को इंसान समझेगा। कब सबके लिए एक समान नियम और कानून बनेंगे, कई प्रश्न मन को आंदोलित कर रहे हैं, किन्तु किसी का भी उत्तर शायद ही आज किसी के पास हो।

    मानवता को आईना दिखाता
    संपादकीय।
    साधुवाद आपको।

    • सुधा जी, आपने संपादकीय का विश्लेषण करते हुए कुछ सवाल भी खड़े किए हैं। आपका बहुत बहुत आभार।

  14. पुलिस का रवैया अफ़सोसजनक है। मानवीयता आवश्यक है चाहे जो हो। आपने सही मुद्दा उठाया है।

  15. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    ‘उखड़ती साँसों को पहनाईं हथकड़ियां’ शीर्षक से प्रस्तुत आपका संपादकीय समसामयिक वैश्विक विद्रूपताओं, प्रशासनिक संवेदनहीनता और राजनीतिक अवसरवादिता के अंतर्संबंधों को उघाड़ता एक अत्यंत साहसिक, मर्मस्पर्शी और गहरी मानवीय संवेदना से अनुप्राणित दस्तावेज़ है। रोज़मर्रा की सतही ख़बरों से आगे बढ़कर आपकी पैनी दृष्टि व्यवस्था के उस खोखलेपन और पूर्वाग्रह को पकड़ने में सफल रही है, जो आधुनिक सभ्यता के न्यायपूर्ण होने के दावों पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। यह केवल एक जघन्य हत्याकांड का विवरण मात्र नहीं है, बल्कि कानून की यांत्रिकता और लहूलुहान होती मानवता के बीच की दारुण दूरी को पूरी बेबाकी से आईना दिखाता है।
    संपादकीय के प्रारंभ में ही जब आप साउथैम्प्टन की उस वीभत्स घटना के वीडियो फुटेज का ज़िक्र करते हैं, तब पाठक का अंतर्मन एक गहरे अवसाद और तीखे आक्रोश से भर जाता है। १८ वर्षीय श्वेत किशोर हेनरी नोवाक का अपनी अंतिम साँसें गिनते हुए यह गिड़गिड़ाना कि “मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ…” और उस मरणासन्न तड़प को अनदेखा कर पुलिस अधिकारी द्वारा उसके घायल हाथों को पीठ के पीछे ले जाकर हथकड़ी कसना, यह दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला है। व्यवस्था का यह स्वरूप इतना वीभत्स है कि वहाँ बहते हुए ख़ून को रोकने और जीवन को बचाने की फौरी मानवीय तड़प के बजाय कानूनी अधिकारों की रट लगाना और यांत्रिक प्रोटोकॉल का पालन करना अधिक महत्त्वपूर्ण मान लिया गया।
    संपादकीय का सबसे संवेदनशील और वैचारिक रूप से उद्वेलित कर देने वाला हिस्सा वह है, जहाँ आप व्यवस्था के भीतर गहरे धँसे हुए ‘पक्षपाती पीले चश्मे’ और वैचारिक अंतर्विरोधों का पोस्टमार्टम करते हैं। अपराधी विक्रम डिगवा द्वारा अपने जघन्य कृत्य को छिपाने के लिए रची गई ‘नस्ली हमले’ की झूठी कहानी को पुलिस ने बिना सोचे-समझे सच मान लिया। इस विसंगति को आपने पूरी स्पष्टता से रेखांकित किया है कि आधुनिक पाश्चात्य तंत्र में ‘नस्ली टिप्पणी’ का संशय, एक युवा की उखड़ती साँसों और रिसते हुए ख़ून से भी अधिक गंभीर और प्राथमिक मान लिया गया। यह पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा है जो यह मानकर चलती है कि नस्लभेद या सामाजिक वैमनस्य का शिकार केवल एक ही पक्ष हो सकता है।
    जब आप ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की वर्तमान चुप्पी की तुलना विपक्ष में रहते हुए अमेरिकी घटना ‘जॉर्ज फ़्लॉयड’ के समय उनकी आक्रामक और भावुक सक्रियता से करते हैं, तब राजनीति का वह पाखंडी और दोमुँहा चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो जाता है जहाँ सरोकार केवल वोट-बैंक की सुविधा देखकर तय होते हैं। इसके साथ ही, भारत के संदर्भ में ‘सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011’ के प्रावधानों का स्मरण कराना और गाज़ियाबाद के सूर्या चौहान हत्याकांड के सादृश्य को प्रस्तुत करना यह सिद्ध करता है कि तुष्टीकरण, पक्षपात और बहुसंख्यक आबादी को ही हर परिस्थिति में दोषी मान लेने की आत्मघाती सोच भौगोलिक सीमाओं से परे वैश्विक स्तर पर एक जैसा ही बर्ताव कर रही है।
    इस घने वैचारिक अंधकार के बीच, सिख समुदाय के ज्ञानियों और प्रबुद्ध प्रतिनिधियों द्वारा इस कृत्य की बिना शर्त निंदा करने और संपूर्ण कौम को कटघरे में न खड़ा करने की विवेकपूर्ण अपील को साझा करना संपादकीय में एक सकारात्मक और ज़िम्मेदार संतुलन पैदा करता है।
    साहिर लुधियानवी के शेर—”आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे…” के माध्यम से समय के बदलते मिज़ाज की चेतावनी और एक प्रवासी भारतीय के अंतर्मन की उस विकल दुविधा को छोड़ जाना आपके इस लेखन को एक कालजयी विस्तार देता है। दोनों देशों से अगाध प्रेम करने वाली एक संवेदनशील आत्मा जब सत्ता, न्याय और कानून के इन दोहरे मापदंडों को अचरज और पीड़ा से देखती है, तो वह कसक हर संवेदनशील पाठक के दिल में उतर जाती है। व्यवस्था की इस अंधी क्रूरता के विरुद्ध इस बेहद प्रखर, मर्मभेदी और बेबाक संपादकीय विमर्श के लिए आपकी निर्भीक लेखनी वंदनीय है।

    • देर आए दुरुस्त आए… संपादकीय पर आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है। पढ़ने के बाद अपने ही संपादकीय पर नाज़ होने लगा है। हार्दिक धन्यवाद आपका।

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