Sunday, April 19, 2026
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डॉ. शोभना की लघु कथा- पहली बस सवारी 

वह तीसरी कक्षा में पढ़ती है। हर सुबह वह अपनी माँ का हाथ थामे पैदल स्कूल जाती है। रोज़ वह बस से जाने वाले अपने स्कूल के बच्चों को देखती रहती है। उसके मन में भी बस से स्कूल जाने की इच्छा होती है, लेकिन बस में जाने से उसे बहुत डर लगता है और इस बात को माँ से कहने में उससे भी ज्यादा डर लगता था।

एक दिन अचानक माँ की तबीयत खराब हो गई। उस दिन वह अपने पड़ोस वाली आंटी के साथ सुबह स्कूल गई। शाम को लौटते समय उसकी कई दिनों की इच्छा जाग उठी—बस में जाने की। उसी इच्छा को पूरा करने के लिए वह बस में चढ़ गई। उसे यह नहीं पता था कि किस स्टॉप पर उतरना है। उसने स्कूल के पास वाले बस स्टॉप से बस में चढ़ाई, क्योंकि उसने देखा था कि उसके स्कूल की यूनिफॉर्म पहने कई बच्चे उसी बस में चढ़ते हैं। उसने यह भी देखा कि सामने वाले घर की दीदी, जिनका नाम मेनका है, भी उसी बस में चढ़ीं। उसे लगा कि अगर वह दीदी का पीछा करेगी तो घर पहुँच जाएगी, इसलिए वह भी बस में चढ़ गई।

वह दीदी को देखते-देखते ध्यान नहीं दे पाई कि मेनका दीदी कब बस से उतर गईं। धीरे-धीरे बस खाली होती गई और उसके मन में घबराहट बढ़ने लगी, क्योंकि उसे नहीं पता था कि किस बस स्टॉप पर उतरना है और घर कैसे पहुँचना है। आखिरकार बस अपने आखिरी स्टॉप पर पहुँच गई और पूरी बस खाली हो गई।

जैसे ही वह बस से उतरी, उसकी आँखों में आँसू आ गए और वह रोने लगी। उसे रोता देख उसके आसपास लोग इकट्ठा हो गए। उनमें से एक चश्मा पहने अंकल ने उससे पूछा, “बेटी, तुम क्यों रो रही हो?” उसने कहा, “मुझे घर जाना है, लेकिन मुझे रास्ता नहीं पता।”

अंकल ने उससे उसकी स्कूल डायरी मांगी। डायरी में दिए पते को देखकर उन्होंने उसे घर पहुँचाने का वादा किया। उन्होंने उसे सामने वाले बस स्टॉप से सही बस में बैठाया और खुद भी उसके साथ बैठ गए। बच्ची बहुत रो रही थी, उसे देखकर अंकल को दया आई, इसलिए उसे चुप कराने के लिए उन्होंने आलू के चिप्स का एक पैकेट भी खरीदकर दे दिया।

बस में जाते समय बच्ची के मन में एक नया डर पैदा हुआ। उसे लगा कि कहीं ये अंकल उसे किडनैप तो नहीं कर रहे, जैसा वह टीवी में देखती है। लेकिन वे अंकल बहुत अच्छे इंसान थे। उन्होंने बच्ची को उसके घर के पास वाले बस स्टॉप पर उतार दिया। जैसे ही वह अपने पहचान वाले स्टॉप पर उतरी, उसे बहुत सुकून मिला।

अंकल ने उससे पूछा, “अब तुम्हें रास्ता पता है ना?” बच्ची ने कहा, “हाँ, अब मुझे रास्ता पता है।” फिर उसने कहा, “आप मेरे साथ मेरे घर चलिए, मैं अपनी मम्मी से आपको मिलवाऊँगी।” अंकल उसके साथ उसके घर गए।

बच्ची के घर पहुँचने में देर हो गई थी, इसलिए उसकी माँ बहुत घबराई हुई थी। बच्ची को सुरक्षित देखकर उसकी माँ को राहत मिली। बच्ची ने अपनी माँ को पूरी बात बताई। माँ को समझ नहीं आया कि उसे डाँटे या गले लगाए। फिर भी, जिसने उसकी बेटी को सुरक्षित घर पहुँचाया, उनका धन्यवाद करते हुए माँ ने उन्हें चाय पिलाई और कई बार शुक्रिया कहा।

उसके बाद माँ ने बच्ची को समझाया कि बिना बताए कहीं जाना गलत है। उस दिन के बाद बच्ची के मन में बस से जाने की इच्छा और बस में जाने वाले बच्चों को देखकर होने वाला आकर्षण हमेशा के लिए खत्म हो गया।

  • डॉ. एस. शोभना

Managing Editor – Aakhar Hindi Journal, Assistant professor, Department of Hindi, St. Philomenas College,  Mysore, Ph: 9886203416

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