Sunday, May 31, 2026
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लता तेजेस्वर ‘रेणुका’ के उपन्यास लहराता चाँद,  (उपन्यास का अंश)

पुरुवाई के लिए महाराष्ट्र हिंदी अकादमी से पुरस्कृत मेरा उपन्यास ‘लहराता चाँद’ का अं

एक अंधेरा कोना, न जाने जगह कौन सी है। वह बेहोश पड़ी थी। हाथ बंधे हुए थे, और वह पेट बल लेटी हुई है। सिर उठाकर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मुँह मिट्टीकी ओर दबी हुई थी। सिर दर्द से फटा जा रहा था। आँखें भारी-भारी -सी लग रही थी। वह उठने की कोशिश कर रही थी पर उसकी पलकें हिलने से इनकार रहीं थीं। मुँह से पीड़ा भरी आवाज़ निकल रही थी। शरीर कष्ट से तड़प रहा था। आँखों से पानी निकलकर धूल में मिल रहा था। नाक से गरम साँसों के साथ पानी भी निकलने लगा था। आस-पास कहीं से एक अजीब सी दुर्गंध आ रही थी। वो दुर्गंध नाक से होकर फेफड़े पर असर कर रही थी, गाढ़े रसायन जैसी गंध थी वह। जैसे कि वह गंध आस-पास किसी नाली से या कोई रसायन की फैक्टरी से आ रही थी। उस गंध के असर से वहाँ ज्यादा समय रुकना मुश्किल था। उसकी आँख और नाक के उपर भी मक्खियाँ भिन-भिना रहीं थीं।

अनन्या होश में नहीं थी, लेकिन उस गन्ध से वह बहुत असहनीय महसूसकर रही थी। बहुत देर से या कई घंटों से किसी ऐसी जगह पड़ी थी कि जहाँ से किसी आदमी का उस रास्ते  से गुजरना भी नहीं होता था। अनन्या को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि वह किसी गंदी नाली उसके आस-पास ही कहीं है। या किसी ब्रिज के नीचे दलदल में पड़ी हो। अनन्या को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि वह गंदी नाली उसके आस-पास ही कहीं है।

उसने मुश्किल से पलकें उठा कर देखने की कोशिश की लेकिन मक्खियाँ उसकी पलकों पर से हटने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। उसने मक्खियों को भगाने के लिए हाथ उठाना चाहा पर उसके हाथ अपनी जगह से हिल ही नहीं रहे थे। आखिरकार उसने मुश्किल से आँखें खोलकर देखा। चारों तरफ गाढ़ा अँधेरा छाया हुआ था। आस-पास कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। अनन्या ने हिलने की कोशिश की मगर शरीर साथ नहीं दे रहा था। हाथ को आगे बढ़ाना चाहा, यूँ महसूस हुआ कि जैसे हाथों को किसी मजबूत रस्सी या किसी चीज़ से कसकर बाँध दिया हो। अनन्या ने अपने हाथों को छुड़ाने का प्रयत्न किया मगर असफल रही। आवाज़ देकर मदद के लिए पुकारना चाहा लेकिन उसके मुँह को भी कपड़े से बाँध दिया गया था। उसे समझ में आ गया कि उसे किसी ने हाथ-मुँह बाँधकर किसी सुनसान जगह छोड़ दिया है ।

अनन्या खुद के बँधे हुए हाथों को खोलने को बार-बार कोशिश करती रही लेकिन रस्सी खोलने में असमर्थ रही। आखिरकार थककर यूँ ही पड़ी रही। वह याद करने की कोशिश की कि वह यहाँ आई कैसे? क्या हुआ था उसके साथ? उसने चारों ओर नज़र घुमाई। न जाने समय क्या होगा? जरूर रात का समय होगा, नहीं तो इतनी गहन अंधकार? कहीं से तो थोड़ा सा उजाला दिखाई पड़ता। अनन्या कोशिश करके भी हाथों को मुक्त करने में नाकामयाब रही । वह सोच में पड़ गई कि वह यहाँ पहुँची कैसे?

जहाँ तक उसे याद है वह शाम को 7 बजते ही ऑफिस से निकल गई थी। वहाँ से एक ऑटो में बैठी। रास्ते में बहन की फरमाइश याद आई, “दीदी ऑफिस से आते वक्त मेरे लिए पिंक कलर की लिपस्टिक ले आना। बाकी सब कलर है मगर तुम्हें पता है न पिंक कलर मेरा फेवरट कलर है और दीदी कल स्कूल में फैशन शो भी है, ड्रेस से मैचिंग हाई हील्स भी चाहिए। लेकर आना प्लीज।”

 “अवन्तिका तुम भी न! खुद क्यों नहीं ले आती, मुझे क्यों बता रही है? मेरी ऑफिस में काम है। लेट भी हो सकता है, तुम खुद ले आओ न बाजार से।” अनन्या को अपने ऑफिस में देरी होने की आशंका थी इसलिए उसने अवन्तिका को ले आने को अनुरोध किया।

– “दीदी प्लीज, मुझे और भी बहुत क् क् क..काम है। फैशन शो के लिए रिहर्सल भी करना है। मुझे तो जीतना भी है न? अगर मैं हार जाऊँ तूतू.. तुम्हें अच्छा लगेगा क्या?” कॉलेज के लिए तैयार होते हुए अवन्तिका ने मुँह फुलाकर रुक-रुक कर पूछा। अवन्तिका को बचपन से रुक-रुक कर बोलने की आदत है। उसकी इस आदत की वजह से उसके साथ के बच्चे उसे चिढ़ाते रहते हैं और वह रोते हुए घर आकर अनन्या से शिकायत करती। यही कारण है कि अवन्तिका कभी ज्यादा दोस्त नहीं बना सकी। कुछ गिने-चुने दोस्तों के अलावा उसकी कोई दोस्त नहीं थे। बचपन से लेकर अब तक अनन्या ही उसकी बहन, माँ और दोस्त बनकर रही है। अवन्तिका को अपनी दीदी अनन्या पर पूरा विश्वास और प्यार है, इसलिए वह अनन्या को माँ की तरह मानती है और हर छोटी से छोटी बात उससे बताती है।

ऑफिस के लिए निकल रही अनन्या अवन्तिका की ओर देखकर रुक गई – “अवन्तिका देख! ड्रेस को ठीक से पहन लो, देखो तो कैसे कमर से ऊपर उठ गई है, थोड़ा सा ढँक लिया करो।”

“दीदी आप जानती हो मैं रैंप वॉक के लिए चुनी गई हूँ फिर मुझे फैशन का ख्याल भी रखना पड़ेगा न। और जीन्स पर थोड़ा पेट दिखे भी तो क्या हो गया। आप तो दादीअम्मा-सी बात करती हो। यह आज का फैशन है।”

तभी अनन्या ने कहा – “अच्छा बाबा ठीक है, लेकिन गलत इरादे वाले लोग हमारे चारों तरफ फैले हुए हैं जरा सँभलकर रहना।”

“ठीक है दीदी। फिर आते वक्त मेरा सामान आप ले आओगी न?”

“ठीक है, मैं ले आउँगी। पर देर हो गई तो क्या करोगी?”

“दीदी प्लीज ले आओ न।”

अनन्या ने सोफ़े पर बैठ पेपर पढ़ते हुए संजय के पास आकर कहा, “पापा नाश्ता टेबल पर रख दिया है, ठंड़ा हो जाएगा जल्दी से खा लेना।

 “अरे बेटा! तुम आज इतनी जल्दी तैयार हो गई ? काम का प्रेशर ज्यादा तो नहीं है न? दुर्योधन से बात करूँ?” अखबार को फोल्ड करके टेबल ऊपर रखते हुए कहा।

“नहीं पापा, ऐसी कोई बात नहीं। मुझे ऑफिस में कुछ काम है, इसमें अंकल क्या कर सकते हैं?”

“अच्छा ठीक है, अपना ख्याल रखना।”

“जी पापा, शाम को लौटते वक्त देर भी हो सकती है, खाना खा लेना, मेरा इंतज़ार मत करना।

“अच्छा! जैसे कि मेरे देर होने पर तुम खाना खा लेती हो। मुस्कुराते संजय ने कहा।

ऑफिस जाती हुई अनन्या संजय की बात सुनकर रुक गई – पापा, प्लीज। ठीक है मैं टाइम पर घर पहुँचने की कोशिश करुँगी।”

“अनु बेटा! नाश्ता ठीक से किया?”

“हाँ. पापा”

“भोजन के लिए डब्बा अपने बैग में रख लिया है ना, बिना देरी किए समय पर खा लेना?” संजय ने उसके पीछे दरवाज़े तक आकर पूछे।

 “ठीक है पापा। डब्बा रख लिया है और समय पर खाना खा लूँगी, अब मैं चलूँ?”

” ठीक है पर ज्यादा देर मत करना। अंधेरा होने से पहले घर पहुँच जाना।”

 “जी, पापा!”

अनन्या ऑटो को रोक कर बैठी और ऑफिस के लिए निकल गई। पूरा दिन काम में व्यस्त रहने के बावजूद काम इतना ज्यादा था कि सात बजने से पहले ऑफिस से निकलना संभव नहीं हुआ। शाम को सात बजे ऑफिस से बाहर निकलकर वह ऑटो में सवार हुई। कुछ दूर जाने के बाद अवन्तिका की फरमाइशें याद आई। ऑटो को रास्ते के एक ओर रोकने को कहा – “भैया, मैं अभी आती हूँ यही पर रुको। बस दो मिनटों में आती हूँ।”

जाते हुए अनन्या फिर अचानक कुछ सोचकर पीछे वापस आ गई। मन ही मन कहा, ‘अगर सामान खरीदने में देर हो जाए तो तब तक रिक्शा रोक रखना ठीक नहीं।’ वह वापस आकर ऑटोवाले से कहा, “भैया आप पैसे लो, मुझे देर हो सकती है। मैं दूसरा ऑटो ले लूँगी।” पैसा देकर पास वाले दुकान में चली गई। वहाँ से लिपस्टिक, हाई हिल वाले जूते और खुद के लिए एक पर्स खरीदकर दुकान से तंग गलियों के बीच वापस लौट रही थी। कुछ अँधेरा होने लगा था। दुकान मेन रोड से कुछ अंदर होने से वह रास्ता एक गली से होकर गुजरता है। वहाँ लोगों की आवाजाही बहुत कम थी। वह अपना ऑफिस बैग कांधे पर लटकाए दूसरे हाथ में सामान लेकर उस रास्ते से हाइवे की ओर बढ़ने लगी। कुछ ही दूर चली थी कि बिलकुल उसी वक्त सिर पर किसी ने प्रहार किया। फिर क्या हुआ उसे कुछ याद नहीं। फिलहाल तो वह किसी जगह दयनीय अवस्था में बँधी पड़ी हुई है। उस जगह से यहाँ इस जगह कैसे पहुँची, पता नहीं।

“न जाने कौन लोग हैं और क्या चाहते हैं मुझसे।” अनन्या सोचने की कोशिश कर रही थी। क्या कोई पुराना बदला लेने या पैसों के लिए उसे बंदी बनाया गया है? ये कौन सी जगह है? वह मुंबई में है या किसी दूसरी जगह? आखिर उसका अपहरण क्यूँ किया गया और किसलिए? अपहरण कर्ता चाहते क्या हैं? उसके मन में सवाल पर सवाल उठ रहे थे। मन में उठते प्रश्नों का उसके पास कोई जवाब नहीं था। भूमि पर पड़े-पड़े न जाने कितना वक्त निकल गया था।

रात के अँधेरे में चाँद की हलकी-सी किरणें चारों तरफ फैली हुई थीं। उस रोशनी में धुंधले-से कुछ पेड़-पौधे नज़र आ रहे थे। अनन्या की हालत को नज़रअंदाज़ करते चाँद बादलों के संग लुका-छुपी खेल रहा था। चौथ के चाँद की चाँदनी से आधा संसार तो वैसे ही अँधेरे में डूबा हुआ था। समय का भी पता नहीं चल रहा था। न जाने कब से वह इस अंधरे में एक अनजान जगह पर पड़ी है। पैरोँ पर कुछ हलचल महसूस हुई। वह डर से काँप गई, साँप या कोई जंतु? जोर से आँखे बंदकर बिना हिले चुपचाप पड़ी रही। कुछ समय बाद रेंगते हुए कोई जंतु उससे दूर चला गया। पत्तों के बीच से कुछ सरसराने की आवाज़ भी बंद हो गई। अनन्या ने राहत की साँस ली ही थी कि चमगादड़ की फड़फड़ाहट से उस जगह में सनसनी फैल गई।

भूख से उसके पेट में चूहे फुदकने लगे थे। जमीन से उठने के लिए हाथ भी सहयोग नहीं कर पा रहे थे। वह बहुत देर तक यूँ ही लेटी रही। मुँह का एक अंश जमीन से रगड़ रहा था। सांस लेते ही नाक में धूल-मिट्टी घुस रही थी। ऊपर से असह्य बदबू। कुछ और देर इस तरह पड़े रहने से बदबू से बेहोश होने की आशंका थी। अनन्या को उस दुर्गंध से उल्टी आने लगी, किसी न किसी तरह उठकर बैठने को प्रयास किया। पैर हिलते ही सूखे पत्तों की आवाज़ रात के सन्नाटे में अजीब-सी सुनाई देने लगी। वह समझ नहीं पा रही थी यह कौन-सी जगह है? न जाने कहाँ उसे कैद किया गया है? इन सवालों से परेशान हो कुछ ही समय में अनन्या की आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा और वह फिर से बेहोश हो गई।

(जारी…अगले अंक में)

लता तेजेस्वर ‘रेणुका’
नविमुम्बई
संपर्क : 9004762999

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