मिशी ने धीरे से एक बार स्कूल के गेट की ओर देखा। विशू की मम्मी आ गई थी। लपककर दौड़ते हुए विशू ने मम्मी के स्कूटर का हैन्डल पकड़ लिया था। और फिर उसे लगा कि इतनी खुशी अभी नही दिखानी चाहिये थी। अभी मिशी के पापा तो लेने आए ही नही है। ऎसा अच्छा थोड़े ही लगता है।
विशू ने मुड़कर मिशी की ओर देखा। वह जबर्दस्ती मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। विशू को उसे छोड़कर जाना अच्छा तो नही लग रहा था। लेकिन मम्मी को भी तो घर पर कितने काम होते हैं, वो कह भी तो नही सकती कि मिशी के पापा आ जाए, तब तक यहीं रुकी रहे। फिर घर भी तो कितने दूर है दोनो के। विशू ने सोचा, क्यों न मिशी को अपने साथ घर पर ले चले और उसके पापा को फोन कर दे कि वो घर से उसे ले लेंगे। लेकिन घर पर दादी, बुआ, चाचा…. सब मिशी के आने का कारण पूछेंगे तो बताना पड़ेगा कि उसके पापा आज देर से…
और फिर सब बोलना शुरु हो जाएंगे, आजकल के मम्मी पापा को बच्चों की कोई फिक्र ही नही है, बस अपना काम ही देखते हैं। और ये सब बोलते समय वे यह भी नही सोचेंगे कि मिशी सुन रही है।
“क्या हुआ? बैठती क्यों नही जल्दी?” विशू की मम्मी ने पूछा।
“वो मम्मी, मिशी के पापा आए नही अभी लेने।”
“तो आते होंगे ना, दस पांच मिनट इधर उधर हो जाता है कभी। रास्ते में ट्रैफिक भी तो कितना है। आ जाएंगे। चल तू बैठ अब जल्दी।” मम्मी ने स्कूटर के आगे रखे सब्जी के थैले को सरकाकर उसपर एक पैर रख दिया। अनिच्छा से ही, विशू को वहां से जाना पड़ा।
मिशी को अब ड़र लग रहा था। भले ही उसने विशू को कह दिया था कि डरने की जरुरत नही है। पापा आ ही जाएंगे। लेकिन अब तो टीचर्स भी एक के बाद एक निकलने लगी हैं। उसकी अपनी क्लास की तो सभी चली गई। मिशी बैठी है स्कूल की सीढ़ियों पर।
सारे झूले खाली हैं। और कोई समय होता तो उचककर चढ़ जाती, खूब बड़ी बड़ी पींगे लेती। लेकिन अभी तो सब कैसा उदास सा लग रहा है। बस एक बार पापा आ जाए। वह पापा के स्कूटर का हॉर्न अच्छे से पहचानती है। थोड़ा खराब हो गया है। मम्मी कहती रहती है कि ठीक करवा लो लेकिन पापा कहते हैं कि इससे पहचानने में आसानी होती है वर्ना सभी के एक जैसे होते हैं।
मम्मी पापा की इस बातचीत को सुनकर मिशी को हमेशा ही लगता है कि पापा कुछ न कुछ अलग ही सोचते हैं हमेशा, वह बड़ी होकर पापा जैसी ही बनेगी। लेकिन पापा जैसी भूलने की आदत नही रखेगी।
“अरे बेटा अकेली बैठी हो? कौन लेने आता है?” सिन्हा मैडम की आवाज सुनकर मिशी अचकचाकर उठ बैठी।
“जी, पापा।”
“तो आज आए नही? आएंगे कि नही?” सिन्हा मैडम
मिशी का मन गुस्से से भर उठा, आएंगे कैसे नही? मेरे पापा हैं आखिर वो। इन्हें क्या पता कि उन्हें कितना काम होता है, और मेरे लिये तो वो कहीं से भी आ जाएंगे, गाड़ी खराब हो गई होगी या फिर कुछ जरुरी काम होगा ना। ये भी कोई सवाल हुआ? मिशी को लगा कि वह सिन्हा मैडम को सुना ही दे, कि आपको तो कोई लेने भी नही आता, रिक्शा से आती जाती हैं आप। मेरे लिये तो सुबह शाम दोनो वक्त पापा आते हैं।
लेकिन वास्तव में वो कुछ भी तो नही बोल पाई। सूखा मुंह लिये मैडम को ताकती रही।
“चिंता मत करो, आते होंगे।” रुखा सा वाक्य फेंककर सिन्हा मैडम चली गई।
“मैं क्यों चिंता करुंगी? वो भी मेरे पापा की?” मिशी ने इतने धीरे से कहा कि बस उसे ही सुनाई दिया। लेकिन क्या वो वाकई चिंता नही कर रही है? इतनी देर तो पापा ने कभी भी नही की।
पहली बार, मिशी को स्कूल के गेट की ओर जाती हुई, रिक्शा का इंतज़ार करती हुई सिन्हा मैडम से भी एक प्रकार का सहारा मिल रहा था। वैसे तो एकदम खडूस थी, लेकिन आज वो और मिशी एक ही दल में थे। स्कूल छूट जाने पर भी अभी तक घर के लिये दोनों ही निकले नही थे। मिशी ने मन ही मन प्रार्थना की, हे भगवान, पापा को इनके सामने ही बुला दो, दिखा दो इन्हें कि मेरे पापा मुझे लेने आए हैं।
समय काटने के लिये मिशी मेन बिल्डिंग के सामने की सीढ़ियां चढ़ने उतरने लगी। बीच बीच में सिन्हा मैडम को भी देख लेती थी। अबकी बार जब सीढ़ियों से सबसे ऊपर थी, तब बांई ओर से एक रिक्शा आता दिखाई दिया। भगवान करे यह सिन्हा मैडम का नही हो। लेकिन मिशी की बात भगवान तक पहुंचे उससे पहले ही, वह रिक्शा वाला रुक गया सिन्हा मैडम के पास। और उसका आखरी सहारा भी हाथ से जाने लगा था।
रिक्शा में बैठते हुए सिन्हा मैडम ने पूछा, “बेटा तुम्हें घर का रास्ता तो पता होगा, मेरे साथ चलोगी?”
मिशी को लगा कि वह सब कुछ छोड़कर सरपट दौड़ लगा दे और बैठ जाए उनकी बगल में। फिर रिक्शा वाले को सारे रास्तों का पता बताती रहे, घर पहुंच जाए जल्दी से। लेकिन उसने केवल गर्दन हिलाकर मना कर दिया। पता नही सिन्हा मैडम कुछ समझी या नही। वे रिक्शे में बैठकर चली गई। मिशी को लगा, जैसे उस दिन स्कूल से आते समय, सड़क पर एक पपी पड़ा था, घायल था किसी गाड़ी की मार से। और सभी उसे देखकर ऎसे निकल रहे थे जैसे वो कोई बेजान पत्थर ही है। उसे सभी पर खूब गुस्सा आया था, थोड़े समय के लिये पापा पर भी। उस पपी को कितना दुखा होगा, उसकी मम्मी और भाई बहनों को कितना दुख हुआ होगा उसे ऎसे जख्मी देखकर। लेकिन यहां किसी को उससे कोई लेना देना ही नही था।
मिशी को लगा जैसे आज वो भी एक घायल पपी है! खूब आशा से सभी की ओर देख रही है कि कोई तो यह समझ ले कि स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद जब सारे दोस्त और सहेलियों को उनके मम्मी पापा आकर ले जाते हैं, टीचर्स भी घर जाने लगते हैं, तब अकेले में कितना अजीब लगता है। और इस अजीब लगने में हमारा तो कोई दोष नही होता, हमारे मम्मी पापा का भी नही होता, लेकिन इस तरह से अकेला पड़ जाना कभी भी अच्छा नही लगता।
आज तो पापा से खूब लड़ूंगी, ऎसे कैसे इतनी देर कर दी? मुझे सुबह देर होती है स्कूल के लिये तैयार होते समय, तब तो कितना लेक्चर देते हैं। अब खुद क्या कर रहे हैं? वो आ जाएंगे तब भी उनसे बात नही करुंगी।
मिशी को लगा कि क्यों न वह स्कूल से पैदल ही घर की ओर निकल पड़े। उसे घर का रास्ता पता है। धीरे धीरे पहुंच ही जाएगी, और रास्ते में कहीं पापा आते हुए दिखाई देंगे, तो उन्हें आवाज़ देकर रोक लेगी। अच्छा होगा, उन्हें पता चलेगा कि उनके देर से आने के कारण आज मिशी को इतना चलना पड़ा है।
लेकिन इस बारे में वह बहुत आगे नही सोच पाई। शायद मन ही मन डरी हुई थी लेकिन इस बात को मानना नही चाहती थी। आज का दिन कितना अच्छा बीता था उसका। टेस्ट में क्लास में सबसे ज्यादा मार्क्स मिले थे, दो कॉपियों में स्टार थे और उसका टिफिन भी सारी फ्रेन्ड्स में सबसे अच्छा था। टिफिन की याद आते ही मिशी को भूख भी लगने लगी थी। आधा घन्टा हो गया है छुट्टी होकर। अब तक तो वह घर पर होती है, मम्मी कुछ ना कुछ फ्रेश बनाकर देती है और नखरे करते हुए ही सही, मम्मी को स्कूल की बाते बताते हुए खाना मिशी को बड़ा अच्छा लगता है।
ये पापा आते क्यों नही?
अब मिशी को वाकई थोड़ा ड़र लगने लगा था। पल्लवी के पापा जैसा तो नही? मिशी को वो भयानक दिन याद आया, जब रिसेस से पहले वाले पीरीयड में, पल्लवी के घर से उसके मामा लेने आए थे, मिशी ने देखा था उन्हें। एकदम परेशान, पसीने से तर और तेजी से चलती हुई सांस। पल्लवी को ले गये थे वो। टीचर से कुछ बात अकेले में की और टीचर ने कैसे तो पल्लवी को देखा था, दया करते हुए।
मिशी को उसी समय लगा था कि पल्लवी के घर पर कुछ हादसा हो गया होगा। बाद में पता चला था कि पल्लवी को स्कूल छोड़कर ऑफिस जाते समय उसके पापा का रास्ते में एक्सीडेन्ट हो गया था। वे नही रहे। पल्लवी पन्द्रह दिनों से भी ज्यादा समय तक स्कूल नही आई थी। मिशी तो उसके बारे में सोच सोचकर अपने कमरे में अकेली होने पर और रात को सोते समय रोती थी। घर पर भी पल्लवी को लेकर बातें होती थी। अब उसकी मम्मी अकेली कैसे उसे बड़ा करेगी, क्या होगा उसका?
लेकिन पल्लवी से मिशी फिर नही मिल पाई। पन्द्रह दिनों बाद उसने रिसेस के समय देखा था, प्रिंसीपल मैडम के रुम में पल्लवी और उसकी मम्मी बैठे थे। पल्लवी ने उसे देखकर गर्दन झुका ली थी। वह किसी से भी मिली नही। बाद में पता चला कि पल्लवी और उसकी मम्मी इस शहर को छोड़कर चले गए।
कहीं पापा… नही नही…. वो तो कितना सेफ स्कूटर चलाते हैं। धीरे धीरे मिशी को भी सिखाने लगते हैं। भले ही थोड़ी देर हो जाए तो चलेगा लेकिन पापा को तो कुछ नही होना चाहिये। मिशी अब सीढ़ियां चढ़ उतर के खेल से ऊब गई थी। पानी की बोतल में से बचा खुचा पानी पिया और निरुद्देश्य सी बगीचे में टहलने लगी।
अब तो स्कूल की इमारत के आखरी सिरे पर ही धूप बची है। इतनी कम रोशनी में स्कूल की इमारत वह पहली बार देख रही है। इससे अच्छा होता वह विशू के साथ ही चली जाती। मान लिया कि उसके घर पर कितने सारे लोग होते हैं, सभी अजीबोगरीब सवाल पूछते रहते हैं, उसे जरा भी अच्छा नही लगता। लेकिन स्कूल में इस तरह से लावारिस भटकते रहने की बजाय तो वह अच्छा होता।
अब तो सारी बसें भी वापस आ चुकी थी। वॉचमैन की ड्यूटी बदल गई थी। पुराना वॉचमैन बसों की संख्या गिनवाकर चाबियां दूसरे वॉचमैन को दे रहा था।
“इस बेबी को लेने आया नही कोई?” नये वॉचमैन ने पूछा।
“हां थोड़ी देर देखना नही तो प्रिंसीपल मैडम को फोन कर देना। इसके पापा को फोन सीधे तुम मत लगाना।” पुराने वॉचमैन ने कहा।
“हां हां, पता है। मैडम के बनाए सारे नियम।” दोनों साथ में बीड़ी पी रहे थे।
मिशी दोनों को देख रही थी। किसी भी स्टाफ के सामने ये वॉचमैन कितना डरा हुआ रहता था। आज उसे बिना किसी से डरे हुए, बेखौफ बीड़ी पीते हुए देखकर मिशी को अचानक कुछ अजीब सा लगा।
अब तो पापा जल्दी से आ ही जाने चाहिये। नही तो थोड़ी देर बाद यह नया वॉचमैन प्रिंसीपल मैडम को फोन करेगा, फिर प्रिंसीपल मैडम पापा को। और कल स्कूल में सभी को पता चल जाएगा कि पापा को देर हो गई थी।
लेकिन पापा को देर आखिर क्यों हो रही है! मिशी फिर अपनी चिंता पर लौट आई है।
कितनी ही बार उसने स्कूटर की आवाजों की टोह ली है लेकिन पापा वाला स्कूटर नही आ रहा। स्कूटर से न सही तो पापा पैदल ही आ जाएं, पर आ जाएं और उसे अपने साथ ले ले, बस। मिशी को लगा कि अब और ज्यादा देर होगी, तो शायद उसे रोना आने लगेगा। नही, उसे अपने आप को कमज़ोर नही दिखाना है। पापा क्या कहेंगे, इतनी सी आने में देर हो गई तो तुमने स्कूल में रोना धोना मचा दिया, तुम तो मेरी बहादुर बेटी हो ना?
और वह रोने लगेगी तो वॉचमैन और भी जल्दी प्रिंसीपल मैडम को फोन कर देगा। नही, वह दरवाजे की ओर देखेगी भी नही, वॉचमैन की ओर अपनी पीठ ही रखेगी।
धीरे धीरे हवा ठंडी होने लगी थी। पुराना वॉचमैन उसे सायकल पर जाता हुआ दिखाई दिया। नया वॉचमैन उसे देख रहा है, वह सामान्य दिखाई देने की पूरी कोशिश किये जा रही है। लेकिन अब वह अपने आप को और हिम्मत नही दे पा रही है। एक बैंच पर बैठ गई है। बैग भी उतारकर रख दिया है। मिशी को याद आया, आज अस्मिता का बर्थडे था, उसकी बेस्ट फ्रेन्ड है। इसलिये उसे एक्स्ट्रा चॉकलेट मिली है, उसने मम्मी पापा के लिये रख दी है।
अब पापा तो इतनी देर कर रहे हैं, वह उन्हें वह चॉकलेट नही देने वाली। लेकिन क्या वो खुद खा ले? लेकिन वॉचमैन को क्या लगेगा? एक तो इस लड़की के पापा इतनी देर से इसे लेने नही आए हैं और यह मजे में बैठकर चॉकलेट खा रही है! अरे.. कितनी मुश्किल है। ये पापा आते क्यों नही अब।
और मिशी को लगा, जैसे पापा की स्कूटर जैसी कुछ कुछ आवाज आ रही है दूर से। उसने सुनने का प्रयास किया पहले लेकिन अब तक इतनी बार ठगी गई थी, कि मन को भुलावा दे दिया, ये भी पापा नही होंगे। लेकिन आवाज धीरे धीरे पास आ रही थी, एकदम स्कूल के गेट के पास। मिशी का एक मन हुआ कि दौड़कर जाए और देखे कि ये पापा ही हैं या नही। फिर लगा, कि कितनी बार तो कर चुकी है ऎसा, और अब तो नया वॉचमैन बैठा है, यूं दौड़कर जाएगी और किसी और की स्कूटर होगी, तो उसे कितना शर्मिंदा होना पड़ेगा।
धीरे धीरे एक स्कूटर आकर स्कूल के गेट पर रुका है। बिल्कुल पापा के स्कूटर जैसी ही आवाज है। लेकिन मिशी बैंच पर जमकर बैठ गई है। वह गेट की दिशा में देखना भी नही चाहती। एक सहारा मिला है इतनी देर के बाद, इतनी ज्यादा प्रतीक्षा तो आज तक उसने कभी भी नही की है। वह नही चाहती कि गेट पर देख ले और वे पापा न निकले। भ्रम को बना रहने देना चाहती है।
और तभी एक सुमधुर आवाज आती है।
“मिशी बेटा? घर नही चलना है?”
पापा आ गये!
ओह, मिशी को लगा जैसे फिल्मों में दिखाते हैं, अकाल से पीड़ित, दरार पडी हुई धरती पर खूब प्रतीक्षा के बाद वर्षा होती है और सभी अपने होशो हवास भूलकर बरसते पानी में भीगने दौड़ पड़ते हैं, वैसे ही उसे पापा के पास दौड़कर जाना चाहिये। उन्हें पूछना चाहिये कि उन्हें क्यों यह याद नही रहा कि मिशी को उसके स्कूल में लेने जाना है।
लेकिन मिशी ऎसा कुछ भी नही कर पाई। बैग को पीठ पर लटकाया, बॉटल उठाई और धीरे धीरे गेट की ओर चल दी। उसने सुना, पापा वॉचमैन से कह रहे थे, “अरे कुछ दोस्त आ गए थे घर पर, बातचीत में वक्त का पता ही नही चला। वो तो वाईफ का फोन आया, तब अचानक याद आया।”
“कोई बात नही साहब, हो जाता है ऎसा कभी कभी। वैसे तो यहां पर बच्चे सेफ रहते हैं।”
और मिशी को लगा, कि जो उतार चढ़ाव, ज्वार भाटा और वैचारिक तूफान उसने पिछले पैंतालीस मिनिटों में झेला है, वह पापा के लिये कितना बेमानी है। उनके दोस्तों के साथ बैठने पर वे मिशी को भूल सकते हैं, यह विचार भी उसके लिये कितना तकलीफदेह था। और लाख चाहने पर भी वह अपने आंसू रोक नही पाई।
“अरे सॉरी बेटा, आप परेशान हो गए ना? देर हो गई मुझे।” कहते हुए पापा ने उसे समझाना चाहा।
लेकिन मिशी के मन में आज बहुत कुछ बदल रहा था। पापा को देर हो गई थी, मिशी को स्कूल से लेने आने में देर हो गई थी। ये बात मिशी के लिये जितनी महत्वपूर्ण थी, पापा के लिये उतनी ही सामान्य। आज उसने अपनी क्लास से बाहर काफी बड़ा सबक सीख लिया था। उसकी नन्ही सी दुनिया भी बड़ी हो रही थी।
पापा को, बस यूं ही तो देर हो गई थी!
- अंतरा करवड़े
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