बशीर बद्र नहीं रहे। उनका जाने का ग़म सब को है। पुरवाई परिवार की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि। यहाँ कुछ पाठकों की भावनाओं के शब्द रूप प्रस्तुत हैं।
मैं खुद को इस काबिल नहीं समझता, लेकिन अपने शब्दों से मशहूर शायर बशीर बद्र जी को श्रद्धांजलि देना चाहता हूँ। जीवन की वास्तिविकता से अवगत कराते हुए, उन्होंने लिखा था “परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता, किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना, जहाँ दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता”, हर इंसान को मेहनत और संघर्ष के रास्ते पे चलते हुए अपनी पहचान बनानी चाहिए। सभी को प्यार और सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए और अपनी काबिलयत को, अपने हुनर को इस कदर बढ़ाना चाहिए की, एक छोटी सी नदी, या दरिया जब किसी सागर या महासागर से मिले तो अपनी पहचान और आत्मसम्मान ना खोये। हालाँकि बशीर बद्र साहब ने यह भी लिखा है कि “आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता ” मतलब हम सबको अपने जीवन के एकमात्र सत्य से अवगत रहना चाहिए और अपने जीवन में, जितना हो सके लोगों कि मदद करें, उन्हें भी प्यार और सम्मान की दृष्टि से देखें। क्यूंकि इंसान की असली पहचान उसके कर्मों से ही बनती है और सभी लोग किसी भी इंसान को उसके द्वारा किये गए कर्म और व्यव्हार से ही याद रखते हैं। आज पूरा देश बशीर बद्र साहब को याद कर रहा है और अपने शब्दों से, उनके योगदान, लिखे हुए शायरी को पढ़ते हुए मैं भी। ये सच है “आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता, लेकिन आप हम सब के दिल में , हमारे साथ और हमारे बाद भी जिन्दा रहेंगे, क्यूंकि ये शरीर नश्वर है लेकिन आपका काम और लिखी हुए शायरी, अमरत्व को प्राप्त कर चुकी है। आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस के ज़माने में, आपकी शायरी को आने वाले समय में सभी लोग इक साथ ऑनलाइन भी पढ़ सकते है और उन्हें भी प्रेरणा मिलती रहेगी। लेकिन जो साहित्य और कला से जुड़े लोग है उनके लिए आपके कुछ शब्द, इक लाइन या आपकी तस्वीर ही काफी होगी, जो मूक रहकर भी, उचित मार्गदर्शन कर सकती है।
- नम आँखों के साथ, अश्रु सुमन अर्पित कर रहा हूँ : चंदन झा
बशीर बद्र उर्दू शायरी के वह चमकते सितारे हैं जिन्होंने अपने सहज, भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाले शेरों से करोड़ों पाठकों के मन में अपने लिए खास जगह बनाई। उनकी ग़ज़लों में प्रेम, बिछोह, रिश्तों की नज़ाकत और जीवन के अनुभव बड़ी सादगी से अभिव्यक्त होते हैं। बशीर बद्र जी ने उर्दू शायरी को आम जन की भाषा और भावनाओं से जोड़कर उसे नई ऊँचाइयाँ दीं। उनके शेर आज भी लोगों की जुबान पर बसे हुए हैं—
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
और—
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
उनकी रचनाओं में दर्द भी है, अपनापन भी और उम्मीद की रौशनी भी। वे केवल शायर नहीं, बल्कि संवेदनाओं के सच्चे चित्रकार हैं। साहित्य जगत में उनका योगदान सदैव अमिट रहेगा। उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेम, इंसानियत और संवेदनशीलता का संदेश देती रहेगी। उनका जाना उर्दू शायरी के एक युग का समाप्त होना है। बशीर बद्र जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।
- रेणु मंडल
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डॉ. बशीर बद्र जी को भावभीनी श्रद्धांजलि
आज साहित्य और ग़ज़ल की दुनिया का एक संवेदनशील स्वर मौन हो गया।
बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं थे, वे टूटते रिश्तों, बिखरती संवेदनाओं और इंसानी भावनाओं के सबसे सच्चे दस्तावेज़ थे। उनकी ग़ज़लों ने न जाने कितने दिलों को सुकून दिया, कितने अकेले मनों को आवाज़ दी। उनकी लिखी पंक्तियाँ आज भी जीवन की सच्चाइयों को बेहद सहजता से हमारे सामने रख देती हैं,..
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
यह केवल एक शेर नहीं, बल्कि समाज और इंसानियत के प्रति उनकी गहरी संवेदना का प्रमाण है। इसी तरह-
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
उनकी लेखनी में प्रेम भी था, पीड़ा भी, अपनापन भी और समय की विडंबनाओं पर गहरी दृष्टि भी।
उन्होंने शब्दों को केवल लिखा नहीं, उन्हें जिया। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें हर पीढ़ी के दिल में अपनी जगह बना लेती हैं।
आज उनका जाना केवल एक साहित्यकार का जाना नहीं, बल्कि उर्दू अदब की एक पूरी तहज़ीब का मौन हो जाना है।
वे अपनी रचनाओं, अपने विचारों और अपनी अमर पंक्तियों के माध्यम से सदैव हमारे बीच जीवित रहेंगे।
अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि
- डॉ. प्रीति समकित सुराना- संस्थापक- अन्तरा शब्द शक्ति प्रकाशन एवं संस्था
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डॉ. बशीर बद्र को विनम्र श्रद्धांजलि
डिमेंशिया से पीड़ित डॉ. बशीर बद्र उन शायरों में रहे, जिन्हें “महबूब शायर” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। उनकी ग़ज़लों को सबसे अधिक महिलाओं ने अपने दिल में बसाया। मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों की नमी और बिछड़ने की कसक को उन्होंने जिस सादगी और खूबसूरती से शब्द दिए, वह सीधे दिल में उतर जाते हैं।
मैं भी अपने हाईस्कूल के दिनों में पापा के साथ टीवी पर मुशायरे सुना करती थी। जैसे ही @बशीरबद्र साहब का कोई शेर शुरू होता, मैं जल्दी-जल्दी अपनी कॉपी में उसे लिखने लगती। उस उम्र में शायद शायरी का पूरा अर्थ समझ नहीं आता था, लेकिन उनके शब्द दिल में उतर जाते थे।
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
यह शेर न जाने कितनी बार पढ़ा, सुना और महसूस किया।
जब यह सुना कि वे मेरठ छोड़कर भोपाल चले गए हैं, तब भी मन में एक अजीब सी कसक उठी थी। दिल में एक चाह थी कि कभी उनसे मिलूँगी ज़रूर। बाद में पता चला कि भोपाल में मेरी मित्र शबाना के घर के सामने ही उनका घर है। मन बहुत हुआ कि जाकर अपने प्रिय शायर को देख आऊँ। लेकिन Shabana Khan ने कहा…
“मत मिलो… महबूब शायर को उस हालत में देखोगी, जिसमें कभी देखना नहीं चाहोगी, तो दिल टूट जाएगा। उनकी शायरी को ही दिल में ज़िंदा रहने दो।”
उस दिन समझ आया कि कुछ लोग अपनी आवाज़, अपने शब्दों और अपनी रूह से ही याद किए जाने चाहिए। उनकी कौन-सी ग़ज़ल का ज़िक्र करूँ और किस शेर को छोड़ दूँ
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
और यह शेर तो जैसे जीवन का हिस्सा बन गया
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों”
आज जब यह खबर मिली कि बद्र साहब नहीं रहे, तो न जाने क्यों मन भर आया। ऐसा लगा जैसे अपना कोई अज़ीज़ चला गया हो। उनके शब्द आज भी भीतर कहीं गूंज रहे हैं…
“ऊपर-ऊपर हँसते रहना, अंदर-अंदर रोते रहना…”
बशीर बद्र साहब केवल एक शायर नहीं थे, वे भावनाओं की वह मुलायम छुअन थे, जिसे पढ़ते हुए न जाने कितने लोगों ने अपने दिल का दर्द महसूस किया।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
- नीलिमा शर्मा
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हमारे पास तो आओ बड़ा अंधेरा है
कहीं न छोड़ के जाओ बड़ा अंधेरा है।
‘कहीं न छोड़ के जाओ’ कहने वाले शायर बशीर बद्र आज अपने प्रशंसकों को इस अंधेरे समय में ग़मज़दा छोड़कर चले गए।
15 फरवरी 1935 को कानपुर में पैदा हुए बशीर बद्र का पैतृक स्थान अयोध्या (फ़ैज़ाबाद) जिले का बक़िया गाँव है। पिता की नौकरी के सिलसिले में कई शहरों में उनका रहना हुआ। मेरठ युनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनने के बाद वे लंबे समय तक मेरट में रहे। 1987 के दंगों के बाद भोपाल जाकर रहने लगे। उसी दौर में उन्होंने यह मशहूर शेर लिखा था-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।
बशीर साहब ने ज़िन्दगी में अनेक झंझावात झेले लेकिन चाहने वालों की मोहब्बत ने उनका सारा-गिला शिकवा दूर कर दिया था।
इस तरह दुनिया मिली शिकवा-गिला जाता रहा
मैं समझता था मिरा तेरे सिवा कोई नहीं।
गिला-शिकवा न रह जाने की एक वजह यह भी थी कि बशीर साहब ने भी कबीर के ‘बुरा जो देखन मैं चला’ की तर्ज पर अपने भीतर झांकना सीख लिया था।
मैं पयम्बर तो नहीं लेकिन मुझे एहसास है
इन बुरे लोगों में भी मुझ से बुरा कोई नहीं।
महबूब शायर की मौत से ग़मज़दा लोगों के लिए बशीर सहब ने पहले ही यह शेर लिख रखा है-
वो अपने घर चला गया अफ़्सोस मत करो
इतना ही उस का साथ था अफ़्सोस मत करो।
अलविदा शायर !
- अरुण आदित्य
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यूँ ही बेसबब ना फिरा करो ”
“परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता,
किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता’।
और सचमुच अब दुनिया के आइने में बशीर बद्र साहब का चेहरा नहीं दिखेगा। करीब दो दशक पहले की बात है । उन्हीं दिनों साहित्य/ उर्दू अदब की तरफ मेरा झुकाव शुरू हुआ था।मेरे शहर बलरामपुर में एक कवि सम्मेलन /मुशायरा था। उन दिनों बशीर बद्र साहब मुशायरों के सुपर स्टार माने जाते थे। उनकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि बैनर/पोस्टर पर उनका नाम आते ही भीड़ जुट जाया करती थी। दिसंबर की ठंड में भी पूरा परेड ग्राउंड खचाखच भरा हुआ था। मुशायरे का संचालन सुप्रसिद्ध कवि कैलाश गौतम साहब कर रहे थे । मगर इंतजाम के सर्वेसर्वा पुलिस अधिकारी एवं साहित्यकार श्रीपति मिश्र जी कर रहे थे। मुशायरा बहुत देर तक चलता रहा।
उन दिनों उनकी नज्म
“यूँ ही बेसबब ना फिरा करो,
किसी शाम घर भी रहा करो ”
धूम मचाये हुए थी। जगजीत सिंह के कई एल्बम उनके साथ आ चुके थे। मुशायरा चलता रहा। बशीर साहब की लरजती आवाज सुनने के लिए मेरा इंतजार लंबा होता जा रहा था। मैंने मंच के पीछे जाकर श्रीपति मिश्र जी को एक पर्ची दी और उनसे बशीर बद्र साहब तक पहुंचाने का अनुरोध किया। पर्ची पढ़कर मिश्र जी ने कहा “बहुत बढ़िया चुना है आपने। बशीर साहब इसे बहुत अच्छा सुनाते हैं ”यह कहते हुए उन्होंने वह पर्ची रख ली।
मुशायरा आधी रात तक कामयाबी से चला। बशीर साहब सबसे बाद में माई क पर आये। उन्होंने मेरी भेजी हुई पर्ची पर मेरी द्वारा भेजी गयी मेरी पसंदीदा नज्म “यूँ ही बेसबब ना फिरा करो ” नहीं सुनायी। सिर्फ दो तीन शेर सुनाये। क्योंकि तब तक मंच पर लिफ़ाफ़ा वितरण (मानदेय) का कार्यक्रम शुरू हो गया था। जिससे वहाँ पर थोड़ी अफरा -तफरी और तल्खी का माहौल बन गया था।
मैं बाद में उनकी गाड़ी के पास गया जब वह मंच से होटल जा रहे थे। उनसे मैंने थोड़ी बातें की और वह सवाल पूछ ही लिया जो सवाल उनसे उन दिनों अक्सर पूछा जाता था कि क्या उन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी जी के बारे में जो कहा है वो सच है या अफवाह।
उन्होंने प्यार से कहा “देखो , मैंने एक अच्छे आदमी को वोट देने की अपील की है। अब तुम बताओ बेटे कि अटल जी अच्छे आदमी नहीं हैं क्या ”।
मैं कुछ कहता तब तक मेरे एक परिचित स्थानीय कवि ने बात काटते हुए कहा “रात बहुत हो गयी है। बशीर साहब बहुत थक गए हैं। बाकी बातें कल सुबह तुम आकर होटल में कर लेना” यह कहकर उन्होंने अपनी फियेट कार को गियर में डाल दिया। कार रेंगने लगी और मैं जब वापस आया तो साइकिल स्टैंड में सिर्फ मेरी साइकिल बची थी।सब जा चुके थे। मैं उस सुनसान रात में अपनी साइकिल लेकर घर लौटने लगा तो रास्ते में बशीर साहब की नज्म गुनगुना रहा था-
“यूँ ही बेसबब ना फिरा करो,
किसी शाम घर भी रहा करो ”
- दिलीप कुमार
