‘डिंग-डॉंग’! बेल बजी।
सौम्या ने दरवाज़ा खोला तो देखा; डिलीवरी बॉय पिज़्ज़ा लेकर खड़ा था।
‘मैडम! आपने पिज़्ज़ा का ऑर्डर करवाया था।’
पिज़्ज़ा लेने से पहले सौम्या की नज़र उसके शर्ट पर लगे नेम प्लेट पर गयी। ‘मोहम्मद आसिफ़’ नाम देखकर भड़क पड़ी –
‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई; मुसलमान होकर मेरे घर ऑर्डर लाने की?’
‘क्या हुआ मैडम! मुझसे कोई ग़लती हो गई?’
‘ग़लती माई फूट। तुम, देशद्रोही यहां क्या कर रहे हो? पाकिस्तान क्यों नहीं जाते? थुक कर खाना देते हो?’
‘नहीं मैडम! मैं मूल हिंदुस्तानी हूं। हमारा पूरा खानदान यही पर है। और हां! ‘मैं थुक कर क्यों लाउंगा? आपको कोई ग़लतफहमी हो गई है।’
‘तुम मुझसे बहस करोगे?’- सौम्या ने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया।
‘ये क्या कर रहीं हैं मैडम?’
तभी अंदर से सौम्या का पति आया और पूछने लगा- ‘क्या हुआ?’
‘अरे! ये मुसलमान लड़का थुक कर पिज़्ज़ा दे रहा था।’
‘इसकी इतनी हिम्मत। अभी बताता हूं, साले को।’
और उसने मारते हुए, सीढ़ियों से धक्का देते रोड पर कर दिया।
‘आइंदा इधर दिख न जाना। नहीं, तो जान से मार दुंगा।’
उसको कई जगह चोटें भी आईं। उसे समझ ही नहीं आया, क्या हो रहा है?
‘अजीब लोग हैं?’
आसिफ़ अभी थोड़ी दूर ही आगे गया तो देखा कि एक ट्रक एक गाड़ी को मारते हुए निकल गया।
‘अरे! ये तो एक्सीडेंट हो गया।’ जाकर देखा तो एक वृद्ध दम्पत्ति खून से लथपथ पड़ें थे। तब तक भीड़ इकट्ठी हो गई। लोग वीडियो बनाने लगे। आसिफ़ चीखा – ‘आप लोगों की इंसानियत मर गई है। आप इन्हें हॉस्पीटल ले जाने के बजाय, वीडियो बनाने में लगे हुए हैं। शर्म आनी चाहिए आप लोगों को। कोई कॉल करके एंबुलेंस को जल्दी बुलाओ।’ और खुद भी कॉल करने लगा।
भीड़ में से आवाज़ आई- ‘अरे! ये पुलिस केस है। कोई हाथ न लगाओ।’
‘तो क्या? जब तक पुलिस आएगी तब तक इन्हें तड़पने और मरने के लिए छोड़ दें’- आसिफ़ चीखा।
‘और नहीं तो क्या? पुलिस बचाने वालों को ही मुजरिम बना देती हैं।’
‘भाड़ में जाओ तुमलोग। एक दिन तुमलोग भी इसी तरह तड़पोगे।लोग इसी तरह तमाशा देखेंगे और वीडियो अपलोड करेंगे।’
थोड़ी देर में ही एंबुलेंस आ गई। इस हालत में उन लोगों के अकेले एंबुलेंस में भेजना उसे अच्छा नहीं लगा; वो भी एंबुलेंस में बैठ गया। डॉक्टर पुलिस केस कहते हुए उन्हें एडमिट नही कर रहे थे। उसने गुजारिश की – ‘प्लीज़! आप इनका ट्रीटमेंट शुरू कर दीजिए। मैं अभी पुलिस को कॉल कर देता हूॅं, प्लीज़ सर!’
‘ठीक है। मैं आपकी जिम्मेदारी पर एडमिट कर रहा हूॅं।’
उसने पुलिस को कॉल कर दिया। थोड़ी ही देर बाद नर्स आकर बताई कि, अंकल जी का बहुत खून बह गया है। इन्हें फ़ौरन ‘ओ पोजीटिव’ खून चाहिए। हमारे ब्लड बैंक में ख़त्म हो गया है।’
‘आप इनके घर वालों को जल्द बुला दीजिए।’
‘मैं तो उन्हें नहीं जानता? आप जरा देखिए कहीं अंकल या आंटी के पास मोबाइल हो?’
तभी डॉक्टर ने एक मोबाइल लाकर दिया- ‘इनके घर वालों को जल्दी बुलाइए। खून बहुत बह गया है। मेल पेशेंट की हालत बहुत सीरियस है। उनके साथ बहुत सारी कॉम्पलीकेशन्स भी है।’
मोबाइल में लेटेस्ट कॉल राहुल को किया गया था। उसने उसी नंबर पर कॉल लगाया। दूसरे साइड से आवाज़ आई – ‘अब क्या हुआ पापा?’
आसिफ ‘पापा’ शब्द सुनते हीं जल्दी बोला – ‘आपके पापा का एक्सीडेंट हो गया है। आप जल्दी ‘राठी हॉस्पिटल’ आ जाइए।’
‘ये आप क्या कह रहे हैं? पापा से तो एक घंटा पहले हीं बात हुई थी। वो ठीक तो हैं?’
‘जी! बस आप जल्दी आ जाइए, उन्हें खून की जरूरत है।’
‘अच्छा! मैं जल्दी आता हूं।’
तभी डॉक्टर आकर बोले। इनके घर वालें अभी तक नहीं आएं। पेशेंट की हालत बिगड़ती जा रही है, प्लीज़ जल्दी कीजिए।’
‘डॉक्टर! मेरा ब्लड ग्रुप ‘ओ पोजीटिव’ है। क्या आप मेरा खून दें सकते हैं?’
‘जी! अगर आपको कोई कॉम्पलीकेशन्स न हो तो?’
‘जी! मुझे कोई कॉम्पलीकेशन्स नहीं है।’
‘तो खड़े क्यों हैं? जल्दी कीजिए। नहीं तो पेशेंट को बचाना मुश्किल हो जाएगा।’
‘जी!’
‘नर्स! जल्दी करो। यहीं ओटी हीं में ब्लड देने का प्रॉसीजर करना पड़ेगा, क्योंकि इमीडिएटली ब्लड चढ़ाना है।’
‘जी!
राहुल दौड़ता हुआ आया; उसके पीछे सौम्या भी थी। राहुल आई.सी.यू. में घूसने लगा। नर्स दरवाजे पर हीं रोक दी।
‘सर ! आप अंदर कहॉं जा रहे हैं? पेसेंट की हालत बहुत सीरियस है। उनकी सर्जरी चल रही है।’ राहुल बाहर ही रुक गया और पुछने लगा- ‘मेरी मॉं कहॉं है? उनकी कंडीशन कैसी है?’
‘देखिए! उन्हें भी काफी चोटें आईं हैं, पर उन्हें इंटर्नल चोट नहीं है। वो होश में हैं। उनका ट्रीटमेंट भी चल रहा है। जब जनरल वार्ड में आ जाएंगी तो मिल लीजिएगा। अभी धैर्य रखीए और अपने पापा के लिए दुआ कीजिए। वो होश में नहीं है।’ उनके सर में इंटर्नल चोटें आई हैं। खून बहुत लॉस हो गया है। साथ ही शुगर, बी.पी सभी बढ़ गये हैं।’
‘ये बताइए! खून का इंतजाम कहॉं से हुआ?’ ब्लड बैंक ने दिया क्या?’
‘ब्लड बैंक में ‘ओ पोजीटिव’ खून था ही नहीं। वो तो भला हो, उस बच्चे का जिसने एक्सीडेंट के फ़ौरन बाद यहां लाया भी और अपना खून भी दें रहा है।’
‘मै, उस लड़के से मिलना चाहता हूं। कहॉं है, वो?’
‘वो भी ओटी में अंदर ही है। खून दें रहा है, आपके फादर को।’
तभी पुलिस की पूरी टीम आ गई। पुलिस पेशेंट से मिलना चाहती थी, पर डॉक्टर ने साफ-साफ मना कर दिया-
‘पेशेंट अभी होश में नहीं है, दूसरे फिमेल पेशेंट अभी इस हालत में नहीं है कि, वो बयान दर्ज करा सके।’
‘पेशेंट को यहां लेकर कौन आया है?’
‘एक यंग बॉय है, जो एंबुलेंस में साथ आया था; फिलहाल वो ब्लड दे रहा है पेशेंट को।’
‘आप कौन हैं? – राहुल के तरफ मुखातिब होते हुए इंस्पेक्टर ने पूछा।
‘जी! मैं राहुल; पेशेंट मेरे मम्मी-पापा हैं।’
‘और ये?’
‘जी! मेरी वाइफ है।’
‘अच्छा! तो आपलोग एक्सीडेंट के टाइम पर कहां थे?’
‘जी! हम तो घर पर थे। हॉस्पिटल से कॉल गयी कि, आपके मम्मी-पापा का एक्सीडेंट हो गया है। बस! अभी-अभी आएं हैं।’
‘ओके’
दस मिनट बाद आसिफ़ ओटी से बाहर आया, तभी पीछे से नर्स की आवाज़ आई – ‘सुनिए! पहले आप कुछ खा-पी लीजिए। अभी आप खून देकर आ रहें हैं, थोड़ी सी वीकनेस होगी।’
राहुल और सौम्या; दोनों हीं आसिफ़ को देखकर चौंक गएं- ‘तुम…?’
‘तो क्या, आप लोग एक-दूसरे को पहले से जानते हैं?’
‘नहीं! हॉं!’ राहुल, पुलिस की आवाज़ सूनकर जैसे सकपका गया।
‘और हॉं! ईश्वर के साथ-साथ इनका भी शुक्र अदा कीजिए। इन्होंने हीं आपके मम्मी-पापा को टाइम से हॉस्पिटल लेकर आएं और ब्लड भी दिया। नहीं तो आपके फादर की…?’ इतना कहकर नर्स चुप हो गई।
राहुल दोनों हाथ जोड़कर आसिफ़ के सामने झुक गया- ‘माफ कर दो यार! मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई। हम जिस माहौल में पले-बढ़े; वहां यही सीखाया गया कि मुस्लिम अच्छे नहीं होते। वो देशद्रोही और आतंकी होते हैं। उनसे दूर रहा करों। मेरे मुस्लिम दोस्त भी नहीं थे।’
सौम्या भी हाथ जोड़कर सॉरी बोल रही थी। दोनों के ऑंखों में ऑंसू थे।
‘अरे! आप ये कर रहे हैं?’ – आसिफ़ ने राहुल का हाथ पकड़ लिया।
‘कोई बात नहीं। बस! अंकल-आंटी का ख्याल रखीएगा।’
पुलिस ने आसिफ़ के बयान दर्ज किए और बोला कि अगर जरूरत पड़ेगी तो आपको पुलिस स्टेशन आना पड़ेगा।
‘बिल्कुल सर! मैं आ जाऊंगा।’
तभी आसिफ़ के मोबाइल पर कॉल हुआ। उसने कॉल रिसीव किया।
‘कहॉं हो बेटा? तुम ठीक तो हो। कब से कॉल लगा रही हूॅं; तुम न कॉल रिसीव कर रहे हो न कॉल बैक कर रहे हो। सब खैरियत?’
‘जी अम्मी! आप परेशान न हों। मैं बिल्कुल ठीक हूॅं।’
‘नहीं बेटा! मुझे घबराहट हो रही है, तुम बताओ अभी कहॉं हो?’ मैंने ‘पिज़्ज़ा हाउस’ भी कॉल किया था। पता चला तुम वहॉं भी नहीं हो। सच-सच बता।’
‘अरे अम्मी! मैं हॉस्पिटल में हूॅं। थोड़ी देर में आता हूॅं, तो सब बताता हूॅं।’
‘हॉस्पीटल में?’ और अम्मी ने रोना शुरू कर दिया-
‘क्या हुआ बेटा?’- मैं अभी हॉस्पिटल आ रही हूॅं।’
‘आने कोई जरूरत नहीं अम्मी! मैं अभी आ रहा हूॅं। एक अंकल-आंटी का एक्सीडेंट हो गया था; उन्हीं को लेकर आ गया था। थोड़ी सिरीयस कंडीशन थी। उनके साथ कोई नहीं था, इसलिए मैं रुक गया। अब उनके बेटे आ गये हैं।’
‘ओहह! ठीक किया तुमने। अब बताओ उनकी तबीयत कैसी हैं?’
‘जी! अब वो दोनों ख़तरे से बाहर हैं।’
‘अल्लाह का शुक्र है।’
‘उस बच्चे से बात करवाओ।’
‘आपसे अम्मी बात करना चाहती हैं’- आसिफ़ ने मोबाइल राहुल के तरफ बढ़ाया।
‘जी आंटी! नमस्ते।’
‘खुश रहिए। बिल्कुल मत घबराना। मम्मी-पापा जल्दी ठीक हो जाएंगे। मैं भी अल्लाह ताला से दुआ करती रहुंगी। जब भी आसिफ़ की जरूरत हो, बेझिझक बुला लेना।’
‘बिल्कुल आंटी! बस! आप भी दुआ करते रहिए।’
‘बिल्कुल बेटा! ये कहने की बात है।’
‘जी’!
कॉल कट गया। राहुल ने मोबाइल आसिफ़ को दिया। फिर शुक्रिया और सॉरी एक साथ बोला।
‘क्या कर रहें हैं राहुल भाई। ये तो इंसानियत का फ़र्ज़ है। खुशी में न सही; तकलीफ़ में तो इंसान मदद कर हीं सकता है। अच्छा मैं चलता हूॅं। जब भी जरूरत हो, मुझे कॉल कर लीजिएगा। मैं पॉंच से दस मिनट में पहुंच जाऊंगा, आपके पास।’
‘ठीक है…!’
- डॉ. शबनम आलम
शिक्षा : बी.ए. (राजनीति विज्ञान), एम.ए. एवं पी-एच.डी. (हिंदी •साहित्य), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय; यूजीसी-नेट (हिंदी साहित्य), स्वतंत्र लेखन में सक्रिय — कविता, कहानी, लघुकथा, हाइकु एवं शोध आलेख। प्रकाशित पुस्तक : फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का कथासाहित्य और ग्रामीण जनजीवन, विभिन्न साझा काव्य एवं लघुकथा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित।•अनेक लघुकथाओं एवं कविताओं का अंग्रेजी, गुजराती, भोजपुरी, कन्नड़, मैथिली और नेपाली में अनुवाद, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं कवि सम्मेलनों में सक्रिय सहभागिता, सम्मान : अभ्युदय लेखक सम्मान (2022), हिंदी का सितारा सम्मान (2023), विश्व प्रसिद्ध नव उदय साहित्यकार सम्मान (2024), कलमकार सम्मान एवं अदबी संगम अवार्ड (2025), वर्तमान निवास : अलीगढ़, उत्तर प्रदेश।
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