Monday, June 15, 2026
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कलाइडोस्कोप की भाँति दिव्या की सतरंगी स्मृतियाँ

पुस्तक : “कलाइडोस्कोप : सतरंगी स्मृतियाँ”  विधा-संस्मरण पृष्ठ संख्या : 194 लेखिका : दिव्या माथुर, प्रकाशक : अद्विक पब्लिकेशन; वितरक : अमेज़न, *मूल्य : रुपए 350/-
समीक्षा : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

किसी साहित्यकार या कलाकार के लिए अपने जीवन से संबंधित स्मृतियों को सहेजकर संरक्षित करते हुए उनका पुनरवलोकन तथा पूर्वापेक्षण करना नि:संदेह सहज-सरल नहीं होता. विशेषतया एक लेखक के जीवन में इतना उत्थापन होता है और विशिष्टीकृत घटनाओं का इतना विस्तार होता है कि उन्हें समेटकर कथापुंज के रूप में प्रस्तुत करना एक दुष्कर प्रक्रिया है. बेशक, जब उसके जीवन में घटनाओं और उसकी क्रियाओं, अनुक्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं का अविच्छिन्न रेला लगा हो तो अपने जीवन को सर्वसुलभ दर्पण बनाते समय उसका दिमाग़ तो चकरघिन्नी करने ही लगेगा. इसके अतिरिक्त, विशिष्ट और साधारण घटनाओं में भेद करते हुए, उन्हें ही प्रस्तुत करना जो लेखक के लिए समीचीन हो तथा पाठकों को सहज-स्वीकार्य है और जिससे उसके सुघड व्यक्तित्व का क्षरण न हो रहा हो, जटिल और आत्ममंथनात्मक कार्य है.

दिव्या माथुर जैसी अनुभवपक्वित लेखिका द्वारा अपने अतीत में घुसपैठ करके व्यपगत क्षणों को बीन-बटोरकर उनसे कालानुक्रमानुसार माला पिरोते हुए अपनी रामकहानी को प्रस्तुत किया जाना हम जैसे मसीजीवी पाठकों के लिए कितना सुखद हो सकता है, इसका वर्णन आसान शब्दों में नहीं किया जा सकता. हाल ही में प्रकाशित उनके संस्मरण “कलाइडोस्कोप – सतरंगी स्मृतियाँ” उनके जीवन के व्यापक अनुभवों, भौतिक-बौद्धिक क्रिया-कलापों, भावनात्मक उच्छवासों, सहज स्वीकारोक्तियों, सामाजिक जीवन में सामासिक समन्वय लाने की उद्यमिताओं के माध्यम से उन्हें समेटते हुए उनकी रामकहानी को बयां करती है. इस असाधारण पुस्तक में उनके यथार्थपरक और खुरदरे जीवन के ठोस, कष्टकर और प्राय: सुखद अनुभव इतने भावगुम्फित और ज़ज़्बातों से लबरेज़ हैं कि हमें उनके विचार, आत्मालाप, आनुभविक उद्बोधन, संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं आदि सभी तरल पय की तरह फैलते हुए लगते हैं जिसे वह अपने प्रयत्नलाघव के मेढ़ से बाँधती हैं, बिखरने नहीं देती हैं. उन जैसी दक्ष लेखिका को इस पल तक पढ़ते हुए हम यह सहज अनुभव करते हैं कि वह अपने सृजक मन को किस सीमा तक अनुशासित कर सकती हैं और हम सभी के लिए प्रेरणादायक बना सकती हैं.

“कलाइडोस्कोप” न केवल उनके जीवन का चमकता हुआ उज्ज्वल दर्पण है, बल्कि इसे उन्होंने अत्यंत वर्गीकृत रूप में प्रस्तुत किया है. आरंभ में ‘प्राक्कथन’ और लेखिका के ‘दो शब्द’ तथा अंत में ‘पुस्तकों की सूची’ को छोड़कर कुल सत्ताईस अध्यायों में विभक्त उनकी यह संस्मरणात्मक आत्मकथा प्राय: उनके चार दशकों की विविधधर्मी गतिविधियों का आईना है जिसमें वह स्वीकार करती हैं कि उन्हें उम्र के विभिन्न पड़ावों पर “रोते-बिलखते, विलाप करते, दिलो-दिमाग़ की चीड़फाड़ करते” हुए जीवन के कंटिकाकीर्ण मार्ग पर अनवरत चलना पड़ा है. अबोध बचपन में ही (पुनर्जन्म) अनिष्टकारी घटनाओं का उस घर में साक्षी बनना उनका (ढीली और लंबी फ्रॉक पहने मुनिया का) ‘सौभाग्य’ था जहाँ वह अपने स्मृत्यायन से झाँकती हुई दद्दू के अभौतिक होने को कुतूहल से अहसासती हैं और मूँछों वाले हरिहर चाचा, मेहुल भइया, छुटभइया जैसल के सान्निध्य में उठने-बैठने वाली बालिका दिव्या अर्थात मीठी आवाज वाली ‘मैना’ को निहारती हैं. बचपन में बिताए हुए ग्रामीण परिवेश का जीवन्त चित्रण हमें चमत्कृत करता है जहाँ हुक्के की तंबाकू की गंध है; खाटों पर सुखाने के लिए लाल मिर्चें, मँगोड़ियाँ, बड़ियाँ, धनिया, आम की कतरनें आदि हैं; रिम-झिम बरखा है, नाचते हुए मोर हैं, पूजाघर की रंगोली, गुड़-तिल की गज्जक आदि हैं. इन सबके अलावा, माई-बाबा का सुरक्षित सान्निध्य है और अम्मा द्वारा राई-नमक से नज़र उतारती हुई साक्षात ममता का संग है. मुनिया के तनिक सयानी होते ही नए घर का माहौल उसे आत्मविभोर करने लगता है, जहाँ “हर रोज़ एक त्योहार मनाया जाता है’, जहाँ वह स्कूल से लौटते समय बंदर-बंदरिया का नाच देखती है, किसी बूढ़े संत द्वारा उसके जरिए किसी भागे हुए लड़के का अता-पता बताया जाता है.

संस्मरण का प्रत्येक अध्याय दिव्या के जीवन में आए भौतिक-अभौतिक परिवर्तन का सूक्ष्म ब्योरा देता है. विदेशों में गुजारे हुए चालीस वर्षों और भारत में बिताए हुए छत्तीस वर्षों की यादें उनके स्मृति-दर्पण में कहीं भी धूमिल पड़ती हुई नहीं दिखाई देती हैं. जाने-अनजाने दिव्या जो विवरण दे जाती हैं, वे कैनवास पर चित्रित छबियों की भाँति जीवन्त और आकर्षक हैं. पूरी तरह चित्रोपम हैं. स्मृतियों की तूलिका से उकेरित हर घटना हमें जिज्ञासा से आप्लावित करती है.

वर्ष 1985 में एम्स के नेत्र विज्ञान केंद्र में अपनी अच्छी-ख़ासी सरकारी सेवाएं देने के पश्चात, वह समस्त नारी-सुलभ वर्जनाओं तथा बाधाओं और लोगों की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए शायद एकाध अनजान महात्वाकांक्षाओं को पोषित करने के लिए अपने छ: वर्षीय बेटे के साथ अपनी मित्र जगजीत के बुलावे पर कोपेनहेगन (डेनमार्क) प्रवास करने का जो निर्णय लेती हैं, वह उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन का सूत्रपात करता है. इस अध्याय का शीर्षक है ‘बड़ा फलक, बड़ा जोख़िम’ जिसका आशय भी सारगर्भित है. जीवन में पहली बार डेनमार्क का खुला जीवन देखकर दिव्या विस्मित-सागर में डूबती-उतराती हैं. वह लिखती हैं, “बाहर उमड़ रहे समंदर से कहीं बड़ा समंदर मेरे दिलो-दिमाग पर हावी था.” कोपेनहेगन से ओडैन्स सिटी की समुद्री यात्रा का उनके द्वारा दिया गया ब्योरा डेनमार्क की जीवन-शैली को रूपायित करता है. डेनमार्क में उन्हें अपने निजी जीवन में जिन दिक्कतों, उलझनों और अभावों का सामना करना पड़ा, उन्हें उन्होंने अपनी दोस्तों के साथ मौज़-मस्ती में और जगजीत के बच्चों के साथ हिलमिल कर रहते हुए भुलाने की भरसक कोशिश की. भाषाई बाधा, नए प्रकार के खान-पान, नई तहज़ीब अपनाने की उत्सुकता, अपनी भारतीयता के प्रति संलग्नता, पुरुष की स्वेच्छाचारिता के प्रति जुगुप्सा तथा विदेश में समायोजित होने की कोशिशों जैसी बातों में लेखिका अपने बहुमुखी व्यक्तित्व और रचनाकर्म का परिचय देती हैं.

अध्याय ‘मन चाकर राखो जी’ दिव्या के खुले व्यक्तित्व और उनके खुले माहौल में जीने की इच्छा को रेखांकित करते हुए लंदन-हीथ्रो में उनके प्रवास पर प्रकाश डालता है. एयरपोर्ट पर इमीग्रेशन-एन्क्वाइयरी संबंधी दिक्कतों, बेटे अबीर संग अपने जीजा द्वारा एयरपोर्ट पर कार-लिफ्ट, अनुशासन-प्रिय जीजा के घर का माहौल एवं उनकी आदतों, वहाँ रहते हुए पड़ोसियों के साथ अन्योन्यक्रिया, दैनिक भजन-कीर्तन, लंदन का चतुर्दिक माहौल, नौकरी पाने में रेस्ट्रिक्टेड वीज़ा की अड़चन, स्वेटर बुनते हुए टाइम-पास, बेटे के स्कूल में प्रवेश, भार्गव जी और कपूर जी द्वारा नौकरी दिलाने का झाँसा, भारत भवन में मिस पैम सिंह का सहायोग, भारतीय उच्चायोग में सचिव के पद पर नियुक्ति, किराए के घर की तलाश, दिल्ली में नाना-नानी के घर से बेटी को अपने पास लंदन बुलाने की बेचैनी और आख़िर में संगीत-साहित्य से चैन-सुकून जैसी गुजरी बातें इस अध्याय को बेहद दिलचस्प बनाती हैं. अर्थात् दिव्या स्वावलम्बन और पूर्णता से जीवन जीने के लिए सभी प्रकार की चुनौतियों का डटकर सामना करती हैं. इतना ही नहीं, वह नारी-सुलभ सीमाओं और दुर्बलताओं को कभी अपने संकल्प से तो कभी-कभार भवितव्यता को अंगूठा दिखाकर लांघ जाती हैं.

दिव्या अपने जीवन में सूफी विचारधारा से प्रभावित पिता-आनंद प्रकाश श्रीवास्तव के अमिट प्रभाव को अपनी यादों की खिड़की से झाँकते हुए उन पर एक अघोरी की शक्तियों के अधीन होने की चर्चा करती हैं. सादे जीवन के पक्षधर और बहुआयामी रुचियों वाले पिता आनंद प्रकाश, महात्मा बृज मोहन लाल जी की शिष्यता में घर को सत्संग और धार्मिक समभाव के माध्यम से पूरी तरह आध्यात्मिक वातावरण से आच्छादित किए हुए थे और पड़ोसी जन ‘घर में सदा उत्सव-महोत्सव की रौनक’ को रेखांकित करते रहते थे. घर के नेपथ्य में अपनी माँ और बहनों की भूमिकाओं को भी शिद्दत से वर्णित किया गया है. माँ की ‘कर्मठता और नैतिकता’ तथा ‘हिम्मत, त्याग और आशीर्वाद’ ने पिता समेत सातों भाई-बहनों की ज़िंदग़ी सँवारी.

दिव्या माथुर ने हर काल-कण, हर संगी-साथी और हर ख़ासमख़ास घटना को समेटने की कोशिश की है ताकि ये सभी उनके जीए हुए पलों के गवाह बन सकें. इसी क्रम में वह अपनी सिक्खनी ‘दिलेर और दिलदार दोस्त : जगजीत’ को कैसे भूल सकती हैं, जिसके सहयोग से उन्होंने ‘जग जीत लिया’? उसके साथ तीन वर्षों तक बिताए स्कूल के शरारत-भरे, मटरगश्ती के दिन और फिर कॉलेज़ में भी एक-साथ रहने का सुख, छेड़छाड़ के पल, एन.सी.सी. शिविर में भागीदारी, विवाह के बाद भी उससे मिलना दिव्या को भुलाए नहीं भूलता.

संस्मरण के ‘भूतिया हवेली’ अध्याय में ऊँट की रोमांचक सवारी, जंगल से आवृत्त—बिजली-लाइट बग़ैर गर्द-खाई हवेली, पगडंडियाँ, जीरे के खेत, जंगली जानवरों की आवाजें आदि लेखिका को विचित्र अनुभवों से आप्लावित करते हैं. ‘कलाइडोस्कोप’ अध्याय में शाहदरा-स्थित प्राचीन शिव मंदिर, बरगद का पेड़, वहाँ की कठोर जीवनचर्या आदि का आँखों-देखा रोचक वर्णन है. इस अध्याय में लेखिका के विविध कार्यकलापों का तरतीबवार विवरण मिलता है जिसमें उनकी कहानी ‘वह काली’ विश्वविद्यालय की ओर से पुरस्कृत होती है. लेखिका के वयस्क जीवन के बहुपक्षीय रूपों को इस ‘कलाइडोस्कोप’ के माध्यम से जाना जा सकता है.

अम्मा-बाबा की राजदुलारी बिट्टो यानी दिव्या के निकट अतीत में साहित्य सृजकों, शायरों और रोबदार शख़्सियतों से हमारा साक्षात्कार होता है जो उनके अपने थे, सगे थे. मुग़लिया ज़माने के शाद देहलवी मुंशी बिशन दयाल, मुंशी बुलाकी दास जैसी हस्तियों को लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का आशीर्वाद प्राप्त था. तेरह वर्ष की उम्र तक दिव्या ने सचमुच एक राजकुमारी की तरह ज़िंदग़ी के मज़े लिए. उनके जन्म पर बहुत बड़ी दावत दी गई थी और पुरानी दिल्ली से हिजड़े भी बुलवाए गए थे. उनके साथ एक अनोखी बात (अध्याय ‘मायाजाल’) यह थी कि वह पिछले जन्म के किस्से सुनाया करती थीं जिसे परिवारजन अपशकुनसूचक बताते थे. बड़ी उम्र में उन्हें जीवन और मृत्यु के बीच हिंडोले की तरह झूलते हुए अवर्णनीय अहसासों के साथ घातक गले के कैंसर के ऑपरेशन से गुजरना पड़ा. ऑपरेशन कक्ष में ऑपरेशन-पूर्व अंतर्द्वंद्वों का ब्योरा जितनी सूक्ष्मता से लेखिका देती हैं, वे पाठकों के लिए ज़रूर हैरतअंगेज़ होंगे. बाह्यजगत के दृश्यों और मन में उठ रही शंकाओं का विवेचन लेखिका मनोवैज्ञानिक स्तर पर जाकर देती हैं.

यह संस्मरण दिव्या के यात्रा-वृत्तांतों से भरा पड़ा है. ‘नंगयाँ दा पार्क: ओस्लो-नॉर्वे’ को हम यात्रा-वृत्तांत भी कह सकते हैं जबकि यात्रा-वृत्तांत को संस्मरण विधा के अंतर्गत ही रखा जाता है. नार्वे-स्थित बर्गन की रेल यात्रा, बर्गन का गुलज़ार, चर्च मारयाकिर्केन, बारोक पल्पिट, वहाँ के भीति चित्र, ग्लेशियर्स, फ्रागनरपार्केन, न्यूड पार्क और तत्पूर्व रूस-स्थित मॉस्को यात्रा की स्मृतियाँ दिव्या को आत्मविभोर कर जाती हैं. ‘आरलैंडा: रंग में भंग’ अध्याय में दिव्या अतीत में खो जाती हैं जहाँ जगजीत की यादे जीवन्त हो उठती हैं. बेटी द्वारा प्रशंसित इटली की यात्रा करने का भी उन्हें सुखद मौका मिला था. बोलोनिया जैसा साफ-सुथरा नगर उन्हीं मोहित करता है. रैनो और सवेना नदियों के मध्यस्थ रोमन शहर की संकरी सड़कें और अनुशासनहीन यातायात, इतालवी भाषा न आने पर इशारों से बातचीत करने का माध्यम, बेईमान इतालवी जन, फ्लारैंस की रेल यात्रा, पियाजा मैगिओर चौक, पैट्टो मैट्रोपोलिट्न मठ, किलों जैसी इमारतों आदि के संबंध में हमें महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ लेखिका के जरिए मिलती हैं.

‘राजसी आतिथ्य: राजभवन कोलकाता’ अध्याय में लंदन-स्थित भारतीय उच्चायोग और नेहरू केंद्र में दिव्या को डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी और केशरीनाथ त्रिपाठी जैसी शख़्सियतों से मुलाक़ात का ब्योरा मिलता है. तदनंतर, उन्होंने केशरी जी के आमंत्रण पर गवर्नर-हाउस-कोलकाता आकर विश्व भारती का दर्शन किया. गवर्नर हाउस का वैभव देखकर वह अचंभित हो गईं. नेताजी भवन में बोस परिवार से मुलाक़ात को वह अविस्मरणीय बताती हैं. राजभवन के स्वागत समारोह में विशिष्ट शख़्सियतों से मुलाक़ात के संबंध में उनके अपने खट्टे-मीठे अनुभव थे. ठुमरी की रानी गिरिजा देवी से आत्मीय मुलाक़ात का भी ब्योरा देती हैं. चिडिया घर, साइंस सिटी, शंतिनिकेतन, नंदलाल बोस कला वीथि, माघोत्सव, पौष मेला आदि के भ्रमण के बारे में चर्चा करते हुए वह पंचदिवसीय बंग यात्रा-वृत्तांत का समापन करती हैं.

जब दिव्या को नरेंद्र कोहली जी की पुस्तक के लोकार्पण का आमंत्रण मिला तो उन्होंने झट अपनी तत्परता दिखाते हुए रुग्णावस्था में नरेंद्र जी से दूर-संवाद स्थापित किया; लेकिन, उनसे आत्मीय मुलाक़ात से पहले ही उनका भौतिक अवसान दिव्या को कचोट जाता है. नरेंद्र जी का उनसे यह वादा कि ‘घबराओ नहीं, मैं ठीक हो जाऊंगा’ दिव्या को आज भी सालता रहता है. विशिष्ट व्यक्तियों में डॉ. कमल किशोर गोयनका और डॉ. राम दरश मिश्र से शर्मीली दिव्या का मिलना सुखद संयोग था. बहुआयामी लेखिका चित्रा मुद्गल से उनकी फैन तथा सहेली-दीदी के रूप में हमारा परिचय होता रहा है. चित्रा जी के बारे में एक पूरा चैप्टर इस संस्मरण में उपलब्ध है. उनसे अपने अंतरंग संबंधों के बारे में लेखिका विस्तार से बताती है. मेहरुन्निसा परवेज़, प्रतिभा रे, शैली विलियम्स और नासिरा शर्मा के साथ विश्व हिंदी सम्मेलन-1990 में अपनी मुलाक़ात को वह यहाँ विशेष स्थान देती हैं. चित्रा जी जैसी लब्ध-प्रतिष्ठ लेखिका से अपने कहानी-संग्रह ‘पंगा’ के लिए भूमिका लिखवाने को वह अपनी विशेष उपलब्धि बताती हैं.

संस्मरण में बायादोलीद-स्पेन में ‘भारत महोसव-2004’, शिमला-हिमाचल में ‘75 वाँ अंतरराष्ट्रीय अमृत महोत्सव’, लंदन में ‘जयपुर साहित्य उत्सव-साउथ बैंक, 2015’, ‘पटना ग्लोबल-मीट’, ‘खजुराहो नृत्य महोत्सव’, ‘भारोपीय हिंदी महोत्सव-लंदन, 2023’, ‘विश्व पुस्तक मेला-दिल्ली, 2023’ आदि जैसे विश्व-स्तरीय आयोजनों के संबंध में भी दिव्या का दिया गया वर्गीकृत संस्मरणीय विवरण हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में रेखांकित किया जाएगा. इस संबंध में ‘भारोपीय हिंदी महोत्सव-लंदन, 2023’ विशेष उल्लेखनीय है जिसमें कार्यक्रमों और इवेंटों के लिए दिव्या का दिव्य मार्गदर्शन विश्व-स्तर पर सराहनीय रहा है.

इस संस्मरण में प्रखर चिंतनशील साहित्यकार दिव्या ने बग़ैर किसी लाग-लपेट के अपनी जीवन-यात्रा को शब्दों के माध्यम से चित्रांकित किया है. उन्होंने उन बातों को भी बेझिझक कह डाला है, जिन्हें कोई अन्य साहित्यकार बताने में हिचकिचाता. दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपने निजी जीवन के नकारात्मक पहलुओं को भी सर्वजनीन करने में कोई संकोच नहीं किया है. यह उनके निश्छल व्यक्तित्व का विशेष लक्षण है और इस कारण अपने पाठकों की दृष्टि में उनकी प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ गई है. इसके अतिरिक्त, उनके पिपासु पाठक तथा अन्य साहित्यकार जो उनके रचना-संसार से भली-भाँति परिचित हैं, वे उनके समूचे कृतित्व को इस संस्मरण के साथ जोड़कर ही देखना-पढ़ना चाहेंगे क्योंकि चाहे यह संस्मरण हो या उनका समग्र रचना-संसार, दोनों के साथ समन्वय बनाते हुए ही अब पढ़कर संतुष्टि मिल सकेगी ताकि उन्हें और उनके साहित्य को बेहतर ढंग से समझा जा सके. ऐसा एक शोधार्थी के लिए अधिक ज़रूरी होता है क्योंकि उसे किसी रचनाकार के कृतित्व को गहनता से समझने के पहले उसके जीवन में झाँकने की आवश्यकता होती है जिसे स्वयं लेखक द्वारा विरचित आत्मकथात्मक संस्मरण से पूरा किया जा सकता है. एक तरह से यह संस्मरण उनके कृतित्व और विशेषतया उनके कथा-साहित्य में यत्र-तत्र झिलमिलाती रिक्तियों को भरने का काम करेगा. इस प्रकार, उनका साहित्य पढ़ते-पढ़ाते हुए जहाँ अटकन महसूस होता है, वैसा अब नहीं होगा.

अस्तु, भविष्य में अभी उन्हें हिंदी साहित्य को बहुत समृद्ध करना है और अपनी जीवन-यात्रा के अनेकानेक ठौरों से गुजरना है. या, जो बातें इस संस्मरण में उनकी दृष्टि से छूट गई हैं, उनके लिए भी उनके द्वारा संस्मरण भाग-2 लिखा जाना है. अवश्य लिखा जाएगा जिसकी हमें बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी.

साहित्य के रसिया पाठकों से निवेदन है कि वे इस समीक्षा को पढ़कर लेखिका दिव्या माथुर के इस संस्मरण को अवश्य पढ़ें. यह संस्मरण उस सुगठित-सुडौल देहयष्टि का कंकाल-मात्र है जिसके वास्तविक स्वरूप से उसे समग्रता से पढ़कर ही परिचित हुआ जा सकता है.

डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र मूलतः वाराणसी से हैं. वर्तमान में, भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं. कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं में इनकी अबतक कई पुस्तकें प्रकाशित. कई पत्रिकाओं एवं वेबसाइटों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हैं. एकाधिक पुस्तकों का संपादन. संपर्क - 9910360249; ई-मेल: [email protected]
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