उपन्यास: अपने अपने बुर्ज खलीफा, लेखिका: जयंती रंगनाथन, प्रकाशक: शिवना, सिहोर, मध्य प्रदेश मूल्य: 350/ , समीक्षा- डॉ. मधु संधु
‘अपने अपने बुर्ज ख़लीफ़ा’ साहित्यकार, टी. वी. और वेब सिरीज़ लेखिका, पत्रकार यानी मीडिया कर्मी जयंती रंगनाथन का 2026 में प्रकाशित उपन्यास है। इससे पहले वे आठ उपन्यास, चार कहानी संग्रह, दो संस्मरणात्मक उपन्यास, बच्चों के लिए दो कहानी संग्रह और तीन उपन्यास साहित्य जगत को दे चुकी हैं। जयंती रंगनाथन समय-समय पर धर्मयुग, सोनी एंटर्टेंमेंट टेलिविजन, वनिता, अमर उजाला, दैनिक हिंदुस्तान और नंदन की संपादक रही हैं। वह तमिलभाषी हैं और हिन्दी भाषा पर भी उनकी गहरी पकड़ है। ‘आसपास गुजरते हुये’, ‘ख़ानाबदोश ख्वाहिशे’, ‘औरतें रोती नहीं’, ‘एफओ ज़िंदगी’, शेडो’, ‘मेरी ममी की लव स्टोरी’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं। ‘तीस शेड ऑफ बेला’ पहला फेसबुक नॉवेल है।
‘अपने अपने बुर्ज ख़लीफ़ा’ नट के करतब दिखाने वाली अंतर्राष्ट्रीय चैम्पियन, वंडर गर्ल जागती के जीवन से जुड़ा उपन्यास है। इसमें 19 परिच्छेद हैं। हिन्दी में नट जीवन से जुड़े कुछ उपन्यास और लोक कथाएँ तो मिलती हैं जैसे रांगेय राघव का ‘कब तक पुकारूँ’, रतन कुमार सांभरिया का ‘नटनी’ आदि, लेकिन यहाँ नट जीवन का संघर्ष, जोखिम, गरीबी, शोषण, घूमन्तू जीवन, सामाजिक उपेक्षाएं, अपराध वृति आदि ही मुख्यत: उभरे हैं। जबकि ‘अपने अपने बुर्ज ख़लीफ़ा’ में इक्कीसवीं शती के अत्याधुनिक, सभ्रान्त, धनाढ्य नट हैं। नायिका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर रही है। दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता ही नहीं, अमेरिका, रूस, चीन, जर्मनी की हवाई यात्राएं, विदेशॉ से खरीददारी, महंगी गाड़ियाँ, पाँच सितारा होटल, मैक्डोनाल्ड के पीजे- बर्गर- पास्ता- पेप्सी, अत्याधुनिक वेषभूषा, जिम, पार्लर इस नटिनी के लिए आम बात है।
जाग्रति/जागती (अवेकनिंग) वर्षों से पिता और चाचा के परिवार का अर्थाधार है। पढ़ी तो पाँचवी तक ही है, लेकिन राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय ट्रिप उसे हिन्दी- अङ्ग्रेज़ी में निष्णात बना देते हैं। आज वह अठारह वर्ष की है, जबकि दो साल की उम्र से वह रस्सी पर नटिनी के हैरतअंगेज़ करतब सीख रही है, दिखा रही है। रस्सी पर कूदते मानों उसके पंख उग आते हैं। हवा में चलना वह जानती है। चमत्कारी करतब करते लगता पूरी दुनिया उसकी मुट्ठी में है। स्मार्ट, बेपरवाह और तितली सी है वह। घर, देश, विदेश- सर्वत्र वह हीरोइन है। उपन्यास का आरंभ राबर्ट, सैम, मारिया, निकोल, गुडमैन आदि गोरों की एक टीम द्वारा इस अंतर्राष्ट्रीय फेम की नटिनी जागती पर अपने देश के लिए सत्ताईस मिनट की फिल्म बनाने से होता है- बियोंड द लिमिट्स….. द एक्सट्रा ओर्डिनेरी गर्ल जागती। एक जादुई लड़की जो अपने शरीर को अनेक प्रकार से मोड सकती है। उसकी बी. बी. सी. के लिए भी फिल्म बनती है। दुबई के ग्लोबल विलेज में पूरा एक घंटा करतब दिखाती है। टी. वी॰ शो करती है । अनेक पुरस्कार जीत चुकी है। उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रैस कॉन्फ्रेंस में अनुवादक मिलते हैं। एक स्पेशल लड़की- चैम्पियन- हीरोइन- जिस पर सबको गर्व है। शो में आए आमिर खान जैसे बड़े कलाकार भी खड़े होकर ताली बजाया करते हैं। इच्छा तो यह भी है कि दुबई के बुर्ज खलीफा के ऊपर चढ़कर करतब दिखाये। वह गरूर है परिवार का।
जागती पूरे परिवार की संपन्नता का मूलाधार है। अमेरिका के लिए फिल्म बनने से पहले पाँच लाख उसके बैंक अकाउंट में डाल दिये जाते हैं। कोंफ्रेन्स के चेक अश्विनी हाथों- हाथ वनवा कर पकड़ा देती है। चीन में तीन महीने रहकर टी. वी. शो करने के लिए दो करोड़ का अनुबंध होता है।
आठ लोगों के इस परिवार में कमाने वाली केवल जागती ही है। जीवन तो किसी का भी सदा एक सा नहीं रहता। उसके जीवन में भी झंझावात आते हैं। सीढियों से भागती- दौड़ती टखने की हड्डी चकनाचूर करवा लेती है। हवा से बातें करने वाली जादूगरनी वैसाखियों की मोहताज हो जाती है। तीन साल इलाज पर जमकर पैसा खर्च होता है। चार सर्जरी होती हैं। काम बंद होने पर मित्र, संबंधी साथ छोड़ने लगते हैं। दारिद्रय पाँव पसार लेता है। दो वक्त की रोटी के लिए बाबा मजदूरी करने लगते हैं। अब फ्रिज खाली है। रोटी या दाल- भात दिन में एक बार। दूध दो दिन में सिर्फ आधा किलो। आत्मविश्वास चरमरा जाता है। नींदें उड़ जाती हैं।
जयंती रंगनाथन सरकार के बहरेपन का भी जिक्र करती है। निसंदेह जागती नेशन्स प्राइड थी, लेकिन कोशिश करने पर भी सरकार की तरफ से उसकी बीमारी में कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती। इस नेशनल अवार्ड विन्नर को सरकारी नौकरी तक नहीं मिल पाती।
निकोल को देखकर किशोर वय के रागात्मक उद्वेग जागती को विचलित करने लगते हैं। मन में शादी का सपना उमड़ने- घुमड़ने लगता है। पितृ परिवार से आज़ाद होने की इच्छा कुलबुलाती है और वह पिंजरा खोल पालतू तोते को आकाश में उड़ा देती है। करतब करते बैलेंस बिगड़ने लगता है। अनुरागों में डूबी जागती निकोल के लिए आगरा जाने की जिद्द करती है, स्विमिंग पूल के पास बैठ उसे देखती रहती है। फोटो उतरवाते आवेग में पेड़ से गिर चोट लगवा लेती है। उसकी भाषा इंग्लिश सीखना चाहती है। मन होता है हर समय वह आस-पास ही रहे। काम के प्रति अरूचि जागती है। नींद उड़ जाती है। वह बार- बार भूल जाती है कि वह आम लड़की नहीं है, बहुत खास है। उसे किसी के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं, लोग उसके लिए भागें।
उपन्यास के पात्र जातपात, देश- प्रांत से बहुत ऊपर हैं। वे उच्च कोटि के कलाकार हैं। नायिका भारत में बसे मंगोल परिवार से है। कच्छ से उनका संबंध है। रोमी बंगाली है, चक्रवर्ती है, उसे जागती से शादी करने में कोई हिचक नहीं है। अश्विनी दीदी दिल्ली की है और दुबई में रहने वाले पंजाबी जगजीत से शादी करती है। निकोल और उसके साथी अमेरिकन हैं। चीन, जर्मन का भी उल्लेख है।
उपन्यास में अनेक पात्र हैं।
बाबा दुलार डोरी जागती के पिता और प्रशिक्षक हैं। वे उदार, समझदार, संवेदनशील, संयत और नट विद्या के पारंगत अभिजात पुरुष हैं। दिद्दा यानी चमेली जागती की माँ है। यूँ तो वह घर के कामों में अति व्यस्त रहती है, लेकिन मन की टीस बहुत बार शब्दाकार ले ही लेती है। भतीजी कस्तूरी की शादी के संगीत के समय वह पति के मित्र विलायत खान के साथ घर छोड़ कर चली जाती है और कुछ वर्ष बाद लौट भी आती है।
अश्विनी दीदी सालों से जागती के कार्यक्रम आयोजित कर रही है। जागती को नेशनल और इंटरनेशनल स्टार बनाने में उसका विशेष हाथ है। को-ओर्डिनेशन, पब्लिसिटी, प्रेस कोन्फ़्रेंस, प्रेजेंटेशन – सब में पारंगत है। जागती के प्रति उसके मन में विशेष स्नेह और लगाव है। वह मानों संजीवनी है। उपचार में पूरा साथ देती है। वैसाखी छुड्वा देती है। जागती चलने तो क्या, दौड़ने लगती है। वह जब मुंबई, दिल्ली, चेनई एसिड अटैक विकटिम्स पर दस एपिसोड की डाक्यूमेंटरी बनाती है तो जागती को एंकरिंग का, इंटरव्यू का काम देती हैं। छत्तीसगढ़/ रायपुर में एरोबिक्स रेकॉर्ड बनाने वाली, जागती को अपना आदर्श और प्रेरणा मानने वाली, रबर की गुड़िया सी सोनी की एंकरिंग भी जागती ही करती है। तीन एपिसोड वाली इस सीरीज़ का नाम ‘सोनी द सोनपरी’ रखा जाता है। जागती की वायरल विडियो देख वह होलीवुड तक उसे, उसके काम को ले जाकर उसे होलीवुड स्टार बना देती है। अश्विनी का मानना है- “हम सब अपने अपने हिस्से का सट्रगल कर रहे हैं। हमें एक दूसरे का साथ देना है, सिमपथी नहीं देना और न ही किसी की मजबूती कम करनी है।”[1] वह एक सुलझी हुई बिज़नस वुमन है। उपन्यास के अंत में उसकी शादी दुबई के बिजनेसमैन जगजीत से हो जाती है।
निकोल अमेरिकन है। डोक्यूमेंटरी फिल्में बनाता है। जागती की कला उसे प्रभावित करती है। पहली नज़र में ही वह जागती को भा जाता है। न्यूयार्क में उसकी गर्ल फ्रेंड है, जिससे वह शादी करता है और सब छूट जाने के बाद फिर से जागती की ओर मुड़ना चाहता है।
जबकि जागती अब अठारह वर्षीय किशोरी नहीं रही। वह 22-23 वर्षीय युवती है। वह समझ चुकी है कि निकोल के पीछे भागना सिर्फ एक पागलपन था। आज रोमी उससे और उसके काम से जी- जान से प्रेम करता है- उसकी सभी कमियों और क्षमताओं को, सपनों और इच्छाओं को समझता है। उसे दोबारा खड़ा करने में रोमी चक्रवर्ती का ही मुख्य हाथ रहा है। जान चुकी है कि रोमी ही उसका जीवन साथी होना चाहिए, जिसने उसे नेह और आत्मविश्वास दिया है । जल्दी ही सगाई और शादी हो जाती है।
तिलक जागती का चचेरा पर प्रिय भाई है। बुरे दिनों में वह कोई मदद नहीं करता, अपितु कलसी मामा से मिल नटों के लूट- पाट के पुराने जरायम पेशे को अपनाने में रूचि दिखाता है। अफीम का नशा लेने लगता है। उसका अंत आत्महत्या से होता है। कस्तूरी तिलक की बहन है।
उपन्यासकार ने नटों के ऐतिहासिक विवरण भी दिये हैं। बाबा दुलार डोरी नटों का इतिहास बताते कहते हैं कि बाबर के समय कुछ मंगोल से कुछ ख़ानाबदोश परिवार काम के चक्कर में हिंदुस्तान आए। पहले पुरुष लाहौर के आसपास मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे और औरतें घर संभालती थी। कालांतर में स्त्रियाँ वेश्यावृति करने लगी और पुरुष उनके दलाल बन गए। उसी कबीले के परम नाम के एक आदमी ने नटों के कबीले से नाता जोड़ लिया। कच्छ के आसपास ये कबीले बसने लगे। यह ख़ानाबदोश नट गुजराती बोलते थे, स्त्रियॉं का सम्मान करते थे और जीवन के लिए आगे बढ्ने के लिए संघर्ष करते थे। परम बाबा के परदादा थे। कुछ परिवार महाराष्ट्र से होते हुये मध्य प्रदेश आ बसे । अब शादी से पहले लड़कियां भी नटिनी के करतब करने लगी।
रोमी अश्विनी का असिस्टेंट है। छोटे कद का गदबदा सा, टेडी बियर सा बंगाली। बंगला, हिन्दी और अङ्ग्रेज़ी जानता है। घुंघुराले बालों की पोनी, खुरदरी दाड़ी, आँखों पर चश्मा। उसे जागती चमकीली, सतरंगी चिड़िया सी लगती है। जागती भी अपनी कमजोरी, डर, सवाल- सब रोमी से शेयर करने लगती है। वह जागती का यह स्वप्न पूरा करने के लिए संकल्पबद्ध है कि बुर्ज खलीफा के शिखर, 164 वीं मंज़िल की 828 मीटर की ऊंचाई पर वह अपने करतब दिखाये और वह उसकी यह इच्छा पूरी करता है। जागती को करिश्माई जादूगरनी का खिताब मिलता है।
माँ का छोड़ जाना, निकोल की बेरूखी, शारीरिक और आर्थिक चुनौतियाँ – मानों जागती के हाथ से ज़िंदगी ही फिसल जाती है, किन्तु समय उसे अल्हड़ तरुणी से आत्मविश्वास से भारी युवती में बदल देता है।
साढे तीन साल बाद सोनी के यहाँ किया गया विडियो वायरल होकर तहलका मचा देता है। और अश्विनी दीदी कहती हैं- ‘ हमें अगली फिल्म जागती पर बनानी चाहिए। यह उसका क्रेसेंडो है।”[2]
बहुत से वाक्य पाठकीय चेतना में गूंज- अनुगूँज बन जाते हैं। जैसे-
- हम सब अपने काम से ही जाने जाते हैं।[3]
- पैसा मिलेगा न लाइफ में, बाकी सब कुछ मिल जाएगा। सब लोग फॉलो करेंगे, नो मनी, नो लाइफ।[4]
- लाइफ की खासियत ही यह है कि इसकी अपनी लय होती है। किसी के लिए कोई नही रुकता।[5]
- हर कलाकार की ज़िंदगी में एक क्रेसेंडो आता है।[6]
- ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा आदर्श स्थितियाँ नहीं मिल पाती।[7]
- ये जो सुख के आँसू होते हैं ना दिल की उन गुफाओं से निकलते हैं, जहाँ ख़ुशबुओं भरे खजाने होते हैं। इन आंसुओं का तो स्वाद भी बड़ा मीठा होता है, आँखें खुद चाहती हैं कि बस बरसती रहें और इस मधु को चखती रहें।[8]
पाँव की चोट ने भले ही जागती के जीवन में एक दुखद विराम जोड़ दिया था, लेकिन अश्विनी से मिला प्रोत्साहन, रोमी का स्नेह और साथ उसके कैरियर में क्रेसेंडो, आरोह बनकर आता है। यह क्रेसेंडो, यह आरोह, यह पुनर्जागरण, यह लंबी छ्लांग जागती के लिए बुर्जखलीफा पर चढ़ने की शक्ति लेकर आता है। उसे होलीवुड स्टार बना देता है। जिसे लोग रिटायर्ड मानने लगे थे, वह पुन: ऊँचाइयाँ छूने लगती है। जयंती रंगनाथन का यह उपन्यास उद्घोष स्वर में कहता है- हिम्मत और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। यह संघर्ष और जीवट, अवसाद और जीवन्तता का महा काव्य है।
संदर्भ:
[1] जयंती रंगनाथन, अपने अपने बुर्ज खलीफ़ा, शिवना प्रकाशन, सीहोर, एम. पी., 2026, पृष्ठ 130 [2] पृष्ठ 177 [3] पृष्ठ 46 [4] पृष्ठ 72 [5] पृष्ठ 140 [6] पृष्ठ 145 [7] पृष्ठ 163 [8] पृष्ठ 177

- डॉ. मधु संधु
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,
हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब।
madhu_sd19 @yahoo.co.in
m- 8427004610
