Monday, June 15, 2026
होमपुस्तकमन के तानों-बानों का गहन अन्वेषण 

मन के तानों-बानों का गहन अन्वेषण 

 कथासंग्रह-‘ईंधन की कोठरी’, लेखक – दीपक शर्मा, प्रकाशन-अनामिका प्रकाशन,  प्रयागराज, मूल्य- 295/-
समीक्षा: इला सिंह

साहित्य के परिदृश्य में ध्यान से देखा जाए तो दीपक  शर्मा की कहानियां एक बिल्कुल भिन्न स्थान पर खड़ी दिखाई देती हैं 1979 से वह लगातार रच रही हैं। 2025 में प्रकाशित ‘ईंधन की कोठरी’ दीपक शर्मा का पच्चीसवाँ  कथासंग्रह है।जिसके मुखपृष्ठ पर ‘पीटर द एल्डर’ का तैलचित्र ‘टावर ऑव बाबल’ ध्यान खींचता है।यह चित्र किस कारण दीपक शर्मा ने चुना होगा  इसकी उत्सुकता  ए आई ग्रोक तक ले गई। जहाँ पेंटिंग की बाबत जो तथ्य मिले तो दीपक शर्मा की दृष्टि का  कायल होना पड़ा।जो यह पेंटिंग कहती है वह बाइबिल की सत्य कथा से लिया गया सत्य है और वही सत्य  दीपक शर्मा अपनी कहानियों द्वारा उद्भासित करती हैं ।किस तरह किसी शक्ति द्वारा मानव समाज को भ्रमित कर उनको अलग-अलग भाषाओं में बांट दिया गया ।संवादहीनता की स्थिति अलग- अलग ताकतों ,रहस्यमयता, महत्वाकांक्षाओं और पतन को जन्म देती है।यह चित्र पूरे कथासंग्रह को परिभाषित करता है।

संग्रह में सम्मिलित 18 कहानियां हमारे आसपास बिखरी दास्तानों को कहती हैं। हमारी खुली आँख जो नहीं देख पाती ,दीपक शर्मा की सूक्ष्म ,गंभीर पैनी दृष्टि उन बारीक से बारीक भाव, दृश्य को इस स्पष्टता से पकड़ती है कि पढ़ते हुए बार-बार अचंभित हो जाना पड़ता है।

महीन,सूक्ष्म वर्णन… शब्दों की मितव्ययिता, कम कहन में गहरी बात कह देना दीपक शर्मा की विलक्षण विशेषता है।उनके यहाँ स्त्री की पीड़ा ,त्रासद स्थितियां भावुकता की लिजलिजी प्रस्तुति में नहीं बदलती। उनकी बानगी ,प्रस्तुति बेहद घुमावदार होने के बावजूद भी सीधी चोट करती है।

गहरे, छोटे,गूढ़ संवाद संग अबूझ कभी-कभी क्लिष्ट पहेली से बने चरित्र जब पाठक के मानस पटल के द्वार खोल प्रवेश पाने को अपने को तैयार कर लेते हैं जिसके लिए कभी-कभी उनकी कहानियों का पुनर्पाठ भी आवश्यक होता है,  तो एक चौंकाने वाला दृश्य उत्पन्न होता है!

संग्रह की पहली ही कहानी ‘ईंधन की कोठरी’हौल पैदा करने वाली है।दीपक शर्मा की कलम ने जिस तरह रहीम बख्श रोड पर स्थित बरकत बिल्डिंग का चित्र खींचा है वह रहस्य,  रोमांच की अनेक परतों में लिपटा सनसनी पैदा करने वाला परिवेश बनाता है।कमाल के वाक्य विन्यास युक्त और सशक्त, मजबूत संवादों में चलती कहानी गज़ब का सस्पेंस क्रिएट करती है। दिमागी खेल खेलती इस कहानी की रोचकता और रहस्यमयता जबरदस्त है।

 हालांकि पंजाबी में  संवाद अधिक हैं लेकिन साथ में अर्थ दिए होने से एक तरह से पंजाबी भाषा का आस्वाद भी मिलता है । संवादों के जरिए चलती कहानी परत दर परत 1947 के त्रासद विभाजन के उस  लोमहर्षक समय को हमारे समक्ष सदृश ला खड़ा करती है,जब अपनी सुकून भरी ज़िदगियां छोड़ आदमी दरबदर हो गया था।

 कुछ वाक्य दिल में धँसने वाले हैं-

–  ‘आँख की अपेक्षा हमारे कान ज्यादा तेजी दिखाते हैं।’( पृष्ठ न. 13,ईंधन की कोठरी)

 -’आँख से पहले कान जान लेते हैं घटना ने अपना विस्तार किस पल अर्जित किया ।’(पृष्ठ न.13,वही)

 ये छोटे-छोटे गूढ़ वाक्य  ‘देखन में छोटे लगें ,घाव करें गम्भीर’ उक्ति को चरितार्थ करते प्रतीत होते हैं।

  घरों में व्याप्त साजिशें ,भितरघात, दावपेंच, पुरुषदंभ के छिपे हथियार,घरेलू घिनौनी राजनीति दीपक शर्मा की समृद्ध और सघन भाषा में नितांत कौशल्य से आए हैं।

बड़ी बेगम के लिए दिल दुखता है…।  वहीं ‘प्रबोध’ कहानी में अनगिनत जानकारियों के ज़ख़ीरे संग लघु कलेवर में भी उस समय को ला खड़ा करना कहानी की विशेषता है। बचपन की छूटी  मधुर स्मृतियां जहाँ छुपी एक क्षीण टीस भी  है।अनगिन स्मृतियों में माँ-बाबा का संग- साथ , उनके स्नेह का भरपूर प्रसाद , भाई के साथ माँ-बाबा की छाया में सुंदर -सा बचपन , जहाँ लड़का – लड़की में कोई  भेद नहीं ,समान रूप से खेलना-कूदना,खाना-पीना यहाँ तक कि पहलवानों की कुश्ती देखने में भी कोई हर्ज नहीं कि अचानक  यथार्थज्ञान होना कि बेटियां कैसे ,कब अपनी छाया से बड़ी हो जाती हैं और समाज के लिए  उनकी उपस्थिति,उनकी छाया में समेट देने की कवायद शुरु हो जाती है।

नंग-धडंग पहलवानों का उसकी नज़रों से गुजरना माँ को ठीक नहीं लगता । अत्यंत बारीक और महीन कहन के साथ आई माँ की चिंता पहली दृष्टि में जायज  ही लगती है।मगर अंत तक आते एक बेचैनी में बदल जाती है। किस तरह शनै-शनै एक बड़ी होती लड़की की सीमाएं तय की जाने लगती हैं और यह सीमाएं उसके संस्कारों में आ बसती हैं सदा- सदा के लिए।

अति सामान्य बातें जो हमारी असावधान दृष्टि से ओझल रहती हैं।वहीं लेखक का विहंगावलोकन बहुत बारीकी से  उन्हें पकड़ सहज ही कहानी में परिवर्तित कर देता है। जैसे कहानी ‘दीक्षा’ ,एक बच्चे के पुरुष बनने की कहानी।किस तरह एक बच्चा मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में ही अपनी चार साल बड़ी बहन से भी बड़ा होने का ओहदा पा लेता है। एक भावी पुरुष होने के नाते…,संपत्ति का अधिकारी होने के नाते…। यह दीक्षा उसे बड़े प्यार और हौले से अपने पिता द्वारा मिलती है।सामाजिक व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य । लघु कलेवर  में भी दीपक शर्मा की कहन एक लपलपाती लौ जैसी चमक ,अपनी सार्थकता, अपना औचित्य सिद्ध करती है ।पाठक को ठगा छोड़ती उनकी कहानियां सोचने पर मजबूर करती हैं।

दीपक शर्मा की कहानी  विस्तारित न होकर अपने सुगठित, सुगढ़ ,कम कहन में सघन,गहन और एक पहेली जैसी प्रभावी होती हैं।कहानी ‘माँ के बाद’में यह तथ्य बहुत तीक्ष्णता के साथ  उभरता है।एक सात वर्ष के बच्चे की मनोदशा का मनोवैज्ञानिक चित्रण अत्यंत  गझिन बुनावट में आता है।माँ के बाद अकेला बच्चा अपनी स्मृतियों को इतना जीवंत कर लेता है कि वर्तमान से कट एक चित्र के माध्यम से ही अंदर एक अलग-थलग दुनिया बना लेता है। इस क्रूर दुनिया से अलग माँ के आँचल की ठंडी छांव -सी वह दुनिया है जहाँ न समाज के नियम काम करते हैं न पिता का निष्ठुर व्यवहार।

कहानी ‘दाहिने हाथ’ में मानव मन के गहरे, अंदर छुपी तामसिक प्रवृत्ति को उजागर करता खुद अपराधी ही नरेटर है जो पाठक  को अंदर तक विचलित करता है। और नजर जाती है कि इसतरह के अपराध तो घरों की चारदीवारियों में अक्सर जगह पाते हैं और अपराध बोध कहीं हृदय के गहरे ,अंधेरे कोने में किनारे रख जिंदगी आगे बढ़ा दी जाती है।

‘अकड़-भौं’ रिश्तों की महीन बुनावट, उठा-पटक,प्रेम, अलगाव के विभिन्न कोणों को दर्शाती अत्यंत सशक्त कहानी है।किशोर अवस्था के प्रेम, विद्रोह, तनाव के  दीपक शर्मा की लेखनी से अद्भुत चित्र बनते हैं।कहानी में पिता-पुत्री के प्रेम, पिता का पुत्री की शिक्षा के प्रति चिंता का सरोकार पुरूषों के प्रति बनी धारणा को तोड़ता है।कहानी का अंत रिश्तों की मजबूती को उभारता प्रेरक शैली में होता है।

साथ  ही दीपक शर्मा की खास विशेषतानुसार इस कहानी में भी  पाठक के लिए सुंदर,सशक्त भाषा  का इतना विराट, बहुल प्रज्ञा कोष या कह सकते हैं निपेक्षागार है जिसे पाठक अपने ज्ञान भंडार में रखना चाहेगा।

दीपक शर्मा के यहाँ प्रेम बड़े शालीन तरीके से आता है। प्रेम का उग्र, प्रगल्भ वर्णन ना होकर हल्की बयार- सा ,आपसी संवाद में बहता है, जिसे पकड़ने का हुनर पाठक के पास है अगर तो एक गुदगुदाहट ,एक मीठी चुटकी भर मुस्कान खिल उठती है चेहरे पर।

‘ टेढ़ा पाहुना’ में यह गुदगुदाहट कई बार अनुभव होती है ।लेकिन कहानी जीवन के कठोर सच ,यथार्थ के ठोस अंत के साथ खत्म होती है ।

कहानी ‘एक हाथ की ताली’ में जहाँ एक स्त्री की दारूण, चिरकालिक वेदना को एक बालमन की सहज चेतना,कोमल अनुभूतियों के जरिए सशक्त तरीके से उभारना अचम्भित करता है वहीं पुरुष के अंतस में छुपे दंभ, पितृ सत्ता की दोमुंही प्रवृत्ति पर  किए गए जबरदस्त  कटाक्ष से दीपक शर्मा के कहन और शिल्प का कायल हो जाना पड़ता है।

‘बाबूजी की ज़मीन’ ज़मीन  के अर्थ खोलती हुई एक अत्यंत सशक्त कहानी है ,यह बात  निम्न कथन में अत्यंत स्पष्टता से उभरती है-

‘जिस ज़मीन को बाबूजी आखिर तक पकड़े रहे,वह ज़मीन न कभी बेची जा सकती थी ,न खरीदी।उसकी लंबाई-चौड़ाई भी माप के बाहर थी।’(पृष्ठ-78,बाबूजी की ज़मीन)

कहानी में अन्तर्जातीय विवाह पश्चात  विडम्बनापूर्ण परिस्थितियां, ऐसी शादी से उत्पन्न संतान की मानसिक अवस्था का सटीक चित्रण तो है ही, प्रेम का अनूठा ,दिव्य मानवतावादी स्वरूप भी उपस्थित है।

 स्त्री विमर्श, स्त्री अस्मिता,स्त्री अस्तित्व पर कितनी ही कलमें चलीं और स्त्री के स्वरूप को गढ़ने में उनका महत्वपूर्ण योगदान भी है मगर स्त्री का वास्तविक स्वरूप, स्त्री की गहन पीड़ा ,स्त्री की अंतर गांठें जिस तरह दीपक शर्मा के यहाँ खुलती हैं अन्यत्र मुश्किल दिखता है ।घरों में फैली राजनीति,कुचक्र,दुरभिसंधियों से सीधे न टकराकर स्त्री दोहरा जीवन जीने को मजबूर  होती है यह ‘सिटकनी’ कहानी में अत्यंत रोचक तरीके से दिखाया गया है।पूजा के बहाने अपनी कुंठा,अपना क्रोध निकालने का ढंग एक स्त्री के दो रूप को बयान करता है।

अगली कहानी ‘मुहल्लेदार’ वक्त का चित्र खींचती है मानो।सत्तर-अस्सी के कालखंड को दिखाती ये कहानी उस समय को साक्षात प्रस्तुत करने में सक्षम हैं ।आपसी चालाकियां,झूठे प्रेम, पीठ में छुरा घोंपने की प्रवृत्ति की शिनाख्त दीपक शर्मा की कलम अपनी भाषा,शैली ,कहन से एक प्रणिधि की तरह करती है।

‘मुहल्लेदार’ की भाषा भी बहुत सघन और ताजगी भरी लगती है ।कई नये ,अनसुने शब्द जिनसे भाषा का सौंदर्य द्विगुणित हो गया है जैसे धन-सुंघू एक नये शब्द का प्रयोग किया गया है,जो धन-सुंघू दृष्टि और धन-सुंघू अर्थ दंड एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होकर बात को वजनी बना देता है।

1- ‘हमारे बीच अविभेदनीय भेद हैं ।असाध्य दरारे हैं। फिर भी हमारी धन-सुंघू दृष्टि उन सब की उपस्थिति देखी -अनदेखी कर देती है।’(पृष्ठ -99,मुहल्लेदार)

2- ‘गुणक व प्रवर्धक हमारी इस नई भौतिक संस्कृति का यह धन- सुंघू अर्थ दंड हमें पूर्ण रूपेण ग्राह्य व  स्वीकार्य है।’ (पृष्ठ-99 मुहल्लेदार)

किसी अत्यंत साधारण घटना से मानव मन की तुच्छ क्षुद्रताओं को उनकी संपूर्ण विद्रुपताओं संग अनंत तलछट से भी निकाल लाने की दक्षता ,कौशल दीपक शर्मा के पास है। ‘जमाजथा’ कहानी इसकी सशक्त बानगी है।कहानी में प्रयुक्त वाक्य विन्यास, शिल्प कौशल स्तब्ध करता है। लघु से लघु वाक्य भी मारक क्षमता रखते हैं।औलादें किसतरह लोभ, लालसा ,लिप्सा से रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करती हैं, यह अंदर तक आहत और भौंचक्क छोड़ देता है पाठक को।

कहानी ‘पेंच’ वाकई पेंचदार  है।संवादों में आए लक्षणा,व्यंजना एक झटका देते हैं। नायिका का बात-बात में ,तनावग्रस्त हो खंखारना,नायक की घुमावदार बातों में छिपा पुरुषोचित दंभ नायक-नायिका के बीच संबंधों का अंतर्द्वंद हतप्रभ करता है।मगर अंत इतनी जल्द समाधान ले आता है ,यह थोड़ा ठिठकाता है।दीपक शर्मा  के यहाँ अक्सर नारी पात्र भीरू, अंत में समझौता करने वाले लगते हैं ।यह समाज की वास्तविक स्थिति भी है ही।वह समाज को आइना दिखाती हैं ,काल्पनिक नारी पात्रों की बहादुरी के किस्से वह नहीं गढ़ती।

‘आपसी बाजी’ एक नए आधुनिक एकलव्य की कहानी कहती है। चिरंजी किस तरह अपने आश्रयदाता, अपने कोच, अन्नदाता को भूल अपनी कला को पूर्ण समर्पण दे बैठता है यह बात चौंकाती भी है और अंतिम पायदान पर यह बात पाठक के अंदर  एक खुशी भी पैदा करती है ।लेकिन साथ ही एक सिहरन भी चली आती है रीढ़ में कि अंत क्या होगा चिरंजी का? बाल मनोविज्ञान की परतों को उधेड़ते हुए कहानी एक अनूठी छाप छोड़ती है।

दीपक शर्मा के यहाँ मामूली घटनाएं भी खास बन जाती हैं, यह उनकी असाधारण लेखनी का ही कमाल है। अपनी विहंगम दृष्टि से हर घटना का क्ष-किरण उतार कर रख देती हैं।‘अहेर’ कहानी बदलते समय में किताबों के विकल्प किंडल,आई- पैड ,मोबाइल आदि से प्रभावित लाइब्रेरी के अधिकारियों द्वारा लाइब्रेरी बंद करने की योजना किसतरह एक लाइब्रेरियन की जिंदगी को प्रभावित करने वाली है ।एक अनछुए, अनूठे विषय की दमदार प्रस्तुति ध्यान खींचती है। अनजाने विषयों पर किए गए शोध से दीपक शर्मा की मेहनत और उनका जुझारूपन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

‘खमीर’ शीर्षक उत्सुकता बढ़ाता है।स्त्री केवल देह रहती है पुरुष के लिए यह बात कहानी के शब्दों ,वाक्यों ,एक -एक पंक्ति के बीच अनकहे,छिपे अर्थों से मुखरित हो पाठक को झकझोरती रहती है।

संग्रह की आखिरी कहानी ‘वृक्षराज’ सन १९६५ के भारत-पाक युद्ध की सच्ची तस्वीर।संस्मरण रूप में चलती यह कहानी जैसे हमें युद्ध विभीषिका झेलते उस गली वासी और मिल कारीगरों से जोड़ देती हैं जहाँ वृक्षराज पीपल सबकी सुरक्षा में तैनात हैं ।युद्ध से जुड़ी जानकारी,वह समय ,माहौल का सटीक और बेहद रोचक विवरण कहानी के रोमांच से जुड़े रहने को विवश करता है।

दीपक शर्मा  की स्मृतियों के अनोखे भंडार से निकली अनमोल नगीने  जैसी कहानियां हैं।‘ ईंधन की कोठरी’ ‘ प्रबोध’ ‘अकड़-भौं’ ‘ सहोदरा’ ‘ एक हाथ की ताली’ ‘ बाबूजी की जमीन’ ‘वृक्षराज’आदि इस संग्रह में उन नगीनों की बानगी हैं।वह समय आज भी प्रासंगिक हो हमारे समक्ष चित्र की तरह उपस्थित हो उठता है ।

दीपक शर्मा की कहानियों में शब्दों की मितव्ययिता जहाँ  विशेष गुण हैं वहीं सटीक ,विलक्षण शब्दों का चयन एक तरह से विद्युत उत्पादक के सदृश हैं। उनका शब्दों का चयन,संयोजन और उनका प्रयोग नितांत अभिनव होता है-तरेरती धूप की चौंध, तिलमिली,सुरागरसानी, आदिमजोर,अहेर ,मुड़कना,झोंका-भट्टी ,तत्थोथंभो ,मसृण, अनीदार जैसे अनेकानेक अप्रचलित शब्द कहानियों को एक अलग ही स्वरूप, एक भव्यता देते हैं।

उच्च स्तरीय तत्सम भाषा,चिकित्सकीय भिज्ञता,ठोस तथ्यात्मक प्रस्तुति के बावजूद दीपक शर्मा अपनी भाषा को बोझिल या उबाऊ होने से बचाए रखती हैं।दुरुह भाषा प्रयोग कहानी के सौंदर्य और प्रवाह को कहीं बाधित नहीं करता लगता। आपकी कहानियों में गहरा मनोविज्ञान छिपा रहता है ।मानव मन की छुपी ग्रंथियों ,उनसे उत्पन्न चेष्टाओं पर दीपक शर्मा की जबरदस्त पकड़ है।मानव मनोविज्ञान की अनोखी पड़ताल कर उस छुपे को सटीक और पारदर्शिता  से लेखन में उतारना उनका कौशल है।

वहीं घुमावदार, पेंचदार शैली के निष्पादन में दीपक शर्मा निष्णात हैं। आपकी कहानियां पाठक की सजगता, सचेतनता, जागरूकता की तलबगार हैं। पाठक की मामूली सी गफलत भी उसे कहानी के सही अर्थ से दूर ले जा सकती है।अभिधा ,लक्षणा, व्यंजना शब्दशक्ति से सजी उनकी भाषा शैली उनकी कहानियों की विशेषता है।

आपके शीर्षक  भी अनूठापन लिए बेजोड़ होते हैं।इसी संग्रह की बात करें तो सभी शीर्षक अपने-आप में निराले हैं मगर कुछ शीर्षक खास प्रभावित करते हैं ,जैसे -ईंधन की कोठरी,दाहिने हाथ, अकड़-भौं ,टेढ़ा पाहुना,एक हाथ की ताली,जमा-जथा ,अहेर,ख़मीर इनसे आप कुछ  अंदाजा नहीं लगा सकते कि कहानी क्या होगी मगर शीर्षक की सार्थकता और उद्देश्य कहानी पढ़ने के बाद  पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है।

कहानी जब तक लेखक के पास  रहती है वह उसकी मिल्कियत है, लेकिन निश्चित ही पाठकों के पास पहुँच वह पाठकों की हो जाती है ।हर पाठक  अपने दृष्टिकोण से कहानी पाठ के साथ उसमें छिपे अर्थ ग्रहण करता है ।जैसा कि भूमिका में दीपक शर्मा लिखती भी हैं ‘कहानी वह ‘खुला’ पाठ है जो लेखक और पाठक मिल कर गढ़ते हैं।’

‘लेखक पृष्ठ पर पढ़े जा रहे शब्दों के भीतर  ऐसी अर्थपूर्ण तहें जुटाता चला जाता है जिन्हें पाठक खोलता है और पूरा भेद जान लेता है।’

यह संकलन उन्होंने अपने पाठको को समर्पित भी किया है। संकलन की समस्त कहानियां समय का आख्यान हैं। पाठकों को विचारों के घोड़े दौड़ाने के लिए  वहाँ भरपूर जमीन  उपलब्ध है ।शब्दों,पंक्तियों, वाक्यों में छिपे गूढ़ अर्थ पाठक को भौंचक्क छोड़ एक अबूझ दुनिया से परिचय कराते हैं।

चिरकाल से समाज में समाहित, तह पर तह जमी मानव स्वभाव की विकृतियां और पितृसत्ता की जड़े उखड़ना  नामुमकिन नहीं तो दुष्कर अवश्य  है लेकिन इनका दृष्टि में आना भी खासा महत्व रखता है।दीपक शर्मा की कहानियाँ  आई-ओपनर  का कार्य बखुबी करती हैं।उनके यहाँ मानव स्वभाव की यह विकृतियां,मनोविज्ञान के कुशल पारखी की तरह…अपनी जड़ों सहित,  उन जड़ों के बारीक से बारीक  रेशों तक उघाड़ दी जाती है ।अत्यंत लघु कथनों से ही घरों के अन्दरूनी हिस्सों में भी जमे अंधकार को बाहर निकाल पाठकों के समक्ष दर्पण की तरह रख देना उनका कौशल है।

दीपक शर्मा की कहानियां वास्तव में पाठकों के लिए उपायन ही हैं।

  • इला सिंह
    104,घनश्याम महल, इंडियन ऑयल पेट्रोल पंप के पास, मुंशी पुलिया चौराहा, सेक्टर-16, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016
    मो. 7839040416,
    मेल [email protected]

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest