Tuesday, June 30, 2026
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‘अंतत:’ अविस्मरणीय स्तब्ध कर देने वाली मनोभावनाओं से  साक्षात्कार

नीलिमा करैया दी के प्रथम उपन्यास ‘अंतत:’ पर डॉ. पद्मा मिश्रा की समीक्षा 

भारतीय मनीषा में स्त्रियों ने भी साहित्य सृजन संस्कृति और समाज के नव निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाई है।  वह  साहित्य के माध्यम से जुड़कर अपनी आत्मा को विस्तार देती हैं। भावनाओं को संवारते हुए समाज और जीवन का पथ प्रशस्त करती हैं। जब कोई स्त्री साहित्य से जुड़ती है तो वह अपने भीतर की उन अव्यक्त व्यथा कथा की कहानियों को सुनाना चाहती है जिन्हें समाज ने सदियों तक दबाये रखा था। इतिहास गवाह है कि नारी सृजन ने भी कलम से क्रांति उत्पन्न की है।

वर्ष भर पढी जाने वाली पुस्तकों के क्रम में मैंने आदरणीय नीलिमा करैया दी के प्रथम उपन्यास अंतत: को पढा तो एक अविस्मरणीय स्तब्ध कर देने वाली मनोभावनाओं से  साक्षात्कार हुआ। एक सत्य घटना पर आधारित उपन्यास का कथानक मन को चौंकाता है। भावविह्वल और गहन चिंतन में डुबो देता है। समाज में नारी जीवन की व्यथा कथा की अनगिनत कहानियाँ हैं जो अनेक प्रश्न उपस्थित करती हैं समाज के सम्मुख पर उनका समाधान नहीं मिल पाया आज तक।

ये कहानियां हमारे समाज एवं मन का आईना होती हैं। हमारे परिवेश में घटती हुई घटनाएं जब ह्रदय को प्रभावित करती हैं और अपनी अभिव्यक्ति के लिए छटपटा उठती हैं, तब होता है किसी कालजयी कहानी का जन्म। जीवन के सुख दुख हर्ष विषाद की अनुभूतियों से भरी हुई कहानियां जब नारी विमर्श के मुद्दों को लेकर लिखी जाती हैं तो वह दर्द और पीड़ा के अनेक सोपानों से गुजर कर समाज के सम्मुख अनेक प्रश्न उठाती हैं पर उनका समाधान सरल नहीं होता। जब इन विमर्शों पर महिलाओं की सशक्त लेखनी आवाज उठाती है तो उनका जादू देखते ही बनता है। लेखिका आदरणीय नीलिमा जी ने भी अपनी कलम से इसी दर्द को उकेरा है। 

और यह सिद्ध कर दिया कि यदि संवेदना मानवता,कर्मठता ममता जीवित है तो इन विजयिनी-सशक्त मनोबल वाली कर्मठ महिलाओं  की ही बदौलत। जो कलम भी चलाती हैं और उद्योग भी,सृजनकर्ता भी हैं और विघ्नहर्ता भी। वे जूझ रही हैं अन्याय की हर चुनौती के खिलाफ। उनकी  आवाज उठी है हर अनय के  .विरुद्ध. जैसी इस उपन्यास की नायिका प्रीत ने अपनी आवाज मुखर की थी।अपनी पीडा

अपना दर्द भूलकर अपने जैसी अन्य बेटियों की अस्मिता और सुरक्षा के लिए। उपन्यास का केंद्र मनोवैज्ञानिक अनुभूतियों, सामाजिक परिवेश और प्रकृति के.साथ जीवन की व्यथा कथा बांचती उस प्रीत की कहानी है जो एक सजग संवेदनशील पत्रकार निवेदिता निवी के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है।इस कृति को पढते हुए कई बार आंखें भींगी मन विचलित हुआ और व्यथित भी।

नैनीताल की सुरम्य वादियों में अपने परिवार के साथ पहुंची प्रीत ने मानों प्रकृति को ही अपना मित्र बना लिया है।वह उसके साथ बातें करती है,अपने सुख दुख साझा करती है और कभी उसका मन एकाकार हो उस.समूचे परिवेश की विशाल हरीतिमा भरे विस्तार में खो जाता है

कुछ पलों के लिए अपने साथ घटित उस जघन्य घटना को भूल कर। उसकी यादों से वह अविस्मरणीय पल मिटते ही नहीं बल्कि उसकी समूची चेतना को बिखंडित कर देते हैं। अक्सर वह अपने मित्र आकाश को याद करती है जो अब न जाने कहां होगा। फिर भी एक उम्मीद संजोए वह चल रही है जीवन पथ पर। कालेज में घटी उस नृशंस घटना को याद करती हुई प्रीति अपने जीवन की तुलना मानस की सीता से करती है।जब रावण उनका हरण कर ले गया होगा तब उनकी क्या मनस्थिति रही होगी? उस नितांत अकेलेपन में उन्होने सहायता के लिए किसे पुकारा होगा? जटायु उनकी मदद के लिए आये पर घायल हो पराजित हुए। फिर भी सीता के हरण की सूचना राम को उनसे ही मिली थी।पर उसके साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ? उसके लिए कोई जटायु क्यों नहीं ? प्रीत सोचती है —

काश इंसान के मन में भी जटायु जैसी सहृदयता होती ,मानवीयता होती तो सृष्टि का सफर कुछ और ही होता।

प्रीत पापा और परिवार के साथ नयना देवी मंदिर गई थी।भावनाओं का तूफान मन को मथ रहा था पर अधर मौन थे।सब कुछ अव्यक्त होकर भी व्यक्त हो रहा था।लेखिका यहां पर लिखती हैं–

मानव प्रकृति ऐसी होती है ,जब मन भरा होता है ऐसा लगता है कि अनजानी चुंबकीय शक्ति से सब खिंचते चले जा रहे हैं।..ईश्वर के सामने पहुंच कर सब कुछ कहने का मन मानो जड हो जाता है। 

उपन्यास का अगला अंश एक लंबे अंतराल के बाद आगे बढता है नायिका निवेदिता निवि के रुप में जब वह  सुदूर उड़ीसा के राउरकेला से वहां पढने आती है।अपने हास्टल में उसे विभिन्न अनुभूतियों से गुजरना पड़ता है।जो कमरा उसे मिला उसके विषय में अनेक बातें एवं चर्चाएं छात्रों के बीच फैली थी। किसी ने बताया कि इसी कमरे में रहने वाली  एक लडकी के साथ गैंग रेप की घटना घटित हुई थी जिसके कारण यह कालेज काफी चर्चित रहा था। वह भयभीत तो नहीं पर उसके प्रति एक अज्ञात संवेदना और उत्सुकता से भर उठी थी। यहां पर उपन्यास का कथानक पाठक को भी उद्वेलित करता है उस संपूर्ण घटनाक्रम को जानने समझने के लिए। 

कथानक आगे बढता है स्थान शहर वहां के प्राकृतिक परिवेश और सामाजिक विषमताओं के बीच। वह समय लड़कियों के लिए उदार नहीं था। ऐसी स्थिति में अमृतसर से चलकर यहां तक आने वाली प्रीत की व्यथा कथा उसके परिवार की पारिवारिक उदारता ,बेटी को हास्टल में रखकर पढाने की भावना कितनी सराहनीय थी,निजी को यह भी जानना था। अकस्मात उसके मित्र संग्राम से मुलाकात होना ,प्रीत के विषय में सटीक जानकारी मिलना और उस दर्दनाक हादसे के एक एक पल को जीने महसूस करने की पीडा निवी ने भी संग्राम के मुख से सुनते हुए झेली थी।दर्द आंसू वेदना के भयावह दौर से वह भी गुजरी थी। उसकी नौकरी बैंक में थी और इस दौरान एक वृद्ध व्यक्ति की उसने काफी मदद की बाद में सुना कि वे नहीं रहे।वह उदास थी पर संग्राम ने कहा कि उनके साथ ऐसा ही होना था। वह चौक उठी यह जानकर कि वह भी उन आरोपियों में से एक था।  

निवेदिता का मन अनेक सवालों के भंवर में घिर कर बहुत कुछ जानना चाहता है।अब प्रीत कहां होगी? कैसी होगी? एक अनजानी व्यथा से गुजरती हुई निवेदिता संग्राम के बताए पते पर भटकती हुई आखिरकार प्रीत के घर अमृतसर में पहुंच जाती है। यह उपन्यास की पाठकीय सफलता है कि वह भी निवेदिता की मनस्थिति और उसकी तलाश में साथ साथ चलते हैं। निवि का मन बेचैन था उस बहादुर लडकी से मिलने के लिए जिसने अपने अपराधियों को सजा भी दिलवाई थी।आज वह कहां होगी ? उसके घर में प्रवेश करते ही उसको पहला धक्का लगता है यह जानकर कि प्रीत अब नहीं रही।उसने फांसी लगा ली थी ,पर क्यों?..उसके माता पिता की विक्षिप्त दुखी उदास आंखों में उसके सारे सवालों के जवाब थे पर अधर मौन थे। बहुत प्रयास के बाद प्रीत की करुण कथा सुनते हुए वह कई बार व्यथित और विचलित हुई ।कैसे उन दरिंदों ने पाशविकता की हद तक उसके साथ दुर्व्यवहार किया था। हाथों.में चाकू घोंप कर ,निर्वस्त्र कर विवश करना ,लंबी मूर्च्छा के बाद उसका रेंगते हुए पुलिस तक पहुंचना ..सब कुछ सुना उसने। अपराधियों को उम्रकैद की सजा मिलने के बाद भी समाज ने उस परिवार का स्वागत नहीं किया था।तानों उलाहनों और सामाजिक बहिष्कार के बीच उसके परिवार की पीड़ा और वेदना असहनीय होने लगी थी।जब केवल प्रीत के साथ घटी घटना के कारण उसकी बहन का विवाह टूट गया ,भाई घर छोडकर चला गया और शेष बचे माता पिता उस भयावह त्रासदी की पीडा को झेलते हुए बस जी रहे थे। प्रीत यह सब सह नहीं सकी और फांसी लगा ली । शायद यह सोचकर कि उसकी मृत्यु के बाद सब कुछ शांत और सहज हो जायेगा। निवेदिता को  मां ने बताया कि जीवन के अंतिम दिनों में वह डायरी लिखने लगी थी। प्रीत की डायरी निवी के लिए वह अदृश्य डोर थी जिससे प्रीति की भावनाएं जुड़ी थीं। उसके जीवन का वह अंतिम क्षण जिसमें उसने वह कठोर निर्णय लिया था। डायरी के पहले पृष्ठ सेम

छोटी बहन गीत की शादी तय होने का उल्लास, तैयारियां और परिवार की खुशियों से भरी भावनाएं थीं। फिर उसके साथ घटित घटना के कारण गीत का विवाह टूट गया।भाई पहले ही लोकप्रताडना से घर छोड़कर चला गया था।..उस समाज की क्रूर भावनायें, प्रताड़ना और परिवार का दुख सब कुछ प्रीत की मार्मिक अनुभूति.जन्य वेदना का लिखित दस्तावेज ही था।समाज ने उसे माफ नहीं किया था।समाज ऐसी स्थितियों में एक लड़की को ही दोषी मानता है। कानून अदालत न्यायपालिका कहीं से भी न्याय की उम्मीद या तो टूट जाती है या समय के लंबे अंतराल में सब कुछ गौण हो जाता है,स्थितियां बदल जाती हैं।यही स्थिति प्रीत की थी। उसने मृत्य को चुना परंतु उन्हे मृत्यु

 क्यों नहीं जिन्होंने यह कृत्य किया था? लेखिका नीलिमा जी कहती हैं –न्यायपालिका स्त्रीलिंग है। उसका प्रतीक भी हाथ में तराजू लिए स्त्री का ही है।इसीलिए अपनी देह के क्षार क्षार होकर बिखरने पर भी, अपनी अस्मिता लुट जाने पर भी ,अपनी आत्मा के मिट जाने पर भी स्त्री को न्यायपालिका से न्याय नहीं मिलता। अन्याय यहां पर भी अपना वर्चस्व कायम रखता है।”

उपन्यास की ये पंक्तिया इस कृति की,नारी अस्मिता की मूल उद्भावना हैं।लेखिका स्वयम संवेदनशील करुणामय व्यक्तित्व की स्वामिनी है। उनकी लेखनी मानवीय संवेदना की आत्मा को पहचानती है। स्त्री मन की पीड़ा, असहनीय दुख की वेदना को अनुभूत करती है शायद इसीलिए वो प्रीत की वेदना, उसकी करुण व्यथा कथा को समझ पायी हैं। इस कृति को पढकर अनेक प्रश्न उपस्थित होते हैं पर समाज के पास न तो उनके लिए उचित न्याय है न समाधान। बहुत ही संवेदनशील सार्थक उद्देश्य को लेकर लिखे गए यथार्थ चित्रण की इस कथा का साहित्य जगत में स्वागत है।

आप यशस्वी दीर्घयु व सतत सृजनशील रहें,मेरी सप्रणाम सादर सस्नेह हार्दिक शुभ कामनाएं नीलिमा दी।

  • पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
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2 टिप्पणी

  1. प्रिय पद्मा!
    असीम स्नेह इस समीक्षा ‌के लिये।
    तुमने उपन्यास को पढ़ा और संवेदनाएँ महसूस कीं।
    इस उपन्यास को लिखने का हमारा एक उद्देश्य रहा।
    सामूहिक बलात्कार निरंतर बढ़ ही रहे हैं। लेकिन उसके रोकथाम के लिए कोई गंभीरता से प्रयास नहीं होता।
    कभी घर वाले डर जाते हैं रिपोर्ट नहीं करते, कभी पुलिस डरा देती है और कभी न्याय नहीं मिलता। देर से न्याय मिलना भी अन्याय की ही तरह है।
    इसके लिए कठोर दंड की व्यवस्था जरूरी है,यही हमारी दिली ख्वाइश है। दंड का भय अपराधी प्रवृत्ति को रोकने में किसी हद तक कामयाब होता है।

    न्यायपालिका जल्दी निपटारा करें,निश्चित अवधि में,अधिकतम तीन माह। वकील ईमानदारी बरतें ।
    पुलिस टालमटोल नहीं करे और समाज भी अपनी सोच बदले कि लड़की की इसमें कोई गलती नहीं होती ।
    उसे भी जीने का अधिकार है।
    वह जीना चाहती हैं तो उसे ताने देकर मारने पर विवश न किया जाए।

    हम जानते हैं यह हमारा पहला उपन्यास है और लिखने के क्षेत्र में हमारा पहला कदम। लेखन में उतनी परिपक्वता और विचारों में ठहराव सहजता से नहीं आता, लिखते- लिखते ही आता है।
    लेकिन हमने कोशिश की है।पौने दो वर्ष लगे। लेकिन हम चाहते हैं कि किताब को सब पढ़ें।
    लोगों की सोच बदले।
    सजा वही सही है जो इंसान का मन परिवर्तित कर सके।
    अगर सजा भोगने के बाद भी सोच नहीं बदली तो सजा के प्रारूप परिवर्तन पर विचार करना जरूरी है।

    काश शासन सजग, सचेत और जागरूक हो सके। इंसान ,इंसान बन सके।

    बहुत-बहुत शुक्रिया पद्मा इस परिश्रम के लिये।

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