काव्य संकलन- झील कहती है, कवयित्री-पूर्णिमा वर्मन
प्रकाशक-बुक लिफ़ पब्लिशिंग,समीक्षा- डॉ. मधु संधु
हिन्दी वेब जगत को पूर्णिमा वर्मन की देन अप्रतिम है। वे उत्तरप्रदेश के पीली भीत से हैं और वर्षों से संयुक्त अरब इमारात में रह रही हैं। आज से अढ़ाई दशक पहले उन्हों ने ‘अभिव्यक्ति’ और ‘अनुभूति’ जाल पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी जगत के लिए एक चामत्कारिक नवीन जगत के द्वार खोल जाल जगत में हिन्दी साहित्य का सूत्रपात किया था। वे संस्कृत में पीएच. डी. हैं, वेब डिजाइनिंग में निष्णात और पत्रकारिता में पारंगत हैं । एक सफल संपादक/ पत्रकार होने के साथ- साथ कवयित्री, निबंधकार, और कहानीकार भी हैं। ‘पूर्वा’, ‘वक्त के साथ’, ‘चोंच में आकाश’ उनके काव्य संग्रह हैं। उन्होंने बाल साहित्य का भी सृजन किया है। ‘यों ही चलते हुए’, ‘जन्मदिन मीता का’, ‘एक शहर जादू जादू’, ‘उसकी दीवाली’, ‘फुटबाल’, ‘नमस्ते कोर्निश’ उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं।
छंदमुक्त गीतों के संग्रह ‘झील कहती है’ में कुल 25 कवितायें हैं। प्रत्येक रचना पाठक के अंतस में गहरे उतरने की क्षमता लिए है। प्रवासी मानस का अंतर्जगत और प्रकृति-पर्यावरण का साहचर्य बहुत कुछ इस काव्यलोक की बीज भूमि है।
समर्पण में लिखती हैं-
“उस झील के नाम
जो निरंतर बहा करती है मुझमें।” —
“तीन दशकों तक अपने देश से दूर, एक अलग परिवेश में रहते हुए मेरी संवेदनाओं के केंद्र बदल गए। जहां दुनिया शोर, विमर्श और संघर्षों की परिभाषाएँ तय कर रही थी, वहाँ मैं अपने भीतर के एकांत, प्रकृति के मौन और स्मृतियों के ‘ठिकानों’ से संवाद कर रही थी। बहुतों के लिए ये विषय हवा- हवाई हो सकते हैं, पर मेरे लिए यही जीवन का सबसे कठोर यथार्थ है।”
हर कविता पाठक को एक नए लोक की यात्रा पर ले जाती है। इस चित्रशाला में प्रकृति के अनन्य जीवंत चित्र हैं। ‘झील कहती है’ की झील सैलानियों से कहती है कि जब भी वे आएंगे, उसे यहीं पाएंगे-
इस शहर की गोद में ठहरी हुई हूँ
शांत प्राकृत भाव से गहरी हुई हूँ
दूर पर्वत शृंखलाओं ने
मुझे धारण किया है
वनस्पति की मेखलाओं ने
असाधारण किया है
साथ की अट्टालिकाएँ
हैं तिरा करती मुझमें
पत्तियाँ भी शाख से
अक्सर गिरा करती हैं मुझमें ।
यह झील कवयित्री के अंतर्लोक में भी/ही बह रही है।
‘छूटा हुआ घर’ यायावर जीवन के मन: जगत में प्रवेश की कविता है। कविता पढ़ते एक बार तो निर्मल वर्मा की कहानी ‘दो घर’ याद आ ही गई। प्रवासी जीवन और दो घर। छूटा हुआ घर स्मृतियों में जीवित रहता है, बसा रहता है। जब उस घर के रहवासी लौट आते हैं तो बगिया के फूल खिल उठते हैं, घास हरहराने लगती है। रोशनियाँ/ जगमगाहट और हलचलें उस उदास और मुरझाए घर को जीवंत कर देती हैं-
हम कहीं भी हों
जिसे हम छोड़ जाते हैं
हमें वो याद आते हैं
उसे हम याद आते हैं। 4
‘नीलमणियों सा चमकता दिन’ में शीत ऋतु है और अपने प्रवासी हो चुके प्रियजनों के लौटने की प्रतीक्षा तथा आशा है-
यहाँ सब कुछ
सज़ा है ऐसे कि जैसे
जो गए उठकर यहाँ से
जल्द लौटेंगे
और
उनके लौटते ही वे पुराने पल खुशी के
लौट आएंगे
पुन: हम मुस्कुराएंगे।
लिखती हैं- “यह संग्रह स्थान, स्मृति, ऋतु और समय की आवारा मुसाफिरी है। — ये रचनाएँ मेरी उन यात्राओं का सारांश हैं जहां वे निरंतर दो ठिकानों के बीच आवाजाही करती रही।”
‘गाँव में पीपल’ मूल्यबोध लिए है। पीपल वरदान सा चौपाल पर हीरे- पन्ने सा जड़ा हुआ है। अतिथि सत्कार तो कोई इससे सीखे। उसमें हर अतिथि के लिए पहचान और शरण देने का अपनत्व है। हवा के शुद्धिकरण की शक्ति और उदात्तता है। गर्मी में छाया देता है और बरसात से बचाने के लिए छाते का काम करता है। हवाएँ उसे खुशी देती हैं और वह झूमने लगता है, चाँदनी उसे चमक देती है और वह जगमगाने लगता है।
‘एक सुबह गली में’ कविता पाठक को एक देशीय गली की निराली यात्रा पर ले जाती है। यहां एक जीवंत चहल- पहल है। दैनिक भगदड़ से पहले के सुनहरी क्षण हैं। मौसी- चाची है। गुमटी पर मसाला चाय और अखबार लिए लोग हैं। टेम्पो, लारी जैसे वाहन हैं। ‘गाँव में अलाव’ बर्फ गिरने के बाद उस सुरमई संध्या को लिए है, जिसमें अलाव के आसपास बैठ केसर और गरम मसालों की महक सनी चाय की चुसकियाँ देर रात तक ली जाती हैं।
एक शांत पर्यवेक्षक, गंभीर चिंतक, विचारशील दार्शनिक इन कविताओ में देख सकते हैं। ‘चौराहा समय का’ में समय उस चौराहे के समान है, जो बिना सोचे बिना बोले हर वक्त चलता रहता है। चौराहे की तरह जगमगाता भी है, हर शोर- शांति से निरपेक्ष भी रहता है, अनुशासन का पाठ भी पढ़ाता है और ट्रैफिक लाइट की तरह लाल-पीली आंखे भी दिखाता है।
‘सुनहरी तस्वीर’, ‘नयी सुबह’, ‘सागर तट पर सूर्योदय’, आदि कवितायें प्रकृति के अनेक रूप लिए हैं। ‘नयी सुबह’ का सूर्य दिवस का जादूगर है। यह जादूगर जैसे ही अपनी गठरी खोलता है, पक्षी चहचहाने लगते हैं, किरणों की चादर बिछ जाती है, रोशनी फ़ैल जाती है, आकाश मुसकाने लगता है, ध्वनियाँ बिखरने लगती हैं, शहर जीवंत हो उठता है।
बारहमासा, षठऋतुओं से सम्पन्न इस देश से, उत्सव त्योहारों की जीवंत धरती से इमारात पहुंची पूर्णिमा जी वहाँ रहकर भी प्रकृति और संस्कृति के इन उपहारों को पूरे मन से जीती हैं। ‘कैमरे में कैद होली’, ‘नये साल का जादू’, ‘राग देश’, ‘चैत्र की पहली रात’, ‘उदासियों के पत्ते’, ‘आवारा बसंत’, ‘मधुमास’ ऐसी ही रचनाएँ हैं-
दिवस
फिर रचने लगा मधुमास
उत्सव- उत्सवों में
रच गई है धरा
गुनगुने घर और आँगन
सज गए हैं
लौट आया है वसंती प्यार।
मौसम का वनजारा ‘आवारा बसंत’ जब आता है तो बगिया- बटिया, अमलतास- टेसू, पर्वत- घाटी, महल- कुटिया – सब पर छा जाता है। उदास कवयित्री ‘उदासियों के पत्ते’ में लिखती है-
कभी हमीं फूल थे हम ही तितली
हमीं पतंगे, रंग और झरने
हमीं गुनगुनाते थे चिड़ियों से यहाँ- वहाँ
अब तो सिर्फ दिन बीतते हैं धीरे- धीरे —-
फिर हरे कर दिये बसंत ने
उदासियों के पत्ते।
बसंत उन्हें विशेष प्रिय है। बसंत उदासियों के पत्ते हरे कर देता है। पीली सरसों लहलहाने लगती है। चैत्र की पहली रात, ओस की बूंदें, पेड़ों से गिर श्यामल पृथ्वी पर रंगोली रचते खजूर के सफ़ेद फूल उन्हें भाते हैं और बासन्ती उत्सव ‘होली’ का ‘कैमरे में कैद होली’ में जिक्र करती हैं। ‘राग देश’, ‘मधुमास’ में भी बसंत की हिलोरें हैं।
उत्सव त्योहारों में आज ‘नए वर्ष का जादू’ भी चमकने लगा है। बाज़ार झिलमिला रहे हैं, खरीददारी हो रही है, रेस्टोरेन्ट भरे हुये हैं, अभिनंदन पत्र भेजे जा रहे हैं और –
मीडिया की पुकारों में
विज्ञापनों अखबारों में
फोन पर संदेशों में
फेसबुक और इंस्टा में
सब कहीं बिखरा हुआ है रंग।
लेकिन वेदना यह है कि अकेलापन, बीमारी, अनिद्रा, भूख, निराशा के कारण बहुत से लोग इस जादू से वंचित भी रह हैं।
‘बारिशों के शहर’, ‘बारिश बारिश नभ’, ‘आज तक’ में दिन की गति को थाम लेने वाली बारिशें हैं-
बारिशों के नियम हैं
उनको समय से बरसना है
शहर की ज़िद्द है
कि उसको सुबह उठकर दौड़ना है।
शारजाह के सागर तट के एक सर्द और बरसाती दिन को चित्रित करती कहती हैं कि न दुकानों पर सैलानियों की भीड़ है, न मछुआरों को दिन से कोई उम्मीद है-
सर्द हवा के झोंके पन्नों से उड़ते थे
नए नए अनुबंधों छंदों को बुनते थे –
हल्की- हल्की बौछारों में मन खोया था
शोर भरी इस नगरी में सब कुछ सोया था।
‘सागर तट पर सूर्योदय’ प्रभात का चित्र लिए है। ‘सुनहरी तस्वीर’ में इमारात की उस दोपहर का उल्लेख है, जब सभी लोग तो घरों के अंदर ए. सी. में दुबके होते हैं और मधु मक्खियाँ धूप- गर्मी में भी विश्राम नहीं करती। लगातार परिश्रम से अपने मधुकोष भरती रहती हैं और ‘ठंडी दोपहरी’ में खिड़की से उतर रही मीठी धूप का रंग और नींबू वाली चाय का स्वाद घुलमिल गए हैं।
डेन्मार्क की राजधानी कोपेनहेगन के एक सांस्कृतिक कैफे में बिताई एक सुंदर शाम का जिक्र ‘ट्रकेबार’ कविता में है। काडन वॉटर फ्रंट और आप्रवासी घाट मारिशस के बीच एक बेंच पर शाम का समय बिताती कवयित्री लौटते सैलानियों का चित्र अंकित करती हैं। एल्ते विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी के भारतीय विद्या विभाग से गुजरते हुये पूर्णिमा जी ने लिखा-
तुम कहो या न कहो हर सांस कहती है
कि शिक्षा प्रांगण में कल की दुनिया की नई
तस्वीर रहती है।
“इस संग्रह की कवितायें छंदमुक्त गीत हैं। — शब्दों को छंदों की बेड़ियों से मुक्त रखा गया है, ताकि वे सहज लय पा सकें, लेकिन उनकी आत्मा पूरी तरह गीत की है। यह वैसा ही है जैसे सात समंदर पार रहकर भी मन का पूरी तरह देसी बने रहना। — इन कविताओं में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि एक जीवित पात्र है।”
कवितायें छोटी हैं तथा प्रतीकात्मता और चित्रात्मकता, व्यंजना और अलंकृति, संगीत और लय, संक्षिप्तता और गहराई, पर्यावरण और प्रकृति के अनेकानेक रूप/ बिम्ब सहेजे हैं। यहाँ झील का मानवीकरण भी है और तादात्मयीकरण भी। देशी विदेशी चित्र हैं, दर्शनिकता और मूल्यबोध है, वेदना और आनंद है, प्रकृति और पर्यावरण है, घुमक्कड़ी और स्मृतियाँ हैं, संस्कृति, खानपान और उत्सव त्योहार हैं।
संदर्भ:
पूर्णिमा वर्मन, झील कहती है, बुक लीफ पब्लिशिंग, 2026, मेरी बात
वही, पृष्ठ 1
वही, पृष्ठ 4
वही, पृष्ठ 15
वही, मेरी बात
वही, पृष्ठ 24
वही, पृष्ठ 28
वही, पृष्ठ 18
वही, पृष्ठ 7
वही, पृष्ठ 26
वही, पृष्ठ 31
वही, मेरी बात
वही, पृष्ठ 1
वही, पृष्ठ 4
वही, पृष्ठ 15
वही, मेरी बात
वही, पृष्ठ 24
वही, पृष्ठ 28
वही, पृष्ठ 18
वही, पृष्ठ 7
वही, पृष्ठ 26
वही, पृष्ठ 31
वही, मेरी बात
