प्रेमचन्द जयन्ती पर शिमला के गेयटी थियेटर में राजेन्द्र राजन के सद्यप्रकाशित उन्यास ‘कागज़ की नाव’ का लोकापर्ण हुआ। उपन्यास पर परिचर्चा में हिमाचल व बाहर के कुछ प्रदेशों से आये लेखकों, आलोचकों ने भाग लिया। अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से आयोजित इस राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी के पहले सत्र में ‘क्यों आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचन्द?’ विषय पर संवाद हुआ। प्रमुख वक्ता थे जयपुर के प्रो. कैलाश चन्द सैनी। उन्होंने बताया कि 100 साल बाद भी प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों के किरदार हर घर, गांव, मुहल्ले, कस्बे और शहरों में मौजूदा है। आज प्रेमचन्द के किसान और मजदूर की स्थिति पहले से भी शोचनीय और दयनीय बनी हुई है। उसका शोषण अनवरत जारी है। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और मजदूर आज भी हाशिए पर सिमटा है। प्रेमचन्द कहीं गये नहीं हमारे आसपास ही मौजूद हैं।
राजेन्द्र राजन के उपन्यास ‘कागज़ की नाव’ का लोकापर्ण संगोष्ठी के अध्यक्ष प्रो. सुधीर सोनी, मुख्य अतिथि प्रेम साहिल, विशिष्ट अतिथि प्रो. सैनी व भाषा विभाग के अतिरिक्त निदेशक चन्दन कपूर ने किया। उपन्यास पर तीन वरिष्ठ आलोचकों ने पत्र वचन किया। डॉ. मीनाक्षी पाल ने कहा कि उपन्यास प्रमुख किरदार राहुल के साथ-साथ सभी पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण प्रस्तुत करता है। उपन्यास की कथा $गहरा विक्षोभ पैदा करती है। रंगमंच और सिनेमा में अपनी छाप स्थापित करने वाले राहुल को निराशा ही हाथ लगती है। उपन्यास पाठक को असहज करता है और असमंजस पैदा करता है। पाठक को कटुता और कड़ुवाहट के माहौल से परिचित करवाता है। बेचारगी, हताशा, बेबसी में जीते पात्र पाठक को विचलित करते हैं। यह उपन्यास रिश्तों की बहुत सी गिरहों को खोलता है और इसका सुदृढ़ पक्ष यह है कि इससे ‘मेरा, आपका सबका यथार्थ छिपा है।
दूसरे पत्र वाचक डॉ. उषा बन्दे ने कहा कि यह उपन्यास टैगोर की कविता ‘पेपर वोट’ की याद ताज़ा कर देता है। उपन्यास के प्रमुख पात्र राहुल को अपनी पहचान स्थापित करने की प्यास बहुत गहरी है। उपन्यास पाठक के मन में अजीब सी आशंका पैदा करता है और यह कृति नैतिक आग्रहों को खोजने का विकल्प प्रस्तुत करती है। उपन्यास का अन्त बेहद मार्मिक है। दीपांकर सेठ जब गेयटी थियेटर से बाहर आते हैं तो पत्तों के गिरने की सरासराह से चीक जाते हैं। पतझड़ की आहट उनके समूचे जीवन में बिछे पतझड़ का प्रतीक है जो राहुल के मौत के आगोश में समा जाने के बाद डेरा जमा बैठा है। उपन्यास की भाषा, शिल्प, कथासूत्रों की संवेदना के स्तर पर प्रस्तुति इसे एक ऐसी कृति में ढाल देने में सक्षम है जो निश्चित रूप से पाठक के दिलो-दिमाग पर लबे वक्त तक अपनी छाप अंकित कर देती है।
तीसरे पत्र वाचक वरिष्ठ आलोचक डॉ. हेमराज कौशिक ने ‘कागज़ की नाव’ का सूक्ष्म व सारगर्मित विश्लेषण प्रस्तुत किया। उनका मत था कि राजेन्द्र राजन ने उपन्यास में दापत्य सबन्धों की घुटन में पिसते पति-पत्नी के जीवन का उकेरा है तो दूसरी तरफ उसके बच्चों में संस्कारों पर उसके दुष्प्रभावों को भी चित्रित किया है। दिवंगत पुत्र के साथ पिता के संवाद की कल्पना सृष्टि के माध्यम से राहुल की आत्मा का पिता दीपांकर से संवाद बहुत ही मर्मिक बन पड़ा है। इसमें पिता का पुत्र के प्रति पश्चाताप, विद्धवलता व्यंजित हुई है। डॉ. कौशिक के अनुसार लेखक ने ‘कागज़ की नाव’ उपन्यास की वस्तु का जिस सलंग्नता, अनुभूति की प्रवणता और चारित्रों की मनोभूमि का जिस सूक्ष्मता से निरूपण किया है, भाषा और शिल्प का जो सार्थक निर्वाह किया है वह राजेन्द्र राजन की अनुभूति की $गहराई, संवेदनशीलता और मनोविज्ञान की गहरी पैठ को स्थापित करते हैं। यह उपन्यास संबंधों के मनोविज्ञान तथा चरित्रों की खंडित मानसिकता को निरूपित करता है।
देहरादून से संगोष्ठी में आए प्रेम साहिल ने बतौर मुख्य अतिथि अपने वक्तव्य में कहा कि उपन्यास की कहानी आज घर-घर की कहानी है। बच्चे और अभिभावकों के मध्य संवाद के सेतू टूट रहे हैं जिसके कारण रिश्तों में दरारे पैदा हो रही हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र राहुल स्वयं को कैरियर में स्थापित न कराने के कारण जिस दु:ख, पीड़ा यातना से गुजरता है, उसका द्धन्द और घनीभूत पीड़ा ही इस कृति का प्राण बिन्दु है।
अपने अघ्यक्षीय संबोधन में जयपुर से आए प्रो. सुधीर सोनी ने कहा कि ‘कागज़ की नाव’ उन युवा कलाकारों के सपनों के बिखरने की कहानी का प्रतीक है जो सिनेमा जैसे चकाचौंध और ग्लैमर से भरपूर माध्यम में अपने स्पेस की तलाश में हताशा के दौर से गुजरते हैं। जवान बेटे की लाश का पिता के कंधों पर अर्थी के रूप में अन्तिम यात्रा के लिये जाना कितना पीड़ादायक होता है उसकी सिरहन शिद्दत से इस उपन्यास में मौजूद है। यही कारण है कि यह कृति पाठक के अन्र्तमन को झकझोर कर रख देती है। राजेन्द्र राजन जी का उपन्यास ‘कागज की नाव’ समाज के बदलते स्वरूप, परिवार और रिश्तों के अंत: संबंध की एक संपूर्ण व्याख्या है। कैसे एक व्यक्ति पूरे परिवार की धुरी होते हुए भी अलग-अलग हिस्सों में बंटकर अपने मूल लक्ष्य से भटक जाता है और पूरे परिवार की एक सूत्र होने की प्रक्रिया में किस प्राकर की बाधाएं, वैचारिक मतभेद और परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, इस पर प्रकाश डालता है। ‘कागज़ की नाव’ एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे समाज की कहानी है। इसे तमाम समकालीन परिदृश्यों के बीच नए सिरे से देखे जाने की आवश्यकता है। ‘कागज़ की नाव’ लेखक का एक सार्थक प्रयास है, जिसमें वह बेबाकी से अपने निजी जीवन पक्षों के साथ-साथ कल्पना के आलोक को लेकर अभिनव स्वरूप में पूरे समाज की पड़ताल करता है। प्रो. सोनी ने उपन्यास की आत्मा के प्रत्येक मार्मिक बिन्दु को जिस प्रकार स्पर्श किया उसने गेयटी थियेटर के समेलन कक्ष में खचाखच भरे दर्शकों को पिन ड्राप साइलेन्स की तरह बांधे रखा।
गुप्तेश्वर उपाध्याय, के आर भारती, देवेन्द्र धर और चन्दन कपूर ने भी प्रस्तुत तीनों शोध पत्रों और उपन्यास पर सारगर्भित टिप्पणियां प्रस्तुत कीं। गुप्तेश्वर ने पेरेन्टल केयर का मुद्दा उठाया और कहा कि मां-बाप और बच्चों के मध्य बढ़ती स:वादहीना के कारण परिवारों का ताना-बाना विखंडित हो रहा है। भारती ने इसे एक सशक्त पकड़ का उपन्यास बताते हुए इसे लेखक की व्यक्तिगत पीड़ा से जोड़ा। देवेन्द्र धर ने कहा कि उपन्यास में राहुल की मां के चरित्र को परपीड़क बताया गया है जो स्त्री पात्र के प्रति अतिशय की भावना पैदा करता है। चन्दन कपूर ने कहा कि यह उपन्यास हमें काफका के ‘मैटाफॉरसिस’ की याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि उपन्यास का उज्जवल पक्ष यह है कि इसमें ‘गिल्ट’ में जी रहे दीपांकर सेठ ने खुद बचाने का प्रयास नहीं किया है। अपितु खुद को एक्सपोज़ ही किया है।
तीसरे सत्र में बहुभाषी कवि समेलन हुआ जिसमें कुल्लू, मण्डी, बिलासुपर, चबा, सोलन व शिमला के करीब 80 कवियों ने काव्य पाठ किया। काव्य पाठ की अध्यक्षता की प्रयात कवि आत्माराम रंजन ने मंच संचालन किया विजय विचलित ने। तीनों सत्रों को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया उद्घोषक राधा सिंह ने तथा तीनों धन्यवाद प्रस्ताव ज्ञापित किए देवेन्द्र धर महासचिव प्रलेस और कथाकार राजेन्द्र राजन ने प्रलेस की हिमाचल इकाई के अध्यक्ष एल आर वर्मा ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की।
- देवेन्द्र धर, शिमला
