हिंदी सिनेमा अपनी हर दूसरी फ़िल्म के माध्यम से एक ही संदेश देता है-“यदि आपको जीवन में सफल होना है तो आपके अंदर शारीरिक बल होना अति आवश्यक है। जब तक आप ज़ुल्म और अन्याय के विरुद्ध निजी स्तर पर हिंसा नहीं कर सकते… दस-बारह गुंडों को अकेले, निहत्थे धराशायी नहीं कर देते, तब तक सफलता आपसे रूठकर दूर खड़ी रहेगी।”
‘ज़ंजीर’ का इंस्पेक्टर विजय हो या फिर ‘दीवार’ का कुली विजय, दोनों अपनी अक़्ल से कहीं अधिक अपने ढिशुम-ढिशुम से सफलता हासिल करते हैं। यदि हीरो अपनी बहन के साथ सड़क पर जा रहा है और उसकी बहन को पाँच-छह गुंडे मिलकर छेड़ते हैं तो फिर चाहे पाँच फ़ुट पाँच इंच का आमिर ख़ान हो, डेढ़ पसली का अनिल कपूर हो, या फिर पाँच फ़ुट सात इंच वाले शाहरुख़, सलमान या सैफ़… वे ऐसा एक्शन करते हैं कि भयानक दिखाई देने वाले गुंडे ताश के पत्तों की तरह गिरते दिखाई देते हैं।
हिंदी सिनेमा के बारे में जब हम पूछते हैं कि इतना अविश्वसनीय क्यों होता है?… तो जवाब एक ही सामने आता है कि आम इंसान अपने रोज़मर्रा के जीवन से इतना ऊब चुका होता है कि उसे एक ऐसा नायक चाहिए जो उसके दिल की तमाम हसरतों को पर्दे पर पूरा करके दिखाए। वह हीरोइन से छेड़छाड़ भी करे, हीरोइन उससे प्यार भी करे… वह जीवन के हर संघर्ष से विजयी होकर सीना तानकर सामने खड़ा हो। अकेला दस-बारह आदमियों की पिटाई लगा दे और उसके बालों की कंघी तक ख़राब न हो।
एक ज़माना था जब वी. शांताराम, बिमल रॉय, राज कपूर, महबूब ख़ान, गुरुदत्त, हृषिकेश मुखर्जी और ताराचंद बड़जात्या तथा बासु चटर्जी जैसे फ़िल्मकार फ़िल्मों का निर्माण कर रहे थे। उनकी फ़िल्मों के चरित्र ज़मीन से जुड़े होते थे। ‘दो आँखें बारह हाथ’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘सुजाता’, ‘बंदिनी’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘प्यासा’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘अनाड़ी’, ‘आशीर्वाद’, ‘मिली’, ‘दोस्ती’, ‘आरती’, ‘रजनीगंधा’ जैसी फ़िल्में दिल को छूती थीं। सोहराब मोदी और के. आसिफ़ जैसे फ़नकार ऐतिहासिक फ़िल्में बना रहे थे। यह हिंदी सिनेमा का स्वर्ण काल था।
इस काल में मार-धाड़ वाली फ़िल्मों का एक अलग ही मार्केट हुआ करता था। उसके कलाकार और दर्शकों का एक विशेष वर्ग हुआ करता था। दारा सिंह इस प्रकार की फ़िल्मों की पहचान होते थे। कुश्ती के अखाड़े से सिनेमा में आए दारा सिंह का पाँच-सात गुंडों को अकेले मार भगाना अखरता नहीं था। आज़ाद, शेख़ मुख़्तार, एन. ए. अंसारी, महीपाल, अजीत, मनहर देसाई, रंधावा जैसे कलाकार इस शैली की फ़िल्मों के नामचीन सितारे थे।
वैसे तो सुनील दत्त, शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, फ़िरोज़ ख़ान जैसे सितारे सिनेमा में मौजूद थे, जो अपनी मर्दानगी का परिचय सिनेमा के पर्दे पर विश्वसनीय तरीके से दिया करते थे। फ़िरोज़ ख़ान तो हिंदी सिनेमा के जेम्स बॉण्ड और क्लिंट ईस्टवुड का मिश्रण थे… वे वेस्टर्न चरित्रों की तरह फ़ेल्ट हैट और पिस्तौल भी अपने साथ सजा लेते थे और जेम्स बॉण्ड की तरह जासूसी भी कर लेते थे। मगर अमिताभ बच्चन की सिनेमा में एंट्री के साथ सिनेमा का पूरा रुख़ ही बदल गया।

जब अमिताभ बच्चन की हिंदी सिनेमा में एंट्री हुई, उस समय हिंदी सिनेमा के एकमात्र सुपरस्टार राजेश खन्ना का कैरियर उरूज़ पर था। राजेन्द्र कुमार के बाद राजेश खन्ना ने सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली के अर्थ ही बदल दिए थे। राजेश खन्ना द्वारा निभाए गए चरित्रों में वैरायटी भी कमाल की थी… ‘आराधना’, ‘दो रास्ते’, ‘आनंद’, ‘बावर्ची’, ‘सफ़र’, ‘अपना देश’, ‘इत्तेफ़ाक़’, ‘दाग़’, ‘नमक हराम’, ‘दुश्मन’, ‘रोटी’ जैसी फ़िल्मों में उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि उन्हें टाइप-कास्ट नहीं किया जा सकता। राजेश खन्ना हर तरह के किरदार निभा सकते थे।

मगर ‘ज़ंजीर’ और ‘दीवार’ के बाद भारतीय फ़िल्मों के नायक का रूप पूरी तरह से बदल गया। अमिताभ बच्चन सक्षम कलाकार थे, इसलिए उनके फ़ाइट सीन विश्वसनीय लगते थे। उनकी गहरी आवाज़ और संवाद अदायगी उनके ऐसे हथियार थे, जो आसानी से किसी और कलाकार को उपलब्ध नहीं हो सकते। जैसे गीत लेखन में कभी राजेन्द्र कृष्ण हुआ करते थे, वैसे ही एक्टिंग में अमिताभ बच्चन रहे। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में ‘सब्लाइम’ से ‘रिडिकुलस’ तक हो सकते थे। राजेन्द्र कृष्ण ऐसे नग़मे भी लिख सकते थे-‘घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में / ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिए…’ और साथ ही साथ यह भी लिख सकते थे- ‘शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के / दर्द जवानी का सताए बढ़-बढ़ के।’ ठीक इसी तरह अमिताभ बच्चन भी ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है…’ जैसी अदाकारी कर सकते थे।
अमिताभ बच्चन के बाद की पीढ़ी में जो कलाकार आए, उनकी फ़िल्मों में मार-धाड़ और हिंसा तो होती थी, मगर सिनेमा के बहुत से अवयव कहीं पीछे छूट जाते थे। धर्मेन्द्र के अंतिम पड़ाव की फ़िल्में, शत्रुघ्न सिन्हा की फ़िल्में, रजनीकांत, सनी देओल, संजय दत्त आदि की फ़िल्मों में अधिकतर एक ऐसी दुनिया का चित्रण होता था, जिसे हम पहचानते नहीं थे। मिथुन चक्रवर्ती, अक्षय कुमार आदि ने भी मीडियॉकर मार-धाड़ वाली फ़िल्में परोसने में झिझक महसूस नहीं की।
‘शोले’ भारत की सबसे लंबे अरसे तक चलने वाली फ़िल्म बनी तो उसके पीछे सिनेमैटिक कारण थे। केवल हिंसा नहीं थी। वहाँ हिंसा के लिए गब्बर सिंह मौजूद था, मगर वहाँ ढिशुम-ढिशुम तो कहीं याद ही नहीं रहती।

ऐसा नहीं है कि इस काल में अर्थपूर्ण सिनेमा बनाया ही नहीं गया। मगर समस्या यह है कि मार-धाड़ वाला सिनेमा बेहिसाब बना, जबकि ‘हम आपके हैं कौन..!’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘दिल तो पागल है’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘कुछ-कुछ होता है’, ‘अंदाज़ अपना-अपना’, ‘हम साथ-साथ हैं’, ‘जब वी मेट’, ‘लगान’, ‘रॉकेट सिंह’, ‘वेक अप सिड’ जैसी फ़िल्में अपनी उपस्थिति हमेशा से दर्ज करवाती रही हैं। अजय देवगन बीच-बीच में ऐसी फ़िल्में ले आते हैं कि हैरानी होने लगती है। अक्षय कुमार भी ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ जैसी फ़िल्म बना डालते हैं।
मगर समस्या वहीं रहती है कि बड़े स्तर पर वही फ़िल्में सफल होती हैं, जिनमें हिंसा की भरमार होती है। हिंदी सिनेमा की वर्तमान की सबसे बड़ी हिट फ़िल्में ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर-पार्ट 2’ में जिस स्तर की मारपीट, ख़ून-ख़राबा, गालियाँ और हत्याएँ दिखाई गई हैं, वह एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती है। ऐसा करना ज़रूरी क्यों है कि हीरो यानी कि नायक बनने के लिए आपको विलेन या खलनायक जैसा व्यवहार करना पड़े? यह सिनेमा की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
एक शिकायत दर्शकों से भी तो है कि वे ऐसी ही फ़िल्मों को हिट बनाते हैं, जिनमें निरंतर हिंसा देखने को मिले और उनके हीरो के पास हर समस्या का एक ही हल हो- ढिशुम-ढिशुम करते हुए गुंडों को धूल चटाना। अनिल कपूर की ‘लम्हे’ बुरी तरह फ़्लॉप हो जाती है, मगर ‘तेज़ाब’ और ‘राम-लखन’ हिट हो जाती हैं। दर्शक यह निरंतर जताते रहते हैं कि उन्हें जीवन की सच्चाई बताती फ़िल्में देखने में उतनी रुचि नहीं। उन्हें चाहिए ऐसी फ़िल्में, जिनमें हीरो के पास हर बात का एक ही जवाब हो… मार-धाड़ और ढिशुम-ढिशुम। वरना ऐसा क्यों हो कि रणबीर कपूर की ‘बर्फ़ी!’ तो दुकान पर ही पड़ी रह जाए और ‘एनिमल’ सुपर-डुपर हिट हो जाए!

हिंदी सिनेमा में विश्वसनीयता का अभाव ,इस बार का संपादकीय बहुत से प्रबुद्ध और सामान्य जन के दिल की बात कहता है। हिंसा,कल्पनातीत हरकतें ,कॉमेडी का भौंडा पर ताकत की ओवरडोज के साथ का नायक और वैसे ही फिल्में पहले के कुछ खास वर्गों और अब आम बात हो गई है।संपादकीय सभी प्रकार के नायकों यथा दारा सिंह , अजीत ,आमिर खान ,शाहरुख खान और सारी की सारी ऐसी वैसी फिल्मों को आड़े हाथ लेकर ख़बर लेता है।दूसरी ओर ऋषिकेश मुखर्जी सरीखे फिल्मकारों और उनकी फिल्मों को भी सारगर्भित रूप से प्रस्तुत करता है।भद्र नायकों यथा सुनील दत्त,,,सरीखी पीढ़ी को भी बताता है।
समय के साथ चलता यह संपादकीय राजेंद्र कुमार,राजेश खन्ना और फिर अमिताभ बच्चन की फिल्मों के दौर की बात भी सहज और नैसर्गिक रूप से करता है।अमिताभ और राजेंद्र कृष्ण सरीखे पर्वताकार कलाकारों की रेंज भी कुशलता से बयां करता है।हिंसा और अविश्वसनीय बातों ,किरदारों,कथानकों की भी बात होती है और दर्शकों को भी औचित्यपूर्ण ढंग से खराब और अविश्वसनीय सिनेमा को पसंद और हिट करने की त्रासदी और विडंबना को आज के पाठकों परोसता है !?!
इसी को याद करते हुए फिल्मों के शो में राज कपूर साहब का दूरदर्शन पर एक इंटरव्यू याद आता है। जिसमें ‘ बॉबी फिल्म’ के बारे में मिली सफलता के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बड़े ही मर्म स्पर्शी अंदाज में अच्छे सिनेमा और अविश्वसनीय अकल्पनीय और लुगदी हिंदी सिनेमा की बात को बयां कर दिया!!!उन्होंने बताया कि जब उन्होंने ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी जीवन दर्शन को दर्शाती फिल्म बनाई तो उन्हें काफी नुकसान हुआ और लगभग दिवालियेपन की हद तक! फिर उन्होंने नम आंखों से कैमरे की ओर देखा और कहा” मैं ‘ बॉबी ‘ फिल्म बनाई
जिसमें ऐसा कुछ भी नहीं था,जिसे कंटेंट ,संदेश ,उद्देश्य कहा जा सके?!?! उस में वही सब था जो दर्शक देखना चाहता था,,,
“यकीन मानिए !?साहब!!! मेरा घर भर गया !!!!!और उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में दोनों हाथ !?!!’मेरा नाम जोकर के किरदार की मानिंद फैला दिए,,,, और उनकी आंखें गीली थी,,,, यह एक बहुत बड़ी टिप्पणी है? भारतीय दर्शकों और भारतीय हिंदी सिनेमा के माथे पर।
धुरंधर के निर्माता को भी अब सोचना चाहिए?! कि अगला सीक्वेल हिंसा और गलियों के ग्लूटिन से रहित हो तो बेहतर!!!!
यह संपादकीय यदि किसी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिका मेंआये तो आज के दर्शक जेन जी या अल्फा को पढ़वाया जाए और डीडी कबह राजकपूर साहब का इंटरव्यू भी तो शायद सिनेमा का रुख बेहतर हो जाए।
भाई सूर्य कांत जी, आपके प्रिय विषय पर संपादकीय ने आपसे त्वरित टिप्पणी लिखवा ली। आप सब पुरवाई पत्रिका को ही प्रतिष्ठित बना रहे हैं। दिल से शुक्रिया।
वाकई लेकिन इसका जवाब भी आपने दे दिया है कि बर्फी पडी रहती है और एनिमल चल जाती है
धन्यवाद आलोक भाई।
फिल्मों को बाक्स ऑफिस पर सुपरहिट बनाने के लिए जानबूझकर हिंसाप्रधान फिल्में बनाने की की बाजारु रणनीति पर शानदार आलेख। आपके फिल्मी ज्ञान का अभिनंदन।
हार्दिक आभार अरोड़ा साहब।
यथार्थ से कटी और मार-धाड़ से भरी फिल्में अधिकतर बॉक्स आफिस पर हिट होती हैं क्योंकि आम दर्शक हीरो की जगह अपने आप को देखता है और अपने सपने उनमें जीता है। हिंसा और मार-धाड़ से यूँ अपनी कुंठा को शांत करता है मानो वह उन सब से बदला ले रहा हो जिन्होंने उसके साथ अन्याय किया हो या किसी और कारण वह उनसे नफरत करता हो। आमतौर पर दर्शक हकीकत से दामन छुड़ा कुछ समय सपनों की दुनिया में बिताना चाहते हैं जहाँ तर्क और नीरस ज़िन्दगी की ज़मीनी सच्चाइयों की दुखदायी पकड़ ढीली पड़ जाती है। आम आदमी के मनोरंजन से संबंधित इस लोकप्रिय साधन के विश्लेषण में संपादकीय के लिए पुरवाई के पाठकों का आभार।
बिमल भाई, आपने सही कहा है कि – आमतौर पर दर्शक हकीकत से दामन छुड़ा कुछ समय सपनों की दुनिया में बिताना चाहते हैं जहाँ तर्क और नीरस ज़िन्दगी की ज़मीनी सच्चाइयों की दुखदायी पकड़ ढीली पड़ जाती है। … बहुत शुक्रिया।
पुरवाई का संपादकीय ‘ हिन्दी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव!’ भारतीय सिनेमा को केंद्र में रखकर लिखा गया है।
भारतीय सिनेमा आमजन से लेकर खास तक सभी के लिए सुलभ बन चुका है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि भारतीयों का जीवन सिनेमा से ही शुरू होता है। सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीति के साथ जीवन के जितने कार्य व्यवहार है सभी को इसने व्यक्त किया है। यहां तक कि कई फिल्मों में पशु-पक्षी भी मुख्य भूमिका में नजर आते रहे हैं।
भारतीय सिनेमा इतना अविश्वसनीय क्यों है? अविश्वसनीय है तो लोग देखते क्यों है?? दुबला-पतला नायक भी दस-दस गुंडों को अकेले मारकर भगा देता है। दक्षिण भारत की फिल्में इस मामले में बाॅलीवुड से दस कदम आगे है। इन फिल्मों के नायक एक पंच में दस-दस गुंडों को हवा में तैरा देता है।
इस अविश्वसनीय मारधाड़ का कारण संपादकीय में बताया गया है। इस कारण से संतुष्ट हुआ जा सकता है। एक दूसरा कारण यह भी है कि भारतीय समाज पराजित मानसिकता का शिकार ज्यादा रहा है। आम लोग दशकों से जातिवाद और भ्रष्ट तंत्र से बुरी तरह आहत होते रहे । जब उसका हीरो(गरीब घर का लड़का) सेठों से ,जमींदारों से और ताकतवर व्यवस्था से लड़ता है, तो आम आदमी को वह हीरो बहुत अपना सा लगता है। उसका हीरो उसके जमे आक्रोश का विरेचन कर देता है। अविश्वसनीय स्टंट भी उसके विश्वास को डिगने नहीं देता है।
एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन की इस छवि ने सिनेमा को जन-जन तक पहुंचा दिया। एक समय जिस सिनेमा को बुरा माना जाता था, अमिताभ बच्चन ने उसे काफी हद तक पाक-साफ बना दिया था।अमिताभ बच्चन से पहले वाला सिनेमा खाए-अघाए लोगों के मनोरंजन का साधन मात्र था। आम आदमी हो या खास यह अभिनेता सभी का प्रिय बनकर उभरा था। यहां तक कि उनका यह हीरो किस जाति या धर्म का किरदार निभा रहा है, ये ध्यान में ही नहीं रहता था। बस अमिताभ बच्चन नाम ही पर्याप्त था। पहले दर्शक हीरो की शक्ति पर विश्वास करता था, आज कहानी की अविश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करता है।
भारत-पाक रिश्तों पर बनी फिल्में भी एक समय पर खूब सफल होती थी। सन् अस्सी के दशक से लेकर 2010 तक अपनी आतंकवादी गतिविधियों से पाकिस्तान ने भारत में इतना आतंक मचाया कि आम लोग त्रस्त हो चुके थे। सच कहा जाए तो इस दरम्यान हम इसका माकूल जवाब नहीं दे सके थे। इस आक्रोश को हम फिल्मों के माध्यम से शमन कर लेते थे। उस समय की प्रदर्शित फिल्में बार्डर,गदर इत्यादि खूब सफल रही।
धुरंधर तथा धुरंधर 2 फिल्में सच्ची घटनाओं से प्रेरित थीं। वर्तमान में पाकिस्तान में अननोन गनमैन द्वारा आतंकवादियों की हत्या और फिल्मों में दिखाई गई हत्याओं के साम्य ने लोगों को जबरदस्त आकर्षित किया।
देश की शिक्षा-व्यवस्था में सुधार, ठीक-ठाक आर्थिक स्थिति तथा भयमुक्त वातावरण ने फिल्मों की तकनीक तथा यथार्थ ने इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया हैं। एक तरह से फिल्मों की अविश्वसनीय अब खलने लगी है। जब शिक्षा का प्रसार बढ़ेगा तो लोग इन सब पर बात करेगा। बात की भी जानी चाहिए।
इस विषय पर यह संपादकीय प्रश्न तो उठाता ही है, साथ में सिने इतिहास के रेशे रेशे से परिचित भी कराता है। आज का संपादकीय पाठक को काफी स्पेस दे देता है। क्योंकि हर एंगल से इस पर टिप्पणी की जा सकती है। आपने हर बार की तरह इस बार भी भारतीय सिनेमा की गहराई से पड़ताल की है।
भाई लखन लाल पाल जी, आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि – इस विषय पर यह संपादकीय प्रश्न तो उठाता ही है, साथ में सिने इतिहास के रेशे रेशे से परिचित भी कराता है। आज का संपादकीय पाठक को काफी स्पेस दे देता है। क्योंकि हर एंगल से इस पर टिप्पणी की जा सकती है। आपने हर बार की तरह इस बार भी भारतीय सिनेमा की गहराई से पड़ताल की है।… हमेशा की तरह तार्किक और अर्थपूर्ण टिप्पणी।
सर्वप्रथम मैं संपादक महोदय का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करती हूँ । क्योंकि इस समय वह भारत में है और उनकी माताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है । ऐसी विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया और संपादकीय लिखा। यह संपादकीय दरअसल हिंदी सिनेमा में हिंसा की बढ़ती मौजूदगी पर टिप्पणी करते हुए हमारे सामूहिक मानस का आईना सामने रखता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक केवल फिल्मों को कटघरे में खड़ा नहीं करता, बल्कि दर्शक को भी कठघरे में खड़ा कर देता है। सवाल यह नहीं रह जाता कि फिल्में हिंसक क्यों हैं; असली सवाल बन जाता है—हम हिंसा से इतना आकर्षित क्यों होते हैं?
लेख में ‘विजय’ का चरित्र एक प्रतीक की तरह उभरता है। ‘ज़ंजीर’ का विजय हो या ‘दीवार’ का, वह सिर्फ़ एक फिल्मी पात्र नहीं, बल्कि उस दौर के सामाजिक आक्रोश का प्रतिनिधि था। व्यवस्था से निराश आदमी को पर्दे पर ऐसा नायक दिखाई देता था जो उसकी ओर से लड़ सकता था, अन्याय का जवाब दे सकता था और वह सब कर सकता था जो वास्तविक जीवन में आम आदमी के लिए संभव नहीं था। इस अर्थ में अमिताभ बच्चन की हिंसा महज़ हिंसा नहीं थी; उसके भीतर एक बेचैन समाज की आवाज़ भी थी।
लेकिन संपादकीय की खूबसूरत बात यह है कि वह अमिताभ के दौर को ही समस्या का आरंभ मानकर नहीं रुकता। वह पीछे लौटकर उस सिनेमा को याद करता है जिसमें मनुष्य अपनी कमजोरियों, संवेदनाओं और अपूर्णताओं के साथ नायक हुआ करता था। वी. शांताराम, बिमल रॉय, गुरुदत्त, ऋषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी का उल्लेख इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इन फिल्मकारों के यहाँ जीवन को हराने के लिए मुट्ठियाँ नहीं, कभी-कभी संवेदना, धैर्य और मानवीयता भी पर्याप्त हुआ करती थी।
दारा सिंह का उदाहरण देकर लेख एक महत्वपूर्ण फर्क भी बताता है। जब एक पहलवान सात आदमियों को अकेले पटकता था तो दर्शक उसे स्वीकार कर लेते थे, क्योंकि वहाँ फिल्म और दर्शक के बीच एक मौन समझौता था—यह एक विशेष तरह का सिनेमा है, यहाँ अतिशयोक्ति भी मनोरंजन का हिस्सा है। समस्या तब पैदा होती है जब वही अतिशयोक्ति हर तरह की फिल्म में नायकत्व की अनिवार्य शर्त बन जाती है।
‘शोले’ का उल्लेख संपादकीय का शायद सबसे प्रभावशाली पड़ाव है। ‘शोले’ में हिंसा है, लेकिन उसकी स्मृति केवल हिंसा की स्मृति नहीं है। हमें गब्बर याद रहता है, जय-वीरू याद रहते हैं, ठाकुर याद रहता है, बसंती याद रहती है; हमें उसके संवाद, रिश्ते, संगीत और वातावरण याद रहते हैं। यानी महान सिनेमा में हिंसा कहानी का एक तत्व हो सकती है, कहानी स्वयं नहीं।
यहीं संपादकीय अपने सबसे तीखे प्रश्न तक पहुँचता है—क्या नायक बनने के लिए खलनायक की भाषा और हिंसा अपनाना आवश्यक हो गया है? यह प्रश्न आज इसलिए अधिक बेचैन करता है क्योंकि आधुनिक फिल्मों में नायक का ‘एंटी-हीरो’ बनना अक्सर उसके नैतिक पतन को चुनौती देने के बजाय उसका उत्सव बना देता है। बदला, क्रोध, शक्ति और हिंसा को नायकत्व के प्रमाणपत्र की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
फिर भी लेख का सबसे आत्मालोचनात्मक पक्ष उसका दर्शकों की ओर मुड़ना है। फिल्मकार वही बनाता है जो बिकता है। यदि हिंसक नायक बार-बार टिकट खिड़की पर विजय प्राप्त करता है और शांत, संवेदनशील, जटिल चरित्र पीछे छूट जाते हैं, तो इसका दोष केवल निर्माता या अभिनेता का नहीं है। बाज़ार अंततः दर्शक की पसंद का प्रतिबिंब होता है।
हाँ, यहाँ संपादकीय से थोड़ी असहमति भी संभव है। ‘बर्फ़ी!’ और ‘एनिमल’ की सफलता को केवल हिंसा के आधार पर समझना शायद पर्याप्त नहीं होगा। फिल्मों की सफलता में स्टारडम, प्रचार, जॉनर, संगीत, रिलीज़ का समय और बदलती युवा आकांक्षाएँ भी भूमिका निभाती हैं। फिर भी इन उदाहरणों के माध्यम से उठाया गया मूल प्रश्न अपनी जगह बेहद प्रासंगिक है।
आख़िर में यह संपादकीय फिल्मों से अधिक हमारे भीतर के दर्शक के बारे में है। शायद हम पर्दे पर उस नायक को इसलिए पसंद करते हैं जो दस लोगों को अकेले पीट देता है, क्योंकि वास्तविक जीवन में हम जिन अन्यायों, असुरक्षाओं और बेबसी से घिरे रहते हैं, उनसे लड़ने की ताकत हमारे पास नहीं होती। सिनेमा हमारी अधूरी इच्छाओं को कुछ घंटों के लिए पूरा कर देता है।
लेकिन अच्छे सिनेमा की पहचान शायद यही है कि वह हमारी इच्छाओं को केवल पूरा न करे, उन पर सवाल भी उठाए। वह हमें सिर्फ़ यह न दिखाए कि नायक ने कितने लोगों को पीटा, बल्कि यह भी पूछे कि उसे लड़ना क्यों पड़ा, हिंसा ने क्या बदला और जीत के बाद उसके भीतर क्या बचा।
इस दृष्टि से यह संपादकीय ‘ढिशुम-ढिशुम’ के विरुद्ध महज़ शिकायत नहीं है। यह उस सिनेमा की तलाश है जिसमें मुट्ठी से बड़ा मनुष्य हो, बंदूक से बड़ी कहानी हो और जीत से अधिक महत्वपूर्ण उसकी मानवीय कीमत हो। यही इसकी सबसे सार्थक और साहित्यिक उपलब्धि है।
सादर अभिवादन सर
बहुत विश्लेषणात्मक संपादकीय । मैं भी धुरंधर देखने गई थी ।सच में इतनी डरावनी फिल्म लगी वो मुझे । यही सोचने लग जाते हैं क्या सच ऐसा था । पता नहीं ।
धन्यवाद रेणुका जी।
अच्छा विषय लिया। सब समेट लिया।
शुभकामनाएं पहुंचे।
धन्यवाद जितेन्द्र भाई…
“बड़े स्तर पर वही फ़िल्में सफल होती हैं, जिनमें हिंसा की भरमार होती है” – यही मंत्र तमाम हालीवुड फिल्मों की सफलता का भी है। बस फ़र्क यह है कि उनके हिंसा के दृश्य विश्वसनीय से लगते हैं – “सस्पेंशन आफ डिसबिलीफ ‘ फैक्टर के चलते जबकि बालीवुड की नायक की फाईटिंग फूहड़ और हास्यास्पद सी लगती है। मगर क्या करियेगा दर्शकों का बड़ा वर्ग इसको पसंद करता है। धुरंधर 1 में नायक पिटा है। और हिसकी हिंसा कथानक के अनुरूप है। फिल्म निर्माण में भारी धन खर्च होता है। जब हिंसा पैसा वसूल की गारंटी है तो फिर ज्यादतर फाईनेंसर और प्रोड्यूसर इसका सहारा लेते हैं। हां कला फिल्मों के निर्माता बड़े जीवट के होते हैं और अपने कमिटमेंट से समझौते नहीं करते। सनी देवल का नामोल्लेख भूल गये क्या?
अरविंद भाई आपने सही कहा है कि जब हिंसा पैसा वसूल की गारंटी है तो फिर ज्यादतर फाईनेंसर और प्रोड्यूसर इसका सहारा लेते हैं।… दर्शकों का इसमें उतना ही योगदान है।
सादर नमस्कार सर…
बहुत सुंदर संपादकीय और चिंतन-मंथन करने के लिए प्रेरित करने वाले विचार। आप स्वयं ही चलचित्र जगत से जुड़े हुए हैं, इसलिए आपको विशेष रूप से इसकी गहरी समझ भी है।
चलचित्र का प्रभाव वास्तव में समाज पर पीढ़ी के अनुसार पड़ता ही है… केवल हिंसा ही क्यों, अन्य असामाजिक विषय भी उभर कर आ जाते हैं… हीरो सभी समस्याओं का समाधान भी करता है… और अंत में सहता या मरता भी है। पर पुरानी फिल्मों ने जो सीख दी है—पारिवारिक मूल्य, देशभक्ति, त्याग और सौहार्द आदि की—वह अब बिल्कुल अलग ढंग से प्रेषित की जा रही है।
अब तो KGF, सलार जैसी फ़िल्में युवा पीढ़ी को हिंसा, नशा और अनुशासनहीनता ही दिखाती हैं। मैं ऐसी फ़िल्में नहीं देखती, पर आस-पास से सुनने को मिल ही जाता है… आजकल की फ़िल्में वास्तव में समाज में कई नकारात्मक तत्वों को जन्म दे रही हैं। फिल्में केवल मनोरंजन नहीं होतीं, बल्कि वे युवाओं के आचार-विचार को गहराई से प्रभावित करती हैं।
साधुवाद…..
आदरणीय अणिमा जी, आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि – आजकल की फ़िल्में वास्तव में समाज में कई नकारात्मक तत्वों को जन्म दे रही हैं। फिल्में केवल मनोरंजन नहीं होतीं, बल्कि वे युवाओं के आचार-विचार को गहराई से प्रभावित करती हैं।… इस बारे में कुछ तो होना चाहिये…
पहले फ़िल्मउद्योग कला के जरिये धनार्जन था
इसलिए अच्छे कहानीकार, अच्छे गीतकार, निपुण संगीतकार ,आत्मा फूंक देने वाले निर्देशक स्वाभाविक रूप से सुंदर और स्वस्थ दिखने वाले अभिनेता /अभिनेत्री ढूंढे जाते थे तब फाइनेंसर वित्त व्यवस्था करता था ।
अब इस व्यवसाय में व्यवसायिक कला की अवधारणा काम कर रही है अतः दृश्य बदल गया है ।
Dr Prabha mishra
आपकी टिप्पणी एकदम सटीक है प्रभा जी। हार्दिक धन्यवाद।
बढ़िया सर जी
सिनेमा ने सिनेमाघरों के अंधेरे में, श्वेत पर्दे पर “रंगीन सपने” ही दिखाए जो रोशनी में आते ही छूमंतर हो जाते हैं।
वाह वाह जितेन्द्र भाई: इस सप्ताह के बहुत बढ़िया सम्पादकीय का विषय चुनने के लिए बहुत बहुत साधुवाद। मौजूदा हालात में quality के ऊपर quantity हावी हो गई है। इसका बहुत बड़ा नमूना Netflix पर देखने को मिलता है। Netflix में हिन्दी फ़िल्मों की इतनी भरमार हो गई है कि इतनी बड़ी लिस्ट में से एक देखने लायक मूवी चुनना एक अच्छी ख़ासी मुसीबत हो गई है। ढ़िशुम ढ़िशुम मूवियों की एक ख़ासियत तो ज़ाहिर है कि इनको देखकर सिनेमा हाल से बाहर आने के बाद इनका असर दिमाग़ पर बहुत थोड़े समय के लिए होता है। उसके बाद जैसे चाट खाकर पत्ता फैंक दिया जाता है इन मूवियों की याद भी उस फैंके हुए पत्ते की श्रेणी में आ जाती है।
मुंह का ज़ायका बदलने के लिए थोड़ी देर के लिए ज़रा उन मूवियों को याद करलें जिन्हें आप ने स्वर्णकाल का दरजा दिया दिया है। इन में से बहुत सी फ़िल्में तो हम ने उस समय देखी थी जब हम छोटे थे लेकिन, इतने अर्से बाद भी इन के उन गीतों को हम अब भी गुनगुनाते हैं जैसे: –
“ऐ मेरे प्यारे वतन, ए मेरे बिछड़े चमन”, “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हों हमारे करम”, “ न जाऔ सैयाँ, छुड़ा के बैयाँ, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी”, “सब कुछ सीखा हम ने, न सीखी हुशियारी”, “जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहा हैं”, “सोहराब मोदी के डायलॉग [तुम्हारे लिए ही पैदा हुए दुनिया के नज़ारे / चमके हैं तुम्हारी रोशनी से चाँद और सितारे / तुम्हारा ग़म है ग़म, औरों का ग़म ख्वाब-ओ-कहानी है / तुम्हारा ख़ून है ख़ून, हमारा ख़ून पानी है]
यह सदाबहार यादें वो कीमती हीरें हैं जो हमेशा याद रहेंगी।
आपकी टिप्पणी अद्भुत है विजय भाई कि – ढ़िशुम ढ़िशुम मूवियों की एक ख़ासियत तो ज़ाहिर है कि इनको देखकर सिनेमा हाल से बाहर आने के बाद इनका असर दिमाग़ पर बहुत थोड़े समय के लिए होता है। उसके बाद जैसे चाट खाकर पत्ता फैंक दिया जाता है इन मूवियों की याद भी उस फैंके हुए पत्ते की श्रेणी में आ जाती है।… यह वाक्य फ़िल्म जगत को आईना दिखलाता है।
नमस्कार सम्पादक जी l
आज के संपादकीय ने हिंदी सिनेमा जगत का इतिहास समझा दिया l मार – धाड वाली फ़िल्में ही सफल होती है, अब मिथक टूटता जा रहा है l बहुत समय पहले एक फिल्म आई थी ‘जय संतोषी माँ’ इस धार्मिक फ़िल्म ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे l लोग इस तरह से बातें करते थे ‘हमने यह फिल्म पांच बार देखी, तुमने कितनी बार देखी’ ।
ये सच है आजकल मार-धाड़ जो भी फ़िल्में बन रही हैं, वे काल्पनिक या वास्तविकता से दूर लगती हैं l एक अकेला हीरो आधा दर्जन से अधिक गुंडों से भिड़ जाता है l कुछ घायल हो जाते हैं तो कुछ डरकर भाग जाते हैं l ….. हीरो ‘हीरो’ बन जाता है l इस दौरान न तो उसके शर्ट की प्रेस खराब होती और न ही टाई की गठान ढीली होती l हालांकि धर्मेंद्र अभिराम बच्चन जैसे दिग्गज भी, फ़िल्मों में हिंसा का सहारा लेते थे, परंतु उसमें एक ‘ग्रेस’ होता था l राजकुमार और दिलीप कुमार जैसे महारथियों की फ़िल्मों में तो हिंसा से कुछ लेना-देना ही नहीं होता था l क्या उनकी फ़िल्मों में सफलता की कोई कमी रही ? आलम यह था कि उनका नाम सुनकर ही लोग थियेटर की तरह दौड़ पडते थे l
आज के युवा भयंकर अवसाद और तनाव में जी रहे हैं l जो वे करना चाह रहे हैं, कर नहीँ पा रहे हैं l वे सिनेमा में हिंसा देखरेख ही मन की भड़ास निकाल लेते हैँ l
आजकल ऐसा लगता है कोई साफ – सुथरी, सामाजिक फिल्म बने, जिसे थियेटर में तीन घंटे बैठकर देखी जा सके l
हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास की विस्तृत जानकारी देने के लिए धन्यवाद जी l
उषा l
उषा जी, आपने एकदम सही लिखा है कि – एक अकेला हीरो आधा दर्जन से अधिक गुंडों से भिड़ जाता है l कुछ घायल हो जाते हैं तो कुछ डरकर भाग जाते हैं l ….. हीरो ‘हीरो’ बन जाता है l इस दौरान न तो उसके शर्ट की प्रेस खराब होती और न ही टाई की गठान ढीली होती l… काश कुछ हो पाता…
भारतीय स्वतंत्रता 15अगस्त
के अवसर पर प्रकाशित
“पुरवाई “ निरंतर विश्वसनीयता की ऊँचाइयों की ओर अग्रसर है। जबकि
हिन्दी सिनेमा में विश्वसनीयता का अभाव अर्थात् अविश्वसनीयता के दुष्प्रभाव पर यह अंक केंद्रित है । बहुप्रतिष्ठित सम्पादक अपनी साहित्यिक सर्जना के कथा जगत में उस कथा रूप को भी शामिल करते हैं जिसकी लोकप्रियता के दिवाने आज भी बड़े परदों के स्थान पर छोटे- छोटे साधनों की ओर मुख़ातिब हैं । यानी कि भारतीय सिनेमा का पुराना समय जितना विश्वसनीय और लोकप्रिय था आज उतना ही अविश्वसनीय और लोकप्रिय है । इस विरोधाभास को सम्पादक ने सिलसिलेवार फ़िल्मी दुनिया के विकास क्रम पर प्रकाश डालते हुए अपने समाजोन्मुखी दृष्टिकोण का परिचय दिया है । फ़िल्मों के नाम ही नहीं उसके किरदारों के गुणधर्म का मूल्यांकन किया गया है । हो सकता है आगे किसी दिशान्तरण की ओर हमारा समाज आगे बढ़े ।( जिसकी संभावना हिन्दी सिनेमा के संदर्भ में फ़िलहाल कम है ) । वक़्त का रफ़्तार जिस तकनीकी , वैज्ञानिक, औद्योगिक विकास की ओर उन्मुख है वहाँ सामाजिक जीवन मूल्यों के दर्शन और प्रदर्शन की निहायत ज़रूरत है । सम्पादकीय में जन अभिरुचि को भी इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है।
यह युग जीवन का तकाजा है । परिवेश और परिस्थितियों में बुनियादी बदलाव वैचारिक धरातल पर जब तक नहीं होगा तब तक सिनेमा ही नहीं समूचा परिदृश्य धुँधलके में रहेगा । प्रकारांतर से यह सम्पादकीय इन्हीं तथ्यों को ध्वनित करता है ।
बहुत सराहनीय ।
हार्दिक बधाई ।
—-
मीनकेतन प्रधान
भारत
भाई मीनकेतन जी, आपने अपनी सार्थक टिप्पणी में रेखांकित किया है कि – यह युग जीवन का तकाजा है । परिवेश और परिस्थितियों में बुनियादी बदलाव वैचारिक धरातल पर जब तक नहीं होगा तब तक सिनेमा ही नहीं समूचा परिदृश्य धुँधलके में रहेगा । प्रकारांतर से यह सम्पादकीय इन्हीं तथ्यों को ध्वनित करता है ।… यह एकदम सही कहा है आपने। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय, आपका यह संपादकीय भी विचारोत्तेजक और विचारणीय है, क्योंकि सिनेमा मात्र मनोरंजन नहीं, अपितु समाज की सोच को दिशा देने वाला एक सशक्त माध्यम है। फिल्में केवल समय बिताने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज की भावनाओं और विचारों को भी गहराई से प्रभावित करती हैं। सिनेमा के पर्दे पर नायक का अर्थ हर समस्या का समाधान हिंसा में तलाशने वाला व्यक्ति नहीं होना चाहिए; बल्कि उसे समझदारी, संवेदना और सार्थक संघर्ष की शक्ति का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।
यह सवाल केवल फिल्मकारों से नहीं, बल्कि हम दर्शकों से भी जुड़ा है। हमें स्वयं तय करना होगा कि हम सिनेमा के पर्दे पर किस प्रकार के नायकीय चरित्र और कैसा सामाजिक स्वरूप सफल होते देखना चाहते हैं? यह दर्शकों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे हिंसा, फूहड़ता और नकारात्मकता से भरी फिल्मों को हतोत्साहित करें तथा बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में प्रेरित करने वाली कहानियों को समर्थन दें।
अधिकतर युवा पीढ़ी और दर्शक पर्दे पर दिखाई देने वाले पात्रों से प्रेरणा लेते हैं; इसलिए स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए प्रेरणादायक नायकों और सार्थक कथानकों का होना अत्यंत आवश्यक है।
एक और सार्थक और समाजोपयोगी संपादकीय के लिए आपको हार्दिक बधाई एवं साधुवाद।
ऋतु जी आपने दर्शकों के सामने आईना रख दिया है कि – यह सवाल केवल फिल्मकारों से नहीं, बल्कि हम दर्शकों से भी जुड़ा है। हमें स्वयं तय करना होगा कि हम सिनेमा के पर्दे पर किस प्रकार के नायकीय चरित्र और कैसा सामाजिक स्वरूप सफल होते देखना चाहते हैं? यह दर्शकों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे हिंसा, फूहड़ता और नकारात्मकता से भरी फिल्मों को हतोत्साहित करें तथा बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में प्रेरित करने वाली कहानियों को समर्थन दें।… आपसे पूरी तरह सहमत।
हमेशा की तरह बेहतरीन संपादकीय
धन्यवाद संगीता।
तेजेन्द्र शर्मा जी का संपादकीय “हिंदी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव!”
केवल हिंदी सिनेमा की बदलती प्रवृत्तियों की पड़ताल नहीं करता, बल्कि दर्शक के रूप में हमें भी अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करता है।
सिनेमा समाज से कथाएँ और चरित्र ग्रहण करता है, लेकिन धीरे-धीरे वही दृश्य समाज की संवेदना और रुचि को भी प्रभावित करने लगते हैं। ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं कि पर्दे पर हिंसा इतनी बढ़ क्यों रही है; प्रश्न यह भी है कि हम दर्शक के रूप में उसे इतनी सहजता से स्वीकार क्यों कर रहे हैं?
मेरे विचार से विश्वसनीयता का अर्थ यह नहीं कि सिनेमा कल्पना करना छोड़ दे। कल्पना उसकी शक्ति है, लेकिन जब नायकत्व का पर्याय केवल शारीरिक बल, प्रतिशोध और हिंसा बनने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। नायक वह भी हो सकता है जो विवेक, संवेदना, साहस और मानवीय मूल्यों के सहारे परिस्थितियों से जूझे।
संपादकीय में पुराने और नए हिंदी सिनेमा के उदाहरणों के माध्यम से उठाया गया यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि अंततः सिनेमा और दर्शक एक-दूसरे को निर्मित करते हैं। पर्दा हमारी पसंद का प्रतिबिंब भी है और हमारी पसंद को गढ़ने वाला माध्यम भी।
एक विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी को साधुवाद।
— डॉ. सुनीता शर्मा
ऑस्ट्रेलिया
माननीय सुनीता जी, आपने लिखा है कि – जब नायकत्व का पर्याय केवल शारीरिक बल, प्रतिशोध और हिंसा बनने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। नायक वह भी हो सकता है जो विवेक, संवेदना, साहस और मानवीय मूल्यों के सहारे परिस्थितियों से जूझे। आपसे पूरी तरह सहमत… हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
सबसे पहले आपके उत्तरदायित्व के प्रति सजगता, सचेतनता व सक्रियता के लिये आपको प्रणाम
अपनी माँ की बीमारी के लिये आप यहाँ आए हुए हैं पर संपादकीय अवाध रूप से चलता रहा। यह बताता है कि वास्तव में *उत्तरदायित्व किसे कहते हैं और इसका महत्व क्या है?*
अबकी बार संपादकीय हिंदी सिनेमा पर है।
हम इस विषय के जानकार नहीं पर इतना जानते हैं कि सिनेमा का बहुत जबरदस्त चतुर्दिश प्रभाव दर्शकों पर पड़ता है। अच्छी पिक्चर लंबे समय तक दर्शकों के दिमाग पर रहती हैं। और गीत-संगीत तो दिलो दिमाग में जीवन पर्यन्त रहता है।
वर्तमान में सिनेमा में बढ़ती हिंसा वाकई चिंतनीय है।इस बार संपादकीय सिर्फ हिंसा की ही बात नहीं करता बल्कि सिनेमा में बदलते संबंध, नायक की बदलती परिभाषा, दर्शकों की रुचि और फिल्म की विश्वसनीयता के अभाव पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करता है।
आप की विशेषता है कि आपके संपादकीय अपने विषय पर हमेशा ही तथ्यात्मक जानकारी के साथ किसी विषय को सामने रखते हैं। संपादकीय शीर्षक को विस्तार से स्पष्ट करता है कि‘हिंदी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव!’ क्यों?
यहाँ ‘विश्वसनीयता’ का अर्थ केवल फिल्मों में दिखाई जाने वाली घटनाओं की वास्तविकता से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि कहीं हमारा सिनेमा जीवन और समाज की वास्तविक जटिलताओं को समझने और समझाने के बजाय उससे निपटने के लिये हिंसा को ही सफलता का आसान और सहज साधन मानना तो नहीं सिखा रहा है?
सिनेमा की प्रकृति है कि दर्शक जो पसंद करते हैं वही उन्हें दिखाया जाए ।वह यह नहीं सोचते कि दर्शकों के हित में क्या है?इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो सिनेमा और दर्शक दोनों ही एक साथ कठघरे में खड़े होते हैं।
प्रश्न उठता है कि मार-धाड़ इतनी पसंद क्यों?
शारीरिक शक्ति को ही सफलता का सूत्र क्यों माना जाए? और अगर शारीरिक शक्ति है भी तो उसका प्रयोग सकारात्मक दिशा में क्यों नहीं?
दस-बारह गुंडों को अकेले पीट देना, अन्याय का जवाब हिंसा से देना और हर समस्या का समाधान मारपीट में ही तलाशना—संपादकीय इसी अतिरंजित नायकत्व पर प्रश्नचिह्न लगाता है।नायक की बदलती परिभाषा
संपादकीय की महत्वपूर्ण चिन्ता है और वह हिंदी सिनेमा के नायक के बदलते स्वरूप की ऐतिहासिक पड़ताल करता है।
यहाँ पर दक्षिण – फिल्मों का जिक्र करना जायज है। वहां की पिक्चरों में तो अधिकतर यही देखा जाता है और वहाँ का हीरो तो अकेले दम पर न जाने कितनों को ही मार दे। उसका कुछ नहीं बिगड़ता। थोड़ा बहुत लगना मायने नहीं रखता।
हमें अपने बचपन का याद है जब नायक नायिकाओं के नामों से नहीं फिल्मकारों के नामों से पिक्चर देखने की परमिशन सहजता से मिल जाया करती थी-आपने सही नाम दर्ज किये। वाकई वह स्वर्ण युग था सिनेमा का।वी शांताराम और जैमिनी उस समय अच्छे फिल्मों की पहचान थे। बाद में आपके द्वारा
उल्लिखित सभी लोगों के नामों से भी परिचित हुए। इनकी फिल्मों के चरित्र सामान्य जीवन और सामाजिक यथार्थ से जुड़े होते थे।
पुरानी फिल्मों में सिनेमा मनोरंजन के साथ संवेदना और सामाजिक सरोकार का माध्यम भी था।
इसके विपरीत,आज के नायक को शक्ति और हिंसा के रूप में पेश कर सफलता की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
राजेश खन्ना ने काफी अच्छी पिक्चर दीं।वो पहले सुपरस्टार व सभी के बहुत प्रिय रहे।
अमिताभ बच्चन का संदर्भ महत्वपूर्ण बिंदु है। इनकी भी कई पिक्चर बहुत अच्छी रहीं। आपने अमिताभ बच्चन जैसे सक्षम अभिनेता के व्यक्तित्व, आवाज,अभिनय और उनके एक्शन को भी सिनेमाई विश्वसनीयता प्रदान की।यह काबिले गौर है।यही बात संपादकीय को हिंसा के बरक्स एकतरफा आलोचना से अलग करती है। अमिताभ बच्चन के अभिनय- सामर्थ्य को स्वीकारना यह संकेत देता है कि समस्या केवल हिंसा में नहीं, बल्कि हिंसा के यांत्रिक और फार्मूलाबद्ध इस्तेमाल में है।
शोले बेहतरीन फिल्म थी।काफ़ी चर्चित भी रही।हम आप से सहमत हैं कि सफलता को केवल हिंसा से नहीं समझा जा सकता।फिल्म की स्थायी लोकप्रियता के पीछे उसके चरित्र, कथा, संबंध, संवाद और सिनेमाई संरचना भी हैं!
एक बात आपके संपादकीय में काबिले गौर लगी-
*अच्छी फिल्म में हिंसा कहानी का हिस्सा हो सकती है, लेकिन केवल हिंसा फिल्म को अच्छी नहीं बना देती।*
किसी भी फिल्म के चाहे जितने भी उद्देश्य हो लेकिन मुख्य रूप से उसका उद्देश्य व्यावसायिक सफलता है।यहाँ आप लम्हे , तेज़ाब, बर्फ़ी और एनीमल जैसे उदाहरणों से प्रश्न उठाते हैं कि आखिर दर्शक किस तरह के सिनेमा को व्यावसायिक सफलता प्रदान करते हैं? यह प्रश्न इसलिये भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सिनेमा बाजार से भी संचालित होता है। माँग और पूर्ति का नियम यहाँ भी लागू होता है। यदि दर्शक लगातार हिंसाप्रधान फिल्मों को बड़ी सफलता देंगे, तो निर्माता भी उसी फार्मूले को दोहराएंगे।
यहाँ संपादकीय अप्रत्यक्ष रूप से दर्शकों के सामाजिक उत्तरदायित्व पर भी प्रश्न उठाता है कि “नायक बनने के लिए खलनायक जैसा व्यवहार और हिंसक रूप क्यों अख़्तियार किया जाए?
जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण है उसी तरह सिनेमा और नायक-नायिका भी दर्शकों के लिये प्रेरणा होते हैं। वर्तमान में तो शायद और ज्यादा,इसीलिये
यह प्रश्न आज की दृष्टि से और भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि न्याय पाने के लिए अधिकतम हिंसा ही एकमात्र रास्ता दिखाई जाए, तो धीरे-धीरे हिंसा सामान्य और स्वीकार्य व्यवहार की तरह प्रस्तुत होने लगेगी।
आप क्योंकि सिनेमा को बेहतर जानते हैं, उससे जुड़े रहे हैं, इसीलिये आप सिनेमा की इस प्रवृत्ति को लेकर चिंतित हैं।
हालाँकि आप यह भी नहीं कहते कि सिनेमा में हिंसा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। संभवतः आपके संपादकीय का विरोध उस स्थिति से है जहाँ हिंसा कथानक और चरित्र की आवश्यकता न रहकर सफलता का अनिवार्य विषय बन जाता है।
एक बात हमें शायद पहले ही कहनी चाहिए थी कि संपादकीय में आपने व्यंग्य,बोलचाल, फिल्मी संदर्भ और तर्क को एक साथ साधा है। ‘ढिशुम-ढिशुम’, मुहावरा ‘ताश के पत्तों की तरह गिरना’ जैसे प्रयोग विषय को रोचक ही नहीं बनाते बल्कि प्रभावशाली भी बनाते हैं।
साथ ही,फिल्मों और कलाकारों के इतने सारे उदाहरण कि हम ही नहीं ,हर पाठक पढ़ते हुए अपनी देखी हुई अच्छी फिल्मों की दुनिया में,अतीत में खो गया होगा ।हिंदी सिनेमा का एक लंबा दृश्य-परिदृश्य जैसा बन गया।
‘विश्वसनीयता’ शब्द शीर्षक से जुड़ा है जिसके माध्यम से आप पाठकों से प्रश्न करते हैं कि ,क्या हमारे नायक, उनकी समस्याएँ और समस्याओं के समाधान जीवन की हमारी वास्तविक समझ से विश्वसनीय रूप से जुड़े हुए हैं?
तीन बिंदुओं वाला शीर्षक भी एक तरह से ठहराव और असंतोष की अनुभूति देता है—मानो संपादक के पास सिनेमा की इस स्थिति को लेकर बहुत कुछ कहने के बाद भी कुछ शेष रह गया हो।
वैसे समापन के पूर्व एक बात और कहना चाहेंगे कि किसी फिल्म की सफलता के लिये प्रचार, सितारों की लोकप्रियता, संगीत, रिलीज का समय।दर्शकों की अलग- अलग रुचियाँ भी सफलता को प्रभावित करती हैं।
कुल मिलाकर यह एक सजग, व्यंग्यपूर्ण और प्रश्नाकुल संपादकीय है।
जिसने वर्तमान की हिंसाप्रधान प्रवृत्ति पर सवाल उठाया है जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि सिनेमा केवल वही नहीं दिखाता जो समाज देखना चाहता है; वह यह भी तय करता है कि समाज किन चीजों को सामान्य, आकर्षक और सफल मानने लगे। इसलिए हिंसा का बढ़ता महिमामंडन केवल फिल्मी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदना और नायकत्व की हमारी बदलती अवधारणा का प्रश्न भी है।
आपका असली सवाल यही है कि हमें ऐसा नायक चाहिए जो हर समस्या का उत्तर हिंसा से दे, या ऐसा नायक! जो अपनी बुद्धि, संवेदना, साहस और मानवीयता से समस्याओं का सामना करे?
सिनेमा पर आपका संपादकीय बहुत कुछ समझा गया। इस बेहतरीन, रोचक व महत्वपूर्ण प्रश्न पर ध्यान आकर्षित करने वाले संपादकीय के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
आदरणीय नीलिमा जी, आपने बहुत विस्तार से अपने विचार अपनी टिप्पणी में समेटे हैं। इस विस्तृत टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार। आपने कहा है कि – दस-बारह गुंडों को अकेले पीट देना, अन्याय का जवाब हिंसा से देना और हर समस्या का समाधान मारपीट में ही तलाशना—संपादकीय इसी अतिरंजित नायकत्व पर प्रश्नचिह्न लगाता है। नायक की बदलती परिभाषा। संपादकीय की महत्वपूर्ण चिन्ता है और वह हिंदी सिनेमा के नायक के बदलते स्वरूप की ऐतिहासिक पड़ताल करता है। – आपने संपादकीय की मूल आत्मा को पकड़ा है। एक बार फिर धन्यवाद।
हिंदी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव, शीर्षक संपादकीय में आपने हिंदी सिनेमा के अतीत एवं वर्तमान परिदृश्य की पूरी परिक्रमा कर डाली है। बहुत सारे उदाहरणों से यह साबित हुआ कि हिंदी सिनेमा में मारधाड़ आवश्यक होता है किंतु यह क्यों होता है, इसका जवाब एक ही सामने आता है कि ‘आम इंसान अपने रोजमर्रा के जीवन से इतना ऊब चुका होता है कि उसे एक ऐसा नायक चाहिए जो उसके दिल की तमाम हसरतों को पर्दे पर पूरा करके दिखाए दिखाए।’ यह भी कितनी बड़ी विडंबना है कि अपने रियल लाइफ की त्रासदी को दर्शक रील लाइफ के द्वारा थोड़ी देर के लिए भूलना चाहते हैं। हर बार सामान्य संवेदनशील फिल्मों के बर-अक्स मारधाड़ वाली फिल्में ज्यादा सफल सिद्ध हो जाती हैं और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है रणबीर कपूर की फिल्म बर्फी जो आपके ही शब्दों में ‘वरना ऐसा क्यों हो कि रणबीर कपूर की बर्फी तो दुकान पर ही पड़ी रह जाए और एनिमल सुपर डुपर हिट हो जाए।’ यदि दर्शकों की रुचि परिष्कृत होगी तो सिनेमा भी उसी के अनुसार ढलेगा अन्यथा जो भी नायकत्व की भूमिका निभाएगा उसे खलनायक की भूमिका में आना ही पड़ेगा। एक महत्वपूर्ण सुविचारित संपादकीय के लिए धन्यवाद।
शानदार संपादकीय, मेरे मन की बात, मुझे हिंसक फिल्में अच्छी नहीं लगतीं, देखती ही नहीं, धुरंधर भी नहीं देखा।
कुछ स्टोरी हो, दिल को छूने वाली, याद रह जाने वाली। तभी देखने का कुछ हासिल होता है। वैसे अक्सर रिव्यू पढ़ कर फिल्में देखती हूँ।