Monday, August 17, 2026
होमअपनी बातहिंदी सिनेमा... विश्वसनीयता का अभाव! 

हिंदी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव! 

हिंदी सिनेमा अपनी हर दूसरी फ़िल्म के माध्यम से एक ही संदेश देता है-“यदि आपको जीवन में सफल होना है तो आपके अंदर शारीरिक बल होना अति आवश्यक है। जब तक आप ज़ुल्म और अन्याय के विरुद्ध निजी स्तर पर हिंसा नहीं कर सकते… दस-बारह गुंडों को अकेले, निहत्थे धराशायी नहीं कर देते, तब तक सफलता आपसे रूठकर दूर खड़ी रहेगी।”

‘ज़ंजीर’ का इंस्पेक्टर विजय हो या फिर ‘दीवार’ का कुली विजय, दोनों अपनी अक़्ल से कहीं अधिक अपने ढिशुम-ढिशुम से सफलता हासिल करते हैं। यदि हीरो अपनी बहन के साथ सड़क पर जा रहा है और उसकी बहन को पाँच-छह गुंडे मिलकर छेड़ते हैं तो फिर चाहे पाँच फ़ुट पाँच इंच का आमिर ख़ान हो, डेढ़ पसली का अनिल कपूर हो, या फिर पाँच फ़ुट सात इंच वाले शाहरुख़, सलमान या सैफ़… वे ऐसा एक्शन करते हैं कि भयानक दिखाई देने वाले गुंडे ताश के पत्तों की तरह गिरते दिखाई देते हैं।

हिंदी सिनेमा के बारे में जब हम पूछते हैं कि इतना अविश्वसनीय क्यों होता है?… तो जवाब एक ही सामने आता है कि आम इंसान अपने रोज़मर्रा के जीवन से इतना ऊब चुका होता है कि उसे एक ऐसा नायक चाहिए जो उसके दिल की तमाम हसरतों को पर्दे पर पूरा करके दिखाए। वह हीरोइन से छेड़छाड़ भी करे, हीरोइन उससे प्यार भी करे… वह जीवन के हर संघर्ष से विजयी होकर सीना तानकर सामने खड़ा हो। अकेला दस-बारह आदमियों की पिटाई लगा दे और उसके बालों की कंघी तक ख़राब न हो।

एक ज़माना था जब वी. शांताराम, बिमल रॉय, राज कपूर, महबूब ख़ान, गुरुदत्त, हृषिकेश मुखर्जी और ताराचंद बड़जात्या तथा बासु चटर्जी जैसे फ़िल्मकार फ़िल्मों का निर्माण कर रहे थे। उनकी फ़िल्मों के चरित्र ज़मीन से जुड़े होते थे। ‘दो आँखें बारह हाथ’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘सुजाता’, ‘बंदिनी’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘प्यासा’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘अनाड़ी’, ‘आशीर्वाद’, ‘मिली’, ‘दोस्ती’, ‘आरती’, ‘रजनीगंधा’ जैसी फ़िल्में दिल को छूती थीं। सोहराब मोदी और के. आसिफ़ जैसे फ़नकार ऐतिहासिक फ़िल्में बना रहे थे। यह हिंदी सिनेमा का स्वर्ण काल था।

इस काल में मार-धाड़ वाली फ़िल्मों का एक अलग ही मार्केट हुआ करता था। उसके कलाकार और दर्शकों का एक विशेष वर्ग हुआ करता था। दारा सिंह इस प्रकार की फ़िल्मों की पहचान होते थे। कुश्ती के अखाड़े से सिनेमा में आए दारा सिंह का पाँच-सात गुंडों को अकेले मार भगाना अखरता नहीं था। आज़ाद, शेख़ मुख़्तार, एन. ए. अंसारी, महीपाल, अजीत, मनहर देसाई, रंधावा जैसे कलाकार इस शैली की फ़िल्मों के नामचीन सितारे थे।

वैसे तो सुनील दत्त, शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, फ़िरोज़ ख़ान जैसे सितारे सिनेमा में मौजूद थे, जो अपनी मर्दानगी का परिचय सिनेमा के पर्दे पर विश्वसनीय तरीके से दिया करते थे। फ़िरोज़ ख़ान तो हिंदी सिनेमा के जेम्स बॉण्ड और क्लिंट ईस्टवुड का मिश्रण थे… वे वेस्टर्न चरित्रों की तरह फ़ेल्ट हैट और पिस्तौल भी अपने साथ सजा लेते थे और जेम्स बॉण्ड की तरह जासूसी भी कर लेते थे। मगर अमिताभ बच्चन की सिनेमा में एंट्री के साथ सिनेमा का पूरा रुख़ ही बदल गया।

जब अमिताभ बच्चन की हिंदी सिनेमा में एंट्री हुई, उस समय हिंदी सिनेमा के एकमात्र सुपरस्टार राजेश खन्ना का कैरियर उरूज़ पर था। राजेन्द्र कुमार के बाद राजेश खन्ना ने सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली के अर्थ ही बदल दिए थे। राजेश खन्ना द्वारा निभाए गए चरित्रों में वैरायटी भी कमाल की थी… ‘आराधना’, ‘दो रास्ते’, ‘आनंद’, ‘बावर्ची’, ‘सफ़र’, ‘अपना देश’, ‘इत्तेफ़ाक़’, ‘दाग़’, ‘नमक हराम’, ‘दुश्मन’, ‘रोटी’ जैसी फ़िल्मों में उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि उन्हें टाइप-कास्ट नहीं किया जा सकता। राजेश खन्ना हर तरह के किरदार निभा सकते थे।

मगर ‘ज़ंजीर’ और ‘दीवार’ के बाद भारतीय फ़िल्मों के नायक का रूप पूरी तरह से बदल गया। अमिताभ बच्चन सक्षम कलाकार थे, इसलिए उनके फ़ाइट सीन विश्वसनीय लगते थे। उनकी गहरी आवाज़ और संवाद अदायगी उनके ऐसे हथियार थे, जो आसानी से किसी और कलाकार को उपलब्ध नहीं हो सकते। जैसे गीत लेखन में कभी राजेन्द्र कृष्ण हुआ करते थे, वैसे ही एक्टिंग में अमिताभ बच्चन रहे। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में ‘सब्लाइम’ से ‘रिडिकुलस’ तक हो सकते थे। राजेन्द्र कृष्ण ऐसे नग़मे भी लिख सकते थे-‘घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में / ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिए…’ और साथ ही साथ यह भी लिख सकते थे- ‘शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के / दर्द जवानी का सताए बढ़-बढ़ के।’ ठीक इसी तरह अमिताभ बच्चन भी ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है…’ जैसी अदाकारी कर सकते थे।

अमिताभ बच्चन के बाद की पीढ़ी में जो कलाकार आए, उनकी फ़िल्मों में मार-धाड़ और हिंसा तो होती थी, मगर सिनेमा के बहुत से अवयव कहीं पीछे छूट जाते थे। धर्मेन्द्र के अंतिम पड़ाव की फ़िल्में, शत्रुघ्न सिन्हा की फ़िल्में, रजनीकांत, सनी देओल, संजय दत्त आदि की फ़िल्मों में अधिकतर एक ऐसी दुनिया का चित्रण होता था, जिसे हम पहचानते नहीं थे। मिथुन चक्रवर्ती, अक्षय कुमार आदि ने भी मीडियॉकर मार-धाड़ वाली फ़िल्में परोसने में झिझक महसूस नहीं की।

‘शोले’ भारत की सबसे लंबे अरसे तक चलने वाली फ़िल्म बनी तो उसके पीछे सिनेमैटिक कारण थे। केवल हिंसा नहीं थी। वहाँ हिंसा के लिए गब्बर सिंह मौजूद था, मगर वहाँ ढिशुम-ढिशुम तो कहीं याद ही नहीं रहती।

ऐसा नहीं है कि इस काल में अर्थपूर्ण सिनेमा बनाया ही नहीं गया। मगर समस्या यह है कि मार-धाड़ वाला सिनेमा बेहिसाब बना, जबकि ‘हम आपके हैं कौन..!’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘दिल तो पागल है’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘कुछ-कुछ होता है’, ‘अंदाज़ अपना-अपना’, ‘हम साथ-साथ हैं’, ‘जब वी मेट’, ‘लगान’, ‘रॉकेट सिंह’, ‘वेक अप सिड’ जैसी फ़िल्में अपनी उपस्थिति हमेशा से दर्ज करवाती रही हैं। अजय देवगन बीच-बीच में ऐसी फ़िल्में ले आते हैं कि हैरानी होने लगती है। अक्षय कुमार भी ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ जैसी फ़िल्म बना डालते हैं।

मगर समस्या वहीं रहती है कि बड़े स्तर पर वही फ़िल्में सफल होती हैं, जिनमें हिंसा की भरमार होती है। हिंदी सिनेमा की वर्तमान की सबसे बड़ी हिट फ़िल्में ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर-पार्ट 2’ में जिस स्तर की मारपीट, ख़ून-ख़राबा, गालियाँ और हत्याएँ दिखाई गई हैं, वह एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती है। ऐसा करना ज़रूरी क्यों है कि हीरो यानी कि नायक बनने के लिए आपको विलेन या खलनायक जैसा व्यवहार करना पड़े? यह सिनेमा की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

एक शिकायत दर्शकों से भी तो है कि वे ऐसी ही फ़िल्मों को हिट बनाते हैं, जिनमें निरंतर हिंसा देखने को मिले और उनके हीरो के पास हर समस्या का एक ही हल हो- ढिशुम-ढिशुम करते हुए गुंडों को धूल चटाना। अनिल कपूर की ‘लम्हे’ बुरी तरह फ़्लॉप हो जाती है, मगर ‘तेज़ाब’ और ‘राम-लखन’ हिट हो जाती हैं। दर्शक यह निरंतर जताते रहते हैं कि उन्हें जीवन की सच्चाई बताती फ़िल्में देखने में उतनी रुचि नहीं। उन्हें चाहिए ऐसी फ़िल्में, जिनमें हीरो के पास हर बात का एक ही जवाब हो… मार-धाड़ और ढिशुम-ढिशुम। वरना ऐसा क्यों हो कि रणबीर कपूर की ‘बर्फ़ी!’ तो दुकान पर ही पड़ी रह जाए और ‘एनिमल’ सुपर-डुपर हिट हो जाए!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
RELATED ARTICLES

14 टिप्पणी

  1. हिंदी सिनेमा में विश्वसनीयता का अभाव ,इस बार का संपादकीय बहुत से प्रबुद्ध और सामान्य जन के दिल की बात कहता है। हिंसा,कल्पनातीत हरकतें ,कॉमेडी का भौंडा पर ताकत की ओवरडोज के साथ का नायक और वैसे ही फिल्में पहले के कुछ खास वर्गों और अब आम बात हो गई है।संपादकीय सभी प्रकार के नायकों यथा दारा सिंह , अजीत ,आमिर खान ,शाहरुख खान और सारी की सारी ऐसी वैसी फिल्मों को आड़े हाथ लेकर ख़बर लेता है।दूसरी ओर ऋषिकेश मुखर्जी सरीखे फिल्मकारों और उनकी फिल्मों को भी सारगर्भित रूप से प्रस्तुत करता है।भद्र नायकों यथा सुनील दत्त,,,सरीखी पीढ़ी को भी बताता है।
    समय के साथ चलता यह संपादकीय राजेंद्र कुमार,राजेश खन्ना और फिर अमिताभ बच्चन की फिल्मों के दौर की बात भी सहज और नैसर्गिक रूप से करता है।अमिताभ और राजेंद्र कृष्ण सरीखे पर्वताकार कलाकारों की रेंज भी कुशलता से बयां करता है।हिंसा और अविश्वसनीय बातों ,किरदारों,कथानकों की भी बात होती है और दर्शकों को भी औचित्यपूर्ण ढंग से खराब और अविश्वसनीय सिनेमा को पसंद और हिट करने की त्रासदी और विडंबना को आज के पाठकों परोसता है !?!
    इसी को याद करते हुए फिल्मों के शो में राज कपूर साहब का दूरदर्शन पर एक इंटरव्यू याद आता है। जिसमें ‘ बॉबी फिल्म’ के बारे में मिली सफलता के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बड़े ही मर्म स्पर्शी अंदाज में अच्छे सिनेमा और अविश्वसनीय अकल्पनीय और लुगदी हिंदी सिनेमा की बात को बयां कर दिया!!!उन्होंने बताया कि जब उन्होंने ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी जीवन दर्शन को दर्शाती फिल्म बनाई तो उन्हें काफी नुकसान हुआ और लगभग दिवालियेपन की हद तक! फिर उन्होंने नम आंखों से कैमरे की ओर देखा और कहा” मैं ‘ बॉबी ‘ फिल्म बनाई
    जिसमें ऐसा कुछ भी नहीं था,जिसे कंटेंट ,संदेश ,उद्देश्य कहा जा सके?!?! उस में वही सब था जो दर्शक देखना चाहता था,,,
    “यकीन मानिए !?साहब!!! मेरा घर भर गया !!!!!और उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में दोनों हाथ !?!!’मेरा नाम जोकर के किरदार की मानिंद फैला दिए,,,, और उनकी आंखें गीली थी,,,, यह एक बहुत बड़ी टिप्पणी है? भारतीय दर्शकों और भारतीय हिंदी सिनेमा के माथे पर।
    धुरंधर के निर्माता को भी अब सोचना चाहिए?! कि अगला सीक्वेल हिंसा और गलियों के ग्लूटिन से रहित हो तो बेहतर!!!!
    यह संपादकीय यदि किसी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिका मेंआये तो आज के दर्शक जेन जी या अल्फा को पढ़वाया जाए और डीडी कबह राजकपूर साहब का इंटरव्यू भी तो शायद सिनेमा का रुख बेहतर हो जाए।

    • भाई सूर्य कांत जी, आपके प्रिय विषय पर संपादकीय ने आपसे त्वरित टिप्पणी लिखवा ली। आप सब पुरवाई पत्रिका को ही प्रतिष्ठित बना रहे हैं। दिल से शुक्रिया।

  2. वाकई लेकिन इसका जवाब भी आपने दे दिया है कि बर्फी पडी रहती है और एनिमल चल जाती है

  3. फिल्मों को बाक्स ऑफिस पर सुपरहिट बनाने के लिए जानबूझकर हिंसाप्रधान फिल्में बनाने की की बाजारु रणनीति पर शानदार आलेख। आपके फिल्मी ज्ञान का अभिनंदन।

  4. यथार्थ से कटी और मार-धाड़ से भरी फिल्में अधिकतर बॉक्स आफिस पर हिट होती हैं क्योंकि आम दर्शक हीरो की जगह अपने आप को देखता है और अपने सपने उनमें जीता है। हिंसा और मार-धाड़ से यूँ अपनी कुंठा को शांत करता है मानो वह उन सब से बदला ले रहा हो जिन्होंने उसके साथ अन्याय किया हो या किसी और कारण वह उनसे नफरत करता हो। आमतौर पर दर्शक हकीकत से दामन छुड़ा कुछ समय सपनों की दुनिया में बिताना चाहते हैं जहाँ तर्क और नीरस ज़िन्दगी की ज़मीनी सच्चाइयों की दुखदायी पकड़ ढीली पड़ जाती है। आम आदमी के मनोरंजन से संबंधित इस लोकप्रिय साधन के विश्लेषण में संपादकीय के लिए पुरवाई के पाठकों का आभार।

  5. पुरवाई का संपादकीय ‘ हिन्दी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव!’ भारतीय सिनेमा को केंद्र में रखकर लिखा गया है।
    भारतीय सिनेमा आमजन से लेकर खास तक सभी के लिए सुलभ बन चुका है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि भारतीयों का जीवन सिनेमा से ही शुरू होता है। सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीति के साथ जीवन के जितने कार्य व्यवहार है सभी को इसने व्यक्त किया है। यहां तक कि कई फिल्मों में पशु-पक्षी भी मुख्य भूमिका में नजर आते रहे हैं।
    भारतीय सिनेमा इतना अविश्वसनीय क्यों है? अविश्वसनीय है तो लोग देखते क्यों है?? दुबला-पतला नायक भी दस-दस गुंडों को अकेले मारकर भगा देता है। दक्षिण भारत की फिल्में इस मामले में बाॅलीवुड से दस कदम आगे है। इन फिल्मों के नायक एक पंच में दस-दस गुंडों को हवा में तैरा देता है।
    इस अविश्वसनीय मारधाड़ का कारण संपादकीय में बताया गया है। इस कारण से संतुष्ट हुआ जा सकता है। एक दूसरा कारण यह भी है कि भारतीय समाज पराजित मानसिकता का शिकार ज्यादा रहा है। आम लोग दशकों से जातिवाद और भ्रष्ट तंत्र से बुरी तरह आहत होते रहे । जब उसका हीरो(गरीब घर का लड़का) सेठों से ,जमींदारों से और ताकतवर व्यवस्था से लड़ता है, तो आम आदमी को वह हीरो बहुत अपना सा लगता है। उसका हीरो उसके जमे आक्रोश का विरेचन कर देता है। अविश्वसनीय स्टंट भी उसके विश्वास को डिगने नहीं देता है।
    एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन की इस छवि ने सिनेमा को जन-जन तक पहुंचा दिया। एक समय जिस सिनेमा को बुरा माना जाता था, अमिताभ बच्चन ने उसे काफी हद तक पाक-साफ बना दिया था।अमिताभ बच्चन से पहले वाला सिनेमा खाए-अघाए लोगों के मनोरंजन का साधन मात्र था। आम आदमी हो या खास यह अभिनेता सभी का प्रिय बनकर उभरा था। यहां तक कि उनका यह हीरो किस जाति या धर्म का किरदार निभा रहा है, ये ध्यान में ही नहीं रहता था। बस अमिताभ बच्चन नाम ही पर्याप्त था। पहले दर्शक हीरो की शक्ति पर विश्वास करता था, आज कहानी की अविश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करता है।
    भारत-पाक रिश्तों पर बनी फिल्में भी एक समय पर खूब सफल होती थी। सन् अस्सी के दशक से लेकर 2010 तक अपनी आतंकवादी गतिविधियों से पाकिस्तान ने भारत में इतना आतंक मचाया कि आम लोग त्रस्त हो चुके थे। सच कहा जाए तो इस दरम्यान हम इसका माकूल जवाब नहीं दे सके थे। इस आक्रोश को हम फिल्मों के माध्यम से शमन कर लेते थे। उस समय की प्रदर्शित फिल्में बार्डर,गदर इत्यादि खूब सफल रही।
    धुरंधर तथा धुरंधर 2 फिल्में सच्ची घटनाओं से प्रेरित थीं। वर्तमान में पाकिस्तान में अननोन गनमैन द्वारा आतंकवादियों की हत्या और फिल्मों में दिखाई गई हत्याओं के साम्य ने लोगों को जबरदस्त आकर्षित किया।
    देश की शिक्षा-व्यवस्था में सुधार, ठीक-ठाक आर्थिक स्थिति तथा भयमुक्त वातावरण ने फिल्मों की तकनीक तथा यथार्थ ने इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया हैं। एक तरह से फिल्मों की अविश्वसनीय अब खलने लगी है। जब शिक्षा का प्रसार बढ़ेगा तो लोग इन सब पर बात करेगा। बात की भी जानी चाहिए।
    इस विषय पर यह संपादकीय प्रश्न तो उठाता ही है, साथ में सिने इतिहास के रेशे रेशे से परिचित भी कराता है। आज का संपादकीय पाठक को काफी स्पेस दे देता है। क्योंकि हर एंगल से इस पर टिप्पणी की जा सकती है। आपने हर बार की तरह इस बार भी भारतीय सिनेमा की गहराई से पड़ताल की है।

  6. सादर अभिवादन सर
    बहुत विश्लेषणात्मक संपादकीय । मैं भी धुरंधर देखने गई थी ।सच में इतनी डरावनी फिल्म लगी वो मुझे । यही सोचने लग जाते हैं क्या सच ऐसा था । पता नहीं ।

  7. “बड़े स्तर पर वही फ़िल्में सफल होती हैं, जिनमें हिंसा की भरमार होती है” – यही मंत्र तमाम हालीवुड फिल्मों की सफलता का भी है। बस फ़र्क यह है कि उनके हिंसा के दृश्य विश्वसनीय से लगते हैं – “सस्पेंशन आफ डिसबिलीफ ‘ फैक्टर के चलते जबकि बालीवुड की नायक की फाईटिंग फूहड़ और हास्यास्पद सी लगती है। मगर क्या करियेगा दर्शकों का बड़ा वर्ग इसको पसंद करता है। धुरंधर 1 में नायक पिटा है। और हिसकी हिंसा कथानक के अनुरूप है। फिल्म निर्माण में भारी धन खर्च होता है। जब हिंसा पैसा वसूल की गारंटी है तो फिर ज्यादतर फाईनेंसर और प्रोड्यूसर इसका सहारा लेते हैं। हां कला फिल्मों के निर्माता बड़े जीवट के होते हैं और अपने कमिटमेंट से समझौते नहीं करते। सनी देवल का नामोल्लेख भूल गये क्या?

  8. सादर नमस्कार सर…
    बहुत सुंदर संपादकीय और चिंतन-मंथन करने के लिए प्रेरित करने वाले विचार। आप स्वयं ही चलचित्र जगत से जुड़े हुए हैं, इसलिए आपको विशेष रूप से इसकी गहरी समझ भी है।
    ​चलचित्र का प्रभाव वास्तव में समाज पर पीढ़ी के अनुसार पड़ता ही है… केवल हिंसा ही क्यों, अन्य असामाजिक विषय भी उभर कर आ जाते हैं… हीरो सभी समस्याओं का समाधान भी करता है… और अंत में सहता या मरता भी है। पर पुरानी फिल्मों ने जो सीख दी है—पारिवारिक मूल्य, देशभक्ति, त्याग और सौहार्द आदि की—वह अब बिल्कुल अलग ढंग से प्रेषित की जा रही है।
    ​अब तो KGF, सलार जैसी फ़िल्में युवा पीढ़ी को हिंसा, नशा और अनुशासनहीनता ही दिखाती हैं। मैं ऐसी फ़िल्में नहीं देखती, पर आस-पास से सुनने को मिल ही जाता है… आजकल की फ़िल्में वास्तव में समाज में कई नकारात्मक तत्वों को जन्म दे रही हैं। फिल्में केवल मनोरंजन नहीं होतीं, बल्कि वे युवाओं के आचार-विचार को गहराई से प्रभावित करती हैं।

    साधुवाद…..

  9. पहले फ़िल्मउद्योग कला के जरिये धनार्जन था
    इसलिए अच्छे कहानीकार, अच्छे गीतकार, निपुण संगीतकार ,आत्मा फूंक देने वाले निर्देशक स्वाभाविक रूप से सुंदर और स्वस्थ दिखने वाले अभिनेता /अभिनेत्री ढूंढे जाते थे तब फाइनेंसर वित्त व्यवस्था करता था ।
    अब इस व्यवसाय में व्यवसायिक कला की अवधारणा काम कर रही है अतः दृश्य बदल गया है ।
    Dr Prabha mishra

  10. वाह वाह जितेन्द्र भाई: इस सप्ताह के बहुत बढ़िया सम्पादकीय का विषय चुनने के लिए बहुत बहुत साधुवाद। मौजूदा हालात में quality के ऊपर quantity हावी हो गई है। इसका बहुत बड़ा नमूना Netflix पर देखने को मिलता है। Netflix में हिन्दी फ़िल्मों की इतनी भरमार हो गई है कि इतनी बड़ी लिस्ट में से एक देखने लायक मूवी चुनना एक अच्छी ख़ासी मुसीबत हो गई है। ढ़िशुम ढ़िशुम मूवियों की एक ख़ासियत तो ज़ाहिर है कि इनको देखकर सिनेमा हाल से बाहर आने के बाद इनका असर दिमाग़ पर बहुत थोड़े समय के लिए होता है। उसके बाद जैसे चाट खाकर पत्ता फैंक दिया जाता है इन मूवियों की याद भी उस फैंके हुए पत्ते की श्रेणी में आ जाती है।
    मुंह का ज़ायका बदलने के लिए थोड़ी देर के लिए ज़रा उन मूवियों को याद करलें जिन्हें आप ने स्वर्णकाल का दरजा दिया दिया है। इन में से बहुत सी फ़िल्में तो हम ने उस समय देखी थी जब हम छोटे थे लेकिन, इतने अर्से बाद भी इन के उन गीतों को हम अब भी गुनगुनाते हैं जैसे: –

    “ऐ मेरे प्यारे वतन, ए मेरे बिछड़े चमन”, “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हों हमारे करम”, “ न जाऔ सैयाँ, छुड़ा के बैयाँ, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी”, “सब कुछ सीखा हम ने, न सीखी हुशियारी”, “जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहा हैं”, “सोहराब मोदी के डायलॉग [तुम्हारे लिए ही पैदा हुए दुनिया के नज़ारे / चमके हैं तुम्हारी रोशनी से चाँद और सितारे / तुम्हारा ग़म है ग़म, औरों का ग़म ख्वाब-ओ-कहानी है / तुम्हारा ख़ून है ख़ून, हमारा ख़ून पानी है]
    यह सदाबहार यादें वो कीमती हीरें हैं जो हमेशा याद रहेंगी।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest