प्रतीक्षा
शाम छह बजे। स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर तीन।
68 साल के दादाजी बेंच पर बैठे थे। हाथ में अटैची, आंखों में चमक। दस साल बाद बेटा अमेरिका से आ रहा था। दादाजी रोज़ दिन गिनते थे — “बस एक दिन और।” उनकी चाह थी: बेटा आए, गले लगे, कहे “बाबूजी, अब आप मेरे साथ चलो।”
ठीक सामने, उसी बेंच के दूसरे कोने पर 24-25 साल की मीरा बैठी थी। हाथ में टिकट, आंखों में आंसू। चार साल बाद उसे कॅनाडा की स्कॉलरशिप मिली थी। उसकी चाह थी: ट्रेन आए, वो भागे और कहे, “पापा, अब मैं उड़ना चाहती हूँ।”
ट्रेन की सिटी बजी। दादाजी उठकर खड़े हो गए, “आ गई… आ गई।”
मीरा ने दुपट्टे से आँख पोंछी, “आ गई… अब जाना होगा।”
ट्रेन रुकी। एक ही डिब्बे से एक लड़का उतरा, एक लड़की चढ़ी।
दादाजी का बेटा उतरा। सूट-बूट, हाथ में आई फोन। दादाजी दौड़े, “बेटा!”
बेटे ने गले लगाया, पर नजर घड़ी पर थी। बोला, “पापा, दो घंटे की कनेक्टिंग फ्लाइट है दिल्ली से। बस आपसे मिलना था। माँ की तेरहवीं पर नहीं आ पाया था ना !… सॉरी। कंपनी ने छुट्टी नहीं दी। आप चल रहे है ना मेरे साथ?”
दादाजी की दस साल की चाह, दस सेकंड में बुझ गई। बोले, “तू जा बेटा। मैं यहां ठीक हूँ। अपनी मिट्टी छोड़कर मैं जी नहीं पाऊंगा।”
उसी डिब्बे में मीरा चढ़ रही थी। खिड़की से उसके पापा चिल्लाए, “बिटिया, मत जा। तेरी माँ के बाद अब तू ही तो मेरा सहारा है। तेरे बिना पैसा किस काम का ?”
मीरा की चार साल की चाह, चार सेकंड में कांप गई। पर उसने खिड़की से हाथ हिलाया, “पापा, मैं लौटूंगी। बस एक बार उड़ लेने दो।”
ट्रेन चली गई।
प्लेटफॉर्म पर दो लोग रह गए। एक की चाह थी ‘आना’, पर आया और आकर चला भी गया। दूसरी की चाह थी ‘जाना’, पर जाते-जाते कुछ छोड़ गई।
दादाजी ने खाली बेंच देखा। मीरा के पापा ने खाली पटरी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। कुछ नहीं कहा। बस एक ही बेंच पर बैठ गए।
एक स्टेशन, एक प्लेटफ़ॉर्म और दो विपरीत चाह! स्टेशन एक ही होता है — जहां कोई आने की राह तकता है, कोई जाने की ज़िद करता है। और बीच में बचती है सिर्फ प्रतीक्षा…जो न पूरी तरह अपनी होती है, न पूरी तरह पराई।
इनाम
स्कूल में निबंध प्रतियोगिता का विषय था “मेरी माँ”
रवि ने लिखा-
“मेरी माँ घरों में बर्तन माँजती है, लेकिन मुझे कभी गरीब महसूस नहीं होने देती।”
प्रतियोगिता में उसे प्रथम पुरस्कार घोषित किया गया।
प्रिंसिपल ने मंच पर बुलाकर पूछा –
“बेटा, इनाम के साथ और क्या चाहिए?”
रवि ने भीड़ में बैठी अपनी माँ को देखा।
फिर धीमे से बोला-
“बस इतना कि आज के बाद स्कूल में कोई मेरी माँ को ‘कामवाली’ कहकर न बुलाए… सब उन्हें ‘रवि की माँ’ कहें।”
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा,
और उसकी माँ पहली बार सिर उठाकर रोई।
- डॉ. रमेश यादव, मुंबई
फोन – 9820759088
