मुक्ति
घरेलू सहायिका कल थोड़ी देर से आई; पूछने पर उसने बताया- “मैडम जी मेरी ही तरह सबके घरों में काम करती पड़ोसन रास्ते में चक्कर खाकर गिर पड़ी और तुरंत ही मर भी गई।”
कुछ क्षण चुप रहकर उसने लंबी साँस ली।
“शराबी पति… दो जवान बेटे… सबके लिए दिन-रात पिसती रही। बहन, आज मुक्त हो गई।”
उसके “मुक्त हो गई” शब्द मेरे भीतर उतर गए।
क्यों ऐसा विकास…
विश्वविद्यालय में विकास परिचर्चा चल रही थी। एक वरिष्ठ विद्वान ने कहा, “विकास महानगरों को और फैलाने में नहीं, छोटे-छोटे आत्मनिर्भर नगर बसाने में है। जहाँ रोजगार हों, छोटे उद्योग हों, जल निकासी की वैज्ञानिक व्यवस्था हो, वर्षा–जल संचयन हो, स्कूल, अस्पताल और हरियाली साथ-साथ हों।”
दूसरे विद्वान ने जोड़ा, “शहर को लंदन बनाने से पहले उसे अपने ही देश की प्राचीन सभ्यता– मोहनजोदड़ो ड्रेनेज सिस्टम जैसी बेहतरीन व्यवस्था अपनाने की जरूरत है। साथ ही पिन्नियों,प्लास्टिक को टाटा बाय करने की जरूरत है; जिससे जल का प्राकृतिक बहाव बना रहे।”
बाहर निकलते ही सबकी नज़र सामने सड़क पर पड़ी। तीन महीने पहले बनी सड़क फिर खोदी जा रही थी। बगल में नया नाला बन रहा था। नाले के किनारे ताज़ा बनी फुटपाथ तोड़ी जा चुकी थी। कुछ दूरी पर पानी की पाइप लाइन डालने के लिए फिर खुदाई चल रही थी।
एक छात्र मुस्कुराया, “लगता है, विकास तेज़ी से हो रहा है!”
साथ खड़े प्रोफेसर ने व्यंग्य से कहा, “हाँ, सड़क एक बार बनती है, भुगतान बार बार होता है।”
पास खड़ा मज़दूर फावड़ा रोककर बोला—
“साहब, हमें तो हर साल यही सड़कों के गड्ढे, रोजगार देते हैं।
शेख़ी
पड़ोसी के घर बैठे थे। हँसी-मज़ाक और गपशप का दौर चल रहा था।
तभी सुधा के पति ठहाका लगाकर बोले, “मुझे जब भी यह किसी काम के लिए कहती है, मैं जान-बूझकर उसे बिगाड़ देता हूँ। फिर यह दोबारा कहती ही नहीं। बस… मैं आराम से टीवी और यूट्यूब देखता रहता हूँ।”
बैठक में हल्की-सी हँसी गूँज उठी। मेरे पति भी मुस्करा दिए।
वह अपनी शेखी बघार रहे थे।
मैंने नजरें चुराती सुधा को देखा और उसके पीछे–पीछे रसोई में चली गई।
चिन–मिन
जब से होश संभाला बूढी दादी को हट्टे कट्टे दादा से चुपचाप डांट खाते ही पाया। बूढी कमजोर दादी दवा,पानी लेकर आतीं तो डांट खातीं- पांच मिनट देर कर दी या पांच मिनट जल्दी ले आई आदि। ऐसे ही– खाना– ऐसा है वैसा है; चिन–चिन मिन–मिन। मैंने एक दिन मम्मी से पूछा-
“दादा, क्यों हर समय दादी को डांटते रहते हैं?”
मम्मी बोली-
“बेटा, दादा बूढ़े हैं ना; यह उनके प्यार जताने का तरीका है। वह दादी को हर पल अपने इर्द-गिर्द मंडराते हुए ही देखना चाहते हैं।”
आज तक इस अजीब प्यार को समझ नहीं पाई हूं।
- नील मणि
लेखिका व कार्टूनिस्ट
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मेरठ- 250001 (उत्तर प्रदेश)
