- सुशील उपाध्याय
फिल्म ‘सतलुज’ (पुराना नाम ‘पंजाब 95’)। जो लोग इसे नहीं देखना चाहते थे, अब वे भी इसे देखने का जुगाड़ लगा रहे हैं। रोकटोक और प्रतिबंध की आवाजों से लोगों की उत्कंठा बढ़ गई है। वैसे यूट्यूब पर कई अकाउंट्स पर यह फिल्म उपलब्ध है और खूब देखी भी जा रही है।
कुछ देर के लिए इस फिल्म के कंटेंट और थीम को किनारे कर देते हैं, क्योंकि निर्माता-निर्देशक (हनी त्रेहन) की निगाह में यह ऐसा विषय है, जिसे सेंसर बोर्ड द्वारा एक भी कट के बिना पास किया जाना चाहिए था, जबकि सेंसर बोर्ड और सरकार की निगाह में यह एक पक्षीय फिल्म है, जो स्टेट और सिस्टम की ज्यादतियों पर तो फोकस करती है, लेकिन आतंकवादियों को लगभग क्लीन चिट दे देती है। खैर, इस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए इस फिल्म की कुछ छोटी-छोटी तकनीकी बातों पर नजर डालते हैं। इतनी बड़ी टीम होने के बावजूद उन गलतियों पर निगाह नहीं गई।
वैसे इन गलतियों या कमियों पर बात करने से पहले एक सुझाव है कि इस सतलुज को फिल्म स्टडीज और मीडिया की कक्षाओं में इसकी थीम, कंटेंट और टेक्निकल एस्पेक्ट के साथ दिखाकर विस्तार से पढ़ाया जाना चाहिए। यह सही है कि ये फिल्म सिस्टम (और स्टेट) के पक्ष में झुकी हुई नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह विशुद्ध प्रोपेगेंडा फिल्म हो और पूरी तरह स्टेट के खिलाफ खड़ी हो। यह एक ऐसे विषय को उठाती है, जो आतंकवाद के दौर में पंजाब में लापता हुए लोगों पर फोकस करती है तथा उनके परिजनों के दुख और संघर्ष को सामने लाती है।
खैर, इस विषय को यहीं छोड़ते हैं, क्योंकि यहां राय अलग-अलग हो सकती हैं। चूंकि फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है, इसलिए यह अपेक्षा बढ़ जाती है कि तथ्य और प्रस्तुति, दोनों दृष्टियों से इसमें प्रमाणिकता हो। अक्सर बड़ी चीजों को प्राथमिकता देने के चलते छोटी बातें पीछे छूट जाती हैं। जैसे, फिल्म के एक दृश्य में पांच रुपये का छोटा सिक्का उछाला जाता है। यह फिल्म 1995 की घटनाओं पर आधारित है, जबकि यह छोटा पांच रुपये का सिक्का 2004 में जारी हुआ और 2007 के बाद व्यापक रूप से प्रचलन में आया। यानी जिस समय पर फिल्म केंद्रित है, उस समय यह सिक्का अस्तित्व में ही नहीं था।
फिल्म में दिखाया गया है कि डीजीपी बिट्टा के बाद डीजीपी वर्मा कार्यभार ग्रहण करते हैं। एक दृश्य में वे बताते हैं कि मैं इससे पहले डीजीपी इंटेलिजेंस थे, जबकि 1995 में पंजाब में डीजीपी इंटेलिजेंस का पद ही नहीं था। आज भी वहां डीजीपी के केवल दो ही स्वीकृत पद हैं। हालांकि डीजीपी का वेतनमान अनेक अधिकारियों को मिल जाता है, लेकिन ‘डीजीपी इंटेलिजेंस’ नाम का पद न तब था और न ही आज है।
फिल्म में शुरू से आखिर तक अलग-अलग दृश्यों में ‘पंजाब डेली’ नामक अंग्रेजी अखबारको दिखाया जाता है, जबकि पंजाब में किसी भी सरकारी कार्यालय में पंजाबी भाषा के समाचार पत्र ही प्रमुखता से मिलते हैं। पूरी फिल्म में केवल एक दृश्य में पंजाबी अखबार का मुखपृष्ठ दिखाई देता है। बाकी जगह ऐसा लगता है मानो पूरा पंजाब, थाने से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक, केवल अंग्रेजी अखबार ही पढ़ता है।
फिल्म में दो-तीन बातें और असामान्य दिखती हैं। जैसे सीबीआई का एडिशनल डायरेक्टर (अर्जुन रामपाल) एसएसपी रैंक के अधिकारी से ‘तू-तुझे’ कहकर बात करता है। ध्यान रहे, सीबीआई के अधिकारी भी पुलिस सेवा से ही डेपुटेशन पर आते हैं। इसलिए उन्हें इतनी बुनियादी प्रोफेशनल ट्रेनिंग अवश्य मिलती है कि वे किसी आईपीएस अधिकारी से बातचीत में मर्यादित और पेशेवर भाषा का प्रयोग करें। संभव है कि दृश्य को अधिक फिल्मी बनाने के लिए यह छूट दी गई हो।
यह बात भी हम सभी जानते हैं कि पंजाब में आमतौर पर सिख समुदाय सार्वजनिक रूप से सिगरेट पीने को सामान्य व्यवहार नहीं मानता। ऐसे में सीबीआई का एडिशनल डायरेक्टर उसी थाने में बैठकर सिगरेट पीने लगता है, जहां सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक सभी सिख हैं। इस दृश्य से कौन-सा अतिरिक्त प्रभाव पैदा होता है, यह समझना कठिन है।
हद तो तब हो जाती है, जब यही सीबीआई अधिकारी कोर्ट रूम में (फिल्म यह नहीं बताती कि यह हाई कोर्ट है अथवा सुप्रीम कोर्ट) इस बात पर अपना आपा खो बैठता है कि उसके द्वारा लाया गया गवाह अपनी बात से मुकर जाता है। गवाह का मुकर जाना और अधिकारी का नाराज होना सामान्य बात हो सकती है, लेकिन उसके इस व्यवहार पर अदालत द्वारा कोई कार्रवाई न किया जाना, ऐसी फिल्म में असामान्य लगता है जो स्वयं को सच्ची घटना पर आधारित बताती है। फिल्म के निर्माता-निर्देशकों ने संवैधानिक न्यायालय को किसी सामान्य सरकारी कार्यालय की तरह प्रस्तुत कर दिया है। फिल्म के अंत में एक दृश्य में जब गवाह सच्चाई बयान करता है तो एक साथ पांच पुलिस अधिकारी कोर्ट रूम में ही हंगामा करने लगते हैं। यहां भी अदालत की गरिमा अनावश्यक रूप से कमतर दिखाई गई है। इसी अदालत में दर्जनों पुलिस अधिकारी इस प्रकार बैठे दिखाई देते हैं, मानो वे किसी विभागीय बैठक या सम्मेलन में आए हों।
पुरानी हिंदी फिल्मों की तरह एक वकील अदालत में घूम-घूमकर उपदेशात्मक शैली में दलीलें देता है। जबकि आज अधिकतर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के बाद हम सभी जानते हैं कि अदालतों में कई बार खड़े होने तक की जगह नहीं होती। वरिष्ठ वकील भी एक-दूसरे से सटकर खड़े रहते हैं और जूनियर वकील अपने लिए जगह बनाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में फिल्मी अदालत का यह दृश्य हास्यास्पद ही लगता है।
फिल्म के अंतिम हिस्से में एक और रोचक दृश्य है, जिसमें पंजाब के मुख्यमंत्री, डीजीपी और सीबीआई डायरेक्टर साथ बैठे हैं। इस दृश्य में सीबीआई डायरेक्टर मुख्यमंत्री के बराबर वाले सोफे पर लगभग अधलेटे होकर बैठे दिखाई देते हैं। यथार्थ में, यह अत्यंत असामान्य स्थिति है क्योंकि मुख्यमंत्री के सामने किसी अफसर के बैठने का भी एक तरीका होता है।वास्तविकता में यह कल्पना करना कठिन है कि सीबीआई जैसे संस्थान का डायरेक्टर मुख्यमंत्री के बराबर इस प्रकार अधलेटा होकर टांग फैलाकर बैठा हो। सीबीआई अधिकारी की भूमिका निभाने वाले अभिनेता का शारीरिक गठन भी ऐसा है कि उसका पेट सामान्य से काफी बड़ा दिखाई देता है।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एसएसपी स्तर का कोई अधिकारी अपनी टीम के साथ किसी को मारने पहुंचे और गोली चलाने से पहले परिवार की वृद्ध महिला के साथ ‘अक्कड़-बक्कड़ बंबे बो’ जैसा बच्चों का खेल खेलने लगे, और उसी के आधार पर तय करे कि किसी को मारना है या नहीं? वास्तविक दुनिया में यह संभव नहीं लगता, लेकिन फिल्म में ऐसा ही दिखाया गया है। यह बात इसलिए अधिक खटकती है क्योंकि फिल्म स्वयं को यथार्थवादी और सच्ची घटना पर आधारित बताती है। इसी प्रकार फिल्म के नायक जसवंत सिंह (दिलजीत दोसांझ) को इतना थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया जाता है कि वास्तविक परिस्थितियों में उतनी यातना से किसी एक नहीं, बल्कि कई लोगों की मृत्यु हो सकती थी। यह दृश्य भी जरूरत से अधिक फिल्मी छूट का परिणाम लगता है।
फिल्म में बार-बार ‘दस साल की घटनाओं’ का उल्लेख किया गया है। यदि यह अवधि 1985 से 1995 तक मानी जाए तो भी तथ्यात्मक समस्या है, क्योंकि पंजाब में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत 1978 में हो चुकी थी और 1981 तक वे संगठित रूप ले चुकी थीं। इस दृष्टि से इसे ‘दस साल का दौर’ कहना तार्किक नहीं लगता। ‘पंद्रह-सोलह साल का दौर’ कहना अधिक उपयुक्त होता।
फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे भी हैं, जिन्हें मीडिया और फिल्म स्टडीज के विद्यार्थियों को अवश्य याद रखना चाहिए। एक दृश्य में तरनतारन के एसएसपी अपने घर से अकेले कार लेकर तेजी से निकलते हैं और उसके तुरंत बाद तेज गति से गुजरती हुई ट्रेन दिखाई जाती है। किसी व्याख्या के बिना ही दर्शक समझ जाता है कि एसएसपी ने आत्महत्या कर ली है। यह दृश्य फिल्म भाषा (Film Language) के प्रभावशाली प्रयोग का अच्छा उदाहरण है।दूसरा दृश्य वह है, जब जसवंत सिंह की मौत का गवाह अदालत में झूठी गवाही देने के बाद रात में घर लौटता है तो उसे सोते वक्त अपना वह मित्र दिखाई देता है, जिसे पुलिस पहले ही मार चुकी होती है। वह जिन शब्दों में अपने घावों और पीड़ा का वर्णन करता है, वे अत्यंत मार्मिक हैं।
फिल्म में पुलिस के पक्ष तथा आतंकवाद के विरुद्ध की गई कार्रवाइयों के पीछे की रणनीति को प्रभावशाली ढंग से नहीं दिखाया गया है। इसके बावजूद इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भले ही यह फिल्म पूरी तरह संतुलित न हो, लेकिन इसे केवल राजनीतिक प्रोपेगेंडा फिल्म कहना भी उचित नहीं होगा। हालांकि सतलुज की तरह यह फिल्म बहती हुई नहीं दिखती है, ठिठकी हुई लगती है। एक सामान्य दर्शक की दृष्टि से देखें तो इसके फिल्मांकन, एडिटिंग, विषय-प्रस्तुति तथा संवादों के प्रभाव को और अधिक सशक्त बनाया जा सकता था।
और हां, प्रेस वार्ता के बाद ताली बजाने वाले पत्रकार कहीं नहीं होते, केवल फिल्मों में होते हैं। फिल्मी प्रेस वार्ताओं में नकली पत्रकारों की जगह असली पत्रकार ज्यादा प्रभाव छोड़ सकते थे।

डॉ. सुशील उपाध्याय
Mob: +91 9997998050
