समर वेकेशन के बाद हमारा कालेज जब खुला तो हमारे मनोविज्ञान विभाग में एक बड़ा सरप्राइज़ हमारी प्रतीक्षा में था।
38- वर्षीया हमारी विभागाध्यक्षा का मेक-ओवर।
एकदम नए स्टाइल में कटे और बंधे बाल, आंखों में अंजन की मोटी परत, गालों पर रूज़ की गुलाबी तह, माथे पर बिंदी और सिंदूर की बुंदकी, गर्दन में भारी मंगलसूत्र, बाहों में चार- चार कंगन, उंगली में हीरे की अंगूठी, हाथों व पैरों में नखश्रंगार, खालिस चमड़े का बैग, खूब शानदार ऊंची ऐड़ी की सैंडल और स्लीवलेस लो- नेक ब्लाउज़ के साथ मैंचिंग गुलाबी फ़्रैंच शिफ़ौन….
विभाग की हम पांचों अध्यापिकांए एक साथ बोल उठीं— एक दूसरी को काटती हुईं—
“आपने शादी कब की,मै’म?” कीर्तिभनोट ने पूछा….
“अपने हसबैंड के बारे में बताइए, मैम,” ॠचा सिंघल बोली….
“आप बहुत अच्छी लग रही हैं,मैम,” मैं ने कहा।
“इतनी बिग न्यूज़,मैम, और आप ने हमें बुलाया नहीं?” प्रतिभा मिश्र ने शिकायत की।
“आप हमें मिनर्वा में लंच खिलाइए, मैम,” मंजू शंकर ने मांग रखी।
मिनर्वा हमारे कस्बापुर का सब से महंगा रेस्तरां है।
उषा बत्तरा ने बताना शुरू किया :
रोमानी अन्दाज़ में….
( 2 )
“छुट्टियों से ऐन एक दिन पहले हमारे एम.
ए. पार्ट टू की कुसुम मेरे पास आयी, ‘मैम,आज मेरा जन्मदिन है। मिनर्वा में मना रही हूं। शाम सात बजे। कालेज में से सिर्फ़ आप को बुला रही हूं। निराश मत करिएगा….’
वहां पहुंची तो पाया वहां चार कुर्सियों वाली एक मेज़ पर कुसुम कुलीन एक सज्जन के साथ बैठी थी।
‘तुम्हारी बर्थडे पार्टी?’ अपने हाथ का गिफ़्ट उस के हाथों में थमाते समय मैं ने चारों ओर नज़र दौड़ाई, ‘और बाकी गैस्टस?’
‘पार्टी में केवल हमीं तीन रहेंगे,’कुसुम हंसी, ‘यह मेरे चाचा है। पैंतालीस वर्ष के हैं। चौदह- वर्षीय इन के एक ही बेटा है। जो दून स्कूल के होस्टल में रहता है। चाचा ‘ग्रैंड’ सिनेमाघर के मालिक हैं। सिटी क्लब के औनरेरी ट्रैयरर और लाइफ़ मेंबर भी। पिछले ही महीने मेरी चाची का देहांत हो गया। कई वर्षों से कैंसर झेल रहीं थीं लेकिन उन के जीते-जी यह दूसरी शादी के लिए मना ही करते रहे। लेकिन अब राज़ी हो गए हैं….’
“सज्जन मुझ से बोले, नेम द डे ( मेरा विवाह प्रस्ताव स्वीकार कीजिए)….’
‘दिस इज़ अ न्यू वन, ( ऐसी स्थिति का मैं ने पहले कभी सामना नहीं कर रखा),’ हैरानी के साथ-साथ मुझे गुस्सा भी आया।
‘नेवर फ़ियर,(खतरे की कोई बात नहीं),’ उन सज्जन ने कहा, आप के बारे में मैं पूरी खबर रखता हूं। आप बहुत हिम्मती हैं। आप बहुत तेज़ दिमाग हैं। अठारह वर्ष की उम्र में आप ने अपने इस कालेज में फ़ीस-क्लर्की की नौकरी पकड़ी। अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए। फिर बाइस साल की उम्र में आप ने एम.ए.टू के साथ नेट की परीक्षा भी पास कर ली और फ़ीस- क्लर्की छोड़ कर कालेज में लेक्चररशिप ले ली। फिर छब्बीस साल के आते- आते आप ने पी.एच.डी. की डिग्री भी हासिल कर ली। नतीजा,अपने तेतीसवें साल ही में आप को रीडर ग्रेड मिल गया। लेकिन आश्चर्य, आप की कमखर्ची रत्ती भर भी कम नहीं हुई….’
“उन सज्जन के स्वर की कोमलता ने मुझे शराबोर कर दिया और मेरी रुलाई छूट ली….
‘नेम द डे,’ उन सज्जन ने दोहराया और मैं ने उन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया….
( 3 )
“वौट अ फ़ेयरी टेल!” प्रतिभा मिश्र ने नाटकीय अंदाज़ में ताली बजाई।
“और फिर शादी किस दिन हुई?” कीर्ति भनोट ने पूछा।
“उस से अगले सप्ताह,” उषा बत्तरा लज्जालु सकुचाहट से भर लीं, “बीच के दिन उन्हों ने मेरे साथ शौपिंग करते हुए बिताए। बोले,मुझे अपनी पत्नी सजी- संवरी चाहिए….”
“अमीर आदमी हैं तो अपनी अपेक्षाएं ऊंची रखेंगे ही….” मैं ने कहा।
“खुद भी राजा की तरह सजते- संवरते हैं,” उषा बत्तरा खिलखिलाईं, “हमेशा बने- ठने रहते हैं। और घर भी ऐसा है मानो कोई राजमहल। छत पर झाड़-फानूस, दीवारों पर पेंटिग्ज़, फ़र्नीचर पर लकड़ी की नक्काशी,फ़र्श पर कालीन, हर कमरे में एअरकंडीशनर,बाथरूम में पंखे और रग्ज़….”
“अब हम लंच आप के राजमहल में लेंगी,” मंजू शंकर मचल ली, “मिनर्वा में नहीं….”
“क्यों नहीं?” उषा बत्तरा ठठायीं, “लंच वहीं होगा और बहुत जल्दी होगा….”
आगामी दिन उषा बत्तरा में आए दूसरे अंतर भी प्रकाश में लाए।
विभागाध्यक्षा होने के नाते वह एम.ए. एडमिशन कमिटी की चेयरपर्सन रहा करतीं। कमिटी में उन के साथ मैं और ऋचा सिंघल भी रहीं। किंतु पहले जहां वह एडमिशन के लिए निर्धारित पूरे के पूरे चार घंटे विभाग में हमारे साथ बैठ कर हमारा हाथ बटाया करतीं, अब इस नए सेशन में केवल पांच ही मिनट के लिए उपलब्ध रहने लगीं। आतीं और हम से पूछती, ‘मेरे हस्ताक्षर कहां होने हैं?’ और हस्ताक्षर करने के बाद लोप हो जातीं।
फिर पढ़ाई शुरू हुई तो पिछले कई वर्षों से चला आ रहा टाइम- टेबल उन्हों ने बदल डाला। पहले जहां उन के पीरियडज़ की संख्या विभाग की पांचों अध्यापिकांओं के पीरियडज़ के बराबर रहती रही थी, अब अठारह से घट कर बारह हो गई। और वे बारह भी वह नहीं ही लेतीं। हम में से जिस किसी के भी पीरियडज़ खाली होते, वह उस किसी को मोबाइल कर देतीं, ‘मुझे आज घर में कुछ काम है। मेरी कलासिज़ तुम्हें लेनी होंगी….’
हम उन से क्या कहतीं? हम सभी के मन में उन के लिए अथाह सम्मान था। कालेज के प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने अध्यापन के प्रति उन का समर्पण हम ने देख- सुन रखा था।
वैसे भी अपनी तरफ़ से हमें तुष्ट रखने के लिए वह हमें ग्रैंड सिनेमा की हर पिक्चर बदलने पर बाल्कनी के टिकट अवश्य ही भेंटस्वरूप पेश करतीं। साथ ही घर के बने कभी समोसे खिलातीं तो कभी केक।
हमारी प्रधानाचार्या भी उन की पीठ पीछे ही अध्यापन के प्रति उन में नयी आई इस बेपरवाही का उल्लेख करतीं। उन के सामने तो उन के संग अपनी बातचीत पूरी तरह से सुहानी और मनोहर रखतीं। कालेज की आया लोग हमारे कान में अक्सर फुसफुसातीं, ‘कल बत्तरा मैडम प्रिंसीपल साहिबा को अपनी गाड़ी में बिठला कर मिनर्वा में खाना खिलाने ले गईं थीं….’
‘कल बत्तरा मैडम प्रिंसीपल साहिबा को बेशकीमती एक साड़ी दे गईं थी….’
‘कल बत्तरा मैडम प्रिंसीपल साहिबा
के लिए औल्फ़ोंसो आम की पेटी लायीं थीं….’
इत्यादि, इत्यादि….
फिर एक दिन रात के नौ बजे उषा बत्तरा का मुझे फ़ोन आया, “तुम से एक प्रार्थना है….”
“कहिए मैम,” मैं उन की लाभग्राही रही थी। पहले उन की विद्यार्थी की हैसियत से और बाद में उन की सहकर्मिणी के नाते। बल्कि सच बताऊं तो अपने विभाग में मुझे वही लायीं थीं।
“इधर सिटी क्लब में हम एक पार्टी दे रहे हैं। मेरे पति का कहना है मेज़बान होने के नाते हम इसे बीच में नहीं छोड़ सकते। तुम मेरी अम्मा के पास फ़ौरन चली जाओ। उधर से पड़ोसिन का फ़ोन आया है, उन की तबीयत बिगड़ रही है….”
“ज़रूर मैम,” मैं ने कहा, “मैं अभी निकल लेती हूं….”
इधर जब उषा बत्तरा ने गाड़ी चलानी सीखी थी और एक एयर कंडीशनड स्विफ़ट डिज़ायर बैंक लोन पर खरीद भी ली थी तो उन की देखादेखी मैं ने भी कार चलानी सीख कर अपने लिए लोन पर एक औल्टो आठ सौ निकलवा ली थी।
उसी औल्टो में मैं ने अपने भाई को अपने साथ लिया और उषा बत्तरा के घर के लिए रवाना हो ली।
यहां यह बता दूं उषा बत्तरा की पारिवारिक स्थितियां शुरू ही से जटिल रहीं थीं। उन के पिता हमारे कालेज के फ़ीस बाबू थे और एक सड़क दुर्घटना में जब परलोक सिधारे थे तो उषा बत्तरा केवल अठारह वर्ष की थीं।अपनी उस अल्पायु में भाई- बहनों में सब से बड़ी होने के नाते परिवार का भार उन्हों ने अपने ऊपर लाद लिया था। उन की चार बहनें थीं और एक भाई।और इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि उन चारों बहनों मे से एक में भी न उन जैसा ओज रहा था और न ही उन जैसी कुशाग्र बुद्धि। चारों ही पढ़ाई के मामले में न के बराबर रुचि रखती थीं। उन का भाई ज़रूर अच्छा विद्यार्थी रहा था और आई.आई.टी.देहली से इंजीनियरिंग करने में सफल भी रहा था किंतु वह ऐसा निर्मम और पलायनवादी निकला कि पढ़ाई खत्म होते ही विदेश भाग लिया। कभी न लौटने के लिए। बहनों में भी तीसरे नंबर वाली अपने अठारहवें साल पूरे करते ही एक पड़ोसी लड़के के साथ अपने घर से चंपत हो गई । उस के साथ ब्याह रचाने। इस दूसरी घटना से उषा बत्तरा के मन में बाकी तीन बहनों को लेकर ऐसी हड़बड़ी आन बैठी कि उन में से किसी को भी उन्हों ने फिर बी.ए.के आगे पढ़ाना ज़रूरी नहीं समझा।और सभी के लिए आडंबरहीन एवं विनम्र दूल्हे जुटा भी लिए। एक वाराणसी के किसी सरकारी दफ्तर में टाइपिस्ट था। दूसरा लखनऊ के किसी अस्पताल में एक्सरे टेक्नीशियन। और तीसरा इलाहाबाद के किसी होटल में सुपरवाइज़र। सभी मुक्त भाव से कभी उधार तो कभी भिक्षादान उषा बत्तरा से समेटे रहते। भगोड़ी अपनी बहन,आशा, को उषा बत्तरा ने क्षमा तो न दी थी लेकिन प्रभुकपा देखिए उस का पति सरकारी ठेकेदारी के बूते पर उषा बत्तरा के किनकों से स्वतंत्र था और अच्छा कमा- खा रहा था।
उषा बत्तरा के घर पर जब तक मैं पहुंची आशा और उस के पति उस की मां को अपनी गाड़ी में लिटा कर निकट के नर्सिंग होम ले जा चुके थे।
मैं भी भाई के साथ वहां पहुंच ली। आशा बेतहाशा रो रही थी। उस के पति ने बताया उन की मां हदयाधात के कारण चल बसी थीं।
(4)
मां की मृत्यु की आकस्मिकता ने उषा बत्तरा को पुनः बदल दिया।
उन्हों ने सजना- संवरना छोड़ दिया। हर किसी से बोलना छोड़ दिया। एक जगह बैठतीं तो देर तक बैठी रह जातीं।
मां के घर जाकर वह अपने पुराने कपड़े उठा लाईं और अपनी शादी से पहले वाले लंबी बाज़ू
वाले लंबे ब्लाउज़ पहनने लगीं।शिफ़ौन और क्रेप की साड़ियां छोड़कर उन्हीं ब्लाउज़िस के साथ वाली सादे रंगों की हैंडलूम पहनने लगीं।
कालेज भी किराए की गाड़ी से आने लगीं। अपनी स्विफ़ट डिज़ायर चलानी एकदम छोड़ दी।
फिर कुछ माह जब और बीते तो उन्हों ने कालेज आना बिल्कुल बंद कर दिया। मेडिकल लीव पर चलीं गईं। मेडिकल सर्टिफ़िकेट पर लिखा मिला : कांप्लीकेशन्ज़ रिलेटिंग टू प्रेगनेंसी। ( गर्भावस्था संबंधित जटिलताएं )।
फिर मुझे एक दिन फ़ोन आया, “मेरे पास अभी चली आओ।”
मैं गई तो वह अपने नोट्स के साथ अस्तव्यस्त अवस्था में बैठी थीं।
“ये कागज़ ही मेरे जीवन की पूंजी हैं,” मुझे देखते ही वह रोने लगीं, “ये मैं तुम्हें देना चाहती हूं। क्या मालूम कल मैं रहूं न रहूं….”
“आप ऐसा क्यों कह रही हैं,मैम?” मैं ने उन्हें अपने अंक में भर लिया, “ऐसा क्या हुआ?”
“आज मेरी एमनियोसैंटिसिस की रिपोर्ट आई है। डाक्टर कहती है मेरे गर्भ की बच्ची को डाउन सिंड्रोम रहेगा। उस की छोटी उंगली अनामिका की ओर झुकी हुई, मुड़ी हुई पाई गई है….”
“डाउन सिंड्रोम?” मुझे धक्का लगा। मैं जानती रही थी आनुवंशिक उस स्थिति में बच्चे के
दिमाग और शरीर का सही विकास हो नहीं पाता। हृदय- दोष के साथ-साथ मांसपेशियां कमज़ोर होने के कारण सही देखने- सुनने व बोलने- चलने में सामान्य गति नहीं रहती।
चेहरा अजीब चपटापन लिए रहता है। और आंखें भी ऊपर की ओर चढ़ी रहती हैं। गर्दन और कान छोटे के छोटे रह जाते हैं।
“मेरे हज़बैंड को डर है अभिशप्त उस बच्ची को यदि मैं जन्म देती हूं तो यह उस के प्रति अन्याय होगा। उसे जीवन भर दूसरों पर निर्भर रहने की मजबूरी रहेगी और मुझे यह गर्भ गिरा देना चाहिए….”
“नहीं मैम,” मैं ने उन की पीठ घेर ली, “यह गर्भ गिराना भी उस के प्रति अन्याय होगा। प्रत्येक जीव को जीवन पाने का मौलिक अधिकार तो है ही,साथ ही आप के पास तो साधन भी हैं। आप उसे सही चिकित्सा व मार्गदर्शन उपलब्ध करवा सकतीं हैं और उसे आत्मनिर्भर व सार्थक जीवन व्यतीत करने के योग्य बना सकती हैं। और फिर मुझे विश्वास है आप का आगामी गर्भ एकदम स्वस्थ होगा, और इस बच्ची को संभालने में भी सहायक रहेगा….”
“डाक्टर ने यह भी बताया इस बच्ची के डाउन सिंड्रोम का कारण मेरी बढ़ी आयु भी रही होगी क्योंकि अधेड़ावस्था का गर्भ जोखिम होता ही है….”
“आप की डाक्टर एकदम गलत कह रही हैं,” मैं ने उन्हें ढाढ़स बंधाने की चेष्टा की,”पुरानी पीढ़ी की ओर देखिए। पहले और आखिरी बच्चे में बीस- बीस साल का अंतर रहा करता था और कई बार नौ या दस भाई- बहनों के परिवार में नवमें या दसवें नंबर की संतान सर्वोत्तम दिमाग रखती थी। सर्वोत्तम प्रतिभा रखती थी….”
“आप ने मेरे लिए नोट्स निकाल लिए, चाची?” जभी कुसुम कमरे में आन घुसी।
“तुम बाद में देखना,” उषा बत्तरा ने मेरी ओर संकेत किया, “अभी तो यह देखेगी। मेरे हिस्से का सिलेबस यही पढ़ा रही है….”
“मैं क्यों बाद में देखने लगी?” उषा बत्तरा की
अस्वीकृति के उत्तर में अपनी अप्रसन्नता प्रकट करने में कुसुम ने तनिक संकोच न दिखाया, “इन नोट्स पर मेरा अधिकार पहले बनता है। चाचा ने आप को मेरे सामने कहा था, कुसुम को तुम्हारे नोट्स आज मिल जाने चाहिए। जिन के घर में बैठी हैं उन का कहा बेकहा कर देंगी?”
“मैं फिर आऊंगी,मैम,” उस नाज़ुक स्थिति से मैं ने अपने को उबार लेना चाहा और वहां से चली आई।
लेकिन मैं वहां दोबारा कभी नहीं जा पाई। वे नोट्स भी कभी नहीं ले पाई।
उसी दोपहर उषा बत्तरा ने ग्रैंड सिनेमाघर के प्रोजेक्शन रूम के गलियारे से नीचे कूद कर दो जानें ले लीं : अपने गर्भ की और अपनी।
वह गलियारा मेरा देखा हुआ था। प्रोजेक्शन रूम के अपने आग्रह के अंतर्गत।
उस की सीढ़ियां अलग थीं।एकदम दुरारोह। लकड़ी के बल्लोंवाली।
सीढ़ियों के बाद वह गलियारा आया था जो एक तरफ़ प्रोजेक्शन रूम का दरवाज़ा लिए था और बाकी तीन तरफ़ तीन- तीन बल्लियां। थोड़ी देर के लिए उन बल्लियों पर मैं ठिठकी भी थी। आकाश वहां बहुत पास था और ज़मीन बहुत दूर। और दोनों ही अपनी- अपनी ओर मुझे खींच रहे मालूम दिए थे।
मन में दुःसाहस भी लहराया था और दहल भी उमड़ी थी। और मैं घुमटा खा कर प्रोजेक्शन रूम में लपक ली थी।अंदर टेक्नीशियन अपने शब्द संग्रह से एक के बाद एक शब्द उचारता गया था : असेंबली।लाइट- वाइट।फ़िल्टर ड्रौअर। नेगेटिव।
लेकिन मेरे घुमटे ने मुझ पर अपनी मूठ बनाए रखी थी और मैं कुछ भी समझ न पायी थी।
आजकल हमारे कालेज में उषा बत्तरा के पति अपनी भतीजी,कुसुम, के साथ अक्सर देखे जाते हैं।उन के हाथ में उषा बत्तरा का डेथ सर्टिफ़िकेट रहता है और साथ में कुछ सरकारी आवेदन- पत्र।
वह उषा बत्तरा का कालेज में जमा पी.पी.एफ़. और ग्रुप इन्शुअरन्स का रुपया निकलवाना चाहते हैं।
साथ ही उषा बत्तरा की मृत्यु के कारण खाली हुई उन की जगह कुसुम के नाम हथियाने के चक्कर में रहते हैं।

बहुत ही मार्मिक कहानी।जीवन की विपरीत परिस्थितियों से जूझती उषा बत्रा आज की नारी की सामाजिक यथार्थ स्थिति और संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं।कहानी का दुखद अंत स्तब्ध कर गया।हार्दिक बधाई दीपक दी।सुप्रभात प्रणाम।