- ऋषभदेव शर्मा
न सोचा न समझा न सीखा न जाना
मुझे आ गया ख़ुद ब ख़ुद दिल लगाना
ज़रा देख कर अपना जल्वा दिखाना
सिमट कर यहीं आ न जाये ज़माना
ज़ुबाँ पर लगी हैं वफ़ाओं कि मुहरें
ख़मोशी मेरी कह रही है फ़साना
गुलों तक लगायी तो आसाँ है लेकिन
है दुशवार काँटों से दामन बचाना
करो लाख तुम मातम-ए-नौजवानी
प ‘मीर’ अब नहीं आयेगा वोह ज़माना
ख़ुदा-ए-सुख़न और अराजकता का युग
मीर तक़ी ‘मीर’ (1723-1810), जिन्हें उर्दू अदब की दुनिया में श्रद्धा से ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ (काव्य का ईश्वर) कहा जाता है, महज़ एक शायर नहीं, बल्कि अठारहवीं सदी के भारत के राजनीतिक और सामाजिक पतन के प्रमुख वृत्तांतकार थे। उनका जीवन उस दौर का एक अंतरंग दस्तावेज़ है जिसे इतिहासकारों ने “अराजकता का युग” की संज्ञा दी है – एक ऐसी शताब्दी जब मुग़ल साम्राज्य अपनी अंतिम साँसें ले रहा था और पूरा उपमहाद्वीप विखंडन की पीड़ा से गुज़र रहा था।
आज हम मीर के व्यक्तिगत जीवन में विस्थापन के दंश, संरक्षण के लिए उनके अनवरत संघर्ष और उनकी काव्य-अभिव्यक्ति को एक ऐसे सूक्ष्मदर्शी लेंस के रूप में विश्लेषित करेंगे, जिसके ज़रिए मुग़ल सत्ता के पतन और उससे उपजे सामूहिक आघात के रहस्य को समझा जा सकता है। उनकी शायरी निजी दुख की दास्ताँ से कहीं बढ़कर, एक पूरी तहज़ीब के बिखरने का मर्सिया और उस युग की पीड़ा का प्रमुख पुरालेख है। मीर की दुनिया को समझने की यह यात्रा उन आरंभिक प्रभावों से शुरू होती है जिन्होंने उनके अद्वितीय दृष्टिकोण को गढ़ा।
आरंभिक जीवन और आध्यात्मिक विरासत : आगरा की पृष्ठभूमि
मीर के जीवन के आरंभिक वर्ष आगरा (तत्कालीन अकबराबाद) में बीते, और यही पृष्ठभूमि उनके संपूर्ण काव्य-कर्म की दार्शनिक नींव बनी। उनका पारिवारिक वंश और आध्यात्मिक परवरिश वह ज़मीन थी जिस पर उनकी शायरी की इमारत खड़ी हुई, जिसमें प्रेम, पीड़ा और स्वाभिमान के स्तंभ सबसे मज़बूत थे।
मीर के पूर्वज हिजाज़ से हिंदुस्तान आए और आगरा में बस गए। उनका पालन-पोषण एक गहरे आध्यात्मिक माहौल में हुआ। उनके पिता, मोहम्मद अली, जो ‘अली मुत्तक़ी’ के नाम से प्रसिद्ध थे, एक पहुँचे हुए दरवेश थे। उन्होंने ही बालक मीर के मन में यह बात बिठा दी कि प्रेम (इश्क़) ही ईश्वर की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है और इसके बिना जीवन व्यर्थ है। यह सूफ़ी दर्शन मीर की शायरी का स्थायी केंद्रबिंदु बन गया, जो सांसारिक और दैवीय प्रेम के बीच की सीमाओं को धुँधला देता है।
अश्क आँखों में कब नहीं आता
लहू आता है जब नहीं आता।
होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता।
दिल से रुखसत हुई कोई ख्वाहिश
गिरिया (रुदन) कुछ बे-सबब नहीं आता।
इश्क का हौसला है शर्त वरना
बात का किस को ढब नहीं आता।
जी में क्या-क्या है अपने ऐ हमदम
हर सुख़न ता बा-लब नहीं आता।
मीर के जीवन में त्रासदियों का सिलसिला बहुत जल्द शुरू हो गया। पहले उनके गुरु और पिता के शिष्य, सैयद अमानुल्लाह का निधन हुआ, और फिर जब मीर केवल ग्यारह वर्ष के थे, उनके पिता का साया भी सर से उठ गया। उनके पिता क़र्ज़ में डूबे हुए मरे, और इस आपदा के बाद उनके सौतेले भाइयों ने पारिवारिक संपत्ति पर क्रूरतापूर्वक कब्ज़ा कर लिया, जिससे मीर अनाथ और पूर्णतः निराश्रित हो गए। कम उम्र में मिले इस धोखे और अकेलेपन ने उनके मनोविज्ञान पर एक अमिट छाप छोड़ी। अलगाव और दुख (ग़म) का यही अहसास आगे चलकर उनकी शायरी का मुख्य विषय बना, जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को एक सार्वभौमिक अनुभव में बदल दिया। आगरा में झेली गईं इन कठिनाइयों ने ही उन्हें एक बेहतर भविष्य की तलाश में शाही राजधानी दिल्ली की ओर जाने को विवश कर दिया।
दिल्ली : शाही पतन और काव्य का उत्कर्ष
अठारहवीं सदी की दिल्ली एक विरोधाभासी शहर थी: एक मरते हुए साम्राज्य का सांस्कृतिक केंद्र, जहाँ एक ओर अत्यधिक परिष्कार और कला का बोलबाला था, तो वहीं दूसरी ओर विनाश और अराजकता का तांडव भी चल रहा था। यही शहर मीर के जीवन और काव्य का मुख्य मंच बना, जहाँ उन्होंने अपनी आँखों से एक साम्राज्य को बिखरते और एक तहज़ीब को उजड़ते देखा, और अपनी शायरी को उस पतन का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज़ बनाया।
बेखुदी ले गयी कहाँ हम को
देर से इंतज़ार है अपना
रोते फिरते हैं सारी-सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना
दे के दिल हम जो हो गए मजबूर
इस में क्या इख्तियार है अपना
कुछ नहीं हम मिसाले-अन्का, लेक’
शहर-शहर इश्तेहार है अपना
(अन्का =काल्पनिक पक्षी =नगण्य)
जिस को तुम आसमान कहते हो
सो दिलों का गुबार है अपना
संरक्षण की अनिश्चित दुनिया
मीर का दिल्ली में संरक्षण के लिए किया गया संघर्ष उस युग की राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता का एक सूक्ष्म प्रतिबिंब है। उनका जीवन संरक्षकों की एक अंतहीन और अनिश्चित श्रृंखला से गुज़रा, जो स्वयं अराजकता के शिकार थे। दिल्ली आने पर उन्हें अपना पहला महत्वपूर्ण संरक्षक नवाब समसामुद्दौला के रूप में मिला, लेकिन नादिर शाह के आक्रमण (1739) में नवाब की मृत्यु के साथ यह सहारा भी छिन गया।
इसके बाद उनकी ज़िंदगी अस्थिर संरक्षकों के इर्द-गिर्द घूमती रही। कभी वे रिआयत ख़ान के मुसाहिब बने, तो कभी नवाब बहादुर की सोहबत में कुछ राहत की साँसें लीं, लेकिन जल्द ही सफ़दरजंग द्वारा नवाब बहादुर की हत्या ने उन्हें फिर बेसहारा कर दिया। वे महानारायण दीवान और राजा नागर मल जैसे संरक्षकों के साथ सैन्य अभियानों में भी भटकते रहे। एक दिन वे अमीरों की महफ़िल में ‘मीर-ए-मजलिस’ होते, तो अगले ही दिन रोटी को मोहताज। संरक्षण की यह निरंतर तलाश और उसका बार-बार टूटना केवल मीर की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी, बल्कि यह उस “अराजकता” का जीवंत अनुभव था, जिसने पूरे सामाजिक ताने-बाने को तार-तार कर दिया था।
आक्रमणों का कहर और शहर का विनाश
मीर उन विनाशकारी विदेशी आक्रमणों के प्रत्यक्षदर्शी थे जिन्होंने दिल्ली को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। उनकी शायरी और आत्मकथा इन घटनाओं का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
● नादिर शाह का आक्रमण (1739): फ़ारस के शासक नादिर शाह के हमले ने मुग़ल सत्ता की कमर तोड़ दी। उसने शाही खज़ाने को लूटा, भयंकर क़त्लेआम मचाया और उस राजनीतिक व्यवस्था को घातक चोट पहुँचाई जिससे साम्राज्य फिर कभी उबर नहीं सका।
● अहमद शाह अब्दाली के हमले: अफ़ग़ान शासक अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) के बार-बार के हमलों का आघात और भी गहरा था। मीर ने अपनी आँखों से शहर को लुटते और जलते देखा और अपनी आत्मकथा में लिखा कि “तबाह हुए लोगों की चीखें सातवें आसमान तक पहुँचीं,” लेकिन अब्दाली पर कोई असर नहीं हुआ। इन हमलों ने दिल्ली को भौतिक और नैतिक रूप से पूरी तरह तबाह कर दिया, जिससे कलाकारों, कारीगरों और आम नागरिकों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ।
शहर-आशोब : दिल्ली के लिए एक कवि का विलाप
दिल्ली के इस विनाश ने एक विशिष्ट काव्य शैली को जन्म दिया, जिसे शहर-आशोब (शहर का विलाप) कहा जाता है। मीर इस शैली के सबसे बड़े शायर बनकर उभरे। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से दिल्ली के सामूहिक दुख और पीड़ा को आवाज़ दी। उनके शेर महज़ काव्य नहीं, बल्कि उस दौर का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बन गए। उन्होंने लिखा:
“दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें;
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें तख्तोताज का।”
इस शेर में वह उन अमीरों की दुर्दशा का वर्णन करते हैं जो कल तक सिंहासन पर बैठते थे और आज भीख माँगने को मजबूर हैं। मीर ने अपने शहर-आशोब में दिल्ली के पतन की तुलना कर्बला की त्रासदी से की, जिससे उन्होंने शहर के विनाश को एक भौतिक घटना से उठाकर एक नैतिक और सांस्कृतिक शहादत का दर्जा दे दिया।
इस प्रकार, दिल्ली के भौतिक और संरक्षण-तंत्र के पूर्ण पतन ने न केवल शहर की आत्मा को क्षत-विक्षत कर दिया, बल्कि मीर जैसे कलाकारों को उस शहर को छोड़ने पर विवश कर दिया जो उनकी पहचान का केंद्र था, और उन्हें एक ऐसे भविष्य की ओर धकेल दिया जहाँ समृद्धि तो थी, पर आत्मा का अभाव था।
दिल्ली की बदहाली-
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर (ज़िक्र) है;
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया।
दिल्ली में अब के आकर उन यारों को न देखा;
कुछ वे गये शिताबी कुछ हम बदेर आए।
मंज़िल न कर जहाँ को कि हमने सफ़र से आ;
जिसका लिया सुराग़ सुना वे गुज़र गये।
लखनऊ की ओर पलायन : निर्वासन और मोहभंग
सन् 1782 में, दिल्ली की लगातार लूटपाट और संरक्षण के अभाव से तंग आकर मीर ने अवध के नवाब आसिफ़ुद्दौला का निमंत्रण स्वीकार किया और लखनऊ चले गए। यह पलायन एक युगांतकारी क्षण था, जो तबाह हो चुकी मुग़ल राजधानी से अवध के समृद्ध लेकिन अपरिचित दरबार में सांस्कृतिक वर्चस्व के हस्तांतरण का प्रतीक था।
सांस्कृतिक टकराव और पहचान
लखनऊ में मीर के पहले मुशायरे का क़िस्सा बहुत प्रसिद्ध है। जब वह अपने पुराने दिल्ली के अंदाज़ वाले मामूली लिबास में पहुँचे, तो लखनऊ के भड़कीले और बनावटी दरबारियों ने उनका मज़ाक उड़ाया। मीर ने इसका जवाब अपनी शायरी से दिया, जिसमें उन्होंने अपनी पहचान उजड़ी हुई दिल्ली से जोड़ी। यह घटना दो साहित्यिक धाराओं के बीच के तनाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती है: एक ओर “दिल्ली स्कूल,” जो दाख़िली कैफ़ियत (आंतरिक भावनात्मक अवस्थाओं) और अभिव्यक्ति की ईमानदारी पर केंद्रित था, और दूसरी ओर “लखनऊ स्कूल,” जो नाज़ुक ख़याली (विचारों की कोमलता) और बाहरी भाषाई अलंकरण को महत्व देता था।
नवाब का संरक्षण और मीर का स्वाभिमान
नवाब आसिफ़ुद्दौला ने मीर को तीन सौ रुपये मासिक का एक उदार वज़ीफ़ा दिया और उनका बहुत सम्मान किया। इसके बावजूद, मीर लखनऊ के दरबारी माहौल में हमेशा एक “बेमेल” व्यक्ति बने रहे। उनका अत्यधिक स्वाभिमान (ख़ुद-दारी), संवेदनशीलता और चापलूसी से परहेज़ अक्सर दरबार के साथ उनके संबंधों में तनाव का कारण बनता। एक क़िस्सा है कि जब नवाब ग़ज़ल सुनते हुए अपनी छड़ी से खेल रहे थे, तो मीर ने पढ़ना बंद कर दिया। एक अन्य अवसर पर, जब नवाब ने उन्हें बाज़ार में टोका, तो उन्होंने बेरुखी से जवाब दिया कि “बाज़ार में बातें करना शरीफ़ों का दस्तूर नहीं।” उनका यह अक्खड़पन उनके उस स्वाभिमान से उपजा था जो किसी भी क़ीमत पर झुकने को तैयार नहीं था।
दिल्ली की स्मृतियाँ
लखनऊ में अपने जीवन के अंतिम दशक बिताने के बावजूद, मीर का दिल हमेशा दिल्ली के खंडहरों में ही बसा रहा। उनकी शायरी दिल्ली की यादों से भरी पड़ी है। वह उस उजड़े हुए शहर को लखनऊ की समृद्धि से बेहतर मानते थे। उनका यह शेर उनकी गहरी उदासीनता को दर्शाता है:
“दिल्ली के न थे कूचे औराके मुससव्विर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई”
अर्थात, दिल्ली की गलियाँ महज़ गलियाँ नहीं थीं, बल्कि किसी चित्रकार की किताब के पन्ने थीं; जहाँ भी नज़र पड़ती, एक तस्वीर दिखाई देती थी। लखनऊ में उनका जीवन उनके काव्य के उन मूल दार्शनिक विषयों का विश्लेषण करने का अवसर देता है जो उनके पूरे साहित्यिक जीवन में व्याप्त हैं।
फ़क़ीराना आए सदा कर चले,
मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले
जो तुझ बिन न जीने को कहते थे हम
सो इस अहद को अब वफ़ा कर चले
कोई ना-उम्मीदाना करते निगाह,
सो तुम हम से मुँह भी छुपा कर चले
बहुत आरज़ू थी गली की तेरी,
सो याँ से लहू में नहा कर चले
दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया,
हमें आप से भी जुदा कर चले
जबीं सजदा करते ही करते गई,
हक़-ए-बंदगी हम अदा कर चले
परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे
नज़र में सबों के ख़ुदा कर चले
कहें क्या जो पूछे कोई हम से “मीर”
जहाँ में तुम आए थे, क्या कर चले
मीर की काव्य-सृष्टि : पीड़ा, प्रेम और दर्शन
मीर की महानता इस बात में निहित है कि उन्होंने व्यक्तिगत और ऐतिहासिक पीड़ा को अपनी भ्रामक रूप से सरल शैली में सार्वभौमिक और दार्शनिक सत्यों में बदल दिया। उनकी शायरी जटिल विचारों को रोज़मर्रा की भाषा में व्यक्त करने की कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
ग़म की सौंदर्य-मीमांसा
दुख (ग़म) मीर की शायरी का आधार है। यह कोई साहित्यिक दिखावा नहीं, बल्कि उनकी अपनी ज़िंदगी और उनके युग की सच्चाई का सीधा रूपांतरण था। उन्होंने अक्सर अपने दिल की तुलना एक उजड़े हुए क़िले से की, जो दिल्ली के बिखरे हुए नैतिक और भौतिक ताने-बाने को दर्शाता था। आँसू, लहू और सुबह की राख जैसे प्रतीक उनकी शायरी में बार-बार आते हैं, जो हानि और पीड़ा की निरंतर स्थिति को व्यक्त करते हैं।
इश्क़ : सांसारिक और दिव्य
उनकी शायरी में प्रेम (इश्क़) के कई रूप हैं, जो सांसारिक जुनून (इश्क़-ए-मजाज़ी) और दैवीय प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) के बीच एक पुल का काम करते हैं। अपने पिता की सूफ़ी शिक्षाओं से प्रभावित होकर, मीर ने प्रेम को ब्रह्मांड की सबसे बड़ी रचनात्मक और विनाशकारी शक्ति के रूप में देखा। उनके लिए प्रेम ही ईश्वर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग था, चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक।
हस्ती अपनी हबाब(बुलबुला) की सी है।
ये नुमाइश सराब (मरीचिका) की सी है।।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है।
चश्म-ए-दिल खोल इस आलम (संसार) पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है।
बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज़्तिराब (बेचैनी) की सी है।
मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब (बरबाद) की सी है।
देखिए अब्र की तरह अब के
मेरी चश्म-ए-पुर-आब की-सी है।
‘मीर’ उन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है।
काव्य शैली : सहल-ए-मुमतनअ
मीर की शैली को सहल-ए-मुमतनअ कहा जाता है, जिसका अर्थ है “भ्रामक सादगी।” यह वह कला है जिसमें आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करके इतने गहरे और जटिल विचारों को व्यक्त किया जाता है कि उसकी नकल करना लगभग असंभव हो जाता है। जहाँ उनके कई समकालीन शायर फ़ारसी के भारी-भरकम अलंकारों और जटिल संरचनाओं का प्रयोग करते थे, वहीं मीर की भाषा सरल, स्वाभाविक और सुरुचिपूर्ण थी। इसी सादगी ने उनकी शायरी को कालजयी बना दिया और उन्हें अपने युग के अन्य कवियों से अलग स्थापित किया।
उनकी शायरी की विषय-वस्तु के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि वह केवल एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू साहित्य की संरचना और आलोचना को आकार देने वाले एक प्रवर्तक भी थे।
आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आज
शायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज
जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशीं
हम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज
साक़ी टुक एक मौसम-ए-गुल की तरफ़ भी देख
टपका पड़े है रंग चमन में हवा से आज
था जी में उससे मिलिए तो क्या क्या न कहिये ‘मीर’
पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज
साहित्यिक योगदान और स्थायी विरासत
मीर केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि उर्दू साहित्य के एक संस्थापक स्तंभ थे। उन्होंने नई विधाओं का निर्माण किया, आलोचनात्मक मानक स्थापित किए और भाषा को एक नया रूप दिया।
प्रमुख गद्य कृतियाँ
● ज़िक्र-ए-मीर: फ़ारसी में लिखी गई यह रचना किसी उर्दू शायर द्वारा लिखी गई पहली आत्मकथा मानी जाती है। हालाँकि, आधुनिक विद्वान इसे एक तथ्यात्मक कालक्रम के बजाय विभिन्न क़िस्सों, आध्यात्मिक वृत्तांतों और नैतिक उपदेशों (अदब) का एक विविध संग्रह या “मिश्रण” मानते हैं, जो ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है।
● नुकात-उस-शुआरा: इसे उर्दू में साहित्यिक आलोचना की पहली कृति माना जाता है। इस ग्रंथ में उन्होंने समकालीन शायरों का मूल्यांकन किया, जिससे उन्हें उर्दू परंपरा का “अग्रणी आलोचक” होने का दर्जा मिला।
भाषा के प्रवर्तक : रेख़्ता से उर्दू तक
मीर ने रेख़्ता – उर्दू के आरंभिक रूप – को परिपक्वता, गहराई और संगीतात्मकता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आम बोलचाल की भाषा को एक परिष्कृत साहित्यिक भाषा में बदल दिया, जो आगे चलकर आधुनिक उर्दू कहलाई।
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है
आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है
चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर- ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है
क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ (अधीर और शक्तिहीन) को, इश्क़ का मारा जाने है
आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे से
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है
परवर्ती कवियों पर प्रभाव
मीर का प्रभाव बाद की पीढ़ियों पर बहुत गहरा पड़ा। विशेष रूप से, मिर्ज़ा ग़ालिब ने उनके प्रति अपनी श्रद्धा को स्वीकार करते हुए कहा था:
“रेख़्ता के तुम्ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब;
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।”
यह कथन उर्दू शायरी में मीर के सर्वोच्च स्थान को प्रमाणित करता है।
उलटी हो गईं सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी (बुढापा) में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया
नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करे हैं, हमको अबस बदनाम किया
सरज़द (प्रत्यक्ष) हम से बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया
‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उनने तो
क़श्क़ा (तिलक) खेंचा, दैर (मंदिर) में बैठा, कबका तर्क इस्लाम किया
निष्कर्ष-
मीर तक़ी ‘मीर’ का जीवन और उनकी शायरी अठारहवीं सदी के भारत की ऐतिहासिक त्रासदी से अविभाज्य है। वह एक सामाजिक इतिहासकार, एक भाषाई प्रर्वतक और उपमहाद्वीप के भावनात्मक परिदृश्य के वास्तुकार थे, जिन्होंने पीड़ा को गरिमा प्रदान की और एक स्वाभिमानी कलाकार का आदर्श स्थापित किया। उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और संरक्षण के लिए चापलूसी करने के बजाय ग़रीबी में संतोष करना चुना।
सन् 1810 में लखनऊ में उनकी मृत्यु हुई और उन्हें एक ऐसी जगह दफ़नाया गया, जहाँ बाद में रेलवे लाइनें बिछा दी गईं और उनकी क़ब्र का निशान तक मिट गया। यह अंत उस युग के समापन का एक दुखद लेकिन उपयुक्त रूपक है, जिसका उन्होंने अद्वितीय रूप से वृत्तांत लिखा। मीर का जीवन भले ही समाप्त हो गया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी उनकी शायरी में जीवित है। जैसा कि उन्होंने खुद कहा था:
इधर से अब्र उठ कर जो गया है
हमारी ख़ाक पर भी रो गया है
मसायब (मुसीबतें) और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानिहा (ट्रेजेडी) सा हो गया है
सिरहाने ‘मीर’ के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते-रोते सो गया है

- प्रो. ऋषभदेव शर्मा
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