Sunday, October 18, 2026
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बच्चा ऑनलाइन है… पर क्या हम उसके साथ हैं?

  • चंचल कुमार सिंह

इस आभासी युग में बच्चों को तकनीक से दूर नहीं, जीवन और तकनीक के बीच संतुलन बनाना सिखाना होगा

बच्चे की शिक्षा अक्षरों से बहुत पहले शुरू हो जाती है। जन्म के बाद वह सबसे पहले माँ की आवाज, स्पर्श और चेहरे से दुनिया को पहचानता है; फिर परिवार के व्यवहार से प्रेम, भरोसा, अनुशासन और संवेदना का अर्थ सीखता है। इस अर्थ में माँ उसकी पहली मार्गदर्शक और घर उसका पहला जीवंत विद्यालय बन जाता है।

हमने इतिहास में अनेक युगों के बारे में पढ़ा है। मानव सभ्यता ने कृषि युग देखा, औद्योगिक क्रांति देखी और सूचना क्रांति भी देखी। लेकिन आज का वर्तमान अभिभावकों के लिए एक अत्यंत जटिल दौर लेकर आया है, क्योंकि पहली बार बच्चे के हाथ में ऐसी छोटी-सी स्क्रीन है जिसके भीतर लगभग पूरी दुनिया समाई हुई है।

धीरे-धीरे यही स्क्रीन कई बच्चों के लिए साथी की जगह साथी, खेल के मैदान की जगह खेल का मैदान और कभी-कभी माता-पिता तथा बड़ों से संवाद की जगह भी लेने लगी है। इसलिए इस आभासी युग में अभिभावकों को पहले से कहीं अधिक सचेत, संवेदनशील और संवादशील होने की जरूरत है।

रात के दस बज चुके हैं। माँ कमरे का दरवाजा खोलती है। बेटा अँधेरे कमरे में बिस्तर पर लेटा है। उसके चेहरे पर मोबाइल की नीली रोशनी पड़ रही है और उँगलियाँ स्क्रीन पर तेजी से चल रही हैं। माँ कहती है— “बहुत देर हो गई है बेटा, अब फोन रख दो।” जवाब आता है— “बस पाँच मिनट और…” यह ‘पाँच मिनट’ आज न जाने कितने घरों की कहानी बन चुका है।

कभी बच्चे दादी-नानी की कहानियाँ सुनते-सुनते सोते थे। आज कई बच्चे स्क्रीन देखते-देखते सो रहे हैं। कभी शाम होते ही आवाज आती थी— “माँ, मैं खेलने जा रहा हूँ।” आज कई घरों में माँ को कहना पड़ता है— “बेटा, थोड़ी देर बाहर खेल आओ।” समय बदल गया है। प्रश्न यह है— क्या हमारी परवरिश भी समय के साथ बदली है?

एक बच्चा कमरे में है, लेकिन उसकी दुनिया कमरे से बाहर है

पहले माता-पिता पूछते थे— बच्चा कहाँ गया है, किसके साथ खेल रहा है और कब लौटेगा? आज बच्चा हमारे सामने बैठा हो सकता है, फिर भी हमें पता नहीं कि वह डिजिटल दुनिया में कहाँ है। वह किससे बात कर रहा है? कौन उसे प्रभावित कर रहा है? कौन-सा वीडियो बार-बार उसके सामने आ रहा है? किसकी चमकती जिंदगी देखकर वह अपनी वास्तविक जिंदगी को छोटा समझने लगा है?

आज बच्चों को केवल अच्छे और बुरे स्पर्श का अंतर समझाना पर्याप्त नहीं है; उन्हें अच्छे और बुरे डिजिटल संपर्क का अंतर भी समझाना होगा।

आँकड़े केवल संख्या नहीं, चेतावनी भी हैं

हाल के भारतीय अध्ययनों के आँकड़े इस विषय पर गंभीरता से सोचने का कारण देते हैं, हालाँकि अलग-अलग अध्ययनों के नमूने और पद्धतियाँ अलग होने के कारण इन्हें पूरे भारत के हर बच्चे पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। 2025 में Indian Pediatrics में प्रकाशित 771 बच्चों के एक अध्ययन में औसत स्क्रीन टाइम लगभग 2.62 घंटे प्रतिदिन दर्ज किया गया। पश्चिम बंगाल के 777 स्कूली बच्चों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में दैनिक स्क्रीन एक्सपोजर का मध्य मान करीब सात घंटे पाया गया। उस अध्ययन में मनोरंजक स्क्रीन टाइम और कुछ व्यवहार तथा ध्यान संबंधी समस्याओं के बीच सांख्यिकीय संबंध भी देखा गया।

इन आँकड़ों का अर्थ यह नहीं कि मोबाइल ही हर समस्या का कारण है। लेकिन ये इतना जरूर बताते हैं कि स्क्रीन अब बच्चों के जीवन के किनारे पर नहीं, उसके बीचों-बीच आ चुकी है।

तकनीक दुश्मन नहीं है

मोबाइल या इंटरनेट को खलनायक बनाकर समस्या हल नहीं होगी। इंटरनेट बच्चे को ज्ञान के विशाल संसार तक पहुँचा सकता है। वह विज्ञान, भाषा, संगीत और कला सीख सकता है और AI की सहायता से कठिन विषयों को सरल भाषा में समझ सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि बच्चा कितनी देर स्क्रीन पर है; सवाल यह भी है कि वह क्या देख रहा है, क्यों देख रहा है और उसके व्यवहार पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है।

कहीं सुविधा के लिए हमने स्क्रीन को तीसरा अभिभावक तो नहीं बना दिया?

बच्चा खाना नहीं खा रहा— मोबाइल पर कार्टून लगा दिया। बच्चा रो रहा है— फोन पकड़ा दिया। माता-पिता व्यस्त हैं— “बेटा, थोड़ी देर गेम खेल लो।” उस क्षण मोबाइल राहत देता है, लेकिन बच्चा धीरे-धीरे सीख सकता है कि बोरियत, उदासी, खाना और खाली समय— हर स्थिति का समाधान स्क्रीन है। फिर कुछ वर्षों बाद जब वह फोन छोड़ना नहीं चाहता, तो हम पूछते हैं— “इसे फोन की इतनी आदत कैसे लग गई?” शायद उस प्रश्न का थोड़ा-सा उत्तर हमें अपने भीतर भी खोजना होगा।

बच्चा हमारी बात नहीं, हमारा व्यवहार पढ़ रहा है

एक पिता खाने की मेज पर बैठे हैं। एक हाथ से खाना खा रहे हैं और दूसरे हाथ से WhatsApp देख रहे हैं। सामने बच्चा YouTube देख रहा है। पिता कहते हैं— “फोन बंद करो! खाना खाते समय मोबाइल नहीं देखते।” बच्चा कुछ नहीं कहता; बस पिता के हाथ में पकड़े मोबाइल की ओर देखता है। उस एक नजर में पूरी कहानी छिपी है।

डिजिटल संस्कार भी किसी ऐप से पहले घर के वातावरण में बनते हैं। बच्चा यह देखता है कि हम भोजन के समय फोन कहाँ रखते हैं, बातचीत के बीच संदेश आने पर क्या करते हैं और परिवार को कितना निर्विघ्न समय देते हैं। इसलिए नियम केवल बच्चे के लिए नहीं, पूरे घर के लिए हों। सबसे प्रभावी parental control अक्सर फोन की setting नहीं, माता-पिता की अपनी digital habit होती है।

मोबाइल छीनने से पहले उसे अपना समय दीजिए

हम बच्चे से कहते हैं— “मोबाइल छोड़ो।” वह पूछता है— “फिर मैं क्या करूँ?” क्या हमारे पास इस प्रश्न का उत्तर है? क्या हम उसके साथ मैदान में जाते हैं? क्या घर में कहानी की किताबें हैं? क्या हम उसके साथ बैठकर बिना किसी उद्देश्य के केवल बातें करते हैं? क्या हमने उससे पूछा कि स्कूल में उसका दिन कैसा था— और उत्तर सुनने के लिए सचमुच समय भी दिया?

यदि वास्तविक दुनिया में बच्चे को केवल पढ़ाई, अंक, तुलना, डाँट और निर्देश मिलेंगे, जबकि डिजिटल दुनिया उसे रंग, संगीत, खेल, प्रशंसा और मनोरंजन देगी, तो वह किस दुनिया को चुनेगा? बच्चे को स्क्रीन से बाहर बुलाना है तो स्क्रीन के बाहर भी उसके लिए एक सुंदर दुनिया बनानी होगी। हर बोरियत का इलाज मोबाइल नहीं होता; कभी-कभी बोरियत ही कल्पना की पहली सीढ़ी होती है।

कभी मोबाइल नहीं, बच्चे का चेहरा पढ़िए

जब बच्चा अचानक बहुत अधिक ऑनलाइन रहने लगे, तो केवल यह मत पूछिए— “फोन कैसे छुड़ाएँ?” यह भी पूछिए— “मेरा बच्चा इस स्क्रीन में आखिर खोज क्या रहा है?” क्या वह अकेला है? क्या स्कूल में कोई समस्या है? क्या उसे लगता है कि घर में उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं? हर अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के पीछे भावनात्मक समस्या हो, यह जरूरी नहीं; लेकिन बातचीत हमें वह बता सकती है जो कोई screen-time report नहीं बता सकती। कभी बच्चे के हाथ से मोबाइल लेने के बजाय उसका हाथ पकड़कर देखिए। शायद उसे मोबाइल से अधिक आपकी जरूरत हो।

सबसे जरूरी पासवर्ड है— विश्वास

डिजिटल दुनिया में साइबर बुलिंग, फर्जी पहचान, अनुपयुक्त सामग्री, निजी तस्वीरों के दुरुपयोग, ऑनलाइन ठगी और अनजान लोगों से संपर्क जैसे खतरे वास्तविक हैं। उम्र के अनुसार निगरानी जरूरी है, लेकिन निगरानी से भी अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास। यदि बच्चे को लगे कि ऑनलाइन हुई गलती बताने पर केवल डाँट पड़ेगी और मोबाइल छिन जाएगा, तो वह समस्या छिपा सकता है।

कल्पना कीजिए कि किसी अनजान व्यक्ति ने आपके बच्चे को परेशान करने वाला संदेश भेजा है। उस समय सबसे महत्वपूर्ण क्या होगा— वह डरकर संदेश मिटा दे, या आपके पास आकर कहे, “मम्मी-पापा, मुझे कुछ बताना है…”? जिस घर में बच्चा बिना डर यह वाक्य बोल सकता है, वहाँ डिजिटल सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव पहले ही पड़ चुकी है।

AI उत्तर दे सकता है, संस्कार नहीं

AI बच्चों के लिए ज्ञान का असाधारण साधन हो सकता है। लेकिन यदि हर निबंध AI लिख रहा है, हर सवाल वही हल कर रहा है और हर विचार मशीन से मिल रहा है, तो प्रश्न उठता है— उत्तर तो मिल रहे हैं, लेकिन क्या बच्चा स्वयं सोचना सीख रहा है? AI जानकारी दे सकता है, पर करुणा, संवेदनशीलता, बड़ों का सम्मान, हार के बाद फिर उठने का साहस और किसी दुखी मित्र के कंधे पर हाथ रखने की समझ किसी ऐप से डाउनलोड नहीं की जा सकती। तकनीक ज्ञान दे सकती है; जीवन-मूल्य आज भी परिवार से आते हैं।

अब Parenting भी सीखनी होगी

हम बच्चे के लिए स्कूल, कोचिंग, खेल और संगीत की कक्षाएँ चुनते हैं। लेकिन बदलती दुनिया में माता-पिता बनने की शिक्षा हमें कहाँ मिलती है? आज parenting केवल अनुभव के भरोसे छोड़ देने वाला विषय नहीं रह गया है। डिजिटल सुरक्षा, मानसिक और भावनात्मक विकास, सोशल मीडिया, साइबर बुलिंग, गेमिंग, AI, संवाद और किशोरावस्था— इन सबकी बुनियादी समझ अभिभावकों के लिए भी आवश्यक होती जा रही है।

इसलिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर की शिक्षा व्यवस्था को Parenting Education को गंभीरता से अपने विमर्श में शामिल करना चाहिए। स्कूलों, शिक्षा बोर्डों, शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों और अभिभावक-शिक्षक मंचों के माध्यम से आयु-उपयुक्त Parenting Orientation Programme या Parenting Modules विकसित किए जा सकते हैं। इनका उद्देश्य माता-पिता की परीक्षा लेना नहीं, उन्हें सहयोग देना होना चाहिए। जिस तरह बदलते समय के साथ बच्चों का पाठ्यक्रम बदलता है, उसी तरह parenting की हमारी समझ को भी बदलना होगा।

हमें हर ऐप का विशेषज्ञ नहीं बनना है

तकनीक बदलती रहेगी। आज Instagram, YouTube, ऑनलाइन गेम और AI हैं; कल कोई नई तकनीक बच्चों की दुनिया बदल देगी। माता-पिता हर नई तकनीक को बच्चे से पहले समझें, यह संभव नहीं और जरूरी भी नहीं। हमें हर ऐप का विशेषज्ञ नहीं बनना है— हमें अपने बच्चे को समझना है।

कभी उसके पास अपना मोबाइल लेकर नहीं, अपना मोबाइल दूर रखकर बैठिए। उससे पूछिए कि आज उसका दिन कैसा था। उसका पसंदीदा गेम समझने की कोशिश कीजिए। उसकी ऑनलाइन दुनिया का मजाक मत उड़ाइए। उसकी बात बीच में काटे बिना सुनिए। क्योंकि कई बार बच्चे को सबसे महँगा फोन या सबसे तेज इंटरनेट नहीं, केवल यह एहसास चाहिए— “मेरे माता-पिता के पास मेरे लिए समय है।”

हमारी लड़ाई मोबाइल से नहीं है। हमारी चिंता उस बचपन को बचाने की है जिसमें मैदान की मिट्टी, किताबों की खुशबू, दोस्तों की हँसी, दादी-नानी की कहानी, माता-पिता का स्नेह और डिजिटल दुनिया की संभावनाएँ— सब साथ हों। हमें ऐसी पीढ़ी नहीं बनानी जो तकनीक से डरे; हमें ऐसी पीढ़ी बनानी है जो उसे समझे, उसका लाभ उठाए, लेकिन उसकी गुलाम न बने।

आज हमारा बच्चा एक छोटी-सी स्क्रीन से पूरी दुनिया से जुड़ा है। बस इतना ध्यान रहे कि पूरी दुनिया से जुड़ते-जुड़ते वह अपने घर, अपने लोगों और स्वयं से दूर न हो जाए। आज रात जब आपका बच्चा आपके पास बैठे, तो उससे मोबाइल रखने को कहने से पहले अपना मोबाइल रख दीजिए। फिर उसकी आँखों में देखकर पूछिए— “बेटा, आज तुम्हारा दिन कैसा था?” और इस बार केवल प्रश्न मत पूछिए— उसका उत्तर भी सुनिए। हो सकता है, वह बहुत दिनों से इसी बातचीत का इंतजार कर रहा हो।

चंचल कुमार सिंह
क्षेत्रीय निदेशक,
राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS),
क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता

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