सभ्यता वरदान नहीं
होती हमेशा
कभी कभी
बन जाती है
अभिशाप भी
वह नहीं सिखा पाती
हमें अपने मन के
घावों को धोना
झूठी हंसी ओढ़े
सीख लेता है आदमी
चुप रहकर दर्द ढोना
छद्म आवरण से
ढका शरीर लेकर
घूमते रहता है आदमी
इस सभ्य समाज में
इससे कहीं ज्यादा
महान होता है
आसमान का वह
भव्य खुलापन और
असभ्यता जहां
नहीं छुपाते लोग
स्वयं को इन आवरणों में
जीवन की रुक्षता में
सदियों तक सहेज कर
रखते चले जाते हैं
अपनी सरलता और
स्निग्धता को
यह नैसर्गिकता ही तो
इनकी थाती होती है
जिसे पीढ़ियों तक
हस्तांतरित करते
चले जाते हैं वे।