संपादकीय - तीन टेस्ट ट्यूब बेबी देश 3

पाकिस्तान और इज़राइल में एक बात समान है कि दोनों मुल्क एटमी ताक़तें हैं। मगर अन्य मामलों में बहुत अन्तर हैं। पाकिस्तान का क्षेत्रफल कोई 8,03,940 वर्ग किलोमीटर है, वहां की आबादी क़रीब 22 करोड़ है। शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा नहीं है। वहीं वर्तमान इज़राइल का क्षेत्रफल 20,700 वर्ग किलोमीटर है और आबादी है क़रीब नब्बे लाख। वहाँ शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है। वैसे आजतक विज्ञान के क्षेत्र में सबसे अधिक नोबल पुरस्कार यहूदियों को ही मिले हैं।

पाकिस्तान और वर्तमान इज़राइल दो ऐसे देश हैं जिनका जन्म किसी दूसरे देश की धरती को काट कर हुआ। यानि कि ये दो देश प्राकृतिक देश नहीं हैं… इन्हें पश्चिमी ताकतों द्वारा बनाया गया है।
14 अगस्त 1947 को ब्रिटेन द्वारा भारत को दो टुकड़ों में बांट दिया गया और पाकिस्तान का जन्म हुआ। पाकिस्तान स्वयं दो टुकड़ों में जुड़ा हुआ था – पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान। 1971 में पाकिस्तान का विभाजन हुआ और तीसरे टेस्ट ट्यूब बेबी देश का गठन हुआ जिसे बांग्लादेश कहा गया। 
ठीक इसी तरह 14 मई 1948 को फ़िलिस्तीन को दो हिस्सों में विभाजित करके वर्तमान इज़राइल का गठन किया गया। याद रहे कि इज़राइल या कहा जाए कि पूरे फ़िलिस्तीनी इलाके में इस्लाम के जन्म से पहले केवल यहूदी ही रहते थे। फिर असीरियाई लोगों ने आधी धरती पर कब्ज़ा कर लिया। यहूदियों को अपने मुल्क़ से निकाला रोमन एम्पायर ने। यहूदी बेघर कर दिये गये और वे पूरी दुनिया में बिखर गये। क़रीब दो हज़ार वर्षों बाद उनकी यह तमन्ना पूरी होने जा रही थी कि उनकी घर-वापसी होगी। 
यहूदी एक मामले में ख़ासे बदनसीब माने जा सकते हैं। उन पर लगातार ज़ुल्म होते रहे, चाहे देश उनका अपना हो या फिर जर्मनी। हिटलर ने तो उनकी पूरी नस्ल ही ख़त्म कर डाली। यह भी सच है कि ख़ानाबदोश जीवन जीने को अभिशप्त यहूदी जहाँ भी रहे उस मुल्क का हिस्सा बन कर रहे। मुंबई में भी बहुत से यहूदी मिल जाते हैं मगर वे इतने भारतीय लगते हैं कि उन्हें अलग से पहचानना मुश्किल हो जाता है। शायद विश्व में दो ही मज़हब ऐसे हैं जो धर्म-परिवर्तन को नहीं मानते। एक यहूदी और दूसरे पारसी। मगर दोनों ही क़ौमें बेहद प्रगतिशील और मेहनती होती हैं। पारसी तो शायद अब केवल भारत में ही पाए जाते हैं।
याद रहे कि यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के नबी एक ही हैं। वे सभी इब्राहिम की संतानें कहलाती हैं। यहूदियों में से ईसाई धर्म निकला और वहीं से पैदा हुआ इस्लाम। इसाई धर्म करीब दो हज़ार साल पुराना है तो इस्लाम करीब साढ़े चौदह सौ वर्ष पुराना। विडम्बना यह है कि जो लोग ईसाई धर्म एवं इस्लाम से पहले से वहाँ रहते थे, वे बेघर हो कर रहने को अभिशप्त हो गये। 
वैसे 14 अगस्त को पाकिस्तान भी यौमे-आज़ादी यानि कि स्वतंत्रता दिवस मनाता है। मगर समझ नहीं आता क्यों। प्रश्न यह उठता है कि पाकिस्तान ग़ुलाम कब था। जब एक देश ग़ुलाम था ही नहीं तो वो आज़ाद कैसे हुआ और किस से? तो फिर स्वतंत्रता दिवस काहे का? पाकिस्तान को तो अपना जन्मदिन मनाना चाहिये। भारत उससे अगले दिन यानि कि 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।
कुछ इसी तरह 14 मई को इज़राइल अपना जन्मदिन मनाता है। मगर 15 मई को फ़िलिस्तीन नक़बा दिवस यानि कि ‘विनाश दिवस’ मनाता है। यानि कि इसी दिन से उनके देश का बंटवारा करके उनके अस्तित्व को नकारा गया। फ़िलिस्तीनियों का मानना है कि जिस दिन से इज़राइल अस्तित्व में आया  उसी दिन से फ़िलिस्तीनियों पर अत्याचार और निर्ममता की शुरुआत हुई
इधर जब हम मुहम्मद अली जिन्ना और लॉर्ड माउण्टबेटन के बीच किये गये पत्राचार पर निगाह डालते हैं तो पाते हैं कि जिन्ना साहब ने माँग रखी थी कि ‘अंग्रेज़ों ने भारत की सत्ता मुसलमानों से ली थी, तो उन्हें ही वापिस भी करनी चाहिये।’ मगर ऐसा न करके अंग्रेज़ों ने पाकिस्तान नाम का एक नया मुल्क ही खड़ा कर दिया।
पाकिस्तान और इज़राइल में एक बात समान है कि दोनों मुल्क़ एटमी ताक़तें हैं। मगर अन्य मामलों में बहुत अन्तर हैं। पाकिस्तान का क्षेत्रफल कोई 8,03,940 वर्ग किलोमीटर है, वहां की आबादी क़रीब 22 करोड़ है। शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा नहीं है। वहीं वर्तमान इज़राइल का क्षेत्रफल 20,700 वर्ग किलोमीटर है और आबादी है क़रीब नब्बे लाख। वहाँ शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है। वैसे आजतक विज्ञान के क्षेत्र में सबसे अधिक नोबल पुरस्कार यहूदियों को ही मिले हैं। 
पाकिस्तान का राज्य धर्म इस्लाम है और वहां मुसलमानों की जनसंख्या का प्रतिशत है 96% जबकि बाकी 4% में हिन्दू, सिख, ईसाई और अन्य धर्मों के लोग आते हैं। वहीं इज़राइल में क़रीब 76% यहूदी, 19% अरब व बाक़ी 5% में अन्य अल्पसंख्यक आते हैं। 
पाकिस्तान जिस नीति को अपने लिये सही मानता है, वही इज़राइल के लिये ग़लत मानता है। 1947 में जब पाकिस्तान का गठन हुआ उस समय कश्मीर को एक स्वतंत्र देश का दर्जा दिया गया था। पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण करके उसके एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा बना लिया और आजतक बाक़ी हिस्से के लिये जिहाद कर रहा है। जबकि इसी बात के लिये वह इज़राइल की आलोचना कर रहा है कि बल के ज़रिये इज़राइल फ़िलिस्तीनियों के इलाक़े पर कब्ज़ा जमा रहा है। यह दोगली नीति आसानी से समझ आने वाली है नहीं। 
उधर पाकिस्तान की संसद में भी ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान दिये जा रहे हैं।  जमात-ए-इस्लामी के मौलाना अब्दुल अकबर चित्राली ने तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख से यही पूछ डाला, सात लाख की मज़बूत सेना का फायदा ही क्या है अगर वह फिलिस्तीन और कश्मीर को आज़ादी नहीं दिला सकती? क्या परमाणु बम सिर्फ म्यूज़ियम में सजाने के लिए बनाए गए थे? इसी तरह, जमात उलेमा इस्लाम के मुफ्ती अब्दुल शकूर को पूरा यकीन है कि पाकिस्तान कुछ ही मिनटों में इज़रायल को तबाह करने की क्षमता रखता है।
पाकिस्तान की सत्तारूड़ पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की एक सांसद अस्मा कादिर ने स्पीकर से जिहाद के लिए उनका नाम दर्ज करने तक की गुहार ही लगा डाली। उनका मानना है कि अब पाकिस्तान के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है। उन्होंने इज़रायल का साथ देने के लिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को महिलाओं और मानवता के नाम पर एक कलंक बताया।
यह तो अच्छा है कि इज़राइल और हमास के बीच युद्ध विराम घोषित हो गया है। इस मामले में इस्लामिक संस्था ओ.आई.सी. ने ख़ासा परिपक्व रवैया अपनाया है। 21वीं सदी में युद्ध किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। जो भी समस्या हो उसका हल बातचीत के ज़रिये ही निकाला जा सकता है। उम्मीद भी यही की जा रही है कि अंततः बातचीत से कोई हल निकलेगा।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

7 टिप्पणी

  1. सम्पादकीय में कई तत्व चौकाने वाले हैं, लेख में उल्लेखनीय यह है कि कौन सा धर्म किस मूल धर्म से हुआ ।तीसरे टेस्टट्यूब बेबी देश की अवधारणा, कमाल की है।यहूदियों का दर्द और पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस को जन्म दिवस परिभाषित करने का विचार मौलिक है।
    Prabha mishra

  2. तथ्यात्मक और विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए भाई तेजेंद्र शर्मा जी को हार्दिक बधाई।

  3. सम्पादकीय में अनेक तथ्यात्मक तत्त्वों ने पाठक को चमत्कृत कर दिया है। शीर्षक ही इतना रोचक है कि हम पढ़े बिना नहीं रह सकते। कई नई जानकारियाँ भी मिलीं।
    एक बात यह मन में उठ रही है कि यदि अँग्रेज़ भारत की सत्ता मुसलमानों को वापिस सौंप देते तो क्या देर सबेर भारत को मुस्लिम राष्ट्र न बना दिया जाता ? विद्वान् सम्पादक इस पर विचार-मंथन करने में सर्वथा सक्षम हैं। अस्तु। वह इस अनुपम सम्पादकीय के लिए सर्वथा बधाई के पात्र हैं।

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