पुस्तक : नेमत ख़ाना (उपन्यास), लेखक : ख़ालिद जावेद, उर्दू सेअनुवाद: ज़मान तारिक़, प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर, पृष्ठ संख्या 375, मूल्य : ₹500/- समीक्षा: मनीषा जैन
जब मैं ख़ालिद जावेद के उपन्यास ‘मौत की किताब’ से गुज़री तब मैंने जाना कि मौत के भी अनगिनत पहलू हो सकते हैं और एक साधारण व्यक्ति, जो कि मौत के नहीं, जीवन के विषय में ही सोचता है, लेकिन मौत की किताब का नायक लगातार मौत के विषय में, उसके विभिन्न पहलू, विभिन्न जिज्ञासाओं, अनेक मुखौटों व अनेक यूटोपिया के विभिन्न तंतुओं से लगातार दो-चार होता रहता है। जब ‘नेमत ख़ाना’ को पढ़ना शुरू किया तब पता चला कि यह इस उपन्यास का क्षितिज़ तो उससे कहीं ज्यादा विहंगम है, कहीं ज्यादा हिमालयन है, कहीं ज्यादा समुद्री है, कहीं ज्यादा दिशात्मक है। ख़ालिद जावेद के उपन्यासों के विषय में साहित्यकार उदयन वाजपेयी कहते हैं –“अंधेरे केवल तभी तक डरावने होते हैं जब तक उन पर ख़ालिद जैसे उपन्यासकार की क़लम की उजास न पड़ जाए। यह ख़्याल रहे कि इस उजास का स्रोत इन उपन्यासों की भाषा के अन्तस में कांपता अनूठा लेखकीय विवेक है।”(नेमत ख़ाना, पृष्ठ 20)
यह उपन्यास है उस बड़े होते बिना मां-बाप के बच्चे के महाआख्यान का, साथ ही संयुक्त परिवार के बावर्चीख़ाने से जुड़ी हर उस वस्तु का, उन वस्तुओं का उस बच्चे से जुड़ाव का, जीवन के अनेक अनसुलझे पहलू तथा मानव जीवन की अनगिनत परतों का तथा उस बच्चे के दिमाग़ में उठती बैठती लहरों का और किसी भी व्यक्ति के मस्तिष्क के सोच के पहाड़, नदी, नालों का। यह उपन्यास मानव के जीवन में गुज़रने वाली महानदी की एब्सर्ड लहरों का आख़्र्यान है। आज जब मानव मस्तिष्क वाक़ई में एब्सर्ड हो चला है तब सोचने वाली बात है कि क्या सच में मानव मस्तिष्क एब्सर्ड तो नहीं है\ एब्सर्डनेस की अनेक अतुलनीय कल्पनालोक को बहुत विस्तार देते हुए लगता है कि यह सब इसी लोक में भी संभव है।
इस उपन्यास में लेखक का एब्सर्ड आसमान अनंत है बिलकुल ब्रह्मांड के अनदेखे रहस्यों की तरह और यह भी सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या हर व्यक्ति कल्पना के स्तर पर एब्सर्ड ही होता है\ बस लेखक ही उन्हें देख पाता है एक सामान्य व्यक्ति तो अपने जीवन के ताने-बाने को साधने में ही लगा रहता है। उदयन वाजपेयी लेखक की लिखावट के विषय में कहते हैं-“ख़ालिद पूरी शिद्दत से धागा-दर-धागा बुनते हैं और उनके अनेक आयाम खुद-ब-खुद उभरते चले आते हैं।”(पृष्ठ 18)
पहले नेमत ख़ाना पुस्तक के कुछ अंश पर गौर फ़रमाया जाए:
“एक ख़तरनाक किस्म की ईर्ष्या, जिसके अंदर एक घटिया किस्म की हिंसा छिपी थी। दूसरों को कष्ट पहुंचाने की एक विचित्र कामना अक्सर मेरे अंदर जन्म लेती रहती थी। जैसे बार-बार मेरा जी चाहता था कि अपने पास बैठे लोगों के जिस्म में कोई बारीक सी सूई चुभो दूं, या खाना पकाते हुए किसी व्यक्ति के खाने में चुपके से थूक दूं।”(पृष्ठ 78)
“कॉकरोच जो कभी नही मरता। कॉकरोच जिसमें ख़ून नहीं होता। कॉकरोच जो परमाणु युद्ध की तबाहियों के बाद भी ज़िंदा और सही-सलामत रहेगा। मैं एक ऐसे कॉकरोच को जानता हूं जो पत्थर की एक सिल से कुचले गए सर से निकले ख़ून और भेजे के रेशों को देखता है, फिर मुझे देखता है, मेरी ईमानदारी पर मुसकुराता है, मुझ पर हंसता है। मेरे कानों में उसकी हंसी की आवाज़ सलामत है। इस हंसी को सुनकर मैं एक वहशी घोड़े की तरह, भड़क-भड़क कर सड़कों पर आवारागर्दी करता हूं।”(पृष्ठ- 257)
“आख़िरकार, मिट्टी में धंसे अपने बाएं पैर को वहीं छोड़ते हुए, अपने पेट की आंतों को दोनों हाथों से संभालता हुआ, एक ही पैर पर चलता या हास्यास्पद अंदाज में कूदता हुआ, बेरहम अजनबी हवा और बे-आवाज़ बारिश को अपने पीछे छोड़ता हुआ, वह भी बावर्चीख़ाने में आ गया और एक ख़ाली कोने में, दीवार से लगकर, अपनी पटली पर बैठकर, सर झुकाकर, तामचीनी की प्लेट में अपने हिस्से की हलवा-रोटी खाने लगा।”(पृष्ठ 375)
इस उपन्यास में एक परिवार में रह रहे एक लड़के के जीवन का विहंगम आख्यान है। जिसके हाथों नेमतख़ाने में ही एक गंभीर अपराध हो जाता है। जिसके बोझ तले वह जीवन भर घुटता रहता है और उसी घुटन में जीता हुआ भी असह्य हुई जिंदगी में लगातार अपराधों को स्वीकार करता है। उपन्यास की कहानी मनुष्य के अंत की वीभत्सता को रेखांकित करती है। उपन्यास का मूल तत्त्व जीवन की विभीषिका, विषम परतों तथा एब्सर्ड हादसों को दर्शाना है, जो मानव के जीवन में अकसर घटित होते रहते हैं।
उपन्यास का नायक शायद सदमे में, अनजाने में, कुछ जान बूझकर कितने ही अपराधी कृत्य कर डालता है। यह उसकी पूरी जिन्दगी में मनुष्यत्व के अवसान का कथ्य है। मनुष्यता के विध्वंस या कहें नायक के स्वयं के जीवन के ध्वंस की कथा पूरी मानव जाति के ध्वंस की गाथा है। जो नायक के स्वयं की आंखों व हाथों से किया गया व जीया गया एक विकृत जीवन, जो नायक को जीवन के अंत तक दुख ही दुख प्रदान करता है और नायक शायद स्वयं के विकृत कृत्यों से दुबारा से साक्षात्कार करता है जिससे शायद वह फिर से कोई सुंदर जीवन पा सके। उपन्यास का नायक एब्सर्ड जिन्दगी जी कर आत्म-घृणा में सनी यातना को झेलकर जीवन में पायी यातना से मुक्ति की याचना करता सा प्रतीत होता है-“हर आदमी को एक न एक दिन अपने जैसे लोगों से जाकर मिलना होता है। इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि वो उसे पहचान भी पाएंगे या नहीं। क्या दोबारा जिंदा होना इसी को कहते हैं या यह कोई दूसरी मौत है या मौत की अदालत में एक मुकद्दमा, इंसान की आंतों पर दायर किया गया। कभी न ख़त्म होने वाला असीम और अनंत मुकद्दमा\”(पृष्ठ 375) नायक एक एब्सर्ड जीवन जीकर एक एब्सर्ड मौत पाकर उससे मोक्ष पाना चाहता है शायद इसलिए क्योंकि यदि मनुष्य पश्चाताप की अग्नि में जलकर ही मुक्ति प्राप्त करता है।
उपन्यास में मृत्यु के पहले का सन्नाटा नायक को मृत्यु के बाद तक भी सुनायी देता है-“कमीज़ का नीला कॉलर हवा में बुरी तरह, फड़फड़ाने लगा मगर उस पर बैठा हुआ कॉकरोच टस से मस न हुआ। उसे याद आया, बहुत पहले शायद किसी और जन्म में उसने एक उजाड़ आँखों वाली लड़की के साथ ऐसी ही किसी नदी के किनारे पर बैठकर, ऐसी ही हवा में पनीर के कुछ टुकड़े खाए थे जिनका मज़ा उस कीचड़ के जैसा था। तब वह रोया था, शायद उन उजाड़ ऑखों पर रोया था।”(पृष्ठ 363) जैसे कि वह अपनी मृत्यु के बाद भी सब कुछ देखने के लिए कोई तीसरी आँख रखता हो। उपन्यास में मानवीय संवेदनाओं के इतने महीन क़तरे दिखायी देते हैं, जो कि साधारण मानव के समझ से परे की बात हो।
यह उपन्यास मानव जीवन के अकेलेपन, मानसिक एकान्तवास, एब्सर्डीटी, मानसिक असंतुलन के तंतुओं का मिलाजुला कोरस है। यहां मानवीय मस्तिष्क में उठते ऊलजुलूल ख़्यालात का मजमा है। हर मानव इन ख़्यालों से रू-ब-रू होता है लेकिन दर्ज करने का माद्दा किसी में नहीं होता, लेकिन लेखक ने इनको विस्तृत पटल पर दर्ज़ कर अनगिनत लोगों की मानसिक स्थिति का चित्रण बड़ी ही आसानी से कर दिखाया है। शायद ख़ालिद जावेद ऐसे पहले कथाकार हैं जिन्होंने मनुष्य के जीवन के गुप्त, जुगुप्सुक पहलुओं को बड़ी ही आसानी से कागज़ पर उकेर दिया है। जिन सारी मानसिक व्यथा से आज तक के बहुत से लोग जीवन भर त्रस्त रहते हैं। इस तरह के प्रश्नों से शायद हर व्यक्ति के दिमाग़ में हर समय तैरते रहते हैं, लेकिन कोई भी इन प्रश्नों को चिन्हित ही नहीं कर पाता।
इस उपन्यास में मानवीय जीवन के अनगिनत पहलू जैसे संवेदनाएं, त्रस्तता, जीवन के प्रति रूखापन, जीवन की असंगता, मस्तिष्क का असंतुलन, वस्तुओं से शुरू होकर जीवन की एब्सर्डटी आदि उजागर हुए हैं, और वो भी एक संवेदना के स्तर पर तथा एक तटस्थता के साथ। जैसे कि कोई डॉक्टर सामने बैठकर किसी मनुष्य के दिमाग की शल्य चिकित्सा कर रहा हो।
लेखक का गद्य इतना सूक्ष्म है कि यदि किसी कमरे का चित्रण है तो उस कमरे में सुई कहाँ पर रखी है तो उसका भी बारीक चित्रण किया गया है बिलकुल निर्मल वर्मा के गद्य में हुआ करता है, उसी के समानांतर इस वर्णन में भी वही कमाल की मानसिक बुनावट का ताना-बाना बुनकर एक मस्तिष्क की रचना की गई है कि मानव का दिमाग कितना विचित्र, विषम, एब्सर्ड हो सकता है और होता भी है।
उपन्यास के एक-एक शब्द का क़तरा मृत्यु और जीवन की विडम्बनात्मक भयावहता का चित्रण करता हुआ जीवन की क्षणभंगुरता व असारता (वर्थलेस) का वर्णन करता है। ऐसा चित्रण ‘मौत की किताब’ के बाद इस उपन्यास में चित्रित है। उपन्यास किसी भी बिन्दू पर बोझिल न होकर एक तारतम्यता से सराबोर है। मानव मस्तिष्क हमेशा से यही सोचता है।(मैं भी हर समय यही सोचा करती हूं) कि मृत्यु के समय क्या होता होगा\ चूंकि मृत्यु के बाद मृत्यु से जस्ट पहले का वर्णन करने के लिए कोई ज़िंदा नहीं रहता कि मृत्यु के समय कैसा महसूस होता है\ लेकिन इसका उत्तर उपन्यास के अंत के चित्रण में किया है कि मानव का दिमाग़ उस समय विचित्र अवस्था में घूमता है जैसा कि उपन्यास के नायक का मस्तिष्क घूमता है। अंत में वह अपनी ही मृत्यु के बाद का चित्रण कुछ इस प्रकार करता है-“उसने महसूस नहीं किया कि मौत गुगली फेंककर सारे मूर्खों को चकमा देने में कामयाब हो चुकी थी और वह मैदान पर अचंभित मूर्खों की तरह खड़ा था। उसे अपनी मौत के बाद भी यह नहीं पता चल सका कि मौत किस सफाई से महारत और सलीके के साथ, इंसानों को हादसों, बीमारियों, तबाहियों और बुढ़ापे से बाहर खींचकर, अपने लिए चुन लेती है।”(नेमत ख़ाना, पृष्ठ 275)
उपन्यास की कहानी एक बच्चे गुड्डू के बचपने से शुरू होकर मौत के बाद भी चलती रहती है। जब दिमाग़ के तंतु आपस में उलझकर उलझन पैदा करते हैं तब एक अलग ही सिम्फनी पैदा होती है, जो एक आम इंसान समझ ही नहीं पाता और जब तक वह समझने लायक हो पाता है तब तक मौत उसे अपने आगोश में ले लेती है। उपन्यास का नायक भी मौत को अपनी ही आँखों से तथा आत्मा से इसी सिम्फनी को महसूस करता है। वह हर जगह होकर भी कहीं नहीं होता और हर जगह न होकर भी हर जगह होता है। उसका अस्तित्व कभी न मिटने वाली लकीर बन जाता है और नायक को फिर एक नई शुरूआत, नया सूरज, नई दिशा तथा दूर एक मस्जिद में अजान की आवाज़ सुनता हुआ वह फिर बावर्ची खाने में आ जाता है।
उपन्यास के नायक की कहानी बावर्चीखाने से शुरू होकर बावर्ची खाने में आने पर ही ख़त्म होकर एक नया सूरज उदय होने की ख़बर से होता है। एक सनातन, सतत् अल्लाहु अकबर(ईश्वर महान है) की ध्वनि के साथ जीवन के प्रारंभ का संकेत देता हुआ यह उपन्यास अपने बीज में बरगद के पेड़ की महिमा का आभास कराता है।

- समीक्षक – डॉ मनीषा जैन
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