Tuesday, September 8, 2026
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प्रेमचंद्र की कहानी मंत्र का नाट्य रूपांतरण-डॉ चंद्रशेखर तिवारी

 पात्र-परिचय
1. सूत्रधार : नाटक की भूमिका और सन्देश बताने के लिए।
2. डॉ. चड्ढा : एक प्रसिद्ध, घमण्डी और नियम-निष्ठ डॉक्टर।
3. बूढ़ा भगत : एक गरीब, सीधा-साधा ग्रामीण पिता।
4. कैलाश : डॉ. चड्ढा का इकलौता बेटा (युवा)।
5. मृणालिनी : कैलाश की सहेली/मित्र।
6. मित्र/पड़ोसी : बहुमुखी भूमिका (दोस्त और पड़ोसी दोनों का रोल एक विद्यार्थी कर सकता है)।
(सूत्रधार हाथ जोड़कर मंच के बीच में आता है।)

सूत्रधार : आदरणीय प्रधानाचार्य जी, पूजनीय शिक्षकगण और मेरे प्यारे सहपाठियों! आप सभी को सादर प्रणाम। आज हम हिन्दी साहित्य के महान् कथाकार मुंशी प्रेमचन्द जी की जयन्ती के पावन अवसर पर यहाँ एकत्रित हुए हैं। प्रेमचन्द जी की कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को एक गहरा आईना दिखाती हैं। आज हम उनकी एक बेहद लोकप्रिय और मार्मिक कहानी ‘मंत्र’ को एक नाटक के रूप में प्रस्तुत करने जा रहे हैं। यह कहानी है एक घमण्डी डॉक्टर की, जिसके लिए नियम और मनोरंजन किसी की जान से बढ़कर थे…. और एक गरीब, सीधे-साधे पिता की; जिसका सब कुछ छिन जाने के बाद भी उसकी इंसानियत नहीं मरी।

आइए देखते हैं कि कैसे एक गरीब की निःस्वार्थ सेवा, बड़े-से-बड़े अहंकारी का दिल पिघला देती है और उसे जीवन का असली ‘मंत्र’ सिखाती है। तो आइए, आनंद लेते हैं आज की इस प्रस्तुति का…..।
(सूत्रधार हाथ जोड़कर एक तरफ हट जाता है और दृश्य-1 शुरू होता है)

दृश्य- 1 : डॉक्टर का घमण्ड और गरीब की बेबसी
(मंच पर डॉ. चड्ढा हाथ में गोल्फ स्टिक लिए तैयार खड़े हैं। तभी फटे-पुराने कपड़ों में
बूढ़ा भगत अपने बीमार बच्चे को गोद में उठाए रोता हुआ आता है।)
भगत : (रोते हुए) डॉक्टर साहब! डॉक्टर साहब! दया कीजिए हुजूर। मेरे बच्चे को बचा लीजिए, इसकी तबीयत बहुत खराब है। बाबूजी, सात बच्चों में से यही एक बचा है।
डॉ. चड्ढा : (घड़ी देखते हुए रुखाई से) इस समय मैं मरीजों को नहीं देखता। यह मेरे खेलने का समय है। चलो, कल सुबह आना।
भगत : (पैरों पर गिरकर) सरकार! कल सुबह तक तो यह नहीं बचेगा। बस एक नज़र देख लीजिए। मैं गरीब हूँ, आपकी यह दया ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगा।
डॉ. चड्ढा : (पीछे हटते हुए) मैंने कह दिया न, नियम यानी नियम। मुझे देर हो रही है।
(डॉ. चड्ढा मुड़कर चले जाते हैं। भगत रोते हुए बच्चे को देखता है।)
सूत्रधार : उस रात, डॉ. चड्ढा के न देखने के कारण भगत का इकलौता बेटा शान्त हो गया। बूढ़े माता-पिता के जीवन का एकमात्र सहारा छिन गया, पर समय का चक्र कभी नहीं रुकता। आइए, देखते हैं कि आगे क्या होता है।

दृश्य 2 : कैलाश का जन्मदिन और सांप द्वारा कैलाश को डॅंसना
(कई साल बीत चुके हैं। कैलाश का जन्मदिन मनाया जा रहा है। दोस्त तालियाँ बजा रहे हैं।)
मित्र : जन्मदिन मुबारक हो कैलाश! अरे, आज तो हमें तुम्हारे पाले हुए सांपों को देखना है।
मृणालिनी : हाँ कैलाश, सुना है तुम्हारे पास बड़े जहरीले सांप हैं। हमें भी दिखाओ न!
कैलाश : (हँसते हुए) सांपों से डरना कैसा? मैं तो उनका मिजाज समझता हूँ। देखो, मेरे पास एक से बढ़कर एक जड़ी-बूटियाँ भी हैं। रुको, मैं तुम्हें सबसे जहरीला नाग दिखाता हूँ।
(कैलाश पिटारे से सांप निकालने का अभिनय करता है। अचानक वह चिल्लाता है।)
कैलाश : आऽऽह! इस नाग ने मेरी उंगली में काट लिया! (कैलाश फर्श पर गिर जाता है, दोस्त घबरा जाते हैं।)
मृणालिनी : (चीखते हुए) डॉक्टर साहब! डॉक्टर साहब! जल्दी आइए, कैलाश को सांप ने काट लिया है!
(डॉ. चड्ढा भागते हुए आते हैं, कैलाश की नब्ज टटोलते हैं।)
डॉ. चड्ढा : (घबराकर) अरे! इसका पूरा शरीर नीला पड़ रहा है। कोई झाड़-फूंक या मंत्र जानने वाले को बुलाओ, नहीं तो मेरा बच्चा नहीं बचेगा!

दृश्य 3 : भगत का अंतर्द्वंद्व और महानता
(मंच के एक कोने में बूढ़ा भगत बैठा है। तभी उसका एक पड़ोसी दौड़ता हुआ आता है।)
पड़ोसी : अरे भगत! सुना तुमने? शहर के बड़े डॉक्टर चड्ढा के इकलौते बेटे कैलाश को काले नाग ने डस लिया है। वह मरने की हालत में है!
भगत : (चौंक कर) क्या? डॉक्टर चड्ढा का बेटा? (कड़वाहट से हँसते हुए) अच्छा हुआ! भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। याद है जब मेरे बच्चे की तबीयत खराब थी, तो वह खेलने चले गए थे। आज उन्हें भी बेटे के जाने का दर्द पता चलेगा! मैं नहीं जाऊँगा।
पड़ोसी : हाँ भगत, मत जाओ। उन्होंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया था।
(पड़ोसी चला जाता है। भगत अकेला बैठता है, पर उसका मन बेचैन हो जाता है।)
भगत : (स्वयं से) नहीं….. मेरा पैर मुझे डॉक्टर के घर की तरफ क्यों खींच रहा है? वह भले ही निष्ठुर थे, पर मैं तो इंसान हूँ। एक पिता के सामने उसका बेटा दम तोड़ रहा हो, और मैं मंत्र जानते हुए भी चुप बैठूँ? नहीं, मेरा धर्म मुझे यह इजाजत नहीं देता। मुझे जाना
ही होगा!

दृश्य-4 : निःस्वार्थ सेवा और हृदय-परिवर्तन
(डॉ. चड्ढा के घर का दृश्य। कैलाश बेसुध पड़ा है, माँ-बाप रो रहे हैं। भगत हाथ में लोटा
और जड़ी-बूटी लिए प्रवेश करता है।)
भगत : बाबूजी! घबराइए मत। भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा। मुझे कैलाश को देखने दीजिए।

डॉ. चड्ढा : (रोते हुए) आओ भाई, जो करना है जल्दी करो। मेरा सब कुछ उजड़ रहा है।
भगत : (मंत्र पढ़ने का अभिनय करता है और पानी छिड़कता है) नारायण! दया करो….. नारायण!
(कुछ क्षणों के बाद कैलाश धीरे-धीरे आँखें खोलता है और उठकर बैठ जाता है।)
मृणालिनी : देखो! कैलाश होश में आ गया!
डॉ. चड्ढा : (कैलाश को गले लगाकर) मेरे बच्चे! तुम ठीक हो! (पीछे मुड़कर) अरे, वह देवदूत कहाँ गया जिसने मेरे बेटे को बचाया? भगत… भगत कहाँ हो तुम?
मित्र : डॉक्टर साहब, वह बूढ़ा आदमी तो जैसे ही कैलाश ठीक हुआ, चुपचाप अपना लोटा उठाकर चला गया। उसने कोई इनाम भी नहीं लिया।
डॉ. चड्ढा : (हाथ जोड़कर, आँखों में आँसू लिए) ओहो! मैं कितना अज्ञानी था। सालों पहले यही भगत अपने बीमार बच्चे को लेकर मेरे पास आया था, और मैंने अपने खेल के अहंकार
में उसे दुत्कार दिया था। आज उसी गरीब ने बिना किसी लालच के मेरे बेटे की जान
बचाकर मुझे इंसानियत का सबसे बड़ा ‘मंत्र’ सिखा दिया। मैं उसके पैरों में गिरकर माफी
माँगना चाहता हूँ।
(सभी पात्र एक साथ मंच पर आगे आते हैं।)
सूत्रधार : मुंशी प्रेमचन्द जी की यह कहानी हमें सिखाती है कि बुराई का बदला बुराई से नहीं, बल्कि भलाई से दिया जाना चाहिए। असली ‘मंत्र’ किसी जादू में नहीं; बल्कि इंसानियत, क्षमा और निःस्वार्थ सेवा में छिपा है। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
(नाटक समाप्त होता है और सभी पात्र झुककर दर्शकों को प्रणाम करते हैं और मंच से धीरे-धीरे प्रस्थान कर जाते हैं।)

नाट्य रूपान्तरकार डॉ० चन्द्रशेखर तिवारी
आदित्य बिड़ला इण्टरमीडिएट कॉलेज, रेणुसागर, सोनभद्र (उ०प्र०)-231218

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1 टिप्पणी

  1. रचना को स्थान देने के लिए हृदय से आभार सहित सादर अभिवादन सर।

    ‘प्रेमचंद’ का ‘प्रेमचंद्र’ हो जाना, पीड़ादायक है। चित्र का चयन (किसी भगत द्वारा बीमार को काढ़ा पिलाना) भी कहानी और नाट्य रूपांतरण से मैच न करने के कारण थोड़ा असहज महसूस करा रहा है।

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