“कहते हैं, समय हर घाव भर देता है, पर समय का दिया हुआ घाव हो, तब न! जब समय घाव देगा तो उसे दुरुस्त भी करेगा, लय में चलने वाले, शांत हृदयी समय को बार-बार नकारोगे, तो वह बदला तो लेगा ही, कहते हैं न! “जैसा करोगे वैसा भरोगे..!”
ये ब्रेकअप न…?
उदास बैठी है नैना! आँखों में भादों की बदरी भरे हुए, ब्रेकअप जो हो चुका है, उससे मैं जैसे ही कुछ बोलूँगी, पिछली बार की तरह भरभरा के बरस जाएगी और चाहेगी कि मैं उसकी सारी परेशानियाँ अपने आँचल में समेट लूँ। नौका-विहार वह करे और डूबूँ मैं! ये भी कोई बात है!!
फिर न मैं समंदर हूँ कि नदियों का जहाँ-तहाँ से समेट, ढोकर लाया कूड़ा कचरा, अपने कोख में भर लूँ और जल-जीव के ऊपर उलीच दूँ, मैं तो पहले से ही अपने नमक की वजह से बदनाम हूँ, अब क्या खट्टा भी हो जाऊँ। न! बाबा न! ऐसा कचरा लपेट के तो हम भी लपेटे में आ जाएँगे न!
नैना की उदासी कोई छोटी तो है नहीं, दो दिन हो गए, न कुछ खा रही, न बातें कर रही, न कहीं जाने को तैयार है, जब भी कुछ कहो उसकी एक ही बात! मुझे अकेला छोड़ दो! बस यही कहती है, बताओ भला! कोई अपनी क्लोज़ फ्रेंड को इतनी आसानी से छोड़ सकता है वह भी उसके ब्रेकअप के बाद। कितनी दुखी अवस्था में है वह? मैं तो नहीं ही छोड़ पाऊँगी किंतु लपेटूँगी भी नहीं उसकी गंदगी इस बार। उसका साथ भी न छोड़ेंगे और न साथ देंगे ही फिर अपना तो ज़मीर ही ऐसा है, झेले रहो! भाई झेले रहो! तब तक झेलो, जब तक झेल से तेल निकलकर खोपड़ी से चूने न लगे और जब ये झेल बहने लगे तो दूसरे मार्ग की तलाश तो करनी ही पड़ेगी।
नैना के इन ब्रेकअप्स के नाटकों से मैं अब पूरी तरह थक चुकी हूँ, न वो लड़को के जाल में फँसे न ये ब्रेकअप्स का झंझट झेले, कितनी बार समझाया है उसे? पर वो कहाँ मानने वाली? वो तो ब्रेकअप के कुछ ही दिनों बाद, अगले ब्रेकअप का इंतज़ाम ख़ुद ही करने लगती है।
किसी न किसी लड़के को अपने मत्थे मढ़ ही लेती है, इस ही बार देखो, मैंने उसे हज़ार बार मना किया था कि इस दो मुँहे के चक्कर में मत पड़ो, लेकिन महारानी को न मानना था तो न मानी! उस लफ़ंगे के चक्कर में ऐसी पड़ीं कि अब अपने जीवन का सातवाँ ब्रेकअप झेल रही हैं, कोई सुने तो विश्वास ही न हो कि किसी के इतने ब्रेकअप्स भी हो सकते हैं, पर मैंने तो ब्रेकअप से पंगा ले-ले रोते, उसे अपनी इन्हीं आँखों से देखा है।
नर्सरी से अब तक वो ख़ाली ही कब रही है? नर्सरी में भी बग़ल वाली सीट पर लड़के खोजा करती थी, क्यों न मुँह ही चिढ़ाना था उसे, पर चिढ़ाना लड़कों को ही था, अब बड़ी हुई तब से या तो ब्रेकअप या एक नया बॉयफ्रेंड, मतलब इधर ब्रेकअप उधर बॉयफ्रेंड.. इसको इतनी ज़ल्दी कोई लड़का मिल कैसे जाता है? मैं तो समझ ही नहीं पाती हूँ।
उस दिन नीला के साथ किसी लड़के को कैंटीन में बैठे देखा कि बस फिर क्या था? आकर कहने लगी, “देखो न! नीला का ब्वायफ्रेंड कितना अमीर है, चार दिन पहले तक वह १५ हज़ार का फ़ोन लिए घूम रही थी अब उसके हाथ में आई फ़ोन है, ये बात मुझसे कहने के अगले दिन ही बंदी, नीला के आसपास मँडराती दिखी, एक ख़तरनाक सा फ़ितूर लिए।
सिंहासन चढ़ना और उतरना उसकी फ़ितरत ही बन गई है, अब ये नया शौक़ लेकर आ गईं महरानी, अपनी सहेली के ही ब्वायफ़्रेंड को हथियाने का। मैंने उसको कुछ संदिग्ध चैट करते देखा, तो पूछ लिया। पूछते ही झट से बोली,
“देख न! मैं नीला के साथ वाले लड़के से जैसे ही मिली, वह नीला को छोड़ मुझपे ही मरने लगा, परसों से सुबह-शाम मैसेज कर रहा। मेरे पीछे ही पड़ गया है, सो मैंने भी दो बातें कर लीं। मैंने जब उससे बात की तो नीला को तो कोई एतराज नहीं लेकिन उसकी पुरानी फ़्रेंड्स की जान ही निकल गई। अब वे सब कल मुझे हॉस्टल के गेट पर मिलने को बोल रही हैं, देखना सबको कैसे सबक़ सिखाती हूँ?”
नैना ये कहानी गढ़े जा रही थी और मैं उसके ऊपर कुढ़े जा रही थी। क्या करूँ? “मेरे बचपन की सहेली है न। न तो उसे छोड़ पाती हूँ न समेट पाती हूँ, बर्फ में फँसे जीवाश्म की तरह, बर्फ पिघलने का इंतज़ार करती हूँ, जैसे ही धूप निकलती है तीव्र किरणें बर्फ़ को कोमल बनाती हैं, जब तक पिघलने कि प्रक्रिया शुरू हो, फिर रात बर्फ की चादर लेकर आ जाती है।”
आज तो खिड़की से आसमान झाँक कर मुझपे हँस रहा था, क्योंकि धूप का नामोनिशान नहीं था, पिघलने को कौन कहे, बर्फ मुलायम भी न हुई थी।
नैना की बातों का दौर कंचे की गोली की तरह कभी गुच्चू में चला जाता तो कभी दनदनाकर दूर भाग जाता। मैं जब तक अपनी बारी का इंतज़ार करती तब तक वह जाने कितने कँचे जीत लेती।
वह फिर मुझे छका रही थी, पर मैंने भी सोच लिया था कि इसे रंगे हाथों धर दबोचना है, मुझे बरगलाने के बाद बेटा जैसे ही हॉस्टल के गेट पर पहुँचीं कि धड़धड़ाकर दो स्कूटियाँ उसके सामने आकर खड़ी हो गईं और वह हक्का-बक्का इधर-उधर देखने लगी, मुझे अपने आस-पास न पाकर वह काफ़ी घबरा गई। मैं थोड़ी दूर नीम के दो मोटे पेड़ों के पीछे छुपकर सारा नज़ारा देख रही थी।
देखती क्या हूँ..? कि दोनों स्कूटियों से उतरीं चार लड़कियाँ, हाथ फैला-फैलाकर नैना के ऊपर चढ़ाई किए जा रही थीं नैना भी जवाब दे रही थी बराबर, पर ये क्या? अचानक वे चारों हाथापाई पर उतर आईं, झगड़ा बढ़ते देख, आख़िरकार मुझे जाना ही पड़ा।
आरोप-प्रत्यारोप का दौर अभी चल ही रहा था कि एकाएक एक लड़की नैना पे हमलावर होने लगी, नैना भी तेज़-तेज़ चिल्लाने लगी, शोर-शराबा सुन लड़कियों की काफ़ी भीड़ इकट्ठा हो गई। जान-पहचान की दो-चार लड़कियाँ, मेरी तरफ़ से भी आ गईं। बहुत देर तक गहमागहमी बनी रही अंत में समझौते पर ही बात बनती दिखी। उन लड़कियों ने नीला के ब्वायफ़्रेंड के साथ नैना की, लव यू-लव यू चैटिंग तथा ग़लबाहियाँ किए हुए फ़ोटो दिखाई और हम लोगों के सामने अपना पक्ष रखते हुए आक्रोश प्रकट किया, नीला को बुलाया गया, उसके सामने सारी बात क्लीयर हुई। हम सबके दबाव पर नैना ने उससे माफ़ी माँगी, तब जाकर मामला थोड़ा शांत हुआ।
मैं एक दायरे के अधीन जीवन जीने की आदी हूँ, देखा जाय तो नैना के ऐसे अनगिनत क़िस्से मुझे रोमांचित भी करते रहते हैं, आख़िर मेरी हमउम्र है वह, कभी-कभी तो उसके दायरे को महसूस करके लगता है कि वृहद दायरे समय पर अवश्य भारी होते हैं, पर हल्के होकर भी मनुष्य क्या पाता है? समय की प्रताड़ना ही तो।… काश कि मैं भी उसकी तरह उम्र को जी पाती।
देखो न! जैसे-जैसे समय बीत रहा है, नैना भी बीत रही है, पहले उसे कोई भी, कैसा भी चल जाता था? बस उसके खर्चे चलाता रहे, पर धीरे-धीरे वह चूज़ी हो रही है, इधर मैंने नोटिस किया है कि अब कुछ दिनों से उसे ज़्यादा भीड़ नहीं लगानी, ले दे के दो तीन लड़कों से ही दोस्ती करनी है, पर वे ऐसे हों, जिनके रहते उसे अपने पर्स में हाथ न डालना पड़े, वह साथ जाए, मौज करे, खाए-पिए, कोई टोका-टाकी नहीं, सब अपने मनमुताबिक।
डिबेट कॉम्पीटिशन में सेकंड आने पर, उस दिन उसके ऑफर पर पहली बार, जब हम चाय पीने गए तो उसके दोस्त भी साथ थे। चाय के साथ एक-एक पनीर रोल भी ले लिया सबने। उसने ख़ुद से ही कहा था कि आज चाय वह पिलाएगी, हम सबके रोल लेते ही वह कैसे उछलने लगी थी? उस समय तो ऐसा लग रहा था कि वह जैसे ही पेमेंट करेगी, बिल्कुल पागल हो जाएगी और हमें उसे पागलखाने ले जाना पड़ेगा, नहीं तो हम लोगों के ऊपर सीधे चढ़ाई कर देगी कि हिसाब से ऑर्डर किया करो। खैर! उसका उखड़ता मूड देखकर, पेमेंट मैंने ही कर दिया था। नहीं तो बाबा रे बाबा! मेरा पूरा भेजा ही खा जाती कि रोल का नाम तुमने लिया ही क्यों था?
छोड़ो! उस दिन तो हम उसे पागलख़ाने भेजने से बच गए थे, परंतु रास्ते में कॉलेज की दो लड़कियाँ मिल गईं और वे नैना के एक दोस्त की परिचित थीं, इसलिए हमसे बातें करनें लगीं, उसी बीच वह मेरी तरफ़ देख-देख, चुप-चुप इशारे करने लगी कि इन लोगों से बात बंद करो। वह अपने दोस्त को लेकर बहुत इंसिक्योर हो रही थी। बातचीत के दौरान अचानक उन लोगों के बीच में मैं कैसे कूद पड़ूँ। मेरा कोई रिएक्शन न देख, उसने मुझे फ़ोन पर मैसेज किया कि “यहाँ से चलो ज़ल्दी। तुम क्यों रुकी हो उन लोगों के पास?”
मैंने मैसेज पढ़ा लेकिन कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया तो अचानक ख़ुद ही उन लोगों के बीच घुसते हुए बोली, जिसको चलना हो चले यहाँ से, जिसको रुकना हो वह लड़ाए गप्प! उसकी उस हरकत पर, हम सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे, अंततः हम वहाँ से निकल लिए, डर था कि कहीं वह वहाँ सबसे झगड़ न बैठे। इस बात को लेकर उसने हॉस्टल पहुँचकर भी लफड़ा किया। मैंने बहुत सफ़ाई दी पर वह नहीं समझी। आख़िरकार मैं ही चुप हो गई। उसके बाद भी वह दो बजे रात तक मुझसे लड़ती रही, मुझपे बहुत गुस्सा किया और मुझसे मुँह फुलाकर बैठ गई, अब मुँह फुला तो ली परंतु मन ही मन मेरी राह भी देखती रही कि मैं उसे गले लगा-लगा समझाऊँ। उसे मनाने की मेरी आदत जो पड़ी थी लेकिन भाई उस दिन मैंने उसको बिल्कुल भी नहीं मनाया।
अब मेरे लिए भी… “वह कहे तो हाँ! वह कहे तो न!” इस फ़ार्मूले पर चलना मुश्किल हो रहा था, भला मैं कितने दिनों तक उसका साथ दे पाऊँगी। मेरे व्यवहार में हो रहे परिवर्तन को शायद वह भी महसूस कर रही थी, क्योंकि उसने सुबह उठते ही ऐलान कर दिया कि आज शाम वह अपने दोस्तों के साथ डिनर पर जाएगी “तुम चलना चाहो तो चल सकती हो… फिलहाल तुम्हारा जाना, तुम्हारी मर्ज़ी।”
ऐलान तो मैंने सुन लिया था लेकिन उस पर अमल नहीं करना चाहती थी मैं, कारण बस वही था कि उसके साथ चली तो जाऊँगी, लेकिन वहाँ क्या माहौल होगा मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था। शंका और सच्चाई के बीच झूलता मेरा मन आख़िकार उसके साथ न जाने का प्रण ले चुका था। उस प्रण को तब और बल मिला जब उसके जाने के आधे घंटे बाद ही, माँ का फ़ोन घनघनाया, वे उधर से हड़बड़ाई हुई हेलो-हेलो चिल्ला रही थी। उन्होंने मेरे फ़ोन रिसीव करते ही, मेरे ऊपर प्रश्नों की बौछार कर दी, वे मुझे उल्टा-सीधा कहती जा रही थीं उनके कहन में ये शिकायत थी कि घर से दूर आकर मैं अपने मन का हो रही हूँ।
हुआ क्या है? ये बिना बताए वे डाँटे पड़ी थीं और मैं… सुनो तो माँ … सुनो तोऽ .. हुआ क्या आख़िर? मैं बार-बार पूछ रही थी लेकिन वे अपनी बात कहने के आगे मेरी कोई बात सुन ही नहीं रही थीं .. मुझे बस उनकी एक ही पंक्ति सुनाई दे रही थी,
“जल्दी से बिस्तर बाँधो और घर आओ, बहुत जल्दी पैकिंग करो और हमें इन्फॉर्म करो हम तत्काल में तुम्हारा टिकट करवा दे रहे हैं यहाँ से!”
मैं इधर से, “क्यों आख़िर क्यों? ऐसी भी क्या आफ़त है? क्या हो गया? सब ठीक तो है, पापा कहाँ हैं?”
लेकिन मम्मी बस एक ही बात दोहराती जा रही थीं कि “बहुत हो गया पढ़ाई-लिखाई अब कुछ हमारे साथ भी रहो आकर।”
“लेकिन बात तो बताओगी आप! मुझसे कोई गलती हुई हो तो वह बात तो जानने का हक है मेरा, आख़िर एग्ज़ाम होने के एक महीना इतनी इमर्जेंसी में पहले, मैं इस तरह कैसे आ सकती हूँ?”
मेरा इतना कहना था कि वे और तेज़ से फट पड़ीं… “तुम आजकल किसके साथ अपना ताल मिला रही हो, उस नैना से तुम्हारा क्या लफड़ा हो गया अच्छा-ख़ासा उसके साथ चल रहा था, अब कहाँ और किसके साथ लगी हुई हो? तुम्हें क्या लगता है? कि मुझे कुछ पता नहीं है, अरे यहाँ बैठे-बैठे मुझे तुम्हारी सारी ख़बर है। आज ही पता चला कि अब तुम नैना के साथ के बजाय, किसी और के साथ बाहर जाती हो, घूमती रहती हो।”
“अरे! अरे! ये क्या?” कुछ मेरी भी सुनेंगी या कुछ भी…” मेरा इतना कहना था कि
माँ और हाइपर हो गईं…
“मुझे कुछ भी नहीं सुनना, बस अब तुम घर आ जाओ तभी बात होगी। ऐसी पढ़ाई-लिखाई से बेहतर है अपने घर में रहो। हम तुम्हें यहीं से ग्रेजुएशन करवा देंगे।”
मैंने माँ को कभी भी इस तरह एक ही टोन में बोलते कभी नहीं सुना था। लेकिन आज नैना ने मेरे ख़िलाफ़ अवश्य कुछ ऐसा कान भरा था उनका कि वे बुरी तरह उखड़ी हुई थीं। अभी तक तो मैंने उनका हर कहा बर्दाश्त कर लिया था लेकिन अब तो मेरे धैर्य की सीमा ही टूट रही थी, मैं भी अचानक से रोष में आ गई और तेज़ आवाज़ में बोलने लगी…
“माँ आप कुछ मेरा भी सुनेंगी कि नैना जैसी बदतमीज़ की बातों में आकर मुझे जो पाएँगी वही कहती चली जाएँगी, आज तक मैंने आपको उसकी कोई बदतमीज़ी बताई ही नहीं है, जिस दिन आप उसकी बदतमीजियाँ सुन लेंगी आप एक दिन भी मुझे उसके साथ नहीं रखेंगी, माँ वह बहुत बदतमीज़ और बिगड़ी हुई है यहाँ आकर मुझे पता चल रहा है, वहाँ अपने शहर में वह केवल स्कूल फ्रेंड थी लेकिन यहाँ तो वह मेरी रूमेट है, मुझे उसकी हर हरकत पता चल जा रही है, आप समझो वह बहुत बड़े घर की बिगड़ी हुई लड़की है, हर किसी से झगड़ पड़ती है, आप चाहती हो कि मैं उसके हर झगड़े में शामिल हो जाऊँ, और लफड़े में फंस जाऊँ। उसकी बहुत सारी गंदी आदतों की वजह से मैं धीरे-धीरे उसका साथ कम कर रही हूँ।
मैं यहाँ बहुत मुश्किल से आई हूँ माँ! मैं अपने आप सीख जाऊँगी अपनी परिस्थितियों से लड़ना। मुझे इंडिपेंडेंट होने दो। समझने दो। आते समय आप ही ने तो कहा था कि “बाहर अच्छे-बुरे सब मिलेंगे बस तुम्हें संभल के रहना है, गंभीरता से विचार करना जो तुम्हारा मन कहे कि ये ठीक है, सही है वह अपना लेना और जो नकार दे वह वहीं छोड़ देना… गंभीर परिस्थिति में सबसे अच्छा मित्र सच्चा मन ही होता है।”
“माँ… मैं आपकी दी हुई शिक्षा, नैना जैसे लोगों के लिए नहीं छोड़ सकती।”
मेरी बात सुनकर माँ ने कुछ कहा तो नहीं पर थोड़ा शांत हो गई थीं और बाय कहते हुए फ़ोन रख दिया था।
मैं माँ के बदौलत ही बाहर पढ़ने आई थी पापा तो वैसे भी अपने होमटाउन में ही पढ़ाना चाह रहे थे। आते समय से आज तलक माँ ने मुझे जो भी हिदायतें दी थीं, मैंने लगभग उनकी हर बात मानी थी। बाहर जाकर लड़कियाँ बहुत बिगड़ जाती हैं, इस बात को लेकर माँ बहुत गंभीर थीं लगभग हर दिन वे मुझे इस बात की हिदायत देती थीं “कि संभलकर रहना, सोच-समझकर दोस्ती करना, बाहर जाते वक्त देख लेना कि साथ जाने वालों की आदतें कैसी हैं? बाहर कोई कुछ भी खाने-पीने को दे तो खा-पी मत लेना, लोग नशा मिला देते हैं। बहरहाल माँ मुझे लेकर पहले से ही बहुत कंसर्न थीं, और अब नैना की लगाई-बुझाई।
जहाँ मेरे घर से दिन में तीन बार फ़ोन आता था वहीं नैना के घर से ऐसा कोई भी फ़ोन नहीं आता था जो उसकी दिनचर्या पूछे। बस वही वीकेंड पर एक फ़ोन उसकी माँ का आ जाता था, उसके घर में सबके सब वर्किंग होने के साथ-साथ पैसे वाले थे। देर रात पार्टी और मस्ती करने वाले लोग। सबके सब अपने में जीने वाले। जबकि मेरे घर का माहौल बिलकुल घरेलू और आम उत्तर भारतीय लोगों वाला ही था।
मैंने महसूस किया था कि कभी-कभी वह इन बातों की लेकर काफ़ी ख़ालीपन महसूस करती थी, शुरू-शुरू में एक दिन उसके मुँह निकल ही गया था कि “यार तुम्हारी माँ तुम्हारा कितना ख्याल रखती है। हर दिन बात करती है।”
मैंने तो उस बात को हँसी में टाल दिया था लेकिन अब महसूस हो रहा कि उसे मुझसे इस बात को लेकर भी जलन थी तभी तो माँ से मेरी इतनी शिकायत और चुग़ली कर दी। आख़िर उसे क्या पड़ी थी मेरी माँ से बात करने की? हंड्रेड परसेंट वह सनक गई है।
माँ से शिकायत चेंपने के बाद महारानी पार्टी करके रात १० बजे लौटीं और लौटते ही मेरे कंधे से लगकर दहाड़ मार-मार रोने लगीं, मैं जब तक कुछ समझ पाती तब तक उसकी एक दोस्त रिजुल का फ़ोन आ गया, वह उधर से घबराई हुई चिल्ला रही थी… “यार सँभाल लेना कैफे में तो आज बहुत गड़बड़ हो गई है, देखो आगे क्या होता है? नैना को गेट पर उतारते हुए मैं अपने घर आ गई हूँ, वह ठीक स्थिति में नहीं है।”
“क्यों क्या हुआ? मैंने अति उत्सुक होते हुए उससे अभी पूछा ही था कि वह धीरे से बुदबुदाई… “यार पता नहीं किसी अन्नोन न. से बार बार फ़ोन आ रहा, अभी बात करती हूँ।”
रिजुल का फोन कटते ही, मैंने नैना को झिंझोड़ते हुए पूछा कि “क्या हुआ? तुम लोग कहाँ गए थे, साथ में कौन-कौन था?”
अभी मैं उससे पूछना प्रारम्भ ही कर रही थी कि उसके फ़ोन पर भी अन्नोन न. से फ़ोन आने लगे। सिसकते हुए उसने फ़ोन मेरी तरफ़ किया, जिसमें पुलिस का साइन दिख रहा था, वह अब और ज़ोर से सिसक रही थी, डर के मारे थर-थर काँप भी रही थी।काँपते-काँपते बिस्तर पर लुढ़क गई, वह तो लुढ़क गई लेकिन उसका फ़ोन बराबर घनघनाता रहा, मैंने देखा कि रिजुल का नाम चमक रहा था, मैंने जैसे ही फ़ोन उठाया उधर से कोई बहुत तेज़ आवाज़ में बोला, “ तुम नैना बोल रही हो।”
“नहीं मैं नैना नहीं उसकी दोस्त बोल रही हूँ, कहाँ है वह? उसे फ़ोन दो।”
“वह तो सो गई है।”
“उसे जगाओ, हम पहुँच रहे हैं, उसको भगाने की कोशिश मत करना वरना तुम ज़िम्मेदार होगी।”
मैंने कहा “आप कौन?”
“मैं थाने का इंस्पेक्टर बोल रहा हूँ, इन लोगों ने कैफ़े में जो कांड किया है, उसी के बाबत बात करनी है, मैं अभी थोड़ी देर में हॉस्टल पहुँच रहा हूँ, उसे रोक कर रखना।”
मैं नैना को झिंझोड़-झिंझोड़ उठा रही थी और वह बार-बार लुढ़क रही थी, वह अभी जग भी नहीं पाई थी कि हॉस्टल के चौकीदार का फ़ोन आ गया कि आप और नैना दोनों लोग वेटिंग रूम में अति शीघ्र पहुँचें। यहाँ पुलिस आई हुई है, इधर पुलिस के नाम से मैं बुरी तरह काँप रही थी उधर चौकीदार का बार-बार फ़ोन, ऊपर से नैना जगाए जग ही नहीं रही थी, मैंने चौकीदार को बोला कि वह बहुत नींद में है, मैं उसे नहीं ला पा रही, मैं अकेले ही आ रही हूँ।”
फ़ोन पर बात करते-करते मैं गेट की तरफ़ चल दी और वहाँ पहुँचकर मैंने देखा हमारी वॉर्डन पहले से ही मौज़ूद थीं और उनके सामने पुलिस इंस्पेक्टर सीट पर बैठा उल्टे-सीधे प्रश्न करते हुए उनकी बेइज़्ज़ती सी कर रहा था। मुझे देखते ही वॉर्डन ने मेरी तरफ़ लगभग घूरते हुए हैरानी से ऐसे देखा कि मैं पानी-पानी हो गई…
इंस्पेक्टर अपनी बात दोहरा रहा था कि
“आपके हॉस्टल का क्या अनुशासन है? लड़कियाँ रात १०-१० बजे तक बाहर रहती हैं और नशा करके आती हैं, उठने की ताकत नहीं बचती। बताइए ऐसे कैसे रखते हैं आप उन्हें यहाँ?”
वॉर्डन चुपचाप शांत बैठी थीं, मुझे देखते ही इंस्पेक्टर ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी, मैंने उन्हें आराम से बताया कि वह मेरे बचपन की सहेली और स्कूल मेट रही है, लेकिन आजकल मैंने उसका साथ छोड़ दिया है, बस हॉस्टल एक है और हम साथ रहते हैं, लेकिन इंस्पेक्टर कहाँ मानने वाला था, वह बड़े तैश में मुझसे बोला कि “उसके माँ-बाप का न. दो।”
वॉर्डन ने भी इशारे से न. देने को कहा, इंस्पेक्टर के न. लगाते ही एक बार में ही उसके पापा ने फ़ोन उठा लिया फिर तो भैया इंस्पेक्टर ने नैना की जो कहानी सुनाई कि मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए…
पता चला कि पिछली रात जिन लोगों के साथ वह, जिस कैफे में गई थी उनमें नीला का वह बॉयफ्रेंड भी था, जिसको उसने हथिया लिया था और पार्टी में ड्रिंक करने के बाद जबरदस्त हुड़दंग हुआ था, छीना झपटी में कई लड़कियों के कपड़े फट गए थे, एक लड़की ने तो ख़ुद ही अपने कपड़े फाड़ दिए थे वह शायद नैना ही थी, इंस्पेक्टर ने उसके पिता को बताया कि इन्वेस्टिगेशन से पता चला है कि आपकी लड़की किसी ऐसे ग्रुप के साथ इन्वाल्व्ड है, जो लड़कियों को सप्लाई करता है, उसके कांटैक्ट्स में बहुत प्रभुत्व लोग हैं, कल उसे वहाँ जाना था, तो इस बात का नैना के नए बॉयफ़्रेंड ने विरोध किया तो तैश में नैना ने उसके गाल पर कई तमाचे जड़ दिए जिससे कैफ़े के बार में हंगामा हो गया था। वह लड़का नैना के बुलावे पर पहली बार उस ग्रुप के साथ पार्टी करने आया था और नैना द्वारा थप्पड़ लगाने के बाद नैना के दोस्तों ने भी पटक के बहुत मार दिया है और वह किसी रसूख़दार नेता का बेटा है। सारे वीडियो वायरल हैं। आप लोग ख़ुद देख सकते हैं, रात दो बजे तक हॉस्टल में अफ़रातफ़री मची रही, प्रश्नोत्तर होते रहे।बाबा रे बाबा… मैं भी प्रश्नों के जवाब देते-देते खीझ गई।
आख़िर में वार्डन ने नैना को पुलिस स्टेशन पहुँचाने की ज़िम्मेदारी ले ली और फिर भी पुलिस दूसरे दिन आठ बजे सुबह-सुबह फिर हाज़िर हो गई।
सुबह माहौल में बहुत गहमागहमी थी, नैना वॉर्डन के साथ पुलिस स्टेशन चली गई थी, पीछे-पीछे पुलिस भी।
हॉस्टल में हर तरफ़ एक ही बात गूंज रही थी, हर कोई नैना के फटे हुए कपड़े में हाथापाई कर-कर झगड़ते हुए वीडियो को दिखाए पड़ा था। न्यूज़ पेपर्स में बहुत बड़ी कवरेज़ प्रकाशित थी। कुल मिलाकर उसकी बड़ी थू-थू फ़जीहत हो रही थी। लेकिन उसे क्या? वह रात को तो होश में नहीं थी और सुबह पुलिस स्टेशन में बैठी थी। कुल मिलाकर सबके निशाने पर मैं बैठ रही थी, सभी उसके बारे में मुझे कुरेद रहे थे एम।
थोड़ी देर में ही मेरे पास वॉर्डन का फ़ोन आया कि पुलिस तुमसे कुछ पूछताछ करना चाहती है। मैंने ड्राइवर भेज दिया है, तुम उसके साथ अभी ही आ जाओ। वर्ना बाद में अकेले आना पड़ सकता है। मरती क्या न करती? मुई नैना की हरकतों की वजह से मैं पुलिस स्टेशन तक पहुँच गई थी। भाई! पुलिस ने नैना के संबंधों को जानने के लिए मुझे बहुत हिलाया डुलाया, वह हर बात मेरे मुँह से उगलवाने की कोशिश की जिससे नैना कैफे कांड की सरगना घोषित हो जाए, नैना के लिए सबसे बड़ा निगेटिव प्वाइंट था कि पार्टी में शामिल लगभग सारे ही लड़के लड़कियाँ उसी सिटी के थे, उनकी हर जगह जान पहचान थी और वे लोग सोर्स लगवाकर अपने को बचाने का प्रयास कर रहे थे जबकि नैना दूसरे प्रदेश की रहने वाली थी इसलिए उसकी कोई पहचान नहीं थी और वह पुलिस द्वारा बहुत प्रताड़ित और अपमानित हो रही थी। लेकिन मैं क्या ही कर सकती थी, वॉर्डन भी कहाँ तक पुलिस स्टेशन में बैठी रहतीं। उसके माँ-पापा के आते ही मैं और वॉर्डन हॉस्टल लौट आए थे।
रास्ते में ही मैंने वॉर्डन को बोल दिया था कि “प्लीज़ मैम! मेरा रूम चेंज करा दीजिए नहीं तो मैं तो मर ही जाऊँगी। उन्होंने मुझसे कुछ दिन धैर्य रखने को बोला… लेकिन कहाँ? अब मुझमें धैर्य कौन कहे? धैर्य नाम की चींटी भी नहीं बची थी… मैं वॉर्डन को तो क्या ही कहती? अपना ही चोला बदलने को मेरी आत्मा तड़पड़ा उठी…
पाप का घड़ा एक दिन फूटता ही है और फूटा भी…
नैना का तो छोड़ो, मेरा घड़ा भी मेरे मन माफ़िक़ पुण्यों से तो भर नहीं रहा था। मेरे तो गले के नीचे छाती तक नैना ही भरी हुई थी, छाती के ऊपर कुछ और लोग।
मैं ख़ुद तो ख़ाली अपने मुँह तक बची हूँ, यूँ कहो… मुँह तक भी नहीं, बस ज़ुबान तक ही रह गई हूँ, जो सामने कैंची की तरह चलती है, सब कुछ कतर देती है, पर सिलने के लिए तो सुई चाहिए, जिसका इंतज़ाम मैंने कभी किया ही नहीं, अब या तो कैंची से जड़ ही कतर दूँ या फिर अपने आस-पास झाड़ उगने दूँ और अपनी देंह में उसके नुकीले काँटे चुभाती रहूँ।
आख़िर क्या उपाय है, नैना जैसे लोगों का, या तो उन्हें गोदी में उठाए बेबीट्रीट देते रहो, वे जब चाहें थपकी दे दो, जब सोएँ तो झपकी दे दो, जब चाहें तो पप्पी दे दो।
समय बीत रहा है, फ़ैसला तो लेना ही पड़ेगा और जल्दी लेना पड़ेगा, पानी सिर के ऊपर से बहना प्रारंभ हो चुका है, और बाढ़ आई नहीं कि उसकी जद में वह तो बहेगी नहीं, मैं ज़रूर बह जाऊँगी, और कुछ ऐसा बहूँगी कि अपने साथ अपना ईमान, अपना अंतर्मन और अंत में स्वयं की प्रतिच्छाया भी बहा ले जाऊँगी।
नहीं.. नहीं.. नहींऽ…
आज ही निर्णय लेना है, मुझे अभी फ़ैसला करना है, अभी और अभी…
ऐसे और इस टाइप के बोझ लेकर मैं अब नहीं चल पाऊँगी, सच कहूँ तो बीच रास्ते में ही लुढ़क जाऊँगी..
बिलकुल नहीं.. नहींऽ..
“मुझे तो अभी दूर तक जाना है.. हवाओं से बातें करनी है, समुद्र में गोते लगाने है, सच.. वह जो मेरी खिड़की से सबसे ऊँची हिमालय पर्वत शृंखला की चोटी दिख रही है, वहाँ उस तक जाने के स्वप्न सजाए मैं तो कॉलेज आई थी पढ़ने। और अब! अब… रात दिन ये छपरी चोंचले सुलझा रही हूँ, नैना जैसे लोगों के…”
“मुझे निकलना होगा और निकलना ही होगा ऐसे रिश्तों से…”
उसी शाम मैंने हॉस्टल बदलने की एप्लीकेशन देते हुए, अपने लिए पीजी का विकल्प भी खोज लिया था।
- जिज्ञासा सिंह
(ब्लॉगर, पर्यावरण और साहित्य प्रेमी)
प्रकाशित कृतियाँ:— वे दो आँखें (कहानी संग्रह), नक्षत्रों ने दीप जलाए एवं माटी तेरा मोह न छूटा (गीत संग्रह) तथा फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)
अभिनंदन सी-137, इंदिरा नगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश- 226016
फो. न. 9415410164
