Sunday, July 26, 2026
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जितेंद्र कुमार का संस्मरण-ख़त का सफ़र

फ़र्क नहीं पड़ता कि हम जीवन में किस विचारधारा के साथ आगे बढ़ते हैं, सच तो यह है कि सफर में कई बार ऐसे लोग हमसे जुड़ते हैं, जिनकी अपनी अलग सोच और विचारधारा होती है। हम न चाहते हुए भी कई बार उनकी बातों और उनके नज़रिए से प्रभावित हो जाते हैं। और सच कहूं तो यह ठीक भी है; बीच-बीच में हमारी सोच का किसी और की सोच से टकराना और ढलना जिंदगी को नया आकार देता है।

अब मेरी इस उम्र को ही देख लीजिए। बुढ़ापे का आलम यह है कि सुबह क्या किया, क्या खाया, कुछ याद नहीं रहता। लेकिन न जाने क्यों, कभी-कभी बीते समय की स्मृतियां अचानक लौट कर आती हैं। कभी वो गुदगुदा कर हंसा जाती हैं, तो कभी बैठे-बैठे आंखों में आंसू ले आती हैं। आज सुबह की ही बात है, मैंने किसी के लिए एक ख़त लिखा था। अब दिमाग पर लाख जोर डाल रहा हूं, लेकिन याद ही नहीं आ रहा कि वह ख़त मैंने लिखकर कहां रख दिया! ख़त तो ख़ैर अब तक नहीं मिला, लेकिन उसे ढूंढते-ढूंढते मुझे अपने बचपन की एक ऐसी स्मृति मिल गई, जिसने मुझे बरसों पीछे धकेल दिया।

बात मेरे स्कूल के दिनों की है। मैं उस वक्त कक्षा छह में पढ़ रहा था। उन दिनों मोबाइल फ़ोन का चलन ऐसा नहीं था जैसा कि आज है। किसी का हाल-चाल लेना हो, या अपनी खैरियत बतानी हो, चाहे शहर से गांव हो या गांव से शहर, ख़त ही एकमात्र सहारा हुआ करता था। छुट्टियों के बाद वाला महीना था, जब मेरे मामा जी गांव से लौटे तो अपने साथ एक ख़त लेकर आए। वह ख़त मेरे पिता जी के लिए था। उसमें गांव की राजी-खुशी बताई गई थी और यहां का हाल पूछा गया था।

पिता जी को पूरी उम्मीद थी कि उनका छठी कक्षा में पढ़ने वाला बेटा न सिर्फ यह ख़त फर्राटे से पढ़ लेगा, बल्कि इसके जवाब में एक बढ़िया सा ख़त लिख भी देगा। पर हकीकत कुछ और ही थी। मैं भले ही छठी में आ गया था, लेकिन सच कहूं तो मुझे हिंदी पढ़ना और लिखना सही ढंग से नहीं आता था। ख़ुद से सोचकर कुछ लिखना तो मेरे लिए बहुत दूर की बात थी।

मैंने पिता जी, मामा और घर के बाकी सभी सदस्यों के सामने वह ख़त पढ़ना शुरू किया। शुरुआत में मैं जहां भी अटकता या हकलाता, मामा जी मेरी गलती सुधार देते। लेकिन जब यह अटकना बहुत ज्यादा होने लगा, तो पिता जी का पारा चढ़ गया। उन्होंने आव देखा न ताव, एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर जड़ दिया। गुस्से में तमतमाते हुए बोले, “यही छठी क्लास में पढ़ रहा है!” इसके बाद उन्होंने गालियों के कुछ ऐसे अलंकारों का प्रयोग किया कि मेरी अब तक की सारी पढ़ाई-लिखाई पल भर में व्यर्थ करार दे दी गई। फैसला सुना दिया गया कि कल से मेरी पढ़ाई बंद और मुझे किसी काम पर लगा दिया जाएगा।

बचपन में मैं वैसे भी बहुत कामचोर था। यह कामचोरी मोहल्ले के बाकी बच्चों को दिनभर खेलते देखकर और भी पुख्ता हो गई थी। इसलिए जब स्कूल जाना बंद हुआ, तो मुझे शुरू में कोई खास मलाल नहीं हुआ। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए।

उन दिनों हमारा घर, घर कम और कबाड़ का ढेर ज्यादा लगता था। इस वजह से वहां मच्छरों का भयंकर आतंक रहता था। ऐसी ही मच्छरों से भरी एक रात को मेरी नींद खुल गई और मैं अचानक रोने लगा। मेरे रोने की आवाज सुनकर मां जाग गईं। पास आकर घबराहट में पूछने लगीं, “क्या हुआ? क्यों रो रहा है?”

मुझे कहना तो यह चाहिए था कि मच्छर काट रहे हैं, इसलिए नींद नहीं आ रही है। लेकिन न जाने मेरे मन के किस कोने से वह बात निकली और मैंने रोते हुए कह दिया, “मुझे स्कूल जाना है… मुझे स्कूल नहीं छोड़ना।”

मां ने मेरे सिर पर हाथ फेरा और तसल्ली देते हुए बोलीं, “चल चुप हो जा, सो जा अभी। मैं कल तेरे पापा से बात करूंगी।”

अगली सुबह हुई। मैं बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था कि मां कब पिताजी से स्कूल वाली बात छेड़ेंगी, लेकिन घर के कामों में बात शुरू ही नहीं हो पाई। आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने खुद ही मां के पास जाकर याद दिलाया, “मम्मी, मुझे स्कूल जाना है।” तब मां को मेरे रात वाले रोने की बात याद आई। उन्होंने पिताजी से बात की और मेरी वकालत करते हुए कहा कि इसे पढ़ने देते हैं, अगर यह इस साल फेल हो गया, तो खुद ही इसकी पढ़ाई छुड़ा देंगे।

पिताजी इतनी आसानी से मानने वाले नहीं थे। बहुत बहस के बाद आखिर में एक समझौता हुआ। तय यह हुआ कि मैं सुबह और शाम किसी कारखाने में काम करूंगा, और दोपहर के समय स्कूल जाऊंगा। लेकिन शर्त बड़ी सख्त थी, अगर मैं किसी भी विषय में फेल हुआ, तो मेरी पढ़ाई हमेशा के लिए बंद कर दी जाएगी और मुझे पूरी तरह से काम में ही झोंक दिया जाएगा।

बस, उसके बाद क्या था। मेरी जिंदगी में काम और स्कूल की जो जुगलबंदी शुरू हुई, तो फिर कभी रुकी ही नहीं। मैंने अपनी उस जिद को पकड़ लिया था। मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्कूली और कॉलेज की परीक्षाओं से होते हुए मेरी पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से पीएचडी पूरी करने के बाद ही जाकर समाप्त हुई। और हां, मैं उन तमाम सालों में कभी किसी परीक्षा में फेल नहीं हुआ। काम मैं आज भी कर ही रहा हूं, जिंदगी का पहिया वैसे ही चल रहा है।

आज दुनिया बदल गई है। हाथ में मोबाइल फोन है, पलक झपकते ही संदेश पहुंच जाते हैं। लेकिन मैं आज भी ख़त लिखता हूं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब मैं ये ख़त किसी को भेजता नहीं हूं। इन्हें सहेज कर रख लेता हूं और बाद में फुरसत के पलों में खुद ही पढ़कर कभी खुश हो लेता हूं, तो कभी पुरानी यादों के भंवर में फंसकर आंखों से आंसू भी बहने लगते हैं।

  • जितेन्द्र कुमार

सी-ब्लॉक, गली न. 10, मकान न. 560, श्रीराम कॉलोनी, खजूरी, दिल्ली-110094
मोबाइल – +91 7982308355

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