Sunday, July 26, 2026
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अल्पना मिश्र की कहानी – तोताजान

आकाश में पक्षी उड़ते हुए खूबसूरत लगते हैं। पेड़ों पर बैठे बोलते, गाते भी सुंदर लगते हैं। कभी कभी रूक कर उन्हें निहारने में सुख मिलता है, प्रकृति की रंग बिरंगी कारीगरी पर हैरत भी होती… कभी कभी कोई गर्मियों की चिलचिलाती धूप में कटोरा भर पानी रख देता कि पक्षी आएंगे, पी कर राहत पाएंगे, कुछ लोग कबूतरों के लिए, कौवों के लिए दाना भी डालते… इससे ज्यादा? हाॅ, इससे ज्यादा हम उनके बारे में कितना और क्या जानते हैं? यही कि प्रदूषण की मार ने उनका जीना दुश्वार कर रखा है, यही कि उनका पलायन जारी है या कि वे तेजी से खत्म होते जा रहे, यही कि कई बार वे बड़ी तादाद में मरे पाए जाते हैं, गौरैया लुप्त हो रही है, कोयल की आवाज दूर होती जा रही… कठफोड़वा नजर नहीं आते…नीलकंठ का आशीष लेने की बात अब बीत गई… बाज़ और कितनी ही प्रजातियों के लिए ‘खत्म होती प्रजातियां’ जैसा शब्द सुनने में आता, वे दिखते भी नहीं, जहाॅ देखो, बस, कबूतर शहरी नागरिक बने दिखते… बुलबुल कभी कभी दिख जाती, छोटी सी बया भी कभी कभार आती जाती, एक बहुत चमकदार छोटी सी काली, नीली चिड़ियाॅ भी आती, जिनका नाम हम अब तक नहीं जानते… वैसे न जाने कितनी ही चिड़ियाॅ थीं, जिनको कभी कदा देख तो लेते पर नाम नहीं जानते। ये चिड़ियां इसलिए कभी कभार आ जातीं, क्योंकि कभी यहाॅ जंगल हुआ करता था, कभी यहाॅ घने पेड़ थे, कभी यहाॅ चिड़ियों का गाॅव हुआ करता था, उनका आस पड़ोस था, उनके नाते रिश्तेदार थे, उनके उत्सव थे, उनके खाने के लिए तरह तरह की चीजें थीं….

तो, हमारे घर के ठीक सामने के पेड़ों पर चार पाॅच तोतों का एक परिवार भी कभी कभार दूर दराज से यात्रा करता आता और अपनी तेज आवाज से आकर्षित करता, कुछ देर शोर मचाता, फिर चला जाता…… तब मैं उन्हें देखने बाॅलकनी में दौड़ कर आती, अक्सर वे दिख जाते, कभी कभी सिर्फ आवाज सुन कर संतोष करना पड़ता। कभी कभी यह भी होता कि मेरा और उनका समय ठीक नहीं मिलता, पता ही नहीं चलता, वे कब आ कर चले गए! जाड़ों मेें महीनों यह तोता परिवार नहीं आता तो हमें इनका ‘न आना’ याद नहीं रहता, जब आते तब याद आता कि बड़े दिनों बाद दिखे हैं – चटकीला धानी रंग, लाल चोंच, लम्बी पूंछ, खूबसूरत तोता हरापन… इससे ज्यादा हम तोतों के बारे में नहीं जानते थे। कभी जानने की कोशिश भी नहीं की। जितने से आदमी का काम चल जाए, उससे आगे बढ़ कर जानने समझने की कोशिश में मेहनत करने वाले कम ही लोग मिलेंगे। सो हम भी इन्हीं आम लोगों जैसे अपने जरूरत के ज्ञान से आगे कभी सोचे नहीं,

पर अचानक यह हुआ कि हमारे घर में हरा रंग छा गया – दो ताते आ गए। कैसे? पूछिए मत, एक सज्जन, जो हमारे पारिवारिक मित्र थे, एक दिन वे तोते खरीद कर अपने घर ले जा रहे थे, लेकिन अचानक रास्ता बदल कर दो तोता लिए दिए हमारे घर आ पहुॅचे। उनके रास्ता बदल देने के दो कारण थे। एक तो तोता खरीद कर कुछ दूर चलते ही उनके स्कूटर का हल्का सा एक्सीडेंट हो गया, पैर में थोड़ी चोट लग गई, दूसरे, थोड़ा और आगे बढ़ते ही गाॅव से उनकी माॅ की तबियत सीरियस हो जाने का फोन आ गया। मतलब तो आप समझ ही गए, बिल्कुल ठीक, हाॅ वही मतलब है, तो उनके मन ने, दोनों ही खबरों से, तोते के लाए जाने को शुभ संकेत की तरह नहीं लिया। अब तोते उनके लिए मुश्किल का सबब थे, भविष्य का भय थे, वर्तमान का बोझ थे, तो अब वे किसी के पास तोता टिका कर मुक्त होना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने दो खलिहरों का एक घर, यानी अवकाशप्राप्त दो प्राणियों का एक घर, यानी हमारा घर चुना, इसके भी दो कारण थे, एक तो हमारा घर उनके घर के रास्ते में पड़ता था और दूसरा उन्हें अंदाजा था कि मैं पक्षियों से प्रेम करने वाली प्राणी हॅू। हालाॅकि मुझे यह बात इतने आत्मविश्वास के साथ पता नहीं थी। पता नहीं यह उनका अंदाजा था या वे बस, तुकका मार रहे थे। पर मिलने पर उन्होंने यही कहा।

सच है कि मुझे पक्षी अच्छे लगते, उन्हें देखना, उनके रंगों पर मुग्ध होना, उनकी आवाजों के तिलस्म में खोना… बस, ऐसा ही कुछ, पक्षी पालने के बारे में कभी सोचा नहीं था और जैसा कि मैंने बताया ही कि जानकारी भी कुछ खास थी नहीं। उन्होंने आते ही अपने गाॅव जाने की खबर बताई, एक्सीडेंट भी बताया और तोता हमारे सुपुर्द कर दिया, पहले थोड़े समय का बहाना कर के, लेकिन दरअसल हमेशा, हमेशा के लिए…

तोते सुंदर थे और एक छोटे से पिंजड़े में अड़स कर बैठे हुए एकटक मुझे देख रहे थे। पहली बार मुझे तोते की सपनीली सी आॅखें दिखाई पड़ीं। जरूर इन आॅखों में कोई जादू था, कोई तिलस्म, सम्मोहन, कुछ सपने के जैसा… इतने नजदीक से मैंने कभी तेाता नहीं देखा था। ऐसी ‘एकटक पल रोकी’ दृष्टि पर कौन न फिदा हो जाएगा। मैं फिदा हो गई। इतना हरापन! प्रकृति ने मनुष्य को कितना तो रंगों का खजाना दिया है! सच, ये दोनों तो दो कीमती हीरे जैसे लग रहे। मेरे पति को भी अच्छा लगा। वे भी बड़े मुग्ध भाव से तोते को अपनाने के लिए बेकरार हो उठे। हमारे घर के सूनेपन के बीच अचानक हरापन दमकने लगा। जब से हम दोनों अपनी अपनी नौकरियों की व्यस्तता को पार कर, उम्र के बुढ़ापे वाले पायदान की तरफ बढ़े थे, जीवन की आपाधापी, भागदौड़ और साथ में तरह तरह के लोग और बतकही सब, कुछ कम हो चला था। बच्चे दूर अपनी अपनी नौकरियों में कभी कभार वाला वक्त निकाल कर आते, तब रौनक आती, जाते तो रौनक भी ले जाते, दोस्तों तक का मिलना जुलना कम होता जा रहा था, ऐसे में इन दो नए नवेले हरे मेहमानों का आना – हम तो उन मित्र सज्जन को बार बार धन्यवाद कहे जा रहे थे। तुरंत बने दो हरे सदस्यों की तस्वीर खींच कर दूर रह रहे बच्चों को भेज दिए, उनके भी तुरंत दिल वाले इमोजी आ गए। अब आज कल के ज्यादातर संवाद शब्दों के बजाय इमोजी की भाषा में बदल गए हैं।

तो उन हमारे मित्र सज्जन ने बताया था कि ये तोता, जिसके गले में सुंदर लाल रिंग है, पहाड़ी रिंगनेक है और अभी हाल फिलहाल जंगल से पकड़ा गया है, इसलिए बेचारा डरा सहमा है, जल्दी ही उसका डर दूर हो जाएगा। ऐसा उन्हें बेचने वाले ने बताया था। सचमुच रिंगनेक तोता मोटा और सुस्त था, एकदम किनारे पर डरा सा चिपका था और हमें बस टकटकी लगाए घूर रहा था, वह नर था। दूसरी मादा थी, छरहरी सी, लम्बी पूंछ वाली पर चुप। कुछ खाने का रखने पर मादा तोता आ कर खा लेती पर नर नहीं आता।

‘‘अब इस उम्र में हम इनका ख्याल कैसे रख पाएंगे?’’

मेरे पति ने उन मित्र सज्जन से चिंता जताई। चिंता सही थी। अब हमें किसी बच्चे को पालना कठिन लग रहा था। पक्षी का ख्याल भी किसी छोटे बच्चे की तरह चैबीस घंटे रखना होगा, साफ सफाई भी ज्यादा करनी पड़ेगी, यह मुश्किल काम तो था ही।

‘‘इनका काम आसान है भाईसाहब। अमरूद और सेब देते रहिए। साफ सफाई भी कुछ ज्यादा नहीं, हो जाएगा आपसे। रखिए अभी, अगर परेशानी हुई तो फिर गाॅव से लौट कर देखता हॅू।’’

वैसे अब आ ही गया था तो मेरा मन उन्हें जाने देने का तो बिल्कुल नहीं था। लेकिन हमने उनसे यह कहा नहीं, बल्कि कहा कि गाॅव से लौट कर एक बार जरूर देख लें। वे भी अवकाशप्राप्त ही थे सो गाॅव जा कर दो दिन में लौटने की कोई हड़बड़ी उन्हें नहीं लग रही थी। तिस पर सारी जिंदगी नौकरी की भाग दौड़ में माॅ के लिए समय नहीं निकाल पाए थे, अब उस कमी को पूरा करने का एक मन उनका था, तो हम उन्हें जल्दी लौटने के लिए नहीं कह सकते, रिश्तों में कर्तव्य पर हमारा यकीन उनसे भी ज्यादा था।

उन मित्र सज्जन के जाने के बाद शुरू हुआ हमारा तोता रिसर्च। गूगल बाबा से मदद ली गई, यूट्यूब चैनल खंगाले गए। आश्चर्य हुआ कि तोता कैसे पालें, उन्हें क्या खिलाएं, उन्हें बोलना कैसे सिखाएं, क्या करें, क्या न करें, उनके लिए जरूरी विटामिन्स, उनका प्रशिक्षण…. जैसे कई हजार विडियो उपलब्ध। सबको देखने वाले भी होंगे, क्योंकि उनके दर्शकों की संख्या लाखों में थी! क्या यह भी एक मनोरंजन था?

इन्हें देख कर समझ आया कि तोते को सूरजमुखी के बीज बहुत पसंद होते हैं सो झटपट अमेजाॅन से सूरजमुखी के बीजों का पैकेट आॅर्डर किया गया, ब्लिंकिट से ‘पैरेट फूड’ नाम से उन्तीस बीजों का पैकेट तत्काल मंगवाया गया। घर में रखे सेब काट दिए गए… फिर ध्यान गया पिंजड़े पर, इतना दमघोंटू पिंजड़ा! सुबह सबसे पहले हम बड़ा पिंजड़ा लाने भागे। बड़ा सा सुंदर गुलाबी पिंजड़ा लिया गया। पिंजड़े वाले की ही मदद से दोनों तोतों को बड़े पिंजड़े में शिफ्ट किया गया।

हमारी वर्षों से बनी रूटीन टूट रही थी। अब दिन का सबसे अधिक हिस्सा तोतांे के नाम जा रहा था। हम पहले से ज्यादा चुस्त दुरूस्त हो रहे थे। हम उठते बैठते तोते के बारे में ही बातें कर रहे थे। उनके ही फोटो लिए जा रहे थे, फिज़ा में सिर्फ हरा रंग था – तोता रंग। सबसे पहले तो उनके नाम रखने थे – एक लड़के का और दूसरा लड़की का। फिर दोस्त मित्रों और बच्चों समेत नाते रिश्तेदारों से ऐसे नाम, मतलब तोते की पर्सनालिटी को सूट करने वाले नाम पूछे जाने लगे। नाम ज्यादातर ‘बिट्टू, लवली, पिंकू, चिंकू… ’ ऐसे आ रहे थे। अब गूगल बाबा की शरण ली गई, एक से एक नए, न जाने कहाॅ कहाॅ के अनसुने नाम चमक उठे, पर ऐसे कठिन नाम तोते के लिए जम नहीं रहे, फिर?

‘‘इतने सुरीले पक्षियों का ऐसा रूखा नाम?’’ मेरे पति ने मुॅह बनाया।

तभी मेरे मुॅह से निकला- ‘‘क्या बात है! आपने बिना खोजे कह दिया सुरीली, यही रहेगा नाम।’’

उन्हे भी नाम पसंद आया, अब मादा तोते के नाम की समस्या हल हो गई। हम उसे ‘सुरीली’ बुलाने लगे। नर तोते का नाम अभी भी तय नहीं हुआ।

इसी समय हमारी बाॅल्कनी में उड़ कर गिर आए अपने कपड़े लेने उपरी मंजिल से एक बच्चा  आ गया। उसने तोते को बड़े गौर से देखा, पिंजड़े के पास कुछ देर गुम सुम खड़ा रहा। तोते चुपचाप थे, जिसमें नर तो जब से आया था, बिल्कुल चुप था, मादा आ कर खाना खा लेती, कुछ देने से चोंच से पकड़ लेती, पर नर चुप, डरा सा। जब सब हट जाते तब नर एक पांव पर बल दे कर अपने को कुछ घसीटता हुआ आता और जरा सा कुछ खा कर वापस कोने में दुबक जाता।

‘‘ये तो लगड़ा है!’’बच्चे ने बड़े आश्चर्य से कहा।
‘‘लंगड़ा!’’
‘‘हाॅ आंटी, लंगड़ूमल है ये।’’ लड़का इस बार हॅसा। फिर बाॅल्कनी की तरफ जा कर अपने कपड़े लिए और चला गया।
अब हम परेशान। अब हम दूसरे नजरिए से तोते को देखने लगे।
‘‘ये कुछ बीमार लग रहा है। मुझे पहले से ही लग रहा था।’’ मेरे पति ने कहा।
‘‘हाॅ, अब तो मुझे भी लग रहा। अब तक इसने मुश्किल से कुछ खाया है, वह भी अपने को कितनी मेहनत से घसीट कर ला रहा खाने तक।’’
तो अब एक नया संकट उठ खड़ा हुआ। नाम भूल कर हम डाॅक्टर की तलाश में जुट गए।
‘‘चिड़ियों का डाॅक्टर ढूंढना होगा।’’

वेटनरी डाॅक्टर चिड़ियों को नहीं देखते, यह हम पहली बार जान रहे थे। फिर गूगल की शरण लेनी पड़ी। ‘बर्ड डाॅक्टर नियर मी’ टाइप करना हुआ। दूर दूर तक पक्षियों का कोई डाॅक्टर नहीं दिख रहा। पहली बार ध्यान गया कि इस हमारे शहर में पक्षियों का डाॅक्टर ही नहीं!

पक्षियों की चिंता कहीं नहीं, न मन में, न जन में!
न समाज में, न शहर में!
कभी पक्षियों को इलाज की जरूरत ही नहीं पड़ी!
सोचा ही नहीं गया इस बारे में!

हम हैरान, परेशान! कितने ही लोगों को तो हमने चिड़िया पाले देखा या सुना था। न सही नजदीक से, पर दूर से तो जानते भी थे। हमारे पुराने मोहल्ले के बाबू साहब कबूतर पाले हुए थे, छत पर नियमित उन्हें उड़ाते थे, एक सज्जन ने रंग बिरंगी कई चिड़िया पाली थीं, उनके बागीचे में बड़ा सा पिंजड़ा रखा रहता। फिर?

क्या कभी किसी को उन चिड़ियों का इलाज कराने की जरूरत नहीं पड़ी?
तो खैर, अंततः हमें गूगल सर्च से ‘बर्ड चैरिटेबल हाॅस्पिटल’ नाम से एक जगह दिखाई पड़ी। थोड़ी राहत हुई कि चलो किसी को पक्षियों के लिए चैरिटी का ख्याल आया। उस व्यक्ति के प्रति हमें श्रद्धा हुई।
‘‘कोई नेक बंदा है।’’ मैंने राहत की सांस लेते हुए अपने पति से कहा। वे भी सहमत हुए।

अब हमने गूगल मैप पर ‘बर्ड चैरिटेबल हाॅस्पिटल’ लगाया और घर से लगभग एक घंटे दूरी की यात्रा पर निकल पड़े। हमारे साथ था पिंजड़े में नर तोता। बड़े पिंजड़े में नहीं भाई, उसमें तो सुरीली घर पर थी, ये तो जो शुरू में छोटा वाला पिंजड़ा इन्हें ले कर आया था, उसी में किसी तरह से नर तोते को डाला गया था और साथ ले कर चल रहे थे। लगभग एक घंटे की यात्रा के बाद एक संकरी गली दिखी, जीपीएस इसी गली में हाॅस्पिटल दिखा रहा था। गाड़ी दूर ही रोकनी पड़ी, गली संकरी जो थी, उसी गली में मैप के अनुसार हम पैदल चलते रहे। कुछ दूर जाने पर मैप, जो मकान दिखा रहा था, उसके आगे रूक गए, वह एक पतला, तीन मंजिले उंचा बिल्डर का बनाया मकान था, गली में सारे ही मकान एक दूसरे से चिपके खड़े थे, हवा के लिए सिर्फ सामने का दरवाजा था। वहाॅ कहीं कुछ लिखा नहीं था। एक बारगी तो लगा कि गलत जगह आ गए लेकिन पास खड़े दो लोगों से पूछने पर पता चला ‘‘यही है जी, उपर चले जाओ।’ मैं हाथ में पिंजड़ा, पिंजड़े में एक सुस्त बेदम सा तोता लिए उपर चढ़ने लगी। मेरे पति ने मना कर दिया, वे अपने घुटनों के कारण अब सीढ़ियां नहीं चढ़ पाते। मैं अकेले ही तीन मंजिल चढ़ी। तीसरी मंजिल पर एक दरवाजे पर ‘बर्ड़ चैरिटेबल हाॅस्पिटल’ का टाइप किया हुआ कागज चिपका था, साथ में एक फोन नम्बर भी। मैंने उसी दरवाजे की घंटी बजाई और हाॅफते हुए उसकी सीढ़ी पर बैठ गई। मैं भी अब उम्र की उस दहलीज पर थी, जहाॅ तीन मंजिला चढ़ने में पसीने छूट जाएं। दरवाजा नहीं खुला।

‘अजीब है या शायद कुछ है ही नहीं।’ मन में मैंने सोचा।
दुबारा घंटी बजाई तब भी दरवाजा नहीं खुला तो उस कागज पर लिखे नम्बर पर फोन किया। फोन उठ गया।
‘‘अरे भाई, आपका दरवाजा नहीं खुल रहा। मुझे पक्षियों के डाॅक्टर से मिलना है।’’
‘‘आप सही जगह आई हैं, उस दरवाजे से उपर की सीढी चढ़ उपर आ जाइए।’’
‘‘उपर?’’

‘‘हाॅ, छत पर।’’ फोन कट गया। अब एक ही उपाय था, कुछ और सीढ़ियां चढ़ना और छत पर पहॅुचना। चलो, किसी ने चिड़ियों के लिए कोशिश तो की है, छत ही सही। सीढ़ियां चढ़ी गईं। कंधे दुख रहे थे, पिंजड़ा पकड़े चढ़ने से उनका दर्द बढ़ गया था, हाॅफना भी जारी था, फिर भी, एक पक्षी को इलाज की जरूरत कंधे के दर्द और हाॅफने से बड़ी थी, वह भी एक बर्ड हाॅस्पिटल मिल जाने के बाद। यही सोच कर मैं छत का दरवाजा खोलती उस जगह हाजिर हुई जो बर्ड चैरिटेबल हाॅस्पिटल कहा गया था।

सामने खुली छत थी, बगल में स्टोर जैसा लगने वाला एक कमरा था, जिस में गाड़ियों की मरम्मत करने से मैले हुए कपड़े पहने एक आदमी हीटर पर चाय बना रहा था। चाय का सामान और कुछ बरतन बिखरे से एक तरफ पड़े थे। कमरा छोटा था पर कोने में एक चारपाई भी थी, शायद उस व्यक्ति के सोने के लिए, चारपाई पर कुछ बिस्तर भी था। कुल मिला कर कमरा ‘सर्वेंट क्वार्टर विथ सर्वेंट’ नजर आ रहा था।

‘‘डाॅक्टर कहाॅ मिलेंगे?’’
मैंने हाॅफती हुई निराश आवाज में पूछा।
‘‘क्या काम है?’’ वह अपनी जगह से पीछे मुड़ा।
‘‘मेरा तोता बीमार लग रहा, उसे डाॅक्टर को दिखाना था, किसी ने फोन उठा कर कहा कि उपर…’’
‘‘तोता छोड़ जाइए।’’ उसने मेरी बात बिना पूरा सुने कहा।
‘‘यहाॅ? क्या डाॅक्टर साहब आज नहीं आएंगे? यहाॅ बैठते नहीं हैं?’’
अब मुझे थोड़ा संदेह हो रहा था। डाॅक्टर जैसा तो कुछ नहीं दिख रहा। एक दो कबूतर इधर उधर आ जा रहे, बस।
‘‘बैठे ही रहते हैं, अभी कुछ काम से निकले हैं, छोड़ जाइए, चाहे कल ले जाइएगा, या आज शाम देख लीजिएगा।’’
मतलब कोई इमजेंसी तो है ही नहीं! अरे भाई, बीमार को तुरंत इलाज की जरूरत होती है, पर यहाॅ? खैर, मरता क्या न करता।

मैंने छत पर नजर दौड़ाई। छत पर घर का फालतू सामान, और छतों की तरह ही एक तरफ पड़ा था। एक तरफ लाइन से फूलों के कुछ गमले भी थे, जिनमें फूल आए हुए थे। एक कोने में, थोड़ी सी जगह में, दीवार उठी थी, जिस पर टीन की छत पड़ी थी, दरवाजा नहीं था, आगे से खुला था, कोई खिड़की भी नहीं थी। एक तरफ थोड़ी दूर घेर कर नेट लगा था, जिसमें वही दो कबूतर थे, बस, यही था पूरा का पूरा बर्ड हाॅस्पिटल। मुझे लगा तोते को छोड़ना ठीक नहीं, पूरे छत पर धूप फैली है, अगर इसने तोते को अपने घर में अंदर नहीं रखा तो तोता धूप से जल जाएगा या पता नहीं बेचारा प्राणी कुछ बता भी नहीं पाएगा। क्या पता पिंजड़ा यहीं छोड़ ये भी कहीं निकल जाए? कोई व्यवस्था तो दिख नहीं रही! खैर तो मैंने उससे कोई फोन नम्बर मांगा, जिस पर बात कर के ही दुबारा आउं। उसने नम्बर दिया, दो घंटे बाद आने को कहा। अब मैं पिंजड़ा लिए दिए तीन मंजिल उतर रही थी, पहले से ज्यादा हाॅफती हुई।

नीचे पति जी खड़े इंतजार कर रहे थे।
‘‘कुछ नहीं!’’ मैंने हाथ के इशारे से कहा। वे निराश हो गए।
‘‘फिर आना पड़ेगा।’’
‘‘हाॅ, यहाॅ तो कुछ है ही नहीं!’’
हम थोड़ा निराश, थोड़ा परेशान और थोड़ा हैरान लौटे, दुबारा वहीं जाने के लिए।
विकल्पहीनता से दुहराव या बार बार वही, जैसा कुछ नैराश्य पैदा होता है!

रास्ते भर, अपनी बाॅल्कनी में जाली लगवाने और जाली लगाने वाले को बुलाने की कोशिश जारी रही। सोच रहे थे कि बाॅल्कनी में जाली लग जाए तो दोनों तोते आजादी से रह सकते हैं। इतना उड़ने वालों को पिंजड़े में बंद रखना हमें चुभ रहा था। एक जाली वाला आ गया, उसने चारों तरफ से एकदम कसी जाली लगा दी। जालीवाला, जाली लगाता रहा कि दो घंटे हो चले। अबकी बार थोड़ा सब्र से काम लिया गया। पहले फोन किया, उठाने वाले ने कहा कि ‘आ जाइए। आ गए हैं जो पक्षियों को देखते हैं।’

इस बार मैं अकेले गई। पति जी जाली लगवाने के लिए रूक गए। शाम के पाॅच बज रहे थे, कहीं ऐसा न हो कि जब तक मैं पहॅुचूं, डाॅक्टर चले जाएं, ट््रैफिक की वजह से शाम के वक्त एक घंटे से कुछ ज्यादा समय लग सकता था। पिंजड़ा लिए दिए फिर उसी ‘बर्ड चैरिटेबल हाॅस्पिटल’ की तरफ। फिर तीन मंजिले की सीढ़ियां हाॅफते हुए चढ़ना, फिर दरवाजे पर चिपका कागज देखना, फिर थोड़ी देर अपना हाॅफना नियन्त्रित करने के लिए उसी सीढ़ी पर बैठ जाना।

तभी दुबला पतला मरियल सा एक आदमी, मैली सफेद शर्ट और घिसी हुई ग्रे रंग की फुल पैंट पहने मेरे बगल से, सीढ़ियों पर चढ़ा, एक क्षण को रूका, फिर उपर चला गया।

मैं उठी और पिंजड़ा ले कर उपर पहुॅची, उसी छत पर, सब कुछ वैसा ही था, बस, उस कमरे में चाय बना रहा आदमी अब चारपाई पर बैठा था और मेरे बगल से सीढ़ियां चढ़ कर उपर गया आदमी एक कांच की बोतल से पानी पी रहा था।

‘‘आप ही तोता लाई हैं?’’ पानी पीने के बाद उसने पूछा।
‘‘हाॅ, डाॅक्टर आ गए?’’ मैंने जरा हैरान हो कर प्रश्न किया।
‘‘अभी देखता हॅू।’’

उसने झटके से पिंजड़ा मेरे हाथ से ले लिया। न उसने हाथ धोया, न कोई दस्ताना पहना, बल्कि पिंजड़ा ले कर उस टिन के छत वाली जगह में घुस गया। मैं भी उसके पीछे पीछे आई। उसने झटके से पिजड़े के भीतर से तोते को पकड़ कर बाहर निकाल लिया। तोता शायद बोल भी नहीं पा रहा था, ‘कें कें’ की हल्की सी आवाज तोते ने की, अधिक विरोध की शायद उसमें ताकत ही नहीं थी।

‘‘चल नहीं पा रहा? बोल भी नहीं पा रहा।’’ उसने तोते को पलट दिया।

‘‘ये देखिए इसकी हड्डी टूट गई है, ये बूढ़ा है, इसीलिए फुर्तीला नहीं रह गया, किसी ने इसे गुलेल से मार कर गिराया होगा।’’ उसने ताते के पेट की उभरी हुई हड्डी दिखाई।

हद है इंसान के लालच की! बूढ़े को भी नहीं छोड़ा! घायल बूढ़े को जंगल से पकड़ कर लाया, शर्माता, डरता, कह कर बेच दिया। मरे तो मरे उसकी बला से! बेचारे हमारे मित्र सज्जन, ठगी के शिकार हुए, मेरा मन उनके लिए भी दुखी हुआ, वे, जो अपना अकेलापन दूर करने के लिए पक्षी रखना चाहते थे!

‘‘हड्डी जुड़ नहीं सकती? अगर डाॅक्टर देख लेते…’’
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उस दूसरे वाले लड़के ने उसके हाथ में, न जाने कौन सा सफेद रंग का घोल किसी शीशी के ढक्कन में पकड़ाया और उसने एक झटके में तोते के खुले मुॅह में उड़ेल दिया।
‘‘हाॅ तो मैडम, अब इस उम्र में इसकी हड्डी नहीं जुड़ेगी, ये मंगा लीजिएगा।’’
उसने एक दूसरी शीशी मेरे सामने खिसकाई।
‘‘फोटो ले लीजिए इसका। रोज एक दो बूंद देना होगा।’’

‘‘क्या है ये? और क्या पिलाया आपने इसे? कोई डाॅक्टर नहीं है यहाॅ, आपलोग कुछ भी दिए जा रहे, पहले बताइए, कौन हैं आपलोग? इस तरह कैसे, क्या दवा दे दिया? कोई जानकार आदमी तो होना चाहिए?’’  मैं अब नाराज थी और मेरा लहजा तल्ख हो चुका था।

इस बीच उसने दूसरी शीशी की दवा ड््रापर से दो बूंद तोते को पिला दी और उतने ही झटके से ताते को वापस पिंजड़े में रख दिया।
‘‘मैडम, आप शक कर रही हैं! एंटीबाॅयटिक्स दिया है और इस शीशी में कैलशियम है खास पक्षियों के लिए।’’ अब वह सीधा मेरी तरफ देख रहा था।
‘‘आप डाॅक्टर हैं?’’ उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।

‘‘ले जाइए अपना तोता। कौन डाॅक्टर चिड़िया देखेगा? है इस शहर में कोई? जाइए, पता कर लीजिए। मर जाती हैं चिड़ियां, कोई नहीं लाता। हम करते हैं चिड़ियों का इलाज। हाॅ, आप सही कह रहीं, मैं डाॅक्टर नहीं हूॅ। पहले चिड़िया पकड़ता था, बेचता था, चिड़ियों की मेरी जानकारी पर कोई शक नहीं कर सकता। लेकिन जीवन के दुखों ने मुझे चिड़ियों की सेवा की तरफ मोड़ दिया। मुझे सिर्फ यही आता है मैडम, इसलिए यही कर रहा। नीचे वाली मैडम ने अपनी छत इस काम के लिए दी है, जिनके दरवाजे पर कागज चिपका देखा होगा आपने। और आप देख रही हैं न, यहाॅ कितने पक्षी हैं?’’

गुस्से से शुरू हुआ उसका स्वर धीमा पड़ गया।
‘‘असल में चिड़ियों का कोई महत्व है ही नहीं आदमी के लिए।’’
‘‘अरे ऐसा न कहिए।’’
‘‘हाॅ, ठीक है, कभी कभार आप जैसे इक्के दुक्के लोग आ जाते हैं, तब ये लड़का मुझे बुला लेता है, नहीं तो बाकी समय मैं चिड़ियों के बारे में पढ़ता रहता हॅू।’’ इतना कहते कहते वह बगल से निकल कर तेजी से सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

‘‘पढ़ना!’’ मुझे अपने आप में उसके साथ किया अपना ही व्यवहार अच्छा नहीं लगा। मैं उसे ‘थैंकयू’ भी नहीं कह पाई।
मैंने जल्दी से उस कैलशियम वाली शीशी की तस्वीर खींची और पैसा पेमेंट करने की जगह देखने लगी।
‘‘कुछ पेमेंट?’’
‘‘आप करना चाहती हैं तो इस पेटी में अपनी मर्जी से कुछ डाल दीजिए। नहीं देंगी तो भी कोई बात नहीं।’’ दूसरे लड़के ने कहा।

मैंने जल्दी से सौ रूपए निकाले और वहाॅ रखी, हाथ से तैयार की गई, गत्ते की एक पेटी के उपर से चीरे गए मुॅह में डाल दिया। पिंजड़ा और अपना घुटना संभालते मैं भी नीचे उतर कर घर आ गई।

घर आ कर मैंने तोते को पिंजड़े से निकाल कर बाॅल्कनी में आजाद छोड़ दिया, पर तोता वैसे ही सुस्त पड़ा रहा, जबकि सुरीली इधर उधर चल चल कर कर सब कुछ देखने जानने में व्यस्त हुई। जो कुछ भी खाने को दिया गया, सेब, अमरूद, मंूगफली, सूरजमुखी के बीज… सुरीली ने खा लिया। इधर हमने अमेजाॅन खंगाल डाला, कैलशियम, मल्टीविटामिन के नाम पर दुनिया भर की शीशियां थीं, पर वही नहीं थी, जिसे मंगाने को कहा गया था। पता चला कि यह तो किसी सरकारी अस्पताल में वेट सेक्शन में मिलेगी, इसे पशु पक्षियों, दोनों को देते हैं। अब सरकारी अस्पताल पहॅुचने की युक्तियां सोची जाने लगीं। शाम हेाते होते दवा ने अपना असर दिखाया और नर तोता अपना पैर घसीटते हुए खाने के लिए आया, थोड़ा सा कूं, कूं भी किया। हम जरा जरा खुश हुए। अगले दिन सरकारी अस्पताल से दवा मंगा ली गई और किसी तरह, बड़ी मुश्किल से ड््रापर से दो बूंद तोते को पिलाने में सफलता पाई गई। तोते की यह थोड़ी सी फुर्ती सिर्फ दो दिन चली, अचानक तीसरे दिन के तीसरे पहर में, तोते की सांसें तेज चलने लगीं, जब तक हम देख पाते, समझ पाते, तोते ने अपने प्राण त्याग दिए।

यह हमारे लिए झटका था। हम देर तक सन्नाटे में रहे।

लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि सुरीली पर हमारी करूणा और देखभाल बढ़ गई और हमारा प्यार भर भर कर उसके उपर गिरने लगा। उसके लिए सुंदर सा छोटा झूला आया, उसके लिए तोते के खेलने वाले खिलौने आए, लकड़ी के ब्लाॅक्स आए, उसके लिए सारी बाॅल्कनी सज गई। एक झूलने वाला नेमप्लेट भी उसके नाम से बना, जो बाॅल्कनी में उसके झूलने के काम आता। सुरीली सारी चीजों को जिज्ञासा से भर भर कर देखती पर गजब के अनुशासन के साथ! थोड़ा थोड़ा उड़ती, कभी बिस्तर या घर के अंदर की कोई चीज नुकसान न करती, न ही बिस्तर, किचन ऐसी जगहों पर गंदा करती, इधर उधर कम जाती। बाॅल्कनी में आराम से धीरे धीरे चलती हुई सब जगह जाती। झूले पर बैठाने पर झूलने लगती लेकिन उतरने में डरती। उड़ कर कहीं से कहीं जाना टालती रहती।

‘जंगल से आई है, इन सारी चीजों के साथ सामंजस्य बैठाने में इसे समय लगेगा’ ऐसा हम सोचते।
लेकिन उसके व्यवहार से लगता नहीं था कि जंगली है!

तो हमने उसे उसका नाम सिखाना शुरू किया -‘हैलो सुरीली, गुड मार्निंग सुरीली, सुरीली बेटा, सुरीली ये, सुरीली वो….’ सुरीली ध्यान से सुनती। फिर धीरे धीरे कहीं दूर किसी पक्षी की आवाज सुन कर सुरीली ने तोतों वाली ‘चांव, चांव’ शुरू कर दी। अब हमें लगा कि घर इसके चांव, चांव से भर जाएगा और घर का सारा सन्नाटा दूर। सुरीली धीरे धीरे अपनी चाल में चलती, जैसे कोई पिल्ला हो, उसका चलना अच्छा लगता, पर हम उसे अपने असली रूप यानी उड़ान भरते देखना चाहते थे। उड़ती भी तो बस, हल्का सा उड़ कर रह जाती।

चार महीने हो चुके थे, यूट्यूब ने कहा था कि चार महीने में तोते घुल मिल जाते हैं। थोड़ा थोड़ा घुल मिल रही थी सुरीली।

अब चूॅकि सुरीली हमारे जीवन का केन्द्र बन गई थी तो हम उसे सिखाने के लिए यूट्यूब पर विडियो देखते। तरह तरह से उसे बोलना सिखाने की कोशिश करते।

इसी में हमें दिखा कि कुछ लोग अपने तोते का पंख काट देते हैं, जिससे वे उड़ कर भाग न सकें। अब हमने पाया कि सुरीली क्यों पैदल पैदल चलती है और क्यों उड़ना टालती है? उसके एक तरफ का पंख छोटा था, कटा हुआ, दूसरी तरफ बड़ा था, पूरा था।

अब समझ आया कि क्यों कभी कभी सुरीली अपनी चोंच फर्श पर मार मार कर रोने जैसी आवाज निकालती है….. ओह,
मनुष्य की दुनिया कैसी भयानक क्रूरताओं से भरी है!
इतने प्यारे पक्षी के पंख काटने की क्या जरूरत!
नेह का बंधन सबसे शक्तिशाली है, दूर जाने नहीं देता, चाहे पशु हो, पक्षी हो या आदमी…
फिर क्यों इसकी जरूरत पड़ी?
क्योंकि नेह नहीं, केवल व्यापार है, बाजार है….
इस बार भी हमारे मित्र सज्जन ठगी के शिकार हुए! दोनों के लिए हमारा मन दुखी।
इधर बड़ी मासूमियत से हमें टुकुर टुकुर देखे जा रही प्यारी लाडली सुरीली!
उसका दर्द सिर्फ उसका है!
शिकारी की शिकार सुरीली!
और मित्र सज्जन?
और हम?

हमारा मन सुरीली के लिए और भी प्यार, और भी करूणा से भर भर आया।
हमारी सुरीली, अब हमारे पास है, अब नहीं होगा इसे कुछ। ये जंगल से नहीं आई, ये किसी घर से सीख कर आई है- डर। हाॅ, डर, सीख कर आई है!
अब नहीं डरेगी हमारी सुरीली। मत डरो सुरीली….
तभी सुरीली कुछ सहज हुई और अपनी सचमुच सुरीली आवाज में बोलने लगी -‘‘मैं मिट्ठू, मैं मिट्ठू…. ’’
सुरीली बोले जा रही….
हम आवाक्!
मिट्ठू !?! पूरा घर ‘मिट्ठू’ ‘मिट्ठू’ की गूंज से भर रहा……

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  • अल्पना मिश्र

प्रोफेसर, हिंदी विभाग, उत्तरी परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली- 7

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