Sunday, July 26, 2026
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पल्लवी सक्सेना की कहानी -आखिरी धक्का

  1. जीवन में ना जाने कितने धक्के लिखे होते हैं ना बऊजी। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य केवल धक्के ही खाता रहता है। कभी कोई धक्का उसे खुद लगता है तो कभी कोई और उसे वह धक्का मार देता है।
    “अरे बेटा जीवन में आगे बढ़ने के लिए धक्के खाना बहुत ज़रूरी है। बिना धक्के खाये यदि आप आगे बढ़ भी गए ना तो बहुत कुछ ऐसा पीछे छूट जायेगा जो आप सीख ही नहीं पाओगे। जीवन के ऐसे बहुत से अनुभव होते हैं जो बिना खुद धक्का खाये समझ ही नहीं आते।”
    “हाँ सो तो है। वैसे आपने अपने जीवन में कितने धक्के खाये?”
    “अरे पूछो ही मत। मुझे तो आज भी ऐसा ही लगता है कि मैं अभी भी धक्के ही खा रहा हूँ।” कहते हुए दादा जी हँस दिए।
    उनके पोपले चेहरे पर उनकी यह मधुर मुस्कान कितनी सुंदर दिखाई देती है। उनके चेहरे की झुर्रियों में उनके जीवन का संघर्ष छलकता है।
    “तो आपने अपने जीवन का पहला धक्का कब और कहाँ खाया था?”
    “अरे बेटा कोई एक जगह हो तो बताऊँ। सबसे पहले स्कूल में, फिर राशन की लाइन में, फिर बसों में।”
    “बसों में क्यों?”
    “शहर जाने के लिए। और क्यों, फसल बेचने तो जाना आना पड़ता था ना लल्ला।”
    “ओह हाँ, मैं तो भूल ही गया था, यह बात तो सही है।”
    “फिर तेरी दादी मिली और जीवन ने ऐसा धक्का मारा कि जो कमर अभी भी पिराती है।” कहते हुए दादा जी एक बार फिर से हँसने लगे। इस बार की हँसी ज़ोर की थी पर उसमें कहीं न कहीं दादी के न होने का ग़म भी छिपा था।
    “दादा जी एक बात पूछूँ?”
    “पूछो लल्ला।”
    “क्या जीवन में कभी ऐसा भी धक्का लगता है जो इंसान को अंदर से तोड़ दे। बाहर से नहीं, एकदम भीतर से?”
    दादा जी की हँसी थम गई। उन्होंने मुझे गौर से देखा।
    “लगता है लल्ला। ज़रूर लगता है। और वो धक्का हमेशा कोई अपना ही मारता है। अजनबी तो बस रास्ते में टकराते हैं, धक्का तो वो मारता है जिस पर भरोसा किया हो।”
    उनकी यह बात मेरे मन में कहीं गहरे उतर गई। उस वक्त तो उतर गई, लेकिन समझ बाद में आयी। बहुत बाद में।
    कुछ दिन बीते, मैं वापस अपने शहर लौट गया। ज़िंदगी अच्छी गुज़र रही थी वहाँ। अपना काम था, दोस्त थे और अब तो मैंने वहाँ घर भी ले लिया था। दादा जी ने अब तक जितने धक्के बताये थे उनमें से मैं करीब करीब सभी खा चुका था। पर अब तक मेरे इस जीवन में वो धक्का मुझे लगना बाकी था जो दादा जी को दादी के मिलने पर लगा था।
    खैर कुछ सालों बाद मैंने नौकरी बदल ली। वहाँ मेरी मुलाक़ात एक बेहद खूबसूरत लड़की से हुई जो मेरे ही साथ काम करती थी। वह बहुत बड़े परिवार से ताल्लुक रखती थी। देखा जाये तो उसे काम करने की दूर दूर तक कोई आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन वह खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, या यूँ कहें कि खुद में आत्मनिर्भर महसूस करने के लिए काम करती थी। वह दुनिया को यह दिखाना चाहती थी कि उसके पापा के नाम से उसकी पहचान नहीं है, बल्कि उसमें खुद वो काबिलियत है कि वह अपनी पहचान खुद बना सके। और उसकी यही बात मुझे बहुत पसंद थी।
    समय के साथ हमें एक दूजे से प्यार हो गया और हमने शादी करने का फैसला किया।
    “माँ, पापा, मैंने शादी करने का फैसला कर लिया है।”
    “कब, कहाँ, कैसे, किसके साथ?”
    “किसके साथ मतलब।।।” मैंने डर और हिचक दोनों के साथ कहा। “मेरे ऑफिस में एक लड़की काम करती है और।।।” बाकी शब्द जैसे मेरे गले में ही घुट गए।
    “और? और क्या, आगे भी तो बताओ। कौन है, कहाँ की है, घर परिवार कैसा है?”
    “कहो तो पापा, आ जाएँ रिश्ते की बात करने। भई तुम एक ही संतान हो हमारी। अच्छी तरह ठोक बजाकर ही रिश्ता करेंगे तुम्हारा, पहले से बता रहे हैं।”
    मैंने उन्हें फोन पर ही लड़की और उसके परिवार के विषय में काफी कुछ जानकारी दे दी थी। लेकिन तब भी उन्होंने शहर आने को कहा। मैंने कहा ठीक है।
    वह आये, मैंने उन्हें उस लड़की से मिलवाया। जाने क्यों उन्हें वह ठीक नहीं लगी। बाद में उन्होंने मुझसे कहा।
    “बेटा शादी जैसा सम्बन्ध अपनी बराबरी वालों में ही हो तो अच्छा रहता है। यहाँ सम्बन्ध ना ही बनाओ तो अच्छा रहेगा।”
    “क्यों, ऐसा क्यों लग रहा है आपको?”
    माँ कुछ देर चुप रहीं। जैसे शब्द ढूंढ रही हों।
    “बेटा वह लड़की बहुत होशियार है, यह तो दिखती है। लेकिन जब मैंने उससे बात की तो उसकी आँखों में तुम्हारे लिए जो होना चाहिए था वो नहीं दिखा मुझे।”
    “क्या मतलब है आपका?”
    “मतलब यह कि जब कोई किसी से प्यार करता है तो उसकी आँखें बताती हैं। तुम्हारी आँखें बता रही थीं, उसकी नहीं।”
    “माँ आप बहुत ज़्यादा सोच रही हैं। आँखें पढ़ने लगी हैं आप अब?”
    माँ हल्का सा मुस्कुराईं लेकिन उनकी आँखों में वो बेचैनी बनी रही।
    “बेटा एक माँ की आँखें बहुत कुछ पढ़ लेती हैं, जो बेटे की आँखें नहीं पढ़ पातीं। मैं गलत भी हो सकती हूँ, भगवान करे मैं गलत ही हूँ। लेकिन मन है, जो सही लगा वो बता दिया।”
    पापा जो अब तक चुप बैठे थे उन्होंने धीरे से कहा। “बेटा जल्दी क्या है। थोड़ा वक्त लो। इंसान को जानने में वक्त लगता है।”
    “अरे नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा। आप लोग ज़्यादा सोच रहे हैं।” कहकर मैंने उन्हें चुप करा दिया।
    लेकिन उस रात नींद देर से आयी। माँ की वो बात, “तुम्हारी आँखें बता रही थीं, उसकी नहीं”, किसी काँटे की तरह मन में चुभती रही। सुबह होते होते मैंने खुद को समझा लिया कि माँ को हर बात में शक होता ही है। उनके मन का ना हो तो सभी माँएँ ऐसा ही करती हैं।
    कुछ महीनों बाद हमारी सगाई हो गयी। हालात कुछ ऐसे बने कि मैं चाहकर भी अपने माता पिता को बुला न सका।
    सगाई के बाद ज़िंदगी और भी हसीन लगने लगी। वह मेरे साथ आकर मेरे घर में ही रहने लगी। शादी से पहले ही अब हम दोनों ने साथ रहना शुरु कर दिया था। यह सब मुझे बिल्कुल किसी सपने की तरह लग रहा था। जैसे जैसे शादी की तारीख पास आ रही थी हमारे रिश्ते का रंग और भी गाढ़ा हो चला था।
    फिर एक दिन उसका जन्मदिन मनाने के लिए हम एक पहाड़ी जगह चले गए। वहाँ जन्मदिन की सुबह पहाड़ चढ़ने का प्लान बना।
    रास्ते में वह असामान्य रूप से चुप थी। मैंने पूछा।
    “क्या हुआ, आज जन्मदिन है तुम्हारा, खुश नहीं हो?”
    “हूँ तो।” उसने कहा लेकिन नज़रें दूर पहाड़ों पर टिकी रहीं।
    “कुछ है जो बताना चाहती हो?”
    “नहीं। बस थकान है।” उसने विषय बदल दिया।
    मैंने सोचा शायद सफर की थकान होगी। आगे बढ़ते रहे।
    वहीं एक और इंसान मिला जिसने मुझसे मिलकर खुद को उसका बहुत ही करीबी बचपन का दोस्त बताया।
    “अरे तुम यहाँ?” उसने उस इंसान को देखते ही कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में हैरानी नहीं थी। वो हैरानी जो किसी को अचानक देखने पर होती है, वो नहीं थी।
    मैंने पूछा। “यह कौन हैं?”
    “बचपन का दोस्त है। बहुत पुराना।” उसने लापरवाही से कहा।
    मैंने पहले कभी उसके विषय में अपनी मंगेतर के मुँह से कुछ भी नहीं सुना था। मेरा दिमाग ठनका तो था उस वक्त किन्तु मैंने उस पल जाने दिया।
    पहाड़ चढ़ने से पहले हम तीनों रुके। उस दोस्त ने मुझसे हाथ मिलाया और वह मुस्कुराया। एक ऐसी मुस्कान जिसमें जान-पहचान कम और कुछ और ज़्यादा था। लेकिन उस वक्त मैं उसे पढ़ नहीं पाया।
    चढ़ाई शुरु हुई तो मेरी मंगेतर ने मेरा हाथ थाम लिया। उसकी पकड़ बहुत मज़बूत थी, इतनी मज़बूत कि मुझे अजीब लगा। जैसे वो हाथ पकड़ नहीं रही, थाम रही है। लेकिन उसकी आँखें मुझ पर नहीं, उस दोस्त पर थीं।
    इस बीच कब उसके दोस्त ने मेरा सेफ्टी बेल्ट को काट दिया मुझे पता ही नहीं चला।
    वो धीरे से कुटिल मुस्कान लिए मुस्कुराई और बोली वो मुझसे प्यार नहीं करती। वह तो अपने उस दोस्त से प्यार करती है। मैं तो बस उसके लिए शतरंज का मोहरा था। जिसका उसने अपने पापा की जायदाद हड़पने के लिए इस्तेमाल किया था। मेरे जैसे एक आम आदमी को अपना मंगेतर बनाकर वो अपने पापा को यह दिखाना चाहती थी कि देखो मैंने कितना गलत चुनाव किया है, अब तुम खुद मुझे उस दोस्त के साथ जाने दो। लेकिन उसके पापा नहीं माने। और तब खेल बदल गया।
    मेरे सामने उसने अपने उस मित्र को चूमा। मेरी आँखें बड़ी हो गयी और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उसने मेरा हाथ छोड़कर मुझे खाई में धकेल दिया।
    वो धक्का मेरे जीवन का आखिरी धक्का बन गया होता यदि उस रोज़ मेरी जैकेट का कोना पहाड़ में लगे एक पेड़ में उलझ न गया होता। मैं पूरी तरह घायल और बेहोश था। लेकिन तब भी कहीं न कहीं मेरे दिमाग में दादा जी के वो शब्द गूँज रहे थे।
    “धक्का हमेशा कोई अपना ही मारता है।”
    और माँ की वो बात।
    “तुम्हारी आँखें बता रही थीं, उसकी नहीं।”
    मेरी बेहोशी की हालत में भी यही दो बातें मेरे कानों में गूँज रही थीं।
    और एक सवाल जो उस अँधेरे में भी जलता रहा।
    क्या यह सिर्फ मेरी कहानी है? या उन सभी की कहानी है जो किसी के हाथों मोहरा बन गए, जिन्होंने भरोसा किया और धक्का खाया। वो धक्का जो खाई से नहीं, इंसान के भीतर की खालीपन से आता है। उस खालीपन से जो तब पैदा होता है जब हम अपनी बात किसी से कह नहीं पाते, जब रिश्तों में सच की जगह चालाकी ले लेती है, जब प्यार एक हथियार बन जाता है।
    काश हम एक ऐसा समाज बना पाते जहाँ इंसान अपने मन की बात बिना डर के कह सके। जहाँ रिश्ते नाटक न हों। जहाँ किसी को किसी खाई में धकेलने की ज़रूरत न पड़े।
    तब शायद यह आखिरी धक्का किसी का आखिरी न बने।

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