1986 में जब रीवा मध्य प्रदेश में रंगमंच की शुरुआत की तो पिता जी मेरे पहले रंग निर्देशक सैयद अहमद ज़ैदी को कहते थे कि, “आपने मेरे लड़के को बिगाड़ दिया” जबकि मैं खुद बस अच्छा लगता था; इसलिए रंगमंच करता था। मेरे लिए इसके कोई गूढार्थ नहीं थे, इस रंग सफ़र में क़रीब पन्द्रह साल मुंबई रहा फिर दिल्ली आ गया, श्री हबीब तनवीर, प्रो सतीश मेहता, श्री योगेश त्रिपाठी, अनवर सिद्दकी जी, सागर सरहदी साब, शिवदास घोड़के जी, श्री रंजीत कपूर जी जैसे अनेकों मूर्धन्य लोगों के साथ काम किया। लेकिन मेरे लिए ये भी रंग सफ़र के दौरान हासिल हुई उपलब्धियों से अधिक कुछ नहीं था।
लेकिन कोरोना के कहर के दौरान 2 जून 2020 को जब जीबीएस अटैक के कारण मेरा गले के नीचे पूरा जिस्म लाश बन गया और जिंदगी की सांसे जब टूटने ही वाली थीं, तो मेरे उसी रंगमंच ने मेरे अंदर जीने की उम्मीद को, मौत की गहरी नींद में सोने से बचाया।
जिसके कभी मेरे लिए कोई गूढार्थ नहीं थे, इस अर्थ को आप सबसे साझा करने का अवसर उस समय मिला, जब रंग-वरिष्ठ श्री अनिल गोयल जी ने एक चर्चा के दौरान सवाल किया कि क्या कला संस्कृति और रंगमंच दिव्यांगों या रोगों में कुछ योगदान करता है ? एक पल में मेरी आंखों के सामने मुझे मेरी बीमारी और फिलहाल बीमारी से आई दिव्यांगता में मिली ज़िंदगी कौंध गई। अपने इसी अनुभव को हर्फों का जामा पहनाकर आपके सामने रख रहा हूं।
यहां आपको बता दूं कि अभी इस बीमारी से पूरी तरह छुटकारा नहीं मिला है। यहां आपको पहले बीमारी के आक्रमण और उसकी भयावहता, उसके इलाज के ढेरों उपाय बताऊंगा। लेकिन ठीक न होने की दशा में किस तरह कला संस्कृति और रंगमंच ने मुझे उबारा या उबार रहा है, इसे बताते हुए उसके वैज्ञानिक कारण का खुलासा करूंगा।
बीमारी का अटैक और निष्प्रभावी उपाय
कोरोना लॉक डाउन में सभी की तरह मेरी ज़िंदगी भी ख़ाली हो गई थी। गलियों का सन्नाटा मेरे अन्दर सांसे लेने लगा था। हालांकि कोरोना के आक्रमण के पहले, दिसंबर 2019 से अपनी निरंतर नाट्य गतिविधियों से बेहद ख़ुशनुमा सांसें ले रहा था। दिसंबर में अपने नेटिव प्लेस, रीवा में एक रंग कार्यशाला करते हुए अपना लिखा नाटक “उसके साथ” अपनी संस्था ‘प्रासंगिक’ से किया। इसके बाद हबीब तनवीर साब के नया थिएटर के नाटक ‘आगरा बाज़ार’ का शो करने लखनऊ गया, इसे मैं 2004 से लगातार कर रहा था। जनवरी में अपने एकल नाट्य ‘ख़्वाब’ की रीडिंग करने जावेद जैदी स्मृति नाट्य पाठ में भोपाल गया। फरवरी में इसी एकल नाट्य का मंचन करने रुड़की आईआईटी गया और फिर मार्च के पहले पखवाड़े में केरल के पय्यानूर गया। इसमें रंग साथी रामचंद्र सिंह मेरे लेखन निर्देशन में एक्ट करते हैं।
इसके बाद संभावना बन रही थी कि संगीत नाटक अकादमी और ब्रह्माकुमारी मिशन माउंट आबू में शो करने जाएंगे। इसीके साथ दूरदर्शन के शो “बातें फ़िल्मों की” के हर महीने दो तीन एपीसोड लिख रहा था। लेकिन मार्च के तीसरे हफ़्ते के अंत मे सम्पूर्ण लॉक डाउन लगा तो लगा सांसें थम गईं। सारे कार्यक्रम स्थगित हो गए, दूरदर्शन के सारे लाइव प्रोग्राम भी बंद हो गए। ये एक बड़ा झटका था। ऐसे निराश करने वाले समय में मैंने कुछ कविताएं लिखीं, एक छोटी कहानी लिखी और एक पूर्णकालिक नाटक भी लगभग लिख लिया था। इसी के साथ व्यस्त होने का एक और उपक्रम कर लिया और अपनी संस्था ‘प्रासंगिक’ से पिछ्ले 15 दिन में एक दिन के ब्रेक पर श्री अशोक मिश्रा, जे पी सिंह जयवर्धन, योगेश त्रिपाठी, देव फौजदार, आशीष श्रीवास्तव और संजय श्रीवास्तव के 6 नाटकों की ज़ूम मीटिंग के ज़रिए ऑनलाइन रीडिंग करवाई। इसी श्रृंखला में 31 मई 2020, को संगीत नाटक अकादमी के उप सचिव (ड्रामा) सुमन कुमार जी ने परिचर्चा आयोजित की, जो संयोग से लॉक डाउन का अंतिम दिन था। सुबह 11 बजे से ऑनलाइन ज़ूम मीटिंग की शुरुआत हुई जो क़रीब दो घंटे चली और, डिजिटल माध्यम से संस्कृति कर्म करते हुए किस तरह से अर्थोपार्जन किया जा सकता है, मुद्दे पर बड़े ही सारगर्भित तरीक़े से परिचर्चा हुई।
मीटिंग ख़त्म कर बेहद थके हुए शरीर के साथ दाल-चावल बना कर अनमने ढंग से खाया, लॉक डाउन के चलते पत्नी-बच्चों के मायके में फंसने के बाद; मेरी ज़िंदगी से स्वाद ही चला गया था; पर जीने के लिए कुछ खाना ज़रूरी होता है तो खाया। मीटिंग की ख़बर सोशल मीडिया में अपडेट करने के साथ कुछ समाचार पत्रों में भी उसे प्रेषित किया। ये पिछले 15 दिनों से लगभग रोज़ का काम हो गया था। पहले घंटों एक जगह बैठकर मीटिंग आयोजित करना फिर उसको हर जगह अपडेट करना। सुबह से देर शाम तक यही काम था। फिर लेटे–लेटे ही अगली ज़ूम मीटिंग के लिए मुंबई, भोपाल, रायपुर आदि कई जगह बात की और सबके साथ 4 और 5 जून को मीटिंग फिक्स करने के बाद, पुनः फ़ोन करने की बात कही; जो मेरी मौत जैसी अवस्था से पूरा नहीं होने वाला था। लेकिन ये अभी मुझे पता नहीं था। थोड़ा आराम करने के बाद बाद न्यूज़ देखने लगा, सभी अपने समाचारों में लॉक डाउन हटने के बाद सावधानियों का अंबार परोसने में लगे थे, जो सभी को डरा अधिक रहे थे, जिसमें मैं भी शामिल था। पूरे लॉक डाउन में सभी चैनल्स ने पूरी ईमानदारी से इसे (डर को) परोसा था। थोड़ी ही देर में मुझे थोड़ी भूख लगने लगी तो उठकर बचे हुए दाल चावल को गरम करके उसे खाने बैठ गया। उसके बाद महसूस हो रही कमज़ोरी के मद्देनज़र एक गिलास दूध गुनगुना किया पीने के लिए(जो करना अमूमन मैं पसंद नहीं करता) वास्तव में मुझे दूध, फल आदि पीना-खाना पसंद नहीं था। मेरा विश्वास केवल दाल-चावल, रोटी-सब्ज़ी में था। यहां तक कि अगर कभी बाहर भी जाता था, तो चाहे देश हो या विदेश या कितने ही बड़े होटल में हो या प्लेन में हो दाल-चावल, रोटी-सब्ज़ी ही मांगता था। ऐसे ही हबीब तनवीर साब के ‘आगरा बाज़ार’ ड्रामा शो के दौरान जर्मनी की बॉन सिटी में मैंने कुछ अपने जैसे साथियों के साथ दाल-चावल, रोटी-सब्जी साढ़े चार यूरो में खाया तो परम सुख का अनुभव किया था कि विदेश में भी मैं वही खा रहा हूं जो खाता हूं। हालाँकि आने वाली मेरी जिस्मानी आपदा मुझे ठीक करने के चक्कर में सब कुछ खिलाने वाली थी।
बहरहाल मैंने दूध पीकर सोने की कोशिश की बहुत देर बाद मुझे नींद आई। अगले दिन एक जून की सुबह उठने की कोशिश की तो कल से अधिक कमज़ोरी का अनुभव किया। उठकर बाथरूम जाने को हुआ तो घुटनों से सीधे खड़ा नहीं हो सका और दीवार का सहारा लेना पड़ा। एकदम से समझ नहीं आ रहा था कि इतनी कमज़ोरी क्यों लग रही थी। जैसे-तैसे फ्रेश हुआ, रोजाना की पूजा की, फेसबुक में अपडेट भी किया कि पता नहीं क्या हुआ है, इतनी कमजोरी लग रही है, जैसे अंदर से कोई उसे चूस रहा हो। अनजाने में मैंने वो सत्य लिखा था जो आगे चलकर उद्घाटित होने वाला था। जहां मेरा ही एम्यून सिस्टम मेरी नसों को धीरे-धीरे कुतर रहा था। बेसिकली मैं नर्व की रेयर बीमारी GBS का शिकार हो चुका था।
इस बीमारी से अनजान, मैंने मित्र संजय परिहार को फोन किया और अपनी कमज़ोरी के बारे में बताया। फिर जो नापसंद था यानि दूध, अंडा और मेडिकल स्टोर से बात कर न्यूरोबियान टैबलेट लाने को बोला। मुझे याद था कि मां को पैरालेसिस के समय पिता जी सदा इस गोली को खिलाते थे, कमज़ोरी के लिए। संजय ये सब दे गया और फिर शाम को आने को बोला। इतने में बगल में रह रहे साढू भाई के परिवार के यहां से अच्छा सा नाश्ता आ गया जो ज़्यादातर उनके यहां से आ जाता था, बाकी दिन मैं दाल-चावल बना कर काम चला लेता था। जो भी हो लेकिन एक अजब कमजोरी से मेरा पूरा सिर झन्ना सा रहा था। दीवार के सहारे मुड़े हुए घुटने के साथ कभी किचेन जा रहा था तो कभी एक कमरे से दूसरे कमरे। फिर थोड़ा आराम करने का सोचा पर सो न सका। कुछ इधर-उधर फ़ोन किया, आगे की ज़ूम मीटिंग के लिए। ये करते-करते शाम होने को आई तो संजय आ गया। वो जो भी सुबह दे गया था सब वैसे ही पड़ा था। दरअसल पूरे दिन, कुछ करने की कोशिश की, पर हिम्मत नहीं हुई थी। संजय ने आमलेट बनाया, दूध गर्म करके दिया। इतने में साढू भाई भी आ गए और जब मेरी कमज़ोरी देखी तो रिवाइटल लेने की भी बात कही कि, एक उम्र के बाद लेना चाहिए।
सबसे हंसते-बोलते हुए ये तय हुआ कि कल (2 जून 2020) डॉक्टर से कुछ ग्लुकोज की बोतल चढ़वा लेंगे तभी ये कमज़ोरी जायेगी। सब खा कर टैबलेट और दूध लिया और दोनों को विदा करके, सोने की कोशिश करने लगा। लेकिन नींद से ज़्यादा मुझे अपनी कमज़ोरी सता रही थी। देर रात मुझे थोड़ी नींद आई ही थी कि रात तीन बजे के क़रीब मुझे मोशन महसूस हुआ, तो दीवार के सहारे बाथरुम गया और वेस्टर्न टॉयलेट में बैठकर थोड़ी कोशिश की पर पेट साफ़ नहीं हुआ। मैंने वहां से दीवार के सहारे उठने की कोशिश की पर मेरे घुटनों ने साथ नहीं दिया, और अधिक कोशिश की तो खड़े होने की बजाय मेरे घुटनों ने पूरी तरह मेरा साथ छोड़ दिया और संभलते हुए बाथरूम में नीचे गिर गया। मुझे काटो तो ख़ून नहीं, कि ये क्या हो रहा है मेरे साथ?
किसी तरह हाथ धोया और घिसटते हुए लगभग अर्ध नग्न अवस्था में सबसे पहले मेन गेट को खोला और फिर घिसटते हुए बिस्तर पर जा कर ट्राउजर को ठीक किया। फिर बगल में साढू भाई को फ़ोन किया। इतनी रात या यूं कहें कि इतनी सुबह-सुबह कोई भी जगा नहीं होता सो कई-कई बार फ़ोन किया और तब कहीं बात हुई। वे और मेरी पत्नी की बड़ी बहन हड़बड़ाती हुई आये और जब उन्हें पता चला कि मेरी दोनों टांगे निष्क्रिय हो गई हैं तो ये निर्णय हुआ कि तत्काल अस्पताल चला जाय। मदद के लिए मित्र संजय परिहार को फ़ोन किया। वहां भी कई बार फ़ोन करने के बाद बात हो सकी। थोड़ी ही देर में संजय भी आ गए। अब समस्या थी गाड़ी की, संजय ने बिल्डिंग ओनर से बात की पर कोई मनमाफ़िक जवाब नहीं मिला।
कोरोना की दहशत अभी ख़त्म नहीं हुई थी, तो ज्यादातर लोग कट रहे थे। कैब भी अभी सुचारू रूप से चल नहीं रही थीं। इधर ये सब वाहन के लिए परेशान हो रहे थे तो मैंने दिल्ली की एम्बुलेंस सेवा के 102 नंबर पर डायल किया। आश्चर्यजनक रूप से ये सेवा काम कर रही थी और थोड़े डिटेल्स लेने के बाद 20 मिनिट में एक एम्बुलेंस कैब आ गई। इससे एक राहत मिली और फिर किसी तरह पकड़ कर मेरे शरीर के आधे मृत हो चुके हिस्से को संभालते हुए बड़ी मुश्किल से मुझे पांच मंजिला मकान से नीचे उतारा गया और गली के मुहाने ले गए जहां एम्बुलेंस कैब खड़ी थी। अब तक सुबह के पांच बज चुके थे। काफ़ी लोग जग चुके थे, गली के मुहाने की दुकान भी खुल गई थी। सब लोग मुझे लगभग घिसटते हुए ले जाते हुए तमाशा देख रहे थे पर कोई अन्य मदद के लिए बिलकुल आगे नहीं आया, सब को लगा कोरोना हुआ है।
वे मुझे लेकर अल्लसुबह, पास के लालबहादुर अस्पताल पहुंचे। झा जी (साढू भाई) ने एक स्ट्रेचर का प्रबंध किया, उसे सेनिटाइज करके लिटाया और संजय ने मुझे इमरजेंसी डॉक्टर से दिखवाया। उन्होंने बीपी, टेंपरेचर आदि चेक करके एक अन्य डॉक्टर के पास भेजा। उसने दूर से देखकर बिना कुछ बताए सीधे सफदरगंज अस्पताल रेफर कर दिया। सफदरगंज के लिए फिर 102 नंबर पर फ़ोन करना कारगर रहा और थोड़ी देर में एम्बुलेंस कैब आ गई।
ये सब करते हुए सुबह 6.30 बजे वे दोनों मेरे आधे लाश बन चुके शरीर को लेकर सफदारगंज अस्पताल पहुंचे। यहां हर तरफ़ कोरोना के पेशेंट या उनके तीमारदार ही दिख रहे थे। ऐसे में जैसे-तैसे एक स्ट्रेचर का प्रबंध किया गया, उसे पहले सेनिटाइज किया फिर मुझे लिटाकर इमर्जेंसी में दिखाया। डॉक्टर ने लालबहादुर अस्पताल का पर्चा देखकर हालत से संबंधी कुछ सवाल पूछे और फिर ढेर सारे टेस्ट लिख दिए, एक्सरे, ईसीजी, ब्लड टेस्ट। सब जगह लम्बी लाइन थी। कोरोना पेशेंट तथा नॉर्मल पेशेंट की अलग लाइनें थी। स्ट्रेचर में उसे घसीटते हुए कभी इधर तो कभी उधर टेस्ट तो करा लिया। अब ज़्यादातर टेस्ट रिपोर्ट दस बजे के बाद मिलने की बात हुई। इस पर अस्पताल के बाहर एक पेड़ की छाया में मेरे स्ट्रेचर को लाकर, पास में संजय बैठे गए और झा जी टेस्ट रिपोर्ट लेने के लिए काउंटर में लाइन लगाने पहुंच गए। मैं अस्पताल के बाहर अपने आधे मृत हो चुके शरीर को देख रहा। सामने कुछ मीटर दूर एक मृत व्यक्ति का शरीर पड़ा हुआ था, मक्खियां भिनभिना रही थीं, किसी से कुछ लेनायेदेना नहीं, सब उससे बच कर निकल रहे थे। मैं सिहर गया, हाथों को, पेड़ से झांकते, आसमान की ओर उठाकर प्रभु को याद किया। इधर टेस्ट लेने और फिर मुझे डॉक्टर को दिखाने के चक्कर में शाम हो चली थी। शाम होते-होते साथ आए हुए लोग किसी तरह दवाई लिखाकर घर वापिस आना चाहते थे। वैसे भी अस्पताल के उस डरावने माहौल में कोई नहीं रहना चाहता थ। वे मुझे संभालते हुए अस्पताल के बाहर ले आए। तभी मुझे ज़ोर की पेशाब लगी तो दोनों मुझे संभालते हुए टॉयलेट ले गए, पर ये क्या मैं संभाले नहीं संभल रहा था। न ही पैंट की जिप खोल पाया। पता चला कि मेरे हाथों ने भी काम करना बंद कर दिया था। ये देखकर न सिर्फ़ मेरे तीमारदार डर गए बल्कि मैं ख़ुद भी सहम गया। अब मुझे दो लोग मिलकर भी संभाल नहीं पा रहे थे। अब मैं गले के नीचे पूरी तरह से लाश बन चुका था और किसी लाश की ही तरह भारी भी हो गया था। ना मालूम ईश्वर ने मेरे सिर को क्यों जिंदा रखा था? उसकी भी इति श्री हो जाती तो, जो अविश्वनीय घट रहा था उसके बारे में सोचना, देखना नहीं पड़ता। इसके बाद दोनों मुझे फिर डॉक्टर के पास ले गए। अस्पताल वालों ने भी दया खा कर या मज़बूरी में, जो भी कहें, भर्ती कर लिया। इधर अस्पताल लाते समय साढू भाई ने लॉक डाउन के कारण मायके में फंसी हुई मेरी पत्नी को भी फ़ोन कर दिया था। पत्नी को पता चला तो वो सदमे में आ गई। प्राइवेट अस्पताल में जाने की बात हुई लेकिन शुरु में वहां आईसीयू में प्रति दिन 75 से 90 हज़ार का चार्ज आ रहा था और आईसीयू में कब तक रहना पड़ेगा ये अज्ञात था ऐसे में हिम्मत डोल गई। तब इसी अस्पताल में अच्छे इलाज के लिए जोर लगाया जाए यही कोशिश की जाए, इधर-उधर खूब फ़ोन घनघनाये गए। इसी बीच संजय ने मेरी गंभीर हालात का एक छोटा सा वीडियो फेसबुक में डाल दिया। इसके बाद तो लगभग पूरे देश से रंग–साथियों के चिंता करते फोन आने लगे और इसी के साथ मदद के लिए ढेरों हाथ आगे बढ़े, रंग वरिष्ठ अरविंद गौड़ जी ने अस्पताल मैनेजमेंट को कई फ़ोन किए और जब तक अस्पताल में रहा और उसके बाद भी रोज़ाना फ़ोन करके हाल चाल लेते रहे और ऐसे ही अनेकों फ़ोन आते। हालांकि मेरी ज़्यादातर लोगों से बात नहीं हो पाती; क्योंकि मेरा सिर ही थोड़ा हिलता था बाकी पूरा जिस्म निस्तेज पड़ा हुआ था। ऐसे में फ़ोन कोई अपने हाथ से पकड़ कर मेरे कान पर सटा कर रखता, तब ही कोई बात हो पाती थी। लेकिन उस दौरान मैं बात कम कर पाता था रोता ज़्यादा था। ख़ैर इस तरह चौदह दिन के बाद जब घर लौटा तो 73 किलों से वज़न 59 किलो हो गया था, किसी जनाजे की तरह चार लोग टांग कर पांच मंजिलें मकान में ले गए और फिर अंग्रजी दवाओं के साथ शुरु हुई फीजियोथेरेपी, आईवीजी इंजेक्शन लगने के बाद प्रमुख उपाय यही था। लेकिन कोई असर होता न देख होपियोपैथी और आर्युवेद की दवाएं की गई। बंबावाड, इहिवास और मैक्स अस्पताल में दिखाया गया, इसी बीच लूज़ मोशन ऐसे शुरु हो हुए कि पत्नी दिन भर डायपर बदलते-बदलते परेशान हो जातीं। मेरी हालत बद से बदतर हो चली। छः महीने हो रहे थे लेकिन गले के नीचे का पूरा बदन छोड़िए एक ऊँगली भी नहीं हिला पा रहा था। सबके साथ मुझे भी लगा कि, अब नहीं बचूँगा, यहाँ तक कि फीजियोथैरपिस्ट ने कहीं किसी से बोला कि ये अब ठीक नहीं होंगे … ऐसे में पत्नी ने एक दूसरे फीजियोथेरेपिस्ट को तलाश करना शुरू किया। मुझे लगा “क्या जो भी मेरा किया धरा या लिखा पढ़ा है सब यूँ ही धरा का धरा रह जाएगा?” मन ने एक निश्चय किया कि, “नहीं मैं यूँ ही नहीं मर सकता” और ऐसे में मैंने जो छोटे बड़े सात नाटक लिखे थे; जिनमें से पांच नाटकों का प्रोडक्शन कर चुका था। हालाँकि इसमें बीमारी के पहले लिखे एक फुल लेंथ नाटक में थोड़ा सुधार करना था तो अपने बारह वर्षीय बेटे को लैपटॉप लेकर बैठाया ठीक करवाया और फिर इसके छपने की संभावना के लिए बेटे से बोलकर इधर-उधर फोन लगवाया। इसी तलाश में मारवाह स्टूडियो के ब्राडकास्टिंग डायरेक्टर सुशील भारती जी से बात हुई। इनका राही पब्लिकेशन था। छपने केलिए स्पांसर करने केलिए कला भारती फाउंडेशन की, ममता सोनी जी आगे आईं…. इस नाट्य संग्रह को छपने में करीब सात महीने लग गए और मेरे मानों इसके छपने तक प्राण अटके हुए थे कि किताब का क्या चल रहा है? इसका नाम क्या होगा? इसका कवर पेज कैसा होगा? इसपर सुशील जी से चर्चा होती। फिर इसकी प्रूफ़ रीडिंग पर बात आई तो इसे पत्नी ने किया, पत्नी किसी बच्चे की तरह मेरी सम्पूर्ण सेवा-सुश्रुषा में लगी ही हुई थी। जबकि नए आए फीजियो थैरपिस्ट मेरे बदन में जुम्बिश देने की कोशिश में लगे थे …। कई महीनों बाद लूज मोशन भी ठीक हुए, इस सबमें जब मैंने फाइनल प्रूफ पढ़ा तो लगा एक नाटक में कुछ और चीज लिखनी चाहिए… पर कैसे? तो आपको बता दूँ कि, इस किताब के प्रकाशन की हुलास ने मेरे दाहिने हाथ के अंगूठे में थोड़ी जुम्बिश देदी थी। वास्तव में मेरे अन्दर किताब छपने की कवायद ने बीमारी से ध्यान को हटा दिया था। उसके लिए, बाहर से जो प्रयास हो रहे थे, उनके साथ अब अन्दर से भी स्वतः प्रयास होने लगे थे और करीब एक साल होते-होते मेरा मुर्दा शरीर तड़प रहा था, हिलने डुलने के लिए, फिजियोथैरेपिस्ट दिन एक बार थैरपी करते; उसके बाद उनके कहने पर पत्नी बिस्तर पर उठाकर थोड़ी देर तक बैठाने का अभ्यास करवाने लगी, पकड़कर उठने-बैठने और चलने का अभ्यास करवाने लगी। हालाँकि घुटनों में ताकत न होने के कारण दो बार बुरी तरह से गिरा। जिसमें एक बार, बाएं पैर में बहुत ही तकलीफदेह मोच आई …ऐसे में भी एक अजब आत्मविश्वास के साथ एक अंगूठे से फ़ोन पर हल्के-हल्के लिखा, फ़ोन पर बात करके सुधार करवाया और फिर मेरे छोटे-बड़े सात नाटकों का संग्रह “ख्वाबों के सात रंग” छप कर आ ही गया। इसका ऑनलाइन विमोचन मारवाह स्टूडियो में, इसके चेयरमैन श्री संदीप मारवाह, सुशील जी, ममता जी, प्रसिद्ध नाटककार प्रताप सहगल आदि की उपस्थिति में 14 सितम्बर 2021 को हुआ। मेरे ख़ुशी के आंसू छलक आये। कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ। शेखर वाणी में और इस सबके पहले सुश्री रितंधरा मिश्रा के ऑनलाइन साक्षात्कार हुए। नेचर के साथ मैं, सभी के सामने नतमस्तक था। इस नाट्य-संग्रह ने बाद में, एनएसडी की बुक-शॉप में भी शोभा बढ़ाई; जिसने मुझे अपार प्रसन्नता प्रदान की। इसीके साथ बॉलीवुड और रंगकर्मी साथियों के साथ कई पत्रकार साथियों ने इसे हाथों हाथ लिया। लोग किताब को लेते उसकी सेल्फी भेजते, फेसबुक पर डालते, कुछ अच्छी बातें कहते।
इसने मुझे एक ऐसी उर्जा दी कि उठने-बैठने की ताक़त में थोड़ा और इज़ाफ़ा हुआ। अब बिना मदद के बिस्तर से ज़ोर लगाकर उठने लगा। दीवार पकड़ कर कमरे में चलने का अभ्यास करने लगा। पत्नी मुझे पकड़कर वेस्टर्न टॉयलेट ले जाने लगी।
यहाँ ये अंडर लाइन करता चलूँ कि फिजियोथेरेपी के साथ इस बीमारी के लिए अनिवार्य प्रोटीन डाइट लगातार चालू थी। लेकिन इसका फायदा तब मिलना शुरू हुआ, जबसे किताब की गतिविधि का आगाज़ हुआ। इसे अनुभव करते हुए और इन हो रहे सुधारों के बीच, मैं अपनी और किताबों की पांडुलिपियों के काम में व्यस्त रहने की कोशिश करने लगा। अपने रंगकर्म तथा सिनेमाई सफ़र के तीन दशकीय संस्मरण को पूरा करने की कोशिश में लग गया। इसमें अपनी बीमारी के अनुभवों को संजोया। इस दौरान मेरे जहन में मंच पर काम करने की स्मृतियों के साथ , कैमरे के सामने एक्ट करना घूमता रहता। फिर से मंच पर पूरी रंगत से काम करने के ख्याल, मेरे अंदर एक अजब उर्जा भरते थे। इसे पूरा करने के बाद रंग–मित्र अरुण शेखर के मार्फ़त, इंडिया नेटबुक्स के लेखक/प्रकाशक डॉ संजीव कुमार से बात हुई और फिर यहाँ प्रूफ रीडिंग, इसके कवर पेज की लम्बी कवायद चली। इसबीच मैं अब ख़ुद ही दीवार का सहारा लेकर बाथरूम जाने लगा और अकेले घर में धीरे-धीरे संभल संभल कर चलने लगा। हालाँकि थोड़ा भी ऊपर नीचे होता, सीढियाँ होती तो फिर नहीं हो पाता था। लेकिन ऐसे में पत्नी के सहयोग से ब-मुश्किल सौ कदम की दूरी पर स्थित फिजियोथेरेपिस्ट के क्लीनिक जाने लगा और फिर बीमारी के दूसरे साल के अंत तक, दूसरी किताब छपकर सामने आ गई। जिसका 9 दिसंबर 2022 को एक बार फिर मारवाह स्टूडियो में विमोचन हुआ। लेकिन इस बार साथी प्रताप सिंह जी की मदद से या कहें कि उनका हाथ पकड़-पकड़ कर, इस विमोचन में ख़ुद भी शरीक हुआ। सामने मारवाह के सैकड़ों बच्चे, सुशील भारती जी, ममता सोनी जी, मेरे पुराने रंग-साथी पुरुषोत्तम भट्ट जी, प्रतिभा जैन जी, पत्रकार साथी प्रशांत त्रिपाठी जी, मंच पर संदीप मारवाह जी, ब्रजेन्द्र कालरा जी और अनेकों स्व नाम धन्य लोग। ऐसे मौके पर किताब का विमोचन। उसके बारे में बोलना और बजती तालियों ने गज़ब की उर्जा भर दी। इस विमोचन के बाद उपेन्द्र नाथ रैना साहित्य संवाद मंच में, अनिल पाण्डेय जी, जिन्होंने काफ़ी कुछ आर्थिक मदद की कोशिशें भी की थीं, के मार्फ़त बुक-अड्डा में इंटरव्यू हुए और कई स्थानों के साथ हंस जैसी जानी-मानी पत्रिका में संगम पाण्डेय जी की बेहतरीन समीक्षा छपी। कई साथियों ने इसे ख़रीद कर, किताब के साथ सेल्फी भेजी। इसी के साथ मुझे किताब के प्रकाशन ने चित्रा मुद्गल जी, गिरीश पंकज जी, महेश दर्पण जी, प्रताप सहगल जी जैसे अनेकों प्रसिद्द साहित्यकारों के मध्य 2022 का ‘इंडिया नेटबुक्स नाट्य-रत्न’ साहित्य सम्मान भी प्रदान किया। इसने मेरी एक्सरसाईज़ की शिद्दत को और बढ़ा दिया।
वहीं धीरे-धीरे इस बीमारी में तीन साल हो रहे थे लेकिन एक बात कहीं अन्दर से समझ आ रही थी कि, पूरी तरह से ठीक होने की इनर पावर, कला, संस्कृति और रंगमंच की गतिविधियों से किसी भी तरह अपने को जोड़कर व्यस्त रखने आ रही है। लोगों के स्नेह से आ रही है। ये किसी नेम-फेम से कहीं अधिक, एक ऐसा जीवन अमृत था जिसने मेरी सूख चुकी जीवन-बेल में हरितमा लाने का काम किया था। इसलिए कभी कोई कहानी या कविता या नाटक लिखने बैठ जाता। अपने सोलो नाटक ‘ख़्वाब’ का शो करने के लिए, लोगों को बुलाने के लिए फिलर भेजता। इसी बीच कुछ अन्य साथी मेरे इस सोलो को कर रहे थे; ये भी एक सुखद बात थी। इसीके साथ इधर-उधर बिखरी कविताओं और कहानियों को धीरे-धीरे लैपटॉप पर टाइप करके, पाण्डुलिपि बनाने में अपने व्यस्त रखने लगा।
इसी क्रम में एक काव्य संग्रह “अफ़सोस की ख़बर” का, ज्ञान मुद्रा प्रकाशन, भोपाल से छपने की दिशा में कवर पेज भी बन गया। ऐसे ही कुछ समय के लिए एक योग गुरु, ‘बृजेश शुक्ल’ इक्यूप्रेशर केलिए मेरे पास आते थे। उन्होंने बातों ही बातों में स्वच्छता पर बच्चों के लिए एक छोटा नाटक लिखने के लिए कहा और उसका पेमेंट देने के लिए भी बोला जो उन्होंने उसका शो करने के साथ दिया भी। इसने मुझे बेहद खुशी देने के साथ ऊर्जा भी प्रदान की। ऐसे ही करते हुए समय के साथ पांच और छोटे नाटक लिख गए। जिनका “पंचरंग” नाम से एक संग्रह, इंडिया नेटबुक्स नोएडा, से प्रकाशित होने की कवायद शुरू हो गई है। जिसका बाद में, प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स के स्टॉल में विश्व पुस्तक मेले में, लोकार्पण हुआ और साहित्य(आज तक के यू ट्यूब चैनल) में श्री जेपी पाण्डेय जी ने इसकी बेहतरीन समीक्षा की। ऐसे में एक अच्छी बात ये हुई कि मेरे पुराने बॉस, राघवेश अस्थाना ने, अपने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ‘मितवा’ (अब महुआ ख़बर) में काम भी दे दिया, इसने एक मासिक आर्थिक संबल प्रदान किया। बता दूं कि रंग सफर के साथ जो थोड़ा बहुत सिनेमाई सफ़र रहा उसमें भी आर्थिक संबल के लिए, पत्रकारिता मेरा दूसरा घर रहा, जिसमें स्पेस टीवी, प्रज्ञा टीवी, महुआ टीवी, न्यूज एक्सप्रेस आदि कई चैनल मेरे पड़ाव बनें। इन संपर्कों ने मुझे बीमारी की गंभीर हालत में क़रीब आठ लाख रुपए की मदद दिलवाई। मेरे लगभग हर क़रीबी ने किसी न किसी रूप में मदद प्रदान की। उन सबके नाम चाहते हुए भी इस आलेख में शामिल नहीं कर पा रहा हूँ; जिनका मैं सदा ऋणी रहूंगा(मेरे पूरे सफ़र का ज़िक्र मेरी क़िताब “एक रंगकर्मी की यात्रा” में लिखा हुआ है)।
बहरहाल बीतते समय के साथ एक दिन अचानक, संगीत नाटक अकादमी से विजय सिंह जी का फ़ोन आया कि ओडिशा के राउरकेला में त्रिदिवसीय एक प्ले राइट वर्कशॉप के लिए जा सकते हैं। पहले मन घबराया। लेकिन फिर हिम्मत की और फिर राउरकेला में अभिराम दामोदर जी तथा आसिफ अली जी के साथ तीन दिन, 25 युवाओं के साथ नाट्य लेखन कार्यशाला की। इसने बाहर निकलने का एक बड़ा आत्म-विश्वास भरा, ये 9 मार्च 2020 को केरला के पय्यानूर में, अपने नाटक ‘ख्वाब’ के शो करके लौटने के, करीब साढ़े तीन साल बाद ऐसा हुआ था कि कहीं बाहर अकेले निकला था। ये मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, जिसके लिए संगीत नाटक अकादमी के सभी पदाधिकारियों के साथ, समेत सुमन कुमार जी का तहे दिल से शुक्रिया। जिन्होंने गंभीर बीमारी के बेहद गंभीर दिनों में सदा हौसला दिया कि ‘ठीक होइए’ अभी बहुत काम करना है और इसकी शुरुवात उन्होंने कर दी।
ऐसे ही अनेकों रंग-स्नेहियों ने खूब मदद की, सदा हाल-चाल लेते रहे, उन सबका तहेदिल से शुक्रिया और शुक्रिया।
इसी बीच हबीब तनवीर साब के नया थिएटर के निर्देशक राम चन्द्र सिंह जी से बात हुई और आगरा बाज़ार के शो की चर्चा हुई। चूँकि मेरे मूवमेंट सामान्य नहीं हैं। लेकिन मुझे लगता है कि, जिस दिन मंच में आऊंगा उस दिन एक अलग उर्जा मेरे अन्दर प्रवाहित होगी जो एक दिन पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करेगी। ये सोच सबसे पहले फलीभूत हुई 22 जनवरी 2024 को। मेरे नाटक ‘उसके साथ‘ मंचन से, जो साहित्य कला परिषद के ‘भरत मुनि नाट्य उत्सव’ के अंतर्गत LTG सभागर में मंचित हुआ। ये मंचन साथी प्रताप सिंह, इन्ही के ज़रिये मिले ड्रामा टर्जी थिएटर के प्रिय साथी सुनील चौहान, इसके 20 दिन के अभ्यास में मेरे मूवमेंट काफ़ी खुले, इसके बाद साल 2024 में मुंबई, दिल्ली, पोर्ट ब्लेयर, सहारनपुर, गिरडीह, अलवर, गाज़ियाबाद, भोपाल जैसे शहरों में उसके साथ के 7शो, ख्वाब के 4 शो, दिगदर्शक का एक शो, आगरा बाज़ार के 7 शो, बन्ने की दुल्हनिया के 3 शो किए, ये बेहद अद्भुत था और किसी GBS पेशेंट का महज 75% रिकवर होकर, मंच पर किया पहला परफॉर्मेंस भी था। इसके बाद इस नाटक के शो सहारनपुर, गिरडीह, मुंबई में किये, इसीके साथ अपना सोलो प्ले ख़्वाब तैयार किया और इसके शो दिल्ली और मुंबई में किये। वहीं सुनील चौहान भाई के साथ नाटक दिगदर्शक का भी एक शो किया तो मित्र प्रताप सिंह के आग्रह से बन्ने की दुल्हनिया कहानी पर नाट्य रूपांतरण करके दिल्ली, गाज़ियाबाद और अलवर में शोज किये। इसी बीच आगरा बाज़ार शो के अभ्यास के लिए पहले भोपाल गया और फिर इसके शो के लिए पोर्ट ब्लेयर गया। बाद में इसके कई शो दिल्ली, गुड़गांव और भोपाल में किये। इसी दौरान भोपाल में मित्र मामा अशोक दीक्षित के साथ एम्स के एक डॉक्टर को दिखाया। वे बोले आपको जी बी एस का अमसम वेरिवेंट है और इसमें आपकी प्रोग्रेस बहुत खुश करने वाली है, इस वेरियेन्ट के लोग अकेले सफऱ बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं जबकि आप आराम से कर रहे हैं। ये सुनना बेहद आश्वस्त करने वाला था। इस आश्वस्त करने वाली सक्रियता में साल के अंत में मेरा नया नाट्य–संग्रह ‘अजीब दास्तां..’ आया जिसका लोकार्पण राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में भारंगम के अंतर्गत श्रुति कार्यक्रम में 4 फरवरी 2025 को निदेशक श्री चितरंजन त्रिपाठी, श्री संगम पाण्डेय और डॉक्टर प्रकाश झा ने किया। इसके बाद 6 फरवरी को सुनील चौहान जी द्वारा आयोजित नोयडा रंग महोत्सव में भी श्री संदीप मारवाह और अन्य उपस्थिति रंग साधकों के हाथों हुआ, इसी दौरान सोलो प्ले ख़्वाब का मंचन भी किया, तो 13 फरवरी को कमानी सभागार नई दिल्ली में NSD के भारंगम में आगरा बाज़ार के मंचन में शामिल हुआ।
रिकवरी का विज्ञान
किसी नाटक का शो देखना, उसे करना, उसकी चर्चा करना, पढ़ना-लिखना कुल मिलाकर कला, संस्कृति, रंगमंच की गतिविधियाँ किस तरह मेरे अंदर बूंद-बूंद ज़िन्दगी भरते हैं। इस पर शोध किया तो पता चला कि, उसका मूल कारण हमारे ही अंदर कहीं सांस ले रहे हार्मोंस होते हैं। इसको ऐसे समझें कि जिस तरह मंच के किसी किरदार को जीने के मूल में नौ रस होते हैं, उसी तरह जीवन जीने के लिए हमारे अंदर कई तरह के हार्मोन्स होते हैं। जिसमें चार प्रकार के हैप्पी हार्मोन्स होते हैं। ये सामान्य तौर पर नियमित व्यायाम करने, हर चीज के लिए थैंक फुल रहने, अच्छा सोचने से रिलीज़ होते हैं। जैसे एक हैप्पी हार्मोन सिरोटोनिन हेल्थी डाईट, धूप सेंकने से रिलीज़ होता है। ये मूड को अच्छा और शांत रखता है। दूसरा होता है एंडोर्फिन, जो हंसने मुस्कराने, अच्छी नींद, योग, एक्सरसाईज, प्राणायाम या डीप ब्रीदिंग से रिलीज होता है। यहाँ कह दूँ कि, हम जैसे लोगों का लिखना, पढ़ना, किसी किरदार को करना एक किस्म का मेडिटेशन ही होता है और ये आपको मानसिक तौर पर शांत रखता है; डिप्रेशन से दूर रखता है। तीसरा ऑक्सीटोन होता है जिसे लव हार्मोन भी कहते हैं। ये अच्छी फीलिंग, लोगों से मिले स्नेह, अप्रिशियेशन से रिलीज़ होता है और चौथा डोपामाइन हार्मोन (फील गुड हार्मोन) जो उस समय रिलीज़ होता है जब आप अपने पसंद के काम को करके ख़ुशी महसूस करते हैं या आपको कोई रिवार्ड मिलता है या दिमाग़ को इशारा मिलता है कि आपको कोई रिवॉर्ड मिलने वाला है। ऐसे में आपका मूड और सेहत दोनों को अच्छा रखने के लिए, कला और संस्कृति से जुड़ी गतिविधियाँ, इन हार्मोन्स को बूस्ट करने में मदद करते हैं जो किसी भी दिव्यांग या बीमारी की स्थिति से उबरने, उससे लड़ने की अनन्त सामर्थ्य प्रदान करते हैं। जिन्होंने मेरे जीवन में बड़ी भूमिका निभाई और निभा रहे हैं। ये सामान्य व्यक्ति को असाधारण बनाने या उस व्यक्ति को असाधारण उपलब्धियां प्राप्त करने में सहायक होते हैं।
आदरणीय आलोक शुक्ला जी!
आपका संस्मरण एक साँस में पढ़ गए। पढ़कर दिल दहल गया। बिजली के करेंट की तरह एक सिहरन सी सारे शरीर में दौड़ गई।आपका हौसला, आपका साहस और आपका दृढ़ आत्मविश्वास ;यह सब सहायक हुए आपके आत्म बल की ताकत से।आपकी जिजीविषा की वजह से।इसे कहते हैं कि मन के जीते जीत है,मन के हारे हार। आपके आत्मबल को हम सर झुका कर व दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। ईश्वर करे कि आप पूर्णतया स्वस्थ हों और आगे भी स्वस्थ रहें और अपने इच्छित कार्य क्षेत्र के प्रति दृढ़ संकल्पित भी।
ईश्वर का लाख-लाख शुक्रिया है कि उन्होंने आपको ठीक किया और आप भी प्रशंसा के पात्र हैं क्योंकि अपने प्रयासों से आप अपने आप को पुनः खड़ा कर पाये वरना जिसके धड़ से नीचे का पूरा हिस्सा है निश्चेत हो जाए और वह अगर निराशा से घिर जाए तो उसका ठीक होना लगभग असंभव हो जाता है। बहुत-बहुत बधाइयाँ आपको और भविष्य के लिए अनेकानेक शुभकामनाएँ, दिल से, दिल की गहराइयों से।
मन तो ऐसा हो रहा है कि एक बार आपसे रूबरू मिलें और आपके साहस और हौसले के लिये। आपको आपके सामने खड़े रहकर बधाई दें।
बहुत-बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ आपको एक बार फिर।
आप वास्तव में मौत के मुँह से वापस आए हैं
बहुत बहुत धन्यवाद
अत्यंत प्रेरणादाई आलेख है! आपने जिस बारीकी के साथ एक–एक घटना का उल्लेख किया है, लगता है सचमुच हमने वह सब कुछ अपनी आंखों से देखा। कैसे एक-एक अंग सुन्न होते चले गए और फिर गर्दन के नीचे पूरा शरीर निष्क्रिय हो गया, पांचवें मंजिल से नीचे तल तक दूसरों के सहारे आना, सचमुच सोच कर सिहरन हो रही है। आपकी उत्कट जीजीविषा ने और सही लिखा आपने कि आपका पैशन आपको मौत के मुंह से खींच लाया। आप शतायु हों और हिंदी के नाटकों को ऊंचाई तक ले जाएं।
बहुत शुभकामनाएं।
बहुत बहुत धन्यवाद