अर्पणा शर्मा का संस्मरण लेख - भोपाल गैस त्रासदी (02/03 दिसंबर 1984) की विभीषिका पूर्ण रात 3
सारी सड़कों पर वाहनों की आवाजाही लगी थी, जिनमें से अधिकांश का गंतव्य शीघ्र ही शहर से बाहर जाने का था। सड़कों के आसपास के पेड़ काले पड़े हुए भूतहा लग रहे थे, मानो कोई अभिशप्त कालिमा इन्हें अपने आगोश में ले चुकी हो। सड़कों को किनारे मवेशी , कुत्ते,  पक्षी मृत पड़े थे। सभी के पेट बेतरह फूले हुए थे। अस्पतालों के बाहर लाशों की पंक्तियाँ लगी हुईं थीं और अंदर मरीज भरे पड़े थे। इस सुंदर, हरितिमा से आच्छादित, झीलों में अपनी छवि निहारते मेरे 
गंगा-जमनी तहजीब वाले प्रिय शहर में आधी रात प्रारंभ हुए मौत के साक्षात तांडव को देखने के बाद की भोर प्रियजनों को खोने वालों के विलाप, और सदैव के लिये अंपगता से ग्रस्त हो गये व्यक्तियों के करुण क्रंदन से काँप रही थी। प्रकृति भी मौत की इस कालिमा से बदरंग, नुची-खुसी ड़रावनी प्रतीत हो रही थी। 
आसमान में उड़ते हैलीकॉप्टर पानी का झिड़काव करके हर जगह व्याप्त हो गये विष का प्रभाव कम करने की असफल सी कोशिश कर रहे थे। हम सब भाई-बहनों को भी मेरे पापा जी ने उनके दोस्त के भाई की जीप में बिठा दिया जो हमें उस शहर से बहुत दूर हमारी मौसी जी के घर छोड़ आने वाली थी। मैं तब शायद 09-10 बरस की उम्र में थी। सारी रात हम लोगों ने अपने घर के बीच के कमरे को गीले तौलियों से सील करके उसमें गुजार दी थी क्योंकि घर में सफेद धुएँ जैसी गाढी विषैली मिथाइल आइसो साइनाइड़ गैस हर जगह भर गई थी। 
हमें भागने का भी मौका नहीं मिला क्योंकि दिसंबर की उस ठंडी रात को करीब ढाई-तीन बजे हम सब गहरी नींद सोये हुए थे। मेरी नींद बहन के खाँसने की आवाज़ से खुली । और थोड़ी देर में सभी को साँस लेने में बहुत परेशानी होने लगी। बाहर का दरवाजा खोला तो सीढीयों पर गैस भरी थी। हम सभी परिवारजन , हमारी बिल्ड़िंग के सब किरायेदार उस कमरे में भगवान को याद करते घंटों बंद रहे जबकि मौत सोते हुए लोगों को अपने पंजों में दबोच कर भीषण अट्टाहस कर रही थी। 
यदि गर्मी का मौसम होता तो विषैली गैस गर्म होकर ऊपर उठ जाती परंतु दिसंबर की ठंड़ में मिक गैस ठंड़ी और भारी होकर धरातल पर एकत्र हो गई। जिससे कि मौतों का आँकड़ा भयावह रहा। हमारे क्षेत्र में समीपवर्ती मिलेट्री कैंट से ऑक्सीजन छोड़ी गई जिससे कि विषैली गैस की सघनता कम हुई। सुबह हम घर करीब पाँच-छः बजे बाहर निकले तो देखा कि सैकड़ों की तादाद में लोग भागे चले आ रहे हैं ।
उस जीप में बैठते-बैठते मैं अपने मम्मी-पापा हाथ नहीं छोड़ पा रही थी। जीप जब चली तो मैं रोते हुए उन्हें तब तक देखती रही जब तक वे आँखों से ओझल नहीं हो गये। मन-शरीर सभी कुछ संतप्त-शंकालु था कि कौन जाने फिर उन्हें देख पाऊँगी या नहीं ।
उस दो-तीन दिसंबर 1984 की रात के गहन खूनी-नासूरी घाव मेरे शहर में आज भी बेतरह रिसते हैं जब यूनियन कार्बाइड से मिथाइल आइसो साइनाइड़ गैस का भारी रिसाव हुआ था….।
और मैं जो कि कानों के मामूली संक्रमण से पीड़ित थी, उस विषैली गैस के प्रभाव  से अंततः अपनी श्रवण-शक्ति पूर्णतः खो बैठी। 
वह भुतहा विषैली रात जब मेरी स्मृतियों के द्वार खटखटाती है तो मैं ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद ज्ञापित करती हूँ अपने जीवन के लिये और पुनः कृत संकल्प हो , भविष्य की ओर बढ़ जाती हूँ, अपनी शारीरिक क्षति पर बिना कोई कुंठा या  पश्चाताप लिये….
क्योंकि,  मैंने अपनी उस कोमल-किशोर वय में देखी हैं अस्पताल के बाहर शवों की कतारें, काले पड़े वृक्ष, सड़क किनारे मरे पड़े मवेशी और देखा है एक बहुत सुंदर नवयुवती को फोटो , जो अपने विवाह के सुनहरे सपनों में जी रही थी और उस रात मौत के तेजाबी पंजे उसकी आँखें पिघला गये। 
वह सुर्खी थी अखबारों में, अगले दिन, अपनी गोद में वही सुंदर फोटो लिये बैठी हुई, जो उसके लिये केवल एक मधुर स्मृति बना चुका था….!!!
अधिकारी, सूचना प्रौद्योगिकी, देना बैंक, भोपाल. संपर्क - arpanasharma.db@gmail.com

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