“कल्लू की माँ ये ले पच्चीस हजार रुपये!  भगवान ने इज्जत रख ली। पाँच रुपये सेंकडा सुखीराम से उधार मिल गए । बहुत भला मानस है। बखत पै मदद कर दी । चिंता में रातों कु नींद बी नी आ रही थी।”
“मझै तो यकीन सा नी होरया नू कुक्कर दे दिए।”
 “जमीन के कागज गिरवी धरकै आया । ओमकारी के आग्गे जिकर ना करिये “
ओमकारी ने दरवाजे के अंदर घुसते हुए सुन लिया था मगर वह क्या करती। उसे पता चल गया है यह जाहिर करने से दुख होगा वह छिपा गई।
लच्छी मिल में  मजदूर की नौकरी  करता था । तीन लड़कियों और तीन लड़कों का खाना खर्चा आदि पैसे जुड़ने ही नहीं देता था। तनख्वाह कैसे गायब हो जाती थी पता ही चलता था। जो जमा जोड़ा था वह दो शादियों में खर्च हो गया था । गौने में ससुराल वालों के जोड़े, लड़की की दो चार चीजें मिलाई… खाने में भी बहुत खर्चा हो जाता है । लड़की के जोड़े भी देने थे ।तीनों ने राहत की सांस ली खाना खाकर आराम से सो गए थे। सुबह जाकर शहर से सामान खरीद लायेंगे।
लच्छी रात की ड्यूटी पर चला गया था।
“भैस के ऊपर कपड़ा गेर दिया?” रामरती ने ओमकारी से पूछा ।
“हाँ माँ”
“आज जाड्डा घणा है” रजाई अच्छी तरह लपेटते हुए रामरती ने कहा ।
सब की कब आँख लग गई पता ही नहीं चला ।
अचानक पूरे जोर से सामान गिरने की आवाज हुई ।
“ओमकारी देखिये भैस खुलगी दीक्खै?”
ओमकारी नींद में उठी । उसने बाहर से आती रोशनी देखकर सोचा दिन निकल गया है ।दरवाजा खोल दिया ताकि भैस बाहर निकल जाये।मुँह पर कपड़ा लपेटे हुए तीन आदमी जिनके  हाथों में टॉर्च थी ओमकारी का हाथ पकड़कर अंदर ले आये।ओमकारी की डर के मारे सांस जमने लगी।
रामरती देखने की कोशिश करने लगी तो उसकी आँखों पर टॉर्च की रोशनी लगाये रखी।
“अगर किसी ने चूं चपड़ की एक मिनट में गला काटकर ढेर कर देंगे” सुनते ही  बच्चे अपनी सांस की आवाज को भी डर के मारे दबाने की कोशिश करने लगे।
“संदूक की चाबी दो”
रामरती ने डर के मारे चाबी उनके हवाले कर दी। उन्होंने पैसा जेवर और नए कपड़े बांध लिये। रामरती के  गले की मोटी हँसली  और कड़ी बाँक भी उतरवा लिये।
 रामरती रोने लगी तो उनमें से एक ने रामरती के मुँह में कट्टा ठूस दिया “खबरदार !किसी ने आवाज निकाली तो! हमारे जाने के बाद भी किसी की आवाज आई तो ढेर कर देंगे।”
जाने के बाद रामरती रोने लगी । पड़ोस की दीवार से दीवार मिली थी ।सुनहरी जगी हुई सोच रही थी आज वे रात को क्यों जगे हैं।दीवार की मोरी से रामरती की रोने की आवाज सुनकर सुनहरी हाल चाल पूछने घर से निकल उनके दरवाजे पर आ गई। चोरों ने उसके हँसली  बाँक भी उतरवा लिए वह वापिस भाग गई । वह भी  जमीन पर बैठकर  रोने लगी।सुबह सारे गाँव में खबर फैल गई लच्छी के घर से गौने का सामान चोरों ने लूट लिया। जो भी आता रामरती और सुनहरी रो-रो कर बताती ।किस तरह जेवर उतरवाए ,आँखों पर टॉर्च लगाए रखी । कट्टा मुँह में डाल दिया। रामरती ओमकारी को कोस रही थी इसने दरवाजा खोला । ओमकारी सबसे बता रही थी कि उसने  तो यह सोचा कि भैस खुलकर सामान पर चढ़ गई । दिन निकल गया है बाहर निकल जायेगी। लच्छी रात की ड्यूटी से सुबह लौटकर आया तो सुनते ही घुटनों के बल बैठकर जमीन पर ढह गया। भीड़ किसी तरह पानी पिलाकर होश में लाई । वह रोने लगा।” जमीन गिरवी धरकर किसी तरह पीसो का जुगाड़ करा था ।जमीन भी गई पीसे भी गए ,सामान भी गया “वह दहाड़ देकर रोने लगा।
रामरती चोरों को बुरी तरह कोस रही थी। पास खड़ी सुनहरी मेरा क्या खोट्टा बखत आया था।मैं अप्पोई लुटने पिटने चली आई कहकर  बार-बार आहें भर रही थी,  जिस पर कई औरतों को हँसी भी आ रही थी मगर वे उसे दबा जाती थीं।
“रोओ ना! जो होग्या सो होग्या! इब के हो ?सब से बड़ी बात छोरी को कुछ नी कह्या “एक बोली।
सोचकर रामरती,  लच्छी और ओमकारी की  रूह कांप गई रामरती  भगवान का शुक्रिया अदा करने लगी।
ससुराल वालों को चोरी की बात पता चलने पर कुछ और बात  ही न खटक जाये ,यह सोचकर चोरी की बात भी छिपानी पड़ी।
रामरती खाली गला और पाँव देखकर खाली संदूक देखकर बार-बार जमीन पर बैठकर रोने लगती थी। पड़ोस की औरतों ने सबको अपने घरों से लाकर खाना खिलाया। लच्छी खाट पर अधमरा पड़ा था। धूप में उस पर मक्खियाँ भिनक रही थी। बीच- बीच में हाथ उठाकर हे रामजी यू के कर दिया ? इब कुक्कर होगी ? कहकर रोने लगता, साथ-साथ बच्चे भी रोने लगते। सारा दिन रोते-रोते गुजरा । सारे गाँव की औरतें चोरों को गालियाँ बक रही थीं।
“बहुत बुरा करा वारों नै । उनका नाश हो जा।” समंदरी बोली।
“होगा! देखिये, कन्या का शराप लगेगा “पार्वती बोली ।
“तुम एक काम करो ईंट पै सिंदूर लगाकै देवी माँ के मंदिर के आग्गे पीपल में   बाँध आओ। जो सामान वापिस करने से पहले ईंट गिरी तो नाश हो जागा चोरों का। चलो उठो सारे इस ईंट पै सिंदूर लगा दो। पार्वती पास में ही पड़ी ईंट उठाकर सामने रखती हुई बोली।
ओमकारी अंदर से सिंदूर ले आई। सब घर वालों ने ईंट पर सिंदूर लगा दिया ।लच्छी का लड़का और कई गाँव वाले मिलकर उसे पेड़ की शाख में बाँध आये।
“पिछाणे बी नी तन्नै?” एक ने पूछा।
“कुक्कर पिछाणती आँखों पै बैटरी लगा रक्खी थी” रामरती बोली।
“गाँव के ही होंगे और कौन होंगे” दूसरी बोली।
पता नी बोब्बो कौन थे केना-केना समान जोड़ रक्खा था अपनी जाकती खात्तर । सब लेंगे।
“तुझे दरवाजा खोलने को किसने कहा था?” पार्वती ओमकारी को डाँटने लगी।वह पास में खड़ी आँसू पोंछ रही थी।
“भैस कु घास मुट्ठी गेर दे या भी सडरी भूक्की” रामरती बोली।
चलो बोब्बो !इब के हो ?जो होना था होग्या । जाकत बालों को देक्खो।”
“उसे देखियो बेचारी सुनहरी कू वा तो थारी भलाई में ही लुटगी “पार्वती बोली।
जब इंसान चारों तरफ से हार जाता है एक आस बचती है भगवान की ।मगर लच्छी व उसके परिवार की आस भगवान के यहाँ से भी टूट गई थी। दो दिन बाद मेहमान ओमकारी को लेने आ रहे थे। घर खाली हो गया था । खाना खिलाने तक के पैसे नहीं थे। लच्छी और रामरती को लग रहा था जैसे कोई गला घोंट रहा है। पार्वती सबको जबरदस्ती  खाना  खिला गई थी।
पूरा दिन और रात भर रोते- रोते सब अधमरे होकर मूर्छित हो गए थे। आँख लग गई थी। मगर ओमकारी रात भर देवी माँ की  मूर्ति  के सामने  बैठी  रही ।मेरे माँ बाप की इज्जत बचाओ माँ! या मुझे खत्म कर दो। सुबह के साढ़े पाँच बजे थे। भैंस बाहर निकलने को परेशान करने लगी। उसने दरवाजा खोलकर उसे बाहर निकाल दिया।घास की गठरी उठाकर कूंड में डालने गई तो वहाँ एक गठरी पहले से रखी थी । उसने लालटेन से जाकर देखा तो वही घर से चोरी हुआ सामान रखा था।साथ में पच्चीस हजार के साथ अलग से पच्चीस हजार और भी थे। “चाचा —!” उसने लच्छी को आवाज लगाई 
लच्छी ” आँखें फैलाकर भगवान तेरा लाख लाख शुक्र है ,जय हो !भगवान तेरी जय हो “कहता हुआ  पच्चीस हजार लेकर बार- बार  भगवान कहकर हाथ जोड़ रहा था ।पैसे छाती से माथे से लगा रहा था । जैसे सबमें प्राण लौट आये थे।लच्छी  सबसे पहले पच्चीस हजार लेकर  जमीन के कागज छुड़ा लाया था । ओमकारी देवी माँ के चरणों में खुशी से धन्यवाद कर रही थी । रामरती भी धरती छूकर माथे हाथ लगा “धरती माता! भगवान! ” कहकर  भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थी। चोरों के लिए भी मन में कोई बद्दुआ नहीं थी ।
“भाई बड़े से बड़ा चोरी का माल पाकै भी आत्मा कदी इतनी परसन्न नी हुई जितनी आज धोरे तै भी पच्चीस हजार देकै होरी “दारू की दुकान पर एक चोर दूसरे चोर से कह रहा था।

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