डॉ. उर्वशी की कलम से - कहानियों में झारखंड को जीवित करता : 'सरई के फूल' 3
समीक्षक – डाॅ. उर्वशी
पुस्तक : सरई के फूल (कहानी संग्रह)
लेखिका : अनिता रश्मि
प्रकाशक : हिन्द युग्म,
सी – 31,  सेक्टर-20, नोएडा (उ प्र) – 201301
sampadak@hindyugm.com
मूल्य : 150/-
हिंद युग्म प्रकाशन से इस वर्ष 2021 में प्रकाशित अनिता रश्मि जी का कहानी संग्रह ‘सरई के फूल’ की विशिष्टता इस बात में है कि लेखिका ने गदर के पहले ही क्रांति की मशाल जलाने वाले झारखंडी वीरों को याद किया है। इस कहानी संग्रह में और भी जीवन के विभिन्न आस्वादों की कहानियां हैं।
अद्भुत लेखन की धनी इन लेखिका से मेरा पहला परिचय सन 2008 में हुआ, जब मैंने व्याख्याता के तौर पर रांची विमेंस कॉलेज ज्वाइन किया और सिलेबस में मुझे झारखंड के साहित्यकारों को पढ़ाने का मौका मिला। अनिता रश्मि जी की कविताएं पाठ्यक्रम में थीं। छात्राओं को मैंने कविता तो समझा दी लेकिन पाठ्यक्रम में शामिल लेखकों के बारे में भी बताना होता है जो मुझे काफी ढूंढने पर मिला क्योंकि उस वक्त तक झारखंड के साहित्यकारों पर कोई मुकम्मल किताब मुझे हासिल नहीं हुई थी।
सुंदर सरल ढंग से कठिन परिस्थितियों को प्रस्तुत करना, भावपूर्ण लघुकथाएं लिखना,  संवेदना और प्रेरणा से ओतप्रोत कविताएं लिखना और लेखकों के गर्व-घमंड, चमक-दमक से दूर चुपचाप अपने विचारों एवं भावों को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त करते रहना अनिता रश्मि जी की विशेष विशेषता है।
‘सरई के फूल’ कहानी संग्रह में लघुकथा से अलग मन मिजाज की कहानियां हैं। खासकर आदिवासी संस्कृति और उनकी पहचान के वैशिष्ट्य के संदर्भ में। अनिता रश्मि की कहानी ‘सरई फूल’ निश्चित रूप से आदिवासी विमर्श और उनके सरोकारों से जुड़ी एक प्रतिनिधि कहानी है।झारखण्ड की मिट्टी की महक से सुरभित यह कहानी झारखंड की तकलीफ भी बयान करती है:-
“मैं खीजकर उठा। दरवाजा खोलते ही पिस्तौल से लैश बीस-पच्चीस आदमी अंदर घुस आए। दो ने मेरी बातें मरोड़कर पकड़ लीं। मेरी घिग्घी बँध गई। जब तक मैं कुछ समझ पाऊँ, वे मुझे खींचते हुए बाहर ले चले। मैं सैंडो गंजी और पाजामे में ही उनके साथ घिसटने लगा। वे मुझे घेरे हुए चल रहे थे। जोन्हा के जंगल के भयावह सन्नाटे को उनकी पदचाप भंग करने लगी। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के कारण जंगल का अँधेरा और भी गहरा उठा था। उन्हें देख लगा नहीं, यह अंधकार उनके लिए कोई बाधा खड़ी कर रहा है। मैं बेहद डरा हुआ, कुछ बोलना या पूछना भी मुश्किल। वे एक अनजानी भाषा में बात कर रहे थे, जिसका एक लफ्ज भी मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। हवा की साँय-साँय बात करने को बेताब थी, मैं सुन्न था। पता नहीं चला, वे लोग किस भाषा में बात कर रहे हैं खोरठा, मुंडारी, हो, खड़िया या कुडुख में।
उनके साथ चुपचाप चलते हुए लगभग आधे घंटे बाद एक बड़ी चट्टान के सामने पहुँच गया। सामने के दूसरे चट्टान पर लालटेन अपने पूरे सामर्थ्य के साथ अँधेरे के खिलाफ मोर्चा सँभाले हुए थी। चट्टान के पास जाकर मेरे डरावने सहयात्रियों में से कइयों ने अपने हाथ में पकड़ी लालटेनों को चट्टानों के हवाले कर दिया। आस-पास का इलाका जगमगा उठा। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम! आखिर मैंने क्या गलती की? ये मुझसे चाहते क्या हैं?
मैं साँस रोककर उनके अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगा। मैं समझ गया, मैं किनके चंगुल में पड़ गया था। वे खड़े थे। एकदम चुपचाप, अनुशासनबद्ध ! अब मेरा क्या करेंगे ये ? अचार डालेंगे ? छह इंच छोटा कर देंगे ? गोली मारेंगे भेजे में? आखिर क्या करेंगे? भय रगों में, मन को चुहलबाजी से बहलाना चाहा। कोई उपाय भी तो नहीं, थोड़ी चुहलबाजी ही सही।
बहुत देर की प्रतीक्षा के बाद सामने बने छोटे-से झोपड़े से एक व्यक्ति बाहर आया। लालटेन की रोशनी में देखा घुटने से उठाकर बाँधी गई धोती और गंजी में एक मासूम चेहरा! बड़ी बड़ी मूँछें! लेकिन चेहरा एकदम भोले बच्चे-सा। यह ? इतना मासूम चेहरा कहीं… ! समय कितना क्रूर हो चला था। सोचने का वक्त कहाँ था।
इस संग्रह की पहली कहानी है ‘रघुवर टाना भगत’। यह कहानी से बढ़कर एक कविता है, इसमें झारखण्ड की मिट्टी की भरपूर गंध है और साथ ही झारखण्ड के वनफूलों की नियति का, उनके साथ हो रहे नाइंसाफी का कथात्मक दस्तावेज भी है:-
“वह सोचने-विचारने में निमग्न था कि पीछे बढ़ते सायों का एहसास! ‘ फिर आ धमके ससुरे। आज दो टुक बात हो ही जाए। ‘ जल्दी से पलटा। हड़बड़ाकर खड़ा हो गया। सर पर सात-आठ राइफल एकदम उसकी ओर तनी हुई।
“यू आर अंडर अरेस्ट।”
“लेकिन क्यों ? “
“तुम्हारे घर पिछले कई महीनों से नक्सलियों का आना-जाना है।”
“तुम उनसे मिले हुए हो।”
वह हतप्रभ ! एकटक उन्हें देखता रह गया। उसे लगा, उसके अंदर छनाक से कुछ टूटा है, जैसे घर की कच्ची दीवार पर टँगी तुरही की मिठास या बाबा की दी हुई बूढ़ी लाठी अब उसके बूढ़े हाथों से छिटककर गिर गई।
“असली गुनहगार को तो पकड़ने से डरते हैं और निर्दोष लोग के कंधा पर बंदूक तानकर बहादुर बनते हैं। पुरस्कारों की झड़ी लगाते हैं। इतने ही सजग रहते, तो यह रोग इतना फैलता ?”
“एई, चोप्प!”
 बंदूक का कुंदा सर पर। माथे से खून की धार फूट पड़ी। चंदन का टीका फैलते खून के साथ मिल गया। गले से होता हुआ जनेऊ तक बह आया। जनेऊ और सफेद खादी का कुर्ता लाल होने लगा।
“हैंड्स अप ! “
रघु ने दोनों हाथ उठा दिए। झट दोनों हाथों में लोहे का गहना सज गया।”
इस संग्रह में मेरी पसंद की कहानी है ‘दो चुटकी निमक’।
यह अत्यंत भावपूर्ण, कलात्मक एवं काव्यात्मक कहानी है । इस कहानी में समाज की एक गंभीर समस्या पर लेखिका ने उंगली रखी है:-
“अब मजाक बंद भी करो गौना।”
बाबूजी की उत्सुक आवाज में दहाड़ का समावेश था- “मजाक का कोई टाइम होता है।”
गौना काल कोठरी सी उस कोठरी के चौखट तक आई। “बाबूजी, लक्ष्मी आई है। अम्मा बजाओ थाली।”
अम्मा के हाथ में पकड़ी काँसे की थाल गिर पड़ी झन झनन। ‘छन छनन’ नहीं, ‘झन झनन’ ।
एक झनाटे से स्वप्न का तिलिस्म टूट गया। किचें उड़ीं और लहूलुहान हो गए सभी। हाँ हाँ सभी लोग! उस हवेली से कब की लक्ष्मी लुट चुकी थी। उन्हें इस लक्ष्मी का एकदम शौक नहीं बाहर की हवा सन्नाका खाकर बेहोश हो गई। थोड़ी देर किंकर्तव्यविमुढ़ता छाई रही। फिर अचानक सब सक्रिय हो उठे।
 पार्वती मुँह फेरकर लेट गई। अम्मा पूजागृह में घुसकर सूप का प्रसाद टटोलने लगीं। बाबूजी बाहर के दालान में बैठकर माथा धुनने लगे और श्रवण कुमार पक्का घर में जाकर चुपचाप अपना नाखून कुरेदने लगा।
उस पुरानी हवेली में दो-दो फीट की मोटी दीवारें मिट्टी, सुर्खी, चूने से ही बनी थीं। पूरा घर मिट्टी के फर्श का था सिर्फ इस पक्के घर के फर्श को छोड़कर। श्रवण के विवाह के पहले इस इकलौते कमरे के फर्श को सीमेंट से बनवाया गया था। तब से यह पक्काघर कहलाने लगा था। पक्काघर से कच्ची खबर ?
सबके चेहरे उतरे। एक मातम का माहौल तुरंत छा गया सब तरफ। गौना सौरीघर में पुनः व्यस्त हो गई।
दस मिनट बाद ही बर्फीली हवा की तरह अम्मा का ठंडा स्वर गूँजा
“गौना! ये ले उसे खिला दे।”
गौना ने पार्वती के लिए लाए गए पथ्य के लिए हाथ बढ़ा दिया। उसके हाथ में छठ के प्रसाद ठेकुआं का बड़ा-सा टुकड़ा था। अम्मा के हाथों में पथ्य नहीं था।
तभी बूढ़ी दादी का कोमल, मासूम, पवित्र लेकिन दृढ़ स्वर गूँजा- “नहीं गौना, उसे नहीं इसे चटा दो।”
भाषिक स्तर और संप्रेषणीयता में भी इस कहानी का कोई जवाब नहीं है। इस कहानी को पढ़ते हुए आंखें भीग जाती हैं। मालती की यह कहानी भाव और कथ्य में दर्द से सर्वथा भींगी हुई है। यह सिर्फ झारखंड की धरती की समस्या नहीं है, एक ऐसी समस्या है जिससे संपूर्ण भारत को लड़ना है।
स्त्री जाति की समस्याओं से लड़ती एक कहानी और भी है इस संग्रह में जिसका नाम है ‘तिकिन उपाल का छैला’:-
“उसकी संथाली साथिनें भी नहाते-धोते कहानियाँ कहतीं, सुनतीं। चिकने पत्थर से रगड़तीं
रहतीं एड़ियाँ, काली मिट्टी से धोती रहतीं केश और किस्सा परवान चढ़ता रहता। अक्सर सोनी हाँसदा भी कहती, छह भाय और एक बहिन का खिस्सा पुराने जमाने में एक आदमी की एक बेटी, छह बेटा। एक बार पानी के लिए छहो भाय तालाब खोदने लगे। गहरा कोड़ने पर भी पानी निकला नहीं। वे निराश हों, उससे पहले ही भीख माँगते हुए एक बाबा आ पहुँचे… मारांड बुरु। बाबा ने पानी के निकलने का उपाय बताया- “ अपनी बहन उपाल को दान कर दो।”
छहो भाइयों ने दूसरे दिन बासयाम दाका अर्थात जलपान लेकर बहन को बुलाया। उपाल को खेत का रास्ता नहीं मालूम था। भाइयों के कहने पर हल से खिंचे गए चिन्ह को देखते हुए वह उनके पास पहुँची। जलपान के बाद पानी पिलाने की बारी थी। उपाल चली तालाब से पानी लाने। छहो भाय के कहने से सूखे तालाब में घुस गई। चमत्कार! पानी निकल आया। मारांड बुरु का कहा सच ?
लेकिन पानी पाँव के पंजे तक ही निकला। उपाल अब कैसे भाइयों की प्यास बुझाए।
एक गीत उसके होंठों पर खिल आया
सोना किरी सुपाड़ी आयो
 सुपतिच् भारी पानी यो
सुपाड़ी नायो नाँही डुबाय।
हे भइया ! पाँव के पंजे तक ही पानी आया। सोने का घड़ा नहीं डूब रहा है।
थोड़ी देर में ही घुटने तक पानी। फिर पानी बढ़ता गया, बढ़ता गया। वह तालाब के पानी में समा गई।”
मालती और उपाल दोनों स्त्री जाति की सर्वव्यापी पीड़ा का प्रतीक हैं। समाज में व्याप्त स्त्रियों से जुड़े कई अंधविश्वास भी हैं जिन पर एक कहानी है ‘कहानी यहीं खत्म नहीं होती’:-
‘उके मुँह में दे आगी और खुदे उठा ले हल के। अब लाजवंती बने से काम नय चलेगा। तोर ऊ बूढ़ा ससुर के भी रोटी-सोटी चाहिए न?” चाँदो की आँखें फट गई। डर से – “नहीं नहीं। ई कारज हमसे नय होगा।”
“तू जानती है न, हमीन सब में हल नय चला सकती है कोई जनीमन। छप्पर छारना, हल चलाना जनी का काम है ? बाप रे!” जितना उसने मुँह से ना कहा, उससे जास्ती हथेलियों और आँखों से। उसकी हथेलियाँ थरथरा उठीं। आँखें और भी विस्फारित! हथेलियों, आँखों का विस्मय फूलों को विस्मित कर गया।
“देख, अब जमाना बदल रहा है। बदल रहा है कि नहीं। हम सब तेरा साथ देंगे।”
भय उसकी नसों में घुस रहा है, यह समझते देर न लगी फूलमनी को।
“बस! चाँदो, तू मान जा। “
उसके हाथ चाँदो की पीठ पर पहुँच गए। बुरी तरह घबरा उठी थी चाँदो। घबराहट से चाँदो के होंठ भी काँपने लगे थे। थोड़ी देर में ही कंपन देह में घुस गई। आत्मा में घुस गई। देर तक उसकी पीठ सहलाती रही फूलो। उसका शरीर काँपता रहा। सहलाती ही रही फूलो।
“कुछ तो सोचना पड़ेगा। सब कुछ रहते तकलीफ उठाना…’
फूलमनी के सपनों के हर गाँव में औरतों के कंधों पर हल भी था, छप्पर बनाती औरतें भी थीं। उसे अब किसी गाँव-गोत्र से परहेज नहीं था। काफी पहले से वह चाँदों के गाँव में आती रही है। सब उसे पहचानते हैं।
उसने कई लोगों से बात की। सबने दुत्कार भरे शब्दों में कहा- “यह एकदमे नय हो सकता है। अगर हल को हाथ भी लगाएगी चाँदो, भयंकर फल भुगतेगी।”
“का भइया, अइब थोड़ा बदलना भी चाही…”
“तोय आपन बुद्धि आपन पास रख फूलो। ई नियम-कानून तोय पढ़। हमके मत सिखा। हमारा नियम-कानून में दखल मत दे।”
वह उसके ससुर के पास भी पहुँची। वह बाहरी ओसारे पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। गुड़-गुड़!
हर गुड़-गुड़ के साथ चिलम की आग दहक उठती। उसका चेहरा परम संतोष से भरा था।
झारखंड के वीर सपूत अल्बर्ट एक्का, जिनके नाम पर परमवीर अल्बर्ट एक्का चौक रांची में है,  उसे देख कर कैला को प्रेरणा मिलती है। वही लांस नायक अल्बर्ट एक्का जिन्होंने 1971 में दुश्मनों से लोहा लेते हुए हंसते-हंसते अपनी जान गवां दी थी, से वह बेहद प्रभावित है। कहानी ‘एक और भीष्म प्रतिज्ञा’ में व्यक्त संवेदना का धरातल एक अलग ही दुनिया में पाठकों को ले जाता है।
स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों की तिलिस्मी, जादुई रहस्य, रोमांच से भरी जिंदगी उनके योगदान को समझना आसान नहीं है साष्टांग दंडवत करने का दिल होता है ।
 ‘बिट्टो की बड़ी मां’ कहानी इसी प्रेरणा से अभिप्रेरित है:-
सारी चीजें सामने छितरा गईं। कुछ देर स्तब्धता! सभी यूँ देख रहे थे जैसे भूत देख लिया हो। छह पिस्तौल, एक जोड़ा खड़ाऊँ, एक जोड़ी धोती-कमीज, डायरी और एक अखबार में छपी दाढ़ीवाले व्यक्ति की तस्वीर!
“अरे! ई सब का है ?”
“बड़े पप्पा ? ई तो बड़े पप्पा का फोटो है।”
“कितने स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में लोगों को पता तक नहीं, इसी में थे वे।”
अंजू बुदबुदा रही थी। अफसोस था, ऐसे लोगों के बीच जन्म नहीं लिया। खुशी थी, बड़ी माँ को देख सकी। गम था, देखकर भी पोटली को समझ न पाई। समझकर भी बड़ी माँ से अनजान रही।
“इनका हिएँ पोरा के ढेरी में आग लगाकर जला दिया था।”
देहाती ने ठहर-ठहरकर कहा। उसकी आवाज काँपने लगी थी। “क्यों? अंग्रेजों ने पकड़ लिया था क्या ?” अंजू चौंकी ।
“अरे नय नय, ऊ ससुर लोग तो परछाहीं भी नय पा सका था। ई तो जात-बिरादरीवाला दुसमनगी में आग में झोंक दिया था। सुराज मिलने के तीस बरस बाद।”
उसने गमछे से आँखों को पोंछते हुए बताया। अंजू का मुँह खुला-का-खुला रह गया।
“सुराज में?”
एक कसक-सी उठी।
“शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले। वतन पर मरनेवालों का बाकी यही निशाँ… ” यही निशाँ! यही निशाँ! उसकी पलकों पर आहिस्ते से दो बूँद आँसू चमक उठे।
अंजू अचानक उस कालखंड में पहुँच गई। सामान्य ग्रामीण औरतों का सामान्य रूटीन। कैसे खेत-खलिहान, गेहू-उड़द, चना खेसारी फसलों, चूल्हे की धुँधुवाती लकड़ियों, गाय-बैल, गोबर-उपले, हारी-बीमारी से जूझते हुए। बेहद-बेहद पिछड़े इलाके की कठिनाइयों को झेलते हुए कितनी साधनाविहीन छिपे रुस्तमों ने उस समिधा में अपना बहुत कुछ होम कर दिया होगा। ओम! स्वाहा! ओम! स्वाहा! किस प्रेरणा से? किस लालच में?”
इस संग्रह में एक कहानी है जो झारखंड में डोमिसाइल लागू होने के समय की परिस्थितियों पर लिखी गई है। यह कहानी हम भारतीयों के सभ्य, सुसंस्कृत कहलाने की, झूठी पहचान बनाने की संस्कृति पर लिखी गई है । ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का नारा लगाने वाले लोग किस तरह स्वार्थी हो जाते हैं कि अपने ही देश के नागरिकों को स्वीकार नहीं कर पाते:-
“उसकी मौत पर तो वह गर्व करती है, कहती भी है- “गरब हय हमको, हामर आतमा जुड़ा दिया, हामर कोख से जन्मल छउआ। पर ई हामर मँझलका को आपन देश में, आपन राज में, आपन गलती से…” आँसुओं के सैलाब में डूब जाते आगे के शब्द।
परीक्षा हो गई। शिक्षकों की नियुक्ति के लिए होने वाली परीक्षा में पूरा शहर भयग्रस्त! घरों में दुबके लोग टीवी-रेडियो से जा चिपके। उधर घीसू अल्बर्ट एक्का चौक से जीएल चर्च तक दौड़ता थकता, रोता-हँसता बेचैन। इधर मीरू नन्हकुआ की जान को रोती-डरती हलकान !
घीसू की बेटी सगरी बिहार के किसी गाँव में ब्याही गई थी। अपनी ससुराल में बैठी राजधानी में बसे माँ-बाप की दशा पर चिंतित! वह भी झारखंड अलग होने पर खुशी मना चुकी थी। घर-गाँव, आपन देस में अब सब ठीक से रहेंगे, उसे भी विश्वास था। लेकिन अब वहाँ का भी माहौल बदले की दुर्गंध से भर चुका था।
“अपरू छपरू गंगा पार !”
हर ओर शोर! लग रहा था सब घीसू हो गए हैं। सगरी को डर है, लोग कहने न लगें,
‘झाड़-झंखाड़, झंडा उखाड़!”
उधर हलकान सगरी और इधर यामाहा मोटरसाइकिल पर घूमता नन्हकुआ। एक बंद समर्थक पुलिस पर जला हुआ टायर फेंकता, नए राज्य के नवनिर्माण में व्यस्त ।
यह कहानी आगे भी चलती है। आगे की कहानी है, सगरी का डर निर्मूल नहीं। उसके पति और पूरे परिवार के लोगों को खदेड़कर वापस भेज दिया गया था। अन्य राज्यों में कमाने-खाने गए उन जैसे लुटे-पिटे लोग भी रोते-कलपते अपने-अपने घर लौट रहे थे। उन्हें लौटना पड़ा था, मार-पीटकर भगा दिया गया था उन्हें । डोमिसाइल का भूत उन जगहों पर भी हँस रहा था सर  उठाकर हा…हा…हा…!
‘हम सब एक हैं’ का नारा कोने से झाँक रहा था। सभ्य, सुसंस्कृत समाज बर्बर आदिम युग की ओर चल पड़ा था। पूरी तेजी और दम-खम के साथ। वैश्विक होते-होते हम एक भारतीय रहने से भी इनकार कर रहे थे।
झारखंड के प्रसिद्ध घोड़े का नाच पर लिखी गई कहानी है ‘घोड़वा नाच’। अपनी संस्कृति को जिंदा रखने के लिए सेनारी चाहता है कि वह घोड़वा नाच करे लेकिन उसकी मां नहीं चाहती क्योंकि उसे मालूम है कि समाज सिर्फ दिखावे के लिए इन चीजों को पसंद करता है। कलाकार की कोई पूछ नहीं, कोई सम्मान नहीं।
तभी मुन्नी की आँखें दहक उठीं थीं। उसे कैला की आँखों की चमक याद आ गई थी। ऐसे ही, ऐसे ही कैला ड्रेस को प्रेस करता। उसे सहेज कर रखता। घुँघरू बाँधता। चेहरे पर रंग लगाकर, गालों में लाली लगाकर, आँखों में काजल डालकर, नकली मूँछें लगाता था। चेहरे पर एकदम राजा लोग के जैसा भाव लाता था और अकड़कर राजाओं की तरह चलता था। नाचते बखत दोनों हाथ घोड़े की रास को पकड़े हुए दोनों ओर कड़क ढंग से फैले हुए रहते। राजसी डरेस और राजसी ठाठ। मुन्नी अपने को रानी समझने लगती।
सेनारी भी तो ऐसे ही अकड़ रहा है। वैसे ही दोनों हाथ से रास को पकड़कर सामने के मैदान में अभ्यास कर रहा है।
“बेकार मेहनत कर रहा है। अब कोय ई नाच-फाच देखता हय ? मना कर दे सोनवा।”
मुन्नी जब-तब उसे रोकने का प्रयास करती, पर सेनारी नहीं मानता।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘धरती अबुआ बिरसा’ जिसकी चर्चा कई बार हुई है। यह कहानी भारतीयों की जयचंद प्रवृत्ति पर लिखी गई  है:-
चंद अनुयायियों के साथ बिरसा को चाईबासा के बीहड़ जंगलों में शरण लेनी पड़ी। साथ में परमी और साली भी उसकी साँसों में बहुत बेकसूरों के शवों की गंध भरी रही। वनों कछारों पर साथियों की बिखरी पड़ी लाशों को उसने सियार भेड़िया को खाते देखा था श्रृंगालों को लाशों को खींचकर नदी की ओर ले जाते हुए देखा था। ठिठककर रोकने की कोशिश भी की थी। वो विलाप, वो आहें, वो चीत्कार क्या कभी कोई भूल सकता है? बिरसा भी नहीं भूल पा रहा था।
उस जीत ने अंग्रेजों का मनोबल बढ़ा दिया था। उनकी प्रताड़ना बढ़ने लगी। अंततः दोन्का मुंडा ने 32 विद्रोहियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।
इस भगवान के भी कई विरोधी तो थे ही। अंग्रेजों के द्वारा दिया गया पाँच सौ का लालच भी कम न था। कइयों का ईमान डोल गया। और एक रात फिर सेंतरा के पश्चिमी जंगल में आग का धुआँ उठता नजर आया।
“ऊ देखो। हुआँ ।”
बिरसा के पीछे लगातार लगे रहनेवाले लालच में से एक ने कहा- “चलें ?”
“हाँ, चलो।”
दबे पाँव वहाँ पहुँचे सब। अपने एक बाजू पर सर रखकर बिरसा सोया था। चारों ओर अँधेरा घना। उसकी दोनों तलवारें उसके बाजू में सुस्ता रही थीं। गाछों के पीछे से झाँकते लाल को पहले तो हिम्मत ही नहीं। फिर घात लगाकर उन्होंने उसे जकड़ लिया। पाँच सौ रुपए का कद काफी ऊँचा हो गया।
“बिरसा भगबान को फिन सिपाही पकड़ लिया। सिपाही उके हथकड़ी से बाँधकर ले गया।” “नय नय हम देखे, उसको डोरा से बाँधा था।”
जितने मुँह, उतनी बातें।
“उसका कई संगी-साथी भी पकड़ा गया। अब का होगा ?” राँची का सेंट्रल जेल नंग-धड़ंग आजादी के परवानों से भर गया। जेलर तक बिरसा को देखने को उत्सुक।
 यद्यपि सभी कहानियों के कथानक भिन्न हैं, लेकिन मुझे बड़ा साम्य नजर आता है। संग्रह की सभी कहानियों में झारखंड जीवित है, टटका है।
सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली की ओर से रांची की साहित्यकार अनिता रश्मि को ‘रामकृष्ण स्मृति कथा सम्मान-2019’ दिया गया है। उन्हें यह सम्मान हिन्दी भाषा में उनके कथा साहित्य के लिए दिया गया है। इसके पूर्व में अनिता रश्मि को ‘पुकारती जमीं’ उपन्यास के लिए नवलेखन पुरस्कार (राजभाषा विभाग, बिहार सरकार), प्रथम साहित्य गौरव सम्मान (स्पेनिन, रांची) व शैलप्रिया स्मृति सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।रांची की जानी-मानी लेखिका शैल प्रिया का निधन 1994 में हो गया था। उनकी स्मृति में महिला लेखन को लेकर दिया जाने वाला यह सम्मान अपनी एक अलग पहचान रखता है। निर्मला पुतुल, नीलेश रघुवंशी, वंदना टेटे और अनीता वर्मा भी इस पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं।
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समीक्षक का पता –
डॉ. उर्वशी द्वारा ,
श्री रामायण पांडे
वृंदावन कॉलोनी, टैगोर हिल रोड, चिरौंदी, रांची, झारखंड,
पिन कोड:- 834006
लेखिका का पता –
अनिता रश्मि
1 सी, डी ब्लॉक,
सत्यभामा ग्रैंड, कुसई,
डोरंडा, राँची – 834002
ईमेल : anitarashmi2@gmail.com

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