Friday, March 6, 2026
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दिलीप कुमार का व्यंग्य – कोटि-कोटि के कवि

कोई ऐ शाद पूछे या न पूछे
इससे क्या मतलब,
खुद अपनी कद्र करनी चाहिये साहब कमालों को”।
किसी गुमनाम शायर की इन मशहूर पंक्तियों को हमारे हिंदीउर्दू के कवियों और शायरों ने अपने दिल पे ले लिया है शायद । वैसे तो हिंदी उर्दू वाले अपनी भाषाई शुध्दता पर गुमान करते हुए खुद को दूसरे से श्रेष्ठ बताते हैं और एक दूसरे पर तंज कसते रहते हैं।मगर जैसे ही कोई ऐसे मुशायरे या कवि सम्मेलन की घोषणा होती है तो दोनों प्रजातियों के लोग एक दूसरे के गिले शिकवों को परे रखकर तुरंत गंगा जमुनी तहजीब की बात करने लगते हैं । वैसे तो हमारी हिंदी में कवियों का स्थान बहुत ऊंचा माना जाता है ।उनके सम्मान में तो यहां तक कहा जाता है कि 
“जहाँ न पहुंचे रवि,
वहाँ पहुंचे कवि”।
  कवि की महत्ता इतनी थी कि शिवाजी के दरबार में भूषण और पृथ्वीराज चौहान के दरबार में चंदबरदाई को बहुत ही ऊंचा दर्जा प्राप्त था । मगर दरबार में इतना राजेमहाराजों के बराबर बैठने वाले कवि आहिस्ताआहिस्ता कब दरबारी कवि में बदल गए,यह पता ही नहीं चल सका। कवि 
ऋषि गोपालदास नीरज ने तो कहा है कि –
“मानव होना भाग्य है,
कवि होना सौभाग्य”।
पर सेटिंग गेटिंग और नेटवर्किंग के युग में कवियों की कुछ विशेष प्रजातियां विकसित हुई हैं। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्नवत हैं ।
समकालीन कवि(जो वरिष्ठता की सीमा को पार कर चुके हों पर मार्गदर्शक मंडल में जाने के बजाय कविता में डटे रहते हैं)
आशु कवि –( यह प्रजाति ग्रेस पीरियड पर सदैव कार्यरत रहती है। वरिष्ठों को स्टेशन से रिसीव करने और उन्हें स्टेशन पर पहुंचाने के एवज में इस प्रजाति को आशु कवि घोषित करके मंच पर एक दो तुकबंदी सुनाकर मानदेय वाला लिफाफा दिलवा दिया जाता है
स्थानीय कवि इन्हें दफ्तरी कवि भी कहा जाता है क्योंकि यह जिले की सीमा में संपर्कों से पैदा हुए अवसर पर ही कविता सुनाते हैं ।
राष्ट्रीय कवि ( यह बेहद कॉमन प्रजाति है जो कवि सम्मेलन के लिये हमेशा अपना बैगसूटकेस तैयार रखती है)
अंतरराष्ट्रीय कवि (इनकी तो बानगी ही अलहदा है ये सस्ते जैकेट खरीदने अगर नेपाल भी चले जाएं तो अपने को किसी न किसी तरह से अंतरराष्ट्रीय कवि घोषित करवा ही लेते हैं)
प्रादेशिक कवि (दूरदर्शन केंद्रों और आकाशवाणी के आसपास रहने वाले कवि जो हर महत्वपूर्ण अवसर पर सर्वसुलभ रहते हैं जो बुलाने पर तुरंत पहुंच जाते हैं चाहे भुगतान का उम्मीद हो या न हो )
प्रवासी कवि( ये जब भारत आते हैं तो जितने दिन देश में रहते हैं उतने दिन सुबहशाम कविता की गंगा ही बहाते रहते हैं)
अप्रवासी कवि
ये प्रजाति गूगल मीट और फ़ेसबुक लाइव पर ही अपनी दमदार उपस्थिति देती है। इनकी समझ से भारत में कविता को सिर्फ डिग्री कालेज के हिंदी विभाग के लोग ही थामे हुए हैं वरना हिंदी कविता पाताल लोक में समाहित हो जाये) ।
इसके अलावा मंचो,मुशायरों में कुछ और भी किस्म के वीर कवि और वीरांगनाएँ कवयित्रियां सक्रिय हैं जिनकी प्रमुख कोटि है
विश्व कवि,
दिव्य कवि,
गीत कवि,
हास्य कवि,
पैरोडी कवि,
सिद्ध कवि,
प्रसिद्ध कवि,
और इन सबमें जो सबसे दुर्लभतम श्रेणी है वह है 
गिद्ध कवि की।
गिद्ध कवि ( जो अन्य कवियों के मानदेय के लिफाफे रख लेते हैं यह कहकर कि उन्हें बाद में दे देंगे और फिर कभी नहीं देते)
एक दूसरी प्रजाति है जो कही जाती है युग कवि।
इसी युग कवि में से एक आला केटेगरी होती है चुग कवि की। 
चुग कवि (ये ऐसे कवि हैं जो दूर दराज के कवि सम्मेलनों में किसी नए कवि द्वारा सुनाई गई कविता को टीपते रहते हैं और उसे प्रमुख कवि सम्मलेनों में अपने नाम से सुनाते हैं )
सेवानिवृत्त कवि (यह प्रजाति कविताई  के हिसाब से सबसे खतरनाक मानी गई क्योंकि यह दिन रात न सिर्फ कविता करते हैं बल्कि लोगों को पकड़ पकड़ कर कविता सुनाती है । जनहित में चेतावनी शाया हुई है कि ऐसे खतरनाक कवियों की प्रजाति से मार्निंग वाक में दूरी बनाकर चलना चाहिए)
 उन्मादी कवि (ऐसे कवि जो अपनी कविता के जरिये पाकिस्तान और चीन का भूगोल बदलने की चेतावनी देते रहते हैं । 
प्रगतिशील कवि ( इसमें उस कोटि के कवि आते हैं जिनकी कविता न तो अव्वल किसी को समझ आती है 
मुखर कवि (अपने चीखने चिल्लाने को ये हजरात कविता घोषित कर देते हैं )
प्रखर कवि(ये आम तौर पर चुप ही रहते हैं सही अवसर के ताक में रहते हैं और कवि सम्मेलन का मानदेय प्राप्त होते ही मुखरता से आयोजक की ही आलोचना करने लगते हैं) ।
  इनसे इतर कुछ और नाम कविता में छूटे हुए लगते हैं।
छपास कवि, 
रचनाचोर कवि,
चितचोर कवि,
तथाकथित कवि,
अकविता के कवि,
छवि के कवि, 
मंचीय कवि,
उखाडू कवि,
गद्य कवि,
फाड़ू कवि,
और इन पर भारी पड़ने वाली है कबूतर बाज कवि।
कबूतरबाज कवि
(वैसे तो कवियों की अनेक क्लासिक प्रजातियों का विश्लेषण विद्वान आलोचकों द्वारा किया जा चुका है परन्तु आधुनिक कवियों की एक विशेष प्रजाति ‘कबूतरबाज कवि’ भी आजकल सामने आकर धमाल मचा रही है)
 “कबूतरबाज़ कवि वह है जो कई कवियों को अपने गुट में रखता है और सबका रेट बताकर सम्मेलन में उनका आमन्त्रण फ़िक्स करता है और बदले में उस कबूतर कवि के  मंच पर स्वयं आमंत्रित होकर लिफाफा ग्रहण करता है। यह वरिष्ठ होता है और गजब का सम्मेलन लपेटू होता है।”
कवियों की बाकी प्रजातियों पर शोधसंग्रहण गतिमान है । आप और कितने कोटि के कवियों को जानते हैं।
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6 टिप्पणी

  1. दिलीप जी

    *कोटि-कोटि के कवि के काजे धन्नवाद।*
    अजब-गजब व्यंग्य है भई आपका! कवियों के प्रकारों की हमने तो सिर्फ गिनती लगाई- 33 कवि प्रजातियों की! और हाल यह है कि-
    *हँसें के रोएँ ,पहले हँसें के पहले लिखें, के पहले रो लें फिर लिखें।का करें का नईं करें कछुइ समझ में नईं आ रओ , का लिखें का नईं लिखें। जई कै रै कि जो कछु लिखो बाके काजे धन्नबाद। हमें तो जई चिंता लग रई कि दुनिया जहान के सबरे के सबरे कवि मिलके तुम्हें कूट न दें, बच केइ रइयो कछु दिन इतै-उतै छुप छुपा के!”*
    तो सब कवि इस व्यंग्य को पढ़ें और अपनी- अपनी कैटेगिरी खुद तय करें। अगर समझ में नहीं आये तो दिलीप जी से संपर्क करें। दिलीप जी पर गुस्सा आए तो पहले एक गिलास ठंडा पानी पीकर फिर उनसे बात करें।गुस्सा न आए तो भी जबरदस्ती गुस्सा लाइये, लेकिन उसके पहले ठंडा पानी एक गिलास जरूर पी लें । बीपी बढ़ सकता है।पहले से पानी पी लेने से बीपी लेबल पर रहेगा। जहाँ उसे रहना चाहिये।

    “बढ़िया है ” दिलीप सर कुमार विश्वास के तर्ज पर। टेंशन तो यह है कि जब भी कविता लिखने बैठेंगे तो पहले हँसी को सँभालने के लिए किसी को साथ रखना पड़ेगा।
    बहुत-बहुत बधाई आपको इस लाजवाब व्यंग्य के लिये।

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