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डॉ. सपना दलवी का लेख – राष्ट्रीय शिक्षा नीति : हिंदी और अन्य मातृभाषाएं

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हिंदी के यशस्वी कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने डेढ़ सो साल पहले निजभाषा के महत्व को समझा और उदघोष किया “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल”। बहु सांस्कृतिक और बहुभाषी देश भारत के समक्ष भाषा और शिक्षा की माध्यम भाषा की चुनौती प्राचीन काल से ही रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस चुनौती का उत्तर देने के राष्ट्रीय महत्व के निश्चय का दस्तावेज है। प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, इसका प्रावधान करते हुए, शिक्षा नीति ने, शिक्षकों, विद्वानों और नीति नियोजको के समक्ष एक बड़े और कठिन दायित्व का प्रावधान किया है।
भारतवर्ष की शताधिक भाषा बोलियों के लिए यह वैसे तो राष्ट्रीय गौरव से जुड़ा प्रावधान है। परंतु इसे लागू करने का तरीका रोड मैप जितना आसान प्रतीत नहीं होता। प्रधान मंत्री ने शिक्षा नीति को जनता और विद्वानों को समर्पित करते हुए, इसके क्रियान्वयन का दायित्व शिक्षा जगत से जुड़े निर्णय कर्ताओं शिक्षकों, नियोजकों और अभिभावकों को सौंपा है। इस प्रकार इस जनोमुखी नीति के क्रियान्वयन में जन भागीदारी का अत्यधिक महत्व है। मेरा यह विश्वास है कि, दृढ़तापूर्वक सलग्नता यह नीति सही ढंग से क्रियान्वित नही हो सकेगी।
शिक्षा के बिना देश का विकास संभव नहीं है। पूर्ण मानव क्षमता को प्राप्त करने तथा समग्र मानव विकास तथा न्यायपूर्ण समाज के विकास और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा आवश्यक है। सार्वभौमिक उच्चस्तरीय शिक्षा वह उचित माध्यम है, जिससे देश की समृद्ध प्रतिभा और संसाधनों का सर्वोत्तम विकास व्यक्ति, समाज , राष्ट्र और विश्व की भलाई के लिए किया जाता है।भारत द्वारा 2015 में अपनाएं गए सतत विकास एजेंडा 2030 के लक्ष 4 में परिलक्षित वैश्विक शिक्षा विकास एजेंडा के अनुसार विश्व में 2030 तक सभी के लिए, समावेशी और समान गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने और जीवन पर्यन्त शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा दिए जाने का लक्ष है।
इस तरह के उदात्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली को समर्थन, प्रयास करने और अधिगम को बढ़ावा देने के लिए, सम्पूर्ण शिक्षा तंत्र को पुनर्गठित करने की आवश्यकता होगी, ताकि सतत विकास के लिए,2030 एजेंडा के सभी महत्व पूर्ण लक्ष प्राप्त किए जा सके। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं पर जोर दिया गया है। भारतीय भाषाओं के विकास से ही, हिंदी सहित समस्त भाषाओं का समग्र विकास और विस्तार होगा।
पर वर्तमान समय की सच्चाई यह है कि, अंग्रेजी बोलना हम अपनी शान समझते हैं। अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाते हैं। क्योंकि हमारी मानसिकता यह बन गई है कि अंग्रेजी में पढ़ेंगे पढ़ाएंगे तभी एक मुकाम तक पहुंच पायेंगे। और कुछ हद तक यह सोच सही भी है। इसी के परिणाम स्वरूप हम मातृभाषा से विमुख होते जा रहे है। जबकि हर भाषा का अपना महत्व होता हैं। उसकी अपनी पहचान होती है। और आज हमने खुद की पहचान बदल दी है।
अगर कोशिश की जाएं तो हर बात मुमकिन हो सकती है। आज 21 वीं सदी के 21 वे साल में भारत में नई शिक्षा प्रणाली आई है। जिसमे शिक्षा नियमों में बदलाव किए गए हैं। नई शिक्षा नीति के माध्यम से शैक्षिक क्षेत्र में तकनीकी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें भाषाओं को लेकर कई विकल्प रखें गए हैं। यदि शैक्षिक पाठ्यक्रम में छात्र अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में या इसके माध्यम से पढ़ना चाहता है तो, आसानी से उसे पढ़ सकता है। वही इस शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को पढ़ने का विकल्प रखा गया है। छात्रों की जिस क्षेत्र में अधिक रुचि है उसमें उन्हें बढ़ावा दिया जाएगा। छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम करने के लिए, हर संभव प्रयास किए जाएंगे। जिसमे पढ़ाई को आसान बनाने के लिए, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर का इस्तमाल शैक्षिक पाठ्यक्रम में किया जायेगा। वैश्विक स्तर पर मानकों हेतु, बहू विषयक शिक्षा अनुसंधान विश्व विद्यालय की स्थापना भी नई शिक्षा नीति के अंतर्गत प्रस्तावित है, जो मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा के अवसरों का सूत्र हो सकती है।अनेक ऐसे बदलाव नई शिक्षा नीति के अंतर्गत अपनाएं गए हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 21 ववीं सदी के भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मंजूरी दी है। अगर उसका क्रियान्वयन सफ़ल तरीके से होता है तो यह प्रणाली विश्व के अग्रणी देशों के समकक्ष आयेगी।
नई शिक्षा नीति को स्वीकार करते हुए, इससे निर्मित चुनौतियों का मुकाबला भी जरूरी है। शिक्षा एक समवर्ती विषय होने के कारण अधिकांश राज्यों में अपने स्कूल बोर्ड है। इसलिए इस फैसले के वास्तविक कार्यान्वयन हेतु राज्य सरकारों को सामने आना होगा। नई शिक्षा नीति में, विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया गया है। विभिन्न शिक्षाविदों का मानना है कि, विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश से भारतीय शिक्षण व्यवस्था महंगी होने की आशंका है।
इसके फलस्वरूप निम्न वर्ग के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना चुनौती पूर्ण हो सकता है। कुछ दक्षिण राज्यों का यह आरोप है कि, त्रिभाषा सूत्र से सरकार, संस्कृतिकरण करने का प्रयास कर रही है। कुछ राज्यों में अभी भी शुल्क संबंधी विनिमय के अवसर मौजूद है। लेकिन ये नियामक प्रक्रियाएं, असीमित दान के रूप में, मुनाफाखोरी में अंकुश लगाने में असमर्थ है। और वर्तमान में प्रारम्भिक शिक्षा क्षेत्र में शिक्षकों का आभाव है। ऐसे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत प्रारंभिक शिक्षा हेतू की गई व्यवस्था के क्रियान्वयन में व्यवहारिक समस्याएं भी है, जिनका हल ढूंढा जाना आवश्यक है।
इन सारी बातों से हम यह निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि, आज भी अंग्रेजी का दबाव किस कदर भारत की नई पीढ़ी को, प्रताड़ित कर रहा है। सच तो यह है कि आजादी के बाद, मातृभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान का जो सपना देखा गया था, अब वह सपना केवल कार्यक्रमों संस्थानों और दस्तावेजों में दबकर रह गया है।
पर सही मायनों में मातृभाषा से बच्चों का परिचय, घर परिवेश से शुरू हो जाता है। मातृ भाषा में बात करना, चीजों को समझना, इसका पूरा आधार स्तंभ मातृभाषा ही होती है। ऐसे में यदि इस क्षमता का उपयोग पढ़ाई के माध्यम के रूप में, मातृभाषा का चुनाव कर किया जाएं तो, सकारात्मक परिणाम अवश्य देखने को मिलेंगे। यह कार्य अत्यंत जटिल और चुनौती भरा है पर नामुमकिन नहीं है।

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