Tuesday, June 30, 2026
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पद्मा मिश्रा का लेख – महादेवी की गीत संवेदना

छायावाद की लोकप्रिय  वरेण्य कवयित्री, कथाकार महादेवी.वर्मा के काव्य ने हिंदी साहित्य के इतिहास में अपनी अप्रतिम जगह बनाई है। उनका  गीत सृजन भावनाओं का एक प्रवाह है जो हमारी संवेदना से उद्भूत होकर कवि और समाज के मानस पटल पर अभिव्यक्ति का जादू जगाता है। काव्य की विविध कलाओं से उन्होने 
गीत साहित्य को सजाया संवारा है, परंतु केवल गेयता या शब्दों का क्रम सुनिश्चित करना ही गीत या  की कसौटी नहीं है वह अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी है,यह उनकी लेखनी ने सिद्ध कर दिया है कि  यही अभिव्यक्ति जब लेखनी के भाव सलिल में गंगा सी प्रवाहित होती हुई हमारे हृदयों को सिंचित करती है तो वह गीत अमर हो जाता है।
छायावाद की प्रबल स्तंभ महादेवी वर्मा की शताब्दी वर्ष मनाते हुए उनकी गीत साधना को भी नमन करें ,जिन्होने भावनात्मक अभिव्यक्ति को एक अव्यक्त, रहस्यमय आवरण.में छिपाकर अपने आराध्य को अंतर्मन में स्थापित भी किया और उसकी अभ्यर्थना भी की। और यही छायावाद की विशिष्ट उपलब्धि भी रही है और उसकी पहचान भी। वसतुत: छायावाद हिन्दी कविता में निरंतर परिवर्तन का वाहक भी रहा है।डा नामवर सिंह ने और रामविलास शर्मा जी का मानना है कि भक्तिकाव्य के बाद काव्य और सामाजिक चेतना दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण  क्रमिक विकास है।
 विकास  की यह यात्रा घनानन्द, आलम, बोधा, श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी आदि से होती हुई छायावाद तक पहुंची है जहां स्वतंत्रताकी अनुभूति, इचछा , हृदय से बुद्धि का अनुशासन, स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह, असीम और ससीम का मिलन, सुख-दुख की पारस्परिकता, प्रतीकात्मकता, अस्पष्टता, लाक्षणिकता, संकेतपरकता,की अभिव्यक्ति के स्थान पर  अर्थात मैं से हम की ओर  प्रवृत्त आदि विशेषताओं से समृद्ध छायावाद के कारण साहित्य और समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की रूढ़ियों और बन्धनों से मुक्ति की चेतना विकसित हुई। 
वैयक्तिक पीड़ा, दुःख तथा वेदना की निजी अनुभूति परक प्रस्तुति की  बजाय सार्वदेशिक अभिव्यक्ति का साहस और संकल्प विकसित हुआ। सार्वदेशिक पीड़ा – दुःख और वेदना  का विस्तार हुआ  सूक्ष्म के द्वारा स्थूल को परिभाषित करने का ही  परिणाम हैं। 
गीत संपूर्ण मानवीय संवेदना के सर्वोत्तम निचोड़ की सार्थक और सगीतात्मक अभिव्यक्ति है,
गीत जब व्यक्तिगत अनुभूति और अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता है तब वह व्यक्ति से समूह की ओर गमन करता है,, इसलिए गीत वहीं समझ सकता है जो उसकी आत्मा में समाहित मानवीयता की आवाज सुन सकता है और उसकी निजता में समाहित होकर सर्वव्यापी हो जाता है।
महादेवी का प्रकृति वर्णन  भी उनकी निजता का ही विस्तार है। यह विस्तार महादेवी में धीरे धीरे काव्य समय बन गया जिसके कारण कुछ आलोचकों ने इसे कृत्रिम या बौद्धिक दुःखानुभूति’ के नाम से अभिहित किया है।
आदरणीय सत्य प्रकाश मिश्र जी कहते हैं- महादेवी में बौद्ध धर्म के प्रभाव और पिछड़े इलाके में अधनंगे, अधभूखे, प्रताड़ित गरीबों और निम्न वर्गों के बीच काम करने से निर्मित करुणा ने संसार के अन्धकार, अज्ञान, दैन्य और पीड़ा को कम करने प्रेम करुणा के लिए दीपक की तरह अपने को विसर्जित करने की मूल्यचेतना विकसित की।  
दीपक’ का सर्वाधिक प्रयोग महादेवी वर्मा ने किया है-‘
 मधुर मधुर मेरे दीपक जल।
मन्दिर के दीप की तरह जीवन के सूनेपन को प्रभात बेला की पहली किरण तक भरने के आजीवन संकल्प और उससे प्राप्त आत्मसन्तोष की प्रतीति उनकी कविताओं में अन्तःप्रवाहित रक्त की तरह व्याप्त है-‘
यह मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो!
रजत शंख-घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर,
विहँसे उपल तिमिर था खेला,
अब मंदिर में इष्ट अकेला,
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!
महादेवी उन  महान.महिला रचनाकारों  में से एक हैं जिन्होंने विवाह संस्था  को अस्वीकार कर दिया था।। उनका विवाह एक डॉक्टर से हुआ पर विदा होकर उसके घर जाने से उन्होंने दृढ़तापूर्वक मना कर दिया। पिता ने विवाह के बन्धन से मुक्ति के लिए धर्म परिवर्तन की सलाह दी बल्कि बेटी के लिए स्वयं भी धर्म परिवर्तन को तैयार हो गये लेकिन महादेवी ने इसको भी नकार दिया। 
उन्होंने अनेक धार्मिक सम्प्रदायों को नजदीकसे जांचा परखा था,, वहां उन्हें स्त्री का अपमान और किसी न किसी प्रकार की सड़ान्ध ही दिखी। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने गयीं, लौट आयीं, और अन्ततः गांधी के प्रभाव से सेवा का व्रत लिया। शायद जीवन की यही रिक्तता उन्हें छायावाद के दुख  रहस्य, पीडा और वेदना की अनंत गहराईयों में ले गयी जहां अंतरमन की वैयक्तिक पीड़ा भी सार्वजनिक सार्वकालिक बन जाती है-मैं नीर भरी दुख की बदली,उमडी कल थी,मिट आज चली
विस्तृत नभ का कोई कोना,मेरा न कभी अपना होना।
महादेवी वर्मा रहस्यवाद और छायावाद की भावप्रवण कवयित्री थीं, इसलिए उनके काव्य में आत्मा-परमात्मा के मिलन और विरह तथा प्रकृति के ।विभिन्न रुपों की छाया दृष्टिगोचर होती है।वेदना और पीड़ा महादेवी जी की कविता के प्राणवायु की तरह शामिल हैं।उनका समस्त काव्य वेदनामय है। उन्हें निराशावाद अथवा पीड़ावाद की कवयित्री कहा गया है। वे स्वयं लिखती हैं, दुःख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है, जिसमें सारे संसार को एक सूत्र में बाँध रखने की क्षमता है। इनकी कविताओं में सीमा के बंधन में पड़ी असीम चेतना का क्रंदन है। यह वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत की है, जो उसी के लिए सहज संवेद्य हो सकती है, जिसने उस अनुभूति क्षेत्र में प्रवेश किया हो। वैसे महादेवी इस वेदना को उस दुःख की भी संज्ञा देती हैं, “जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँधे रखने की क्षमता रखता है”किंतु विश्व को एक सूत्र में बाँधने वाला दुःख  सांसारिक दुःख ही होता है, जो भारतीय साहित्य की परंपरा में करुण रस का स्थायी भाव होता है। महादेवी ने अपने गीतों में इस दुःख को नहीं अपनाया है, वे कहती हैं, “मुझे दुःख के दोनों ही रूप प्रिय हैं। एक वह, जो मनुष्य के संवेदनशील ह्रदय को सारे संसार से एक अविच्छिन्न बंधनों में बाँध देता है और दूसरा वह, जो काल और सीमा के बंधन में पड़े हुए असीम चेतना का क्रंदन है” किंतु, उनके गीतों में  वह ‘क्रंदन’ ही अभिव्यक्त हुआ है,जो अव्यक्तहै,अमूर्तहै।। यह वेदना सामान्य रुप से लोक ह्रदय  को परिभाषित नहीं करती बल्कि लोक वेदना का ही प्रतिफलित रुप.है।संभवतः इसीलिए रामचंद्र शुक्ल ने उसकी सच्चाई में ही संदेह व्यक्त करते हुए लिखा है, “इस वेदना को लेकर उन्होंने ह्रदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखीं, जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता”। 
इसी आध्यात्मिक वेदना की अनुभूत संवेदना ने महादेवी के गीतों की सूक्ष्म और गहन भावानुभूतियों का विकास और प्रसार दिखाई पड़ता है। डॉ॰ हज़ारी प्रसाद द्विवेदी तो उनके काव्य की पीड़ा को मीरा की काव्य-पीड़ा से भी बढ़कर मानते हैं।मीरा की तरह ही रहस्य के आवरण में छिपे अज्ञात प्रियतम की अभ्यर्थना और प्रेम समर्पण की भावनात्मक अनुभूति ही उनके सृजन में सर्वात्मना आत्म समर्पण का भाव भर देती.है।
सब बुझे दीपक जला लूं।
घिर रहा तम आज दीपक,
रागिनी अपनी जला लूं।
क्षितिज कारा तोड़ कर अब,
गा उठी अनन्त आंध
अब घटाओं में न रुकती,
लास तन्मय तड़ित बांधी।
 ऐसे अनेक गीत हैं जो महादेवी के जीवन की रिक्तता, एकाकीपन और अंतर की  व्यथा को व्यंजित करते हैं। लेकिन ऐसे भी अनेक गीत हैं जो संसार के गहन अंधेरे के खिलाफ लड़ने का संकल्प भी व्यक्त करती हैं। जैसे वे सांध्यगीत में कहती हैं–
शून्य मेरा जन्म था
अवसान है मुझको सवेरा
प्राण आकुल के लिए
संगी मिला केवल अंधेरा।
वह संसार से कुछ भी महीं चाहती ।उन्हें समृद्ध जीवन के.वैभव की अपेक्षा अपना करुणा,वेदना से सिक्त मन का सूनापन ही प्रिय है।नीहार में लिखित पंक्तियां
 दृष्टव्य हैं–
मेरा यह भिक्षुक जीवन?
उनमें अनन्त करुणा है
इसमें असीम सूनापन
व्यक्तिगत आंसुओं के नीहार’ में बन्दिनी रहने वाली महादेवी ने  रश्मि’ के आलोेक में जीवन की व्याप्ति का दर्शन किया और प्रखर ताप को झेलते हुए सांध्य क्षणों तक जाते जाते समाजव्यापी दुःख की अनुभूति करने लगीं। उनकी नीर भरी बदली का दुःख केवल प्रणय व्यथा ही नहीं है, उसमें अनेक प्रकार के सामाजिक असन्तोष घुलेमिले है।अपने गीतों में तम का बार बार प्रयोग विभिन्न अर्थो में आया है। यह शब्द प्रतीकात्मक है,तम यानि अंधेरा, जो तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक जड़ता और आंतरिक तमस का भी प्रतीक है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अनेक परिदृश्य लाक्षणिक रूप में भविष्य के सपने को वर्तमान से परिभाषित भी करते हैं। अतः उनके गीतों में प्रयुक्त इन प्रतीकों को व्यापक अर्थ में ग्रहण करना चाहिए। 
इस असीम तम में मिल कर
मुझको पल भर सो जाने दो
बुझ जाने दो देव आज
मेरा दीपक बुझ जाने दो।
उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल ब्रजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का रुप गढा। संगीत की विदुषी होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भाँति प्रकाशमान है।  27 अप्रैल 1982 को भारतीय साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया था। कोमल भावों की अद्भुत चितेरी महादेवी जी की गीतात्मकता मन प्राणों को स्पर्श कर तरंगित कर देती है और पाठक उस वेदना और  पीड़ा में स्वयं को निमज्जित कर साधारणीकरण के.भाव को प्राप्त कर लेता है।
महादेवी जी के गीतों की संवेदना व्यक्तिपरक नहीं लगती,अपितु  उनकी आत्मवेदना का सहज विस्तारित रुप संसार में.व्यापक हो जाता है।
महादेवी मेरी प्रिय कवयित्री रही हैं,छात्र जीवन से ही छायावाद मेरा प्रिय विषय और महादेवी के गीत मन को छूते थे।एक समय था जब बचपन में मैं भी महादेवी बनना चाहती थी। आज उनके गीतों पर अपनी भावाभिव्यक्त कर पाने का अवसर मिला,पत्रिका की आभारी हूं,और अपनी कुछ पंक्तियाँ समर्पित कर रही हूं–
 वह स्नेह बांटती धरती को,खुद पीड़ा की सहकार बनी
वेदना लिए अन्तरमन मे, रस बरसाती जलधार बनी
 वह स्वयं नीरजा नेह सलिल,जैसे सपनो की मधु यामा
वह महादेवि थी सहज सरल,मीरा  सी कृष्णा की श्यामा
जीवन के रण में प्रति पल क्षण, वह जली दीप की शिखा विरल
रेखाचित्रों मे गढती थी,मानव जीवन के रुप विमल
छाया की माया मे पलकर,पलकों पर सोये सपनों सी
अपनी पीड़ा में साध लिया,जग की पीड़ा ़थी महीयसी
 तुम भाव बोध की कविता सी,हो शक्ति पुंज हे पावन मन !
अंतर की कोमल कविता को शत बार नमन शत बार नमन
 
पद्मा मिश्रा ़
एल आई जी -114,रो हाउस, आर आई  टी थाना के सामने ,आदित्यपुर-2,जमशेदपुर-14
831013
जमशेदपुर


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5 टिप्पणी

  1. वाह, कितना सुंदर लेख। महादेवी के अंतर्मन की करुणा साकार हो गई बिटिया।

    जुग-जुग जियो बेटी।

    स्नेह,
    प्रकाश मनु

    • सादर प्रणाम बाबूजी,
      मेरे लेख को आपने अपना स्नेहाशीष दिया ,यह मेरे.लिए गौरव की बात है। मेरी हर रचना आपका स्नेह पाकर उर्जस्वित हो जाती है।
      बहुत बहुत धन्यवाद, आभार हृदय से।
      आपकी बिटिया
      पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  2. पद्मा मिश्रा जी का लेख ‘महादेवी की गीत संवेदना’ पढ़ा। इस लेख में आपने महादेवी वर्मा जी के गीतों की संवेदनशीलता, उनकी आध्यात्मिक दृष्टि, रहस्यवाद और जीवन के एकाकीपन अच्छे से उकेरा है। व्यक्तिगत जीवन पर भी थोड़ा बहुत प्रकाश डाला है।
    दरअसल महादेवी वर्मा जी का जीवन एकाकी रहा है। और उन्होंने अपने एकांत को अपना साथी बना लिया था। उसी एकांतिक भावभूमि पर उनकी अध्यात्म की फसल लहराई है। इस लहलहाती फसल को देखकर उनके समकालीनों ने इसे नकारने का प्रयास किया है।
    महादेवी जी ने कभी मुखर होकर उनका खंडन नहीं किया है। हां सूक्ष्म अभिव्यक्ति सभी को जवाब दे दिया था। उन्होंने इस पर लिखा था – *जाने क्यों कहता है कोई, मैं तम की उलझन में खोई।*
    आपने उनके द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों जैसे दीपक और बदली से संबंधित रचनाओं पर सटीक विश्लेषण किया है। जो नएपन का एहसास कराता है।
    बदली प्रतीक है एक भारतीय नारी का। बदली आकाश में सब जगह छाई रहती है पर कहने के लिए उसका अपना एक कोना भी नहीं है। उसके पास तो सिर्फ मिटने भर का अधिकार है।
    नभ का कोई कोना,
    मेरा न कभी अपना होना
    उमड़ी कल थी, मिट आ चली।
    करुणा और मिटना उनके जीवन के अंग बन चुके थे। वे जगत की करुणा में इतनी लीन हो जाती है कि इसके बदले में वे अमरलोक को भी ठुकरा देती हैं-
    क्या अमरों का लोक मिलेगा
    तेरी करुणा का उपहार
    रहने दो हे देव! अरे!
    यह मेरा मिटने का अधिकार।
    पद्मा जी, आपने महादेवी वर्मा जी के गीतों की संवेदना को बढ़िया से व्यक्त कर दिया है। इसके लिए आपको बधाई

    • सादर प्रणाम सर,
      आपने बहुत सुंदर ढंग से मेरे लेख को पढा और उसकी समीक्षा की।मैं आभारी हूं। महादेवी के गीत संसार में संवेदना के स्वर पग पग पर गुंजित हैं जिन्हे पढते हुए मन भावनाओ में बह जाता है।
      आपने बिल्कुल सही कहा कि–करुणा और मिटना उनके जीवन के अंग बन चुके थे। वे जगत की करुणा में इतनी लीन हो जाती है कि इसके बदले में वे अमरलोक को भी ठुकरा देती हैं-
      एक बार पुन: सप्रणाम सादर धन्यवाद आदरणीय सर।
      पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  3. सादर प्रणाम बाबूजी,
    मेरे लेख को आपने अपना स्नेहाशीष दिया ,यह मेरे.लिए गौरव की बात है। मेरी हर रचना आपका स्नेह पाकर उर्जस्वित हो जाती है।
    बहुत बहुत धन्यवाद, आभार हृदय से।
    आपकी बिटिया
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

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