विष्णु प्रभाकर बिरले साहित्यकार हैं, जिन्होंने जीवनी लेखन को इतनी गरिमा और ऊँचाई दी, कि ‘आवारा मसीहा’ और विष्णु प्रभाकर एक हो गए। ठीक उसी तरह, जैसे ‘आवारा मसीहा’ और शरत एक हो गए। शरत को याद करें, और ‘आवारा मसीहा’ याद न आए, ऐसा हो नहीं सकता।
‘आवारा मसीहा’ दिग्गज साहित्यकार विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी गई शरत की जीवनी थी, पर ‘आवारा मसीहा’ हिंदी साहित्य में एक ऐसा चमत्कार भी था, जैसे चमत्कार कभी–कभार ही होते हैं। और होते हैं तो उनकी चौंध बिजली की तरह पूरे साहित्य में व्याप जाती है। इसीलिए जब आठवें दशक के मध्य में ‘आवारा मसीहा’ आया था, तो हिंदी में ‘शरत…शरत…शरत’ और ‘आवारा मसीहा’, बस यही सुनाई देता था। जैसे पूरा साहित्य शरतमय हो गया हो।
विष्णु प्रभाकर बेशक हिंदी के बड़े लेखक हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में बहुत कुछ नया और मूल्यवान जोड़ा। उसे अनुभव-विस्तार के साथ एक नया गौरव और गरिमा दी। विष्णु जी मूलतः कथाकार हैं, पर आश्चर्य, उनके द्वारा लिखी गई शरत की औपन्यासिक जीवनी को जो चतुर्दिक ख्याति मिली, वह हिंदी साहित्य की एक विरल और ऐतिहासिक घटना है। हिंदी में जीवनी साहित्य बहुत लिखा गया, पर शरत की जैसी शाहकार जीवनी विष्णु प्रभाकर ने लिखी, वह अपने आप में एक मयार है। किसी बड़े और बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा के धनी लेखक की सुंदर और सांगोपांग जीवनी कैसी होनी चाहिए, उसे किस तल्लीनता से लिखा जाना चाहिए, इसे ‘आवारा मसीहा’ पढ़कर जाना जा सकता है। सच तो यह है कि अपने अथक श्रम और अतुलनीय समर्पण से विष्णु जी ने हिंदी में जीवनी साहित्य को जिस असंभव लगती ऊँचाई तक पहुँचा दिया, वह आज भी बहुतों के लिए स्पृहणीय है।
‘आवारा मसीहा’ शरत सरीखे बड़े कद के साहित्यकार की एक संपूर्ण जीवनी तो है ही, पर इसके साथ ही वह एक ऐतिहासिक महत्त्व की कृति बन गई, जिसमें सर्जना का अपार सौंदर्य है। यही उसे विलक्षण बनाता है। उसमें जितनी गहराई है, उतना ही भावनाओं का विस्तार भी, जितना असाध्य श्रम है, उतनी ही रस में ऊभ-चूभ करती सृजनात्मकता भी। किसी उपन्यास से ज्यादा रोचक और रसपूर्ण होने के साथ ही, उसमें किसी नदी की अजस्र धारा जैसा प्रवाह है और हर क्षण मन में यह जिज्ञासा और कौतुक बना रहता है कि आगे अभी और क्या सामने आना है, अभी क्या कुछ और उस रहस्य के परदे से बाहर आना है, जिसने जाने-अनजाने शरत के व्यक्तित्व को ढककर, उसे असंख्य किंवदतियों का विषय बना दिया है।
यों सच पूछिए तो ‘आवारा मसीहा’ शरत के जीवन से जुड़े तथ्यों की पुनःपुनः खोज ही नहीं, यह एक तरह से शरत का पुनराविष्कार है, यानी ‘ए डिस्कवरी ऑफ शरत’। शरत सरीखे बड़े कद के और कुछ-कुछ बोहेमियन किस्म के बीहड़ साहित्यकार की जीवनी ऐसी ही हो सकती थी।
विष्णु जी ने खुद को समूचा झोंककर शरत की जीवनी लिखी। पर लिखने के बाद संभवतः विष्णु प्रभाकर भी वही नहीं रह गए, जो इस जीवनी को लिखने से पहले थे। उनकी पहचान ही नहीं, साहित्यिक परिचय भी हमेशा-हमेशा के लिए बदल गया था। अब वे घर-घर ‘आवारा मसीहा’ वाले विष्णु प्रभाकर के रूप में जाने जा रहे थे। हिंदी के हजारों पाठकों ने ‘आवारा मसीहा’ को पढ़ा और पढ़ते ही सबके होंठों पर बस एक ही शब्द सुनाई देता, “अद्भुत…!”



प्रसिद्ध लेखका , कवि साहित्यकार डा प्रकाश मनु जी ने वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर को एक विलक्षण लेखक के रूप में उन पर जब अपनी कलम चलाई तो.लगा जैसे उन्होने साहित्य को, सृजन को जिया है। उन्होंने अपने सृजन के माध्यम से शरतचंद्र के जीवन और साहित्य के अनेक अछूते पहलुओं को.जैसे अपनी लेखनी के भाव प्रवाह में बहा ले गए हैं वह सचमुच अप्रतिम है अनुपम है।
भावप्रवण कथाकार शरतचंद्र की कृतियों को पढने समझने और उसकी गहराईयों में डूब जाने का अपना एक सौंदर्य है। जहां पाठक उस.कथा की व्यथा और कथ्य में आत्म लीन सा महसूस करता है।
उन्होने लिखा है कि उनके.व्यक्तित्व को समझना सरल नहीं था।कुछ तो रहस्यमयता थी जिसे व्यक्त होते.हुए भी अव्यक्त सा अहसास होता था।और आम पाठक या उनके विषय में जानने की जिज्ञासा रखने वालो का मन कभी संतुष्ट नहीं हो पाता । वे कहते हैं यह धारणा सत्य ही है कि शरतचंद्र की प्रकृति बहुत जटिल थी। साधारण बातचीत में वे अपने मन के भावों को छिपाने का प्रयत्न करते थे और उसके लिए कपोलकल्पित कथाएँ गढ़ते थे। कितने अपवाद, कितने मिथ्याचार, कितने भ्रांत विश्वासों से वे घिरे रहे। इसमें उनका योग भी कुछ कम नहीं था।
प्रकाश मनु जी ने उनकी कृति आवारा मसीहा पढते समय यह अनुभव किया कि आवारा मसीहा उनके व्यक्तित्व में इस तरह समाहित हो गया था कि उसे शरतचंद्र जी के जीवन का पर्याय माना जाने लगा था।वस्तुत; आवारा मसीहा ने शरतचंद्र को शरतचंद्र बनाया।इतनी एकरुपता कि उन दोनो की पृथक कल्पना भी संभव नहीं रही थी। विष्णु प्रभाकर जी पहले ऐसे जीवनीकार थे जिन्हने जीवनी विधा को गरिमामय बनाया था।आवारा मसीहा’ और शरत एक हो गए। शरत को याद करें, और ‘आवारा मसीहा’ याद न आए, ऐसा हो नहीं सकता।
विष्णु प्रभाकर जी ने जब आवारा मसीहा लिखी थी तब यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि वह.शरतचंद्र पर लिखी एक अनूठी कृति बन जायेगी।कालजयी. ऐतिहासिक और उल्लेखनीय। प्रकाश मनु स्वयं एक अप्रतिम साहित्यकार हैं परंतु एक श्रेष्ठ समीक्षक भी हैं।इस आलेख को लिखते समय उन्होने विष्णु प्रभाकर खी के सृजन और व्यक्तित्व को पूरी श्रद्धा और आदर के साथ स्मरण किया है। उनका जीवनी लेखन हिदी साहित्य की अमूल्य निधि है यह मानते हुए वे लिखते हैं –
कला के लिए सत्य भले ही संपूर्ण आदर्श न हो, परंतु जीवन चरित्र लिखना इस दृष्टि से विज्ञान के अधिक पास है और उसका दर्शन सत्य ही है।
बहुत सुंदर आलेख ,। डा प्रकाश मनु जैसे एक समर्पित साहित्य साधक की लेखनी से एक सिद्ध साहित्यकार को मानो श्रद्धा का मौन समर्पण या भाव सुमनांजलि अर्पित की गई है.इस आलेख में।हार्दिक बधाई बाबूजी।सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
‘
अरे वाह बेटी, बहुत अच्छा लिखा। बहुत-बहुत अच्छा। लेख के मर्म को आपने थाह लिया। और उस लेखकीय तड़प को भी पूरी गहराई से समझा, जो शरत को शरत बनाती है।
जुग-जुग जियो बेटी!
मेरा बहुत-बहुत स्नेह और आशीर्वाद,
प्रकाश मनु
एक जीवंत आलेख जो कालजयी कथाकार शरत चंद्र के बारे में बड़ी ही रोचकता और कौतूहल पूर्ण अंदाज में!? उनकी जीवनी कैसे लिखी गई? किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा? और क्या है? उनकी जीवनी में,,, यह बताता है।
सात खंडों में यह वृहद आलेख, पाठक को लेखक आदरणीय एवं स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर के जीवन,उनकी जीवनी साहित्य में शरत चंद्र बाबू की जीवनी लिखने में जो जो समस्याएं आई उनको भी बताता हुआ बाबू शरत चंद्र के साथ चल पड़ता है।
विष्णु प्रभाकर जी को शरत बाबू की जीवनी साहित्य को लिखने में बेहद परेशानी आई। वह युग आज का इंटरनेट या कृत्रिम बुद्धि से प्रभावित और अनुप्राणित वाला जीवन नहीं था। एक-एक प्रमाण, एक-एक सामग्री के लिए भगीरथ प्रयास करने पड़ते थे। तिस पर भी कोढ़ में खाज वाली कहावत,,, के उनके मित्र या अन्य लोग उनके बारे में बात करने में हिच किचाते थे, बताने या बतियाने में भी संकोच करते थे। ऐसे में आवारा मसीहा का सृजन करना किसी भीष्म प्रतिज्ञा से काम नहीं था।
विष्णु प्रभाकर जी ने शरत बाबू के आत्मगोपन स्वभाव का भी बखूबी चित्रण सटीक शब्दों में किया है।पूरी जीवनी में कल्पना या नाटकीयता का सहारा कतई नहीं लिया और तभी तो जीवन लेखक ,बाबू शरत और सृजित जीवनी साहित्य की अद्वितीय थाती है।
डॉक्टर प्रकाश मनु अपने कई लेखों में आदरणीय विष्णु प्रभाकर जी के बारे में अपनी कलम से उनके प्रति अपनी अगाध श्रद्धा और उनकी सर्जनात्मक शक्ति की विवेचना और खुशबू बिखेर चुके हैं।
इस आलेख में भी उन्होंने विष्णु प्रभाकर को, एक जीवनी कर के रूप में, बड़े ही नैसर्गिक और प्रभावपूर्ण ढंग से उकेरा है। जिसके लिए उन्हें साधु साधु साधु।
आप उन्हें लौट कर आते हैं उसे जीवनी पर, तीन सरगों में विष्णु प्रभाकर जी ने बाबू शरत चंद्र को पूर्ण रूपेण काल जयी कथाकार की जीवंत भूमिका में लगभग अमर कर दिया है।
प्रथम भाग में ही शरद बाबू के बचपन के शौर्य और यौवन की दहलीज तक का एक ईमानदार सच्चा विश्लेषण एक कहानी के रूप में प्रकट किया है दूसरे सर्ग में वे एक उभरते हुए लेखक और रंगून की यात्रा में ब्रह्मा जाते हैं जहां उन में सही रूप से, लेखक बाबू शरत चंद्र पैदा हो जाता है!!! और यह कथाकार या उपयुक्त शब्दों में मनमोहक कथा शिल्पी जीवन पर्यंत एक से एक सृजनात्मक रचनाएं सृजित करता है।
तीसरे सर्ग में विजडम बास्केट का यह नर्गिसी फूल अपना शिल्प सौंदर्य बिखेरता हुआ ,,,मात्र इकसठ वर्ष की आयु में इस संसार से विदा लेता है।
शानदार आलेख ,क्या ही और अच्छा होता कि शरत बाबू के अमर कथन , उक्तियां,या कुछ और भी औचित्यपूर्ण समाहित कर दिया गया होता।
बरहाल एक नायाब आलेख।
डॉक्टर प्रकाश मनु को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
सादर
सूर्यकांत शर्मा
वाह सूर्य भाई!…वाह! आश्चर्य, पूरे आलेख की एक-एक बात, यहां तक कि एक-एक पंक्ति आपके जेहन में रही। और आपने अपनी टिप्पणी लिखते समय उन्हें ऐसे उकेर दिया, जैसे पूरा आलेख आपके भीतर अंकित हो। और शरत की पूरी की पूरी जीवन गाथा भी।
आपकी टिप्पणी में शरत अपनी अनोखी बोहेमियन शख्सियत और पूरे मिजाज के साथ उतर आए हैं।
बार-बार साधुवाद आपको!
स्नेह, प्रकाश मनु