संपादकीय - क्या नई शिक्षा नीति की सच में ज़रूरत है ? 3

एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ऊपर के तमाम नाम उन लोगों के हैं जो भारत की उस पुरानी शिक्षा नीति के तहत पढ़े थे जिसे आज निकृष्ट कहा जा रहा है। इसी शिक्षा नीति के तहत ब्रिटेन, युरोप, अमरीका, कनाडा के आईटी, स्वास्थ्य सेवा, कानून, फ़ार्मेसी जैसे क्षेत्रों में भारतीयों की तूती बोलती है। आज एक नई शिक्षा नीति की बात हो रही है। हमें सोचना होगा कि क्या हमारी नई शिक्षा नीति हमारी पुरानी शिक्षा नीति से वैश्विक स्तर पर बेहतर नतीजे दिखा पाऐगी।… सोचना यह भी होगा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले युरोप और एशिया के दूसरे मुल्कों से बेहतर नतीजे दिखाने के लिये हमारी नई शिक्षा नीति में नया क्या जोड़ा जा रहा है।

ट्विटर पर कांग्रेसी सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने एक ट्वीट किया है जो आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस ट्वीट में भारतीयों को विश्व स्तर की कंपनियों का सी.ई.ओ. दिखाया जा रहा है और पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों के मुखियाओं की तस्वीर की साथ तुलना की जा रही है। 
भारत की ओर से सुंदर पिचाई (गूगल), सत्या नडेला (माइक्रोसॉफ़्ट), शान्तनु नारायण (एडोबी), अरविन्द कृष्णा (आई.बी.एम.) और पराग अग्रवाल (ट्विटर) के चेहरे हैं तो दूसरी ओर हाफ़िज़ सईद (जमात-उ-दावा), मसूर अज़हर (जैश-ए-मुहम्मद), ज़की-उर-रहमान (लश्कर-ए-तयैबा), नूर वली (तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान), यूसुफ़ मंसूर ख़ुरासानी (लश्कर-ए-झंगवी)।
इस वायरल फ़ोटो का निशाना ज़ाहिर है कि पाकिस्तान हो सकता है। मगर इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि इस फ़ोटो में तो केवल पाँच भारतीय दिखाए गये हैं। क्या अन्य भारतीय भी हैं जो ऐसे पदों तक दुनिया भर में पहुंच चुके हैं।
मैंने पाया कि इनके अतिरिक्त भारतवंशियों के ऐसे बहुत से नाम हैं जिन्होंने हमारा गौरव बढ़ाया है। मैंने इस विषय में अपनी खोज शुरू की तो पाया कि अमरीका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस और ब्रिटेन की गृह मंत्री (होम सेक्रेटरी) प्रीति पटेल के अतिरिक्त और बहुत से नाम हैं जिनकी जानकारी हम सब के लिये आवश्यक है। 
इस सूची में शामिल कुछ नाम मैं अवश्य साझा करना चाहूंगा। अजय पाल सिंह बंगा (चेयरमैन मास्टर कार्ड), संजय महरोत्रा (सीईओ माइक्रॉन टेक्नॉलाजी) इनके अतिरिक्त करीब बीस ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने विश्व की बहुत सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुखिया की भूमिका निभाई है।
इंदिरा नूई पेप्सिको की सीईओ रहीं तो अंशुल जैन तीन वर्षों के लिये डॉयशे बैंक के चेयरमैन रहे। आजकल वे कैंटर फ़िट्ज़जेरॉल्ड (एक अमरीकन फाइनेंशियल कंपनी) के अध्यक्ष हैं।
यहां एक सवाल अवश्य खड़ा होता है कि विश्व में चीन, फ़्रांस, रूस, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों के रहते भारत जैसे एक विकासशील देश के लोग विश्व की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीईओ कैसे बन पाते हैं।
यह माना जाता है कि भारतीयों में पाँच ऐसी विलक्षण विशेषताएं हैं जो उन्हें विश्व के अन्य देशों के नागरिकों के मुकाबले बेहतर स्थिति प्रदान करती हैं। पहली विशेषता है कि भारत में पलने बढ़ने वाले युवा कम से कम तीन भाषाओं में सहजता से बातचीत कर पाते हैं। उनकी पढ़ाई अंग्रेज़ी में होती है। अपनी मातृभाषा पढ़ना और बोलना घर पर सीख लेते हैं और उत्तर भारत में आने पर हिन्दी सहज रूप से सीख लेते हैं। भारत का त्रिभाषा फ़ार्मूला उनमें आत्मविश्वास पैदा करता है। भारतीयों में भाषा सीखने की एक सहज क्षमता है। जब हमारे युवा विदेश जाते हैं तो अंग्रेज़ी में तो सहज रूप से काम कर ही लेते हैं अन्य भाषाएं सीखने में भी दक्षता दिखाते हैं।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हमारा समाज ख़ासा कंपलेक्स है। हमारे अफ़सर सब की बात सुनते हुए सही निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा है। हमारे धर्म में लोकतंत्र है देश में भी। मिलजुल कर काम करने की प्रकृतिक क्षमता हम में भरी होती है। अभावों में जीने की आदत होती है हमें। और हम किसी भी तरह स्थिति को संभाल कर नतीजा निकालना जानते हैं।
जैसे भारत में अनेकता में एकता है ठीक वैसे ही अराजकता में भी व्यवस्था और तरतीब दिखाई देती है। हम किसी भी हालात में काम पूरा कर लेते हैं। कहा जाता है कि एक विदेशी जब भारत आया और यहां का ट्रैफ़िक देखा तो उसने कहा अवश्य कोई भगवान है जो इस देश को चला रहा है। हम ख़राब से ख़राब स्थिति में भी अच्छे से अच्छे नतीजे दे पाते हैं। 
क्योंकि भारत एक मल्टी-कल्चरल सोसाइटी है, इसलिये हम भिन्न सोच वाले व्यक्तियों के साथ निपटना जानते हैं और समझते हैं। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोग उत्तर पूर्व और पश्चिम के लोग एक दूसरे के साथ मिल जुल कर रह पाते हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी और न जाने कितने अन्य धर्म के लोग साथ-साथ आसानी से रह लेते हैं। यह भारतीयों की परवरिश का एक अद्भुत पहलू है। उस पर कांग्रेस, भाजपा, वामपंथ, त्रिणमूल कांग्रेस, एन.सी.पी., आर.जे.डी., जे.डी.यू., समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी जैसी तमाम राजनीतिक दलों को मानने वाले आपस में कैसे सामंजस्य बिठाते हैं, यह केवल भारत में ही संभव है। विदेशों में अपने आपको ठीक से जमाने में यह प्रवृत्ति बहुत सहायक सिद्ध होती है।
भारत में माता पिता का एक अतिरिक्त दबाव बना रहता है कि कुछ कर के दिखाओ। अधिक से अधिक नंबर लाओ। यदि बच्चा ब्रिटेन, अमरीका या कनाडा में पढ़ रहा है तो उस पर दबाव होता है कि गोरे विद्यार्थियों से बेहतर नतीजे आने चाहियें। 
भारतीयों की एक बहुत बड़ी ख़ासियत है कि वे किसी भी देश में अपने आपको मुख्यधारा समाज से इतने सहज रूप से जोड़ लेते हैं कि महसूस ही नहीं होता कि वे विदेश में हैं। पश्चिमी देशों में एक कहावत मशहूर है कि इन देशों में प्रवासी इसलिये आते हैं क्योंकि वे अपने देश के हालात से संतुष्ट नहीं हैं। मगर यहां आने के बाद वे अपने देश और मज़हब के लोगों के साथ रहने में ही सुरक्षित महसूस करते हैं। उसके बाद वे अपने अपनाए हुए देश को अपने उस देश में परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं जिस से असंतुष्ट होकर वे अपने अपनाए हुए देश में आए थे। मगर भारतीय ऐसा नहीं करते। वे अपने अपनाए हुए देश के सिस्टम के साथ जुड़ कर उसमें अपना भविष्य बनाते हैं और देश के आर्थिक विकास में योगदान करते हैं। जड़ों के साथ रिश्ता बनाए रखने के बावजूद अपनी कर्म भूमि के साथ पूरी तरह से जुड़ जाते हैं।
कहा जाता है अंग्रेज़ी बोलने का अमरीकी लहजा सबसे जल्दी भारतीय पकड़ते हैं।
भारत की नई शिक्षा नीति की घोषणा करने से पहले मातृभाषाओं में न तो पाठ्य पुस्तकों का इंतज़ाम किया गया और न ही पढ़ाने वाले अध्यापकों एवं प्राध्यापकों के बारे में सोचा गया। आई.आई.टी., आई.एम.ए. और अन्य तकनीकी संस्थाओं के लिये किसी प्रकार की पाठ्य पुस्तकें कहां से आएंगी। पिछले 200 वर्षों में भारत में तो किसी प्रकार का कोई आविष्कार हुआ नहीं। हमारा संविधान भी अंग्रेज़ी में लिखा गया था। इसलिये विज्ञान, कानून, तकनीक, आदि की पुस्तकें मातृभाषा में उपलब्ध करवाई ही नहीं सकतीं जब तक उनकी तैयारी न की जाए। अच्छा रहता कि नई शिक्षा नीति में पहले दो वर्ष केवल पाठ्य पुस्तकों एवं प्राध्यापकों की तैयारी के लिये रखे जाते। मगर यह विकल्प जारी रहता कि जिन्हें अंग्रेज़ी में अपनी पढ़ाई करनी हो वे कर सकें।  
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि ऊपर के तमाम नाम उन लोगों के हैं जो भारत की उस पुरानी शिक्षा नीति के तहत पढ़े थे जिसे आज निकृष्ट कहा जा रहा है। इसी शिक्षा नीति के तहत ब्रिटेन, युरोप, अमरीका, कनाडा के आईटी, स्वास्थ्य सेवा, कानून, फ़ार्मेसी जैसे क्षेत्रों में भारतीयों की तूती बोलती है। आज एक नई शिक्षा नीति की बात हो रही है। हमें सोचना होगा कि क्या हमारी नई शिक्षा नीति हमारी पुरानी शिक्षा नीति से वैश्विक स्तर पर बेहतर नतीजे दिखा पाऐगी।… सोचना यह भी होगा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले युरोप और एशिया के दूसरे मुल्कों से बेहतर नतीजे दिखाने के लिये हमारी नई शिक्षा नीति में नया क्या जोड़ा जा रहा है।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

23 टिप्पणी

  1. नई शिक्षा नीति(भारत)पर सम्पादकीय प्रश्न वाचक है ।सभी तथ्यों का उल्लेख यहाँ संभव नही परन्तु इतना अवश्य है कि”बदलते वैश्विक परिदृश्य में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की जरूरतों के मद्देनजर मौजूदा शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता थी ।स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठ्यक्रम की देश भर में असमानताओं और विसंगतियो को दूर करने के प्रयास किये जाना ही मूल उद्देश्य है । भारत से गए हुए तमाम छात्र जो उच्चपद पर हैं उन्हें भी वहां तक पहुँचने में कई कठिनाइयों से गुजरना पड़ा है अतः अब मिडिल और लोवर क्लास के अभिभावक अपने बच्चों को उच्चशिक्षा दिला सकेंगे ।नई नीति कई विकल्पों के साथ लागू की गई है सफलता के लिए विश्वास किया जा सकता है।

    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी, आपकी टिप्पणी हमेशा ही सार्थक होती है। आपकी टिप्पणियां मुझे कुछ सीखने का अवसर देती है।

  2. शिक्षा नीति तो बदलनी ही चाहिए, यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। आखिर कबतक गुलामों के लिए बनाई गई शिक्षा दी जाती रहेगी, जो क्लर्क बनाने के लिए लायी गयी थी। इसे लागू करने के तरीके पर प्रश्न उठाना उचित है, परन्तु नई नीति पर प्रश्न उठाना ठीक नहीं है। अपने देश और भाषा का अभिमान किसी भी देश को सबल बनता है, यह निर्विवाद सत्य है। अंग्रेज़ी के महत्व से इंकार नहीं है, पर क्या अभी तक भारत से बाहर जाकर वहाँ की कम्पनियों के सी ई ओ, बनना अगर गौरव माना जाता रहा तो क्या भविष्य भी इसी तरह का होना चाहिए???? क्या हम यह नहीं चाहते कि भविष्य में दूसरे देश के लोग हिन्दी सीख कर भारतीय कम्पनियों में काम करके अपने को गौरवान्वित अनुभव करें? हम कब तक दूसरों की चाकरी के लिए अपने को तैयार करेंगे? क्या भारत का भविष्य विकसित देश ही तय करेंगे? क्या भारत कभी स्वयं विकसित देश नहीं बन सकेगा? अतः मुझे तो शिक्षानीति का बदला जाना आवश्यक लगता है, और यह निर्णय स्वागत योग्य है।

    • शैली जी किसी भी संपादकीय की सफलता की पहली शर्त होती है कि वह पाठक को सोचने और प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करे। आपकी शानदार टिप्पणी का स्वागत है। नीतियों पर बहस होना ज़रूरी है है।

  3. इस जग में मात्र परिवर्तन ही अपरिवर्तनीय है। परिवर्तन हर क्षेत्र में आवश्यक है और शिक्षा नीति में भी। लेकिन नीतियों पर अमल करने के लिए पहले ठोस आधार बनाना अत्यंत आवश्यक होता है जैसा कि सम्पादकीय में कहा भी गया है। बिना मज़बूत आधार के पुरानी पद्धति को हटाने से शिक्षा प्रणाली निश्चितः कमज़ोर पड़ेगी। पुरानी शिक्षा पद्धति के चलते विदेशों में काम कर रहे भारतीय विशेषज्ञों का काफी मान-सम्मान होता है और उसी के चलते देश की प्रगति भी हुई है। आशा है कि नई शिक्षा नीति के लागू होने पर पुराने सशक्त पहलू बने रहेंगे तथा उच्च शिक्षा को प्रत्येक तक पहुँचाने जैसे अत्यंत आवश्यक पहलू जुड़ेंगे।

  4. प्रगति आपने संपादकीय की आत्मा को सही पकड़ा है। एक सृजनात्मक टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

  5. Tejendra ji you have raised a very important question in your Editorial of today.
    Would the new Education Policy be able to adequately equip the new generation to make a mark globally?
    You have very rightly pointed out the five unique qualities that belong to us,Indians,that help our men n women to earn the trust of the major corporates as to get to the top positions.
    Congratulations for this well researched discourse on the positive role of Indians doing well abroad!
    Regards n best wishes
    Deepak Sharma

    • आदरणीय तेजेंद्र जी नमस्कार। नई शिक्षा नीति का विश्लेषणात्मक संपादकीय अध्ययन किया। यद्यपि परिवर्तन प्रगति का कारक है, परंतु यह किन क्षेत्रों में किया जाना आवश्यक है और क्यों इसके क्या लक्ष्य हैं यह स्पष्ट होना चाहिए। स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र सिक्षा नीति एक महत्वपूर्ण अनिवार्य विषय है। इस महत्वपूर्ण विषय पर प्रबुद्ध शिक्षाविदों का मंतव्य एवं
      परामर्श लिया जाना चाहिए।
      भारतीय शिक्षा जगत के मूलभूत विषय को उठाने के लिए सादर आभार।
      क्षमा पांडेय

  6. महोदय,
    नयी शिक्षा नीति केवल मातृभाषा में शिक्षण तक सीमित नहीं है. इसमें प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने का प्रावधान है. अंग्रेजी में प्राथमिक शिक्षण उचित नहीं. नयी शिक्षा नीति के बावजूद भारत के पब्लिक स्कूल अंग्रेजी में नहीं पढ़ाएंगे, ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं. वे अंग्रेजी में ही पढ़ाएंगे.
    नयी नीति में अंतर- अनुशासनिक अध्ययन की बात है. यानी विज्ञान व इंजीनियरिंग पढने वाले अब मानविकी भी पढ़ सकेंगे.. और मानविकी वाले विज्ञान. यह तो अच्छा ही रहेगा. इससे छात्रों को अध्ययन की स्वतंत्रता होगी. वे कुएँ के मेंढक नहीं रहेंगे. अब 8+3+4 पद्धति से पढाई होगी. और यदि स्नातक में कोई तीन वर्ष बाद ही पढ़ाई छोड़ दे तो उसे डिप्लोमा और दो साल ही पढ़े तो सर्टिफिकेट मिलेगा. मास्टर डिग्री एक साल की होगी.
    उद्यमिता पर विशेष ध्यान रहेगा.
    पुरानी शिक्षा नीति ने नौकर तो बहुत अच्छे बनाए. जितने भी भारतवंशी सीईओ हैं, वे अंततः हैं तो नौकर ही. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि नयी नीति हमारे युवाओं को खुद मुख्तार होना, अपने उद्यम लगाना सिखाएगी. आज हमारे इंजीनियरिंग कॉलेज हों या आईआईटी और आईआईएम, सभी अपने प्लेसमेंट की गाथाएँ गाते हैं. कोई यह नहीं बताता कि उसके कितने छात्र उद्यमी बने. जो शिक्षा केवल नौकर बनाए, उसे लार्ड मैकाले की 1833 की शिक्षा नीति का ही स्वातंत्र्योत्तर संस्करण कहेंगे. इसे बदलना समय की माँग है. बस ध्यान यह रखा जाए कि नीति के साथ साथ पुराने शिक्षक भी बदले जाएं. यानी नये विषय के शिक्षक भी तदनुरूप योग्यता धारक हों. पुराने ढर्रे पर पुलिस शिक्षक ही नये विषय पढ़ा नहीं पाएंगे. हमें पहले मास्टर शिक्षक तैयार करने होंगे.
    बहरहाल, आपके इस समसामयिक संपादकीय के लिये हार्दिक बधाई.

    • डॉ. आर.वी. सिंह जी आपकी बेहतरीन टिप्पणी के लिये धन्यवाद। 2020 तक भारत ने विज्ञान, चिकित्सा, अंतरिक्ष, अर्थव्यवस्था आदि में जितनी भी तरक्की की है… वो पुरानी शिक्षा नीति के तहत की है। मगर आपने कुछ मुद्दे उठाए हैं जिनके लिये आपका धन्यवाद।

  7. वाह, बहुत अच्छा सम्पादकीय विचार, सराहनीय एवं धन्यवाद योग्य।
    इसके साथ जो शिक्षा नीति पर प्रशन पूछा गया, अति गम्भीर तथा विचारणीय विषय है। किसी भी नीति को बदलने या नया कह कर ” ओल्ड वाइन इन न्यू बॉटल” एक पुरानी सोची समझी राजनीतिक चाल होती है, बदलता कुछ नहीं। आख़िर में वही ढाक के तीन पात ! बदलने की ज़रूरत तब महसूस होती है जब पुरानी में कोई गलती,कमी,ख़राबी हो। जब पुरानी से ही देश के विद्याथियों को विशव स्तर पर विशेष ख्यायि मिल रही है, तो बदलने की क्या ज़रूरत । जिस देश मे शिक्षित जनसंख्या काग़ज़ी रिकॉर्ड में 80 प्रतिशत और वास्तविक रूप में 20 प्रतिशत हो वहाँ शिक्षा के प्रसार की आवश्यकता है । हर गाँव मे पाठ शाला नहीं, जहाँ पाठशाला है तो शिक्षक नहीं, जहाँ शिक्षक है तो फर्नीचर और दूसरा शिक्षा हेतु सुविधा नहीं। तो आप समझ सकते हैं आवश्यकता किस बात की है।

  8. सर संपादकीय में आपने अच्छा प्रश्न उठाया पर नयी शिक्षा नीति के तहत
    अन्य अनेक बिंदु हैं जो युवाओं को अपनी मिट्टी से जोड़े रखते हुए सर्वागीण विकास की ओर अग्रसर करते हैं जिसका जिक्र मैंने अन्य लोगों की टिप्पणी में देखा।

  9. बहुत ही सही और सारगर्भित बात कही है आपने। अच्छा प्रश्न पूछा है। अच्छे सम्पादकीय के लिए बधाई, भाई।

  10. नई शिक्षा नीति देश की अपार संभावनाओं को साकार करने के उद्देश्य से लंबे बौद्धिक कसरत के परिणामस्वरूप बनाई और अब लागू की जा रही है। 1986 के बाद 1992 में किंचित परिवर्तन हुए थे। पूरे तीन दशक बाद इसके अंतर्गत व्यापक परिवर्तन किए जा रहे है। देश के सामने कई नई चुनौतियाँ आसन्न हैं। शिक्षा नीति में परिवर्तन सामयिक, आवश्यक और बहुविध विकास के प्रति संभवनाशील है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि इसे बनाने में प्रत्येक स्तर पर बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण किए गए। सर्वेक्षण से प्राप्त नतीजों के आधार पर इसे तैयार किया गया। उम्मीदें ढेर सारी हैं। शिक्षा व्यवस्था की एकरसता और जड़ता टूटना जरूरी है। शिक्षा की माध्यम भाषा के सवाल बहुत जटिल हैं। मातृभाषा में अनिवार्यतः पाँचवीं तक, संभव हो, तो आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई की अपेक्षा की गई है। आगे भी हो तो अच्छी बात है। आपने ठीक लक्षित किया है कि मातृभाषाओं में पढे-पढ़ाए जाने की अपेक्षित तैयारी आवश्यक है, जो नहीं दिख रही है। दूसरी ओर देश में अलग-अलग पब्लिक स्कूल(नाम से पब्लिक प्रकृति में निजी) अंग्रेजी माध्यम शिक्षा छोडकर मातृभाषा में पढ़वाएंगे!!! यह देखने वाली बात होगी। आपने जिन चंद बहुत सफल प्रवासी भारतीयों का नामोल्लेख किया है, वे निस्संदेह हमारे गौरव हैं। परंतु देश अधिक संभवनाशील है। इसकी बहुसंख्यक प्रतिभाएँ अग्रगमन करती हुई कीर्तिध्वजा फहराती हुई यशस्वी हों, हम सभी यही सोचते हैं और हमें इस शिक्षा नीति से बहुत उम्मीदें भी हैं। शुभमस्तु

    • भाई जयशंकर तिवारी जी, आपने संपादकीय गंभीरता से पढ़ा और उस पर सार्थक टिप्पणी की, हार्दिक धन्यवाद।

  11. बहुत ही रोचक शैली में अति महत्वपूर्ण और प्रासंगिक मुद्दे को उठाया गया है।भारतीय समाज में विद्यमान जटिलता और उसकी विविधता ही उसकी सहजता और एकता का आधार है जो देश को मज़बूत करता हैऔर देशवासियों को निकट लाता है।रही बात नई शिक्षा पद्धति की तो यह विचारुथना स्वाभाविक और जायज है कि हमें व्यवस्था में बदलाव लाने से पहले खुद को तैयार करना चाहिए ताकि उस बदलाव के बेहतर और सकारात्मक परिणाम सुनिश्चित हो सकें।

  12. अति महत्वपूर्ण और प्रासंगिक मुद्दों को रोचक ढंग से संपादकीय में उठाया गया है। निश्चित ही भारतीयों की कुछ खास विशेषताएं हैं जो इन्हें विश्व के लोगों से अलग बनाती हैं । यह देश के लिए सुखकर है कि जिन तत्वों को भारतीय समाज की जटिलताएं और विविधताएं कहा जाता है वे ही उसे सहज और सरल बनाने के साथ उसे एकीकृत भी करते हैं,मजबूती देते हैं ।रही बात नई शिक्षा नीति की ,तो व्यवस्था में बदलाव लाने से पूर्व उसके लिए पूर्व तैयारी आवश्यक है,ऐसा करने से निश्चित ही भविष्य में सार्थक और सकारात्मक परिणाम सुनिश्चित किये जा सकते हैं।
    सादर

    • यह तो बढ़िया हुआ कि दो दो बार टिप्पणी पहुंच गयी। तुमने संपादकीय को गहराई से समझा है और महत्वपूर्ण व्याख्या की है।

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