
सच तो यह है कि गीत विधा यदि आज भी बची हुई है तो केवल हिन्दी सिनेमा की वजह से। गीत विधा को साहित्य की मुख्य धारा से लगभग निष्कासित कर दिया गया है। बाएं हाथ से लिखी जाने वाली कविता में विचार है मगर संगीत नहीं। हर कविता शिकायत करती दिखाई देती है। जीवन के किसी भी पक्ष का उत्सव मनाती नहीं दिखाई देती।
दर से उठा था / के वो रोक लेगी मना लेगी मुझको / हवाओं में लहराता आता था दामन /के दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको / कदम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे /के आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको… यहां तक मुहम्मद रफ़ी को उम्मीद है कि शायद प्रेमिका मना लेगी।
गीतों के पारखी
धन्यवाद भारती
फिल्मी गीतों पर आपका यह संपादकीय मन में गहरे तक उतर गया। आपने बहुत अच्छे विषय का चयन किया। आपकी लेखन-शैली भी उत्तम है। बहुत बधाई।
धन्यवाद अशोक भाई।
हिन्दी फिल्मी गीतों जैसे एक अलहदा विषय पर संपादकीय पढ़कर जैसे ताज़गी सी महसूस हुई । विविध मौकों के लिए लिखे गये अनगिनत गीतों पर तो एक नहीं बल्कि अनेक किताबें लिखी जा सकती हैं ।
ये फिल्मी गीत हमारे जीवन का हिस्सा बनने से पहले किसी गीतकार की कलम से निकल ,
किसी संगीतकार के सुरों से बँधकर , गायकों की आवाज़ और अभिनेताओं के अभिनय की प्रक्रियाओं से गुज़र चुका होता है । हमने उन गीतों को अपनी विरासत के रूप में सहेजा भी है ।
फिल्मों के लिए गीत आज भी लिखे जा रहेहैं लेकिन उनका उथला स्तर हमें उन्हें सपरिवार सुनने से रोकता है ।
आज की कविताओं पर आपकी टिप्पणी बहुत सटीक लगी । सच है, उनमें बस विचार है लयात्मकता नहीं …उत्सव मनता है उनमें भी.. कमियों का, शोषण का , स्त्री और दलित विमर्श का और अभिव्यक्ति पर बटोरी गयी तालियों का । ख़ुशियों का उत्सव मनाते ही उसकी सार्थकता का जैसे अवसान हो जाता है । यह प्रचलन अपनी पैठ बना रहा है लेकिन कवित्त की कीमत पर ।
रचना इस ख़ूबसूरत टिप्पणी ने संपादकीय की सार्थकता सिद्ध कर दी।
आपको बधाई इस बहुत ही प्रासंगिक विषय- चयन और उसके विशद प्रतिपादन के लिए. फिल्मों के बहुसंख्यक गीतकार उर्दू गजलगो रहे हैं. हिन्दी गीतकारों ने भी लिखा. लेकिन इस समूचे साहित्य-संसार की कोई गंभीर मीमांसा हिन्दी साहित्य- जगत में नहीं हुई.
हिन्दी समीक्षा का ठेका उन शिक्षकों के पास है जो विभिन्न विश्व विद्यालयों में अपने विभागीय मठों पर कुंडली मारे बैठे रहते हैं. उनका दृष्टि- परास अति संकीर्ण और संभवतः अपने असुरक्षा बोध से ग्रस्त रहता है. वरना क्या कारण है कि इतने लोकप्रिय गीतों, कहानियों और उनके रचनाकारों को साहित्य-समीक्षा में अथवा हिन्दी साहित्य के इतिहास में कोई जगह नहीं मिलती?
हिन्दी भाषा को दुनिया भर में फैलाने का काम जो फिल्में कर रही हैं, उनके लिए गीत लेखन, संवाद और पटकथा लेखन का कोई परचा हिन्दी बीए अथवा एम ए में क्यों नहीं पढाया जाता?
समूचा प्रेमाख्यानक साहित्य अरबी लिपि में लिखा गया. किन्तु राम चंद्र शुक्ल प्रभृति आचार्यों ने उसे हिन्दी साहित्य माना. जावेद अख्तर ने लिखा ” जैसे मंदिर में हो कोई जलता दिया ” (1942 अ लव स्टोरी). यह पंक्ति केवल अरबी लिपि में होने के कारण उर्दू रचना नहीं है. इसकी मीमांसा हिन्दी रचना के रूप में होनी चाहिए.
अगर हम लिपि का संकीर्ण दायरा और दुराग्रह छोड़ दें तो आज हिन्दी क्षेत्र खाड़ी के देशों से लेकर बर्मा तक यानी धरती के बहुत बडे हिस्से को आच्छादित करता दिखता है. यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि के हिन्दी भाषी भी इसमें शामिल हो जाएं तो हिन्दी इस ग्लोब की कितनी बड़ी भाषा बन जाती है! इस पर कोई मरदुआ हिन्दी प्रोफेसर क्यों नहीं सोचता?
छुई मुई बनने से काम नहीं चलता.
ज्यादा दिन जीना है और ज्यादा भूगोल पर अपनी उपस्थिति दर्शाती है तो हमें सर्वसमावेशी होना पड़ेगा.
आपने जो प्रसंग उठाया है, वह निश्चय ही शोधनीय है.
बहुत बहुत बधाई आदरणीय.
भाई रामवृक्ष जी आपकी भावनाएं हमारे पाठक अवश्य पढ़ेंगे। आपको संपादकीय का विषय भाया यह हमारे लिये गर्व का विषय है। धन्यवाद।
पुराने फिल्मी गीत जो रूह को स्पर्श करते थे। आज भी उतने ही नये लगते हैं। आवश्यक विषय पर लाजवाब संपादकीय।
धन्यवाद सुधा जी।
भाव विभोर शानदार मन प्रसन्न हो गया सर। वादियां तेरा दामन अक्सर सुनती हूं पर वास्तविक अर्थ आज समझ में आया सर । बेहतरीन जरिया है कागज ,सब कुछ कह देने का।
अंजु जी हिंदी फिल्मी गीत अपने में बहुत गहरे अर्थ समेटे हैं।
वाह ! वाह
पूरा पढ़ने के बाद यही कह सकते हैं
“अभी तो कुछ कहा नहीं ,अभी तो कुछ सुना नहीं (-पाठकों ने)
बुरा न मानो बात का …..गिला नहीं “…..
अब तो पूरा रविवार इन गीतों को गुनगुनाते निकलेगा ।
बहुत मनभावन संपादकीय!यय
कितनी ख़ूबसूरत प्रतिक्रिया। धन्यवाद पद्मा
वाह, गीतों पर लिखी गई एक अच्छी संपादकीय। ओल्ड इज गोल्ड । इन गानों में इतनी ताजगी है कि पीढ़ी दर पीढ़ी इन गानों को सुनता है, महसूस करता है और इसमें कहीं ना कहीं खो कर अपने आप को टटोल ता है. “जब भी यह दिल उदास होता है जाने कौन आस पास होता है….” एकाकी जीवन में यह सभी गीत मन में उल्लास भरने के लिए काफी है और काफी है वादियों में दूर-दूर तक खो जाने को। ….हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे हैं खो बैठे तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ…. विरह और श्रृंगार का इससे अच्छा नमूना और कहीं नहीं हो सकता।
सच कहा डॉक्टर पुष्पा जी।
लाजबाब.बधाई
1990 में मै दैनिक भास्कर में ऐसा ही एक लेख लिखा था
धन्यवाद रमेश भाई।
अपने सीमित ज्ञान की दृष्टि से कहूं तो हिंदी फिल्मी गीतों पर आधारित यह संपादकीय न केवल दुर्लभ है संपादकीय इतिहास में, बल्कि इस तरह गीतों की महत्वपूर्ण व्याख्या कम ही पढ़ने में मिली है। आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है कि साहित्य में गीत विधा का अस्तित्व शेष है तो इन हिंदी फिल्मी गीतों के कारण। गीत विधा का वैसे भी बहुत अधिक नुक़सान आधुनिक कविता, अतुकांत कविता ने किया है। बहरहाल एक सुंदर विषय के चयन और उस पर श्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई आपको।
विरेन्द्र भाई इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।
वाह तेजेन्द्र जी एक खूबसूरत संपादकीय, 71 में ग्रेजुएशन पूरा हो गया था , सच कॉलेज के दिनों के गीत अविस्मरणीय हैं। मेरा सदा बगैर गीत जिसे आज भी उतनी ही शिद्दत से वुंगुणता हुन वह गई फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती।
धन्यवाद सुरेश भाई
वाह तेजेन्द्र जी एक खूबसूरत संपादकीय, 71 में ग्रेजुएशन पूरा हो गया था , सच कॉलेज के दिनों के गीत अविस्मरणीय हैं। मेरा सदा बहार गीत जिसे आज भी उतनी ही शिद्दत से गुनगुनाता हूँ वह है फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती।
अच्छा लिखा है आप ने, इस में कोई शक नहीं।
साहित्य समाज का आइना होता है। जब नफरत ने मोहब्बत को रिप्लेस कर दिया हो तो हाथ चाहे बांया हो या दांया , शिकायत के सिवा क्या लिखे गा?
फिर चाहे वै गीत हों, गज़ल हों, नज़्म या अन्य कोई विधा । हो सकता है आप जहां हैं वहां तक हिंदी लैंड की हवाएं न आती हों वर्ना शिकायती कविता से शिकायत न होती।
काश १९४९ – १९७१ वाले दिन आज भी होते । गीत तो आज भी होते है फिल्मों में लेकिन वह दिल को सहलाते नही सर पर हथौड़ा चलते हैं।
तभी तो बड़ी शाइस्तगी से ” बर्फ़ ही बर्फ़ है कुछ पिघलता नहीं/ पास बैठे कोई और रुलाए कोई ” फिर शिकायत ही करता है।
आप ने अपने संपादकीय में छुआ है विषय को । निःसंदेह अच्छा है।
धन्यवाद डॉक्टर साहब। कल नॉटिंघम में आपसे मिल कर बहुत अच्छा लगा। इस सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद।
आज तो सभी अपने ज़माने को याद कर गीत गाते रहेंगे
गीतों भरी लाज़वाब सम्पादकीय, जितनी पढ़ी जाए उतनी कम लगे ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
धन्यवाद प्रभा जी।
एक नया सा विषय, जिसको स्थापित कविगण सम्भवतः अस्पृश्य मानेंगे आप जैसे प्रतिष्ठित कवि – लेखक ने स्पर्श किया, आपके साहस को वन्दन। वैसे मेरी ख़ुद की नज़रों में बॉलीवुड कोई सम्माननीय स्थान नहीं रखता था। कुछ गाने विविध भारती या बिनाका गीतमाला के कान में पड़ जाते थे, जो मेरे बड़े बड़े भाई – बहिन कभी कदा छिप कर सुन लेते थे। क्योंकि पिता फ़िल्मी संगीत को स्तरीय नहीं मानते थे। सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत सुनने को प्रेरित करते थे। इस लिये न रुचि पैदा हुई न जानकारी विस्तृत हुई। लेकिन आज संपादकीय पढ़ कर लगा कि इन गानों को न सुन कर कुछ छूट गया है।एक नए कोण से फ़िल्मी संगीत दिखाने के लिए धन्यवाद, आभार
शैली जी इस सार्थक टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
An earnest discussion on popular Hindi film songs of yesteryears.
Heartwarming n nostalgic.
Regards
Thanks so much Deepak ji
Is it possible to this article and discussion in Urdu script as well. Thanks
Suraiya ji, I will try.
ये सारे संयोग-वियोग श्रृंगार के गीत बचपन से ही दिलो- दिमाग़ पर रचे-बसे हैं। कमाल का विषय आपने चुना।
पढ़कर वाक़ई लगा “कि दिल अभी भरा नहीं।”
इस विषय के लिए कई किताबें रच जाएंगी। फिर भी सम्पादकीय ‘गागर में सागर’ की उक्ति को सार्थक कर रहा है।
धन्यवाद आदरणीय शशि मैम।