Wednesday, March 25, 2026
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संपादकीय – मिमिक्री कलाकार या बहुरूपिया

फ़िल्म कलाकारों की नकल उतारना या उनका रूप धरना तो तुलनात्मक रूप से आसान होता होगा, मगर जिन लोगों को दर्शक या श्रोता लगातार नहीं देखते, उनका रूप धरना बहुत ही मुश्किल होता है। मैं निजी तौर पर सुनील ग्रोवर के गुलज़ार अवतार वाले एपिसोड का सबसे बड़ा प्रशंसक हूँ। मैं गुलज़ार साहब से मिल चुका हूँ और उनके बोलने के अंदाज़ से परिचित हूँ। सुनील ग्रोवर ने जिस परफ़ेक्शन के साथ गुलज़ार साहब को ‘फ़ुल जार’ बनकर पेश किया है, उसके लिए उन्हें सर्वोत्तम कलाकार का अवार्ड मिलना ही चाहिए। गुलज़ार साहब का शेर पढ़ने का अंदाज़, आँखों की हरकत, हाथों से माइक पकड़ना और उनका विट……तमाम महीन बिंदु उस परफ़ॉर्मेंस में मौजूद थे।

कपिल शर्मा शो के अनूठे कलाकार सुनील ग्रोवर ने हाल के महीनों में कुछ ऐसा कर दिखाया है कि ‘पुरवाई‘ पत्रिका को मिमिक्री का इतिहास खंगालने को मजबूर होना पड़ गया। डॉ. मशहूर गुलाटी, गुत्थी और रिंकू भाभी से कपिल शर्मा शो में शुरुआत करने वाले सुनील ग्रोवर मिमिक्री की कला को अद्भुत ऊँचाइयों तक ले गए।
दरअसल ‘मिमिक्री’ ग्रीक भाषा का एक शब्द है। इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार सन 1667 में हुआ। ‘मिमिक्री’ का अर्थ ग्रीक में होता है- किसी की नकल करना। मगर इस नकल करने में हास्य का पुट डालना आवश्यक होता था। यानी कि मिमिक्री कलाकार जिसकी नकल उतार रहा है, वह उस व्यक्ति के हाव-भाव और आदतों को कुछ इस तरह पेश करे कि हास्य उत्पन्न हो जाए।
भारत के हिन्दी सिनेमा जगत में मिमिक्री की शुरुआत 1970 के दशक से मानी जा सकती है। उन दिनों एक कलाकार हुआ करते थे जॉनी व्हिस्की। वे अलग-अलग कलाकारों की आवाज़ निकाला करते थे। मगर इस कला को सही ढंग से माँजने का काम किया जॉनी लीवर ने। उनका असली नाम है- जॉन प्रकाश राव जानुमाला। इन्होंने एक स्टैंड-अप कॉमेडियन के रूप में शुरुआत की और फ़िल्मों में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया। इन्हें 13 बार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड के लिए नामांकित भी किया गया।
उस काल के तमाम मिमिक्री कलाकार हर बड़े स्टार के किसी ख़ास अंदाज़ को पकड़ लेते थे और फिर उसी को बार-बार दोहराया करते थे। दिलीप कुमार का धीरे-धीरे बोलना; राज कपूर का चार्ली चैप्लिन की तरह बोलना और ‘जी कम्मो जी’ कहकर कंधे हिलाना; देव आनंद का कंधे ढीले छोड़कर और नथुने फुलाकर तेज़-तेज़ बोलना; राज कुमार का गले में ख़राश पैदा करके ‘जानी’ कहकर ‘आपके पाँव देखे’ वाला संवाद… इसी तरह धर्मेन्द्र, अमिताभ, जितेन्द्र की भी नकल उतारी जाती… यानी कि हर कलाकार का कोई एक अंदाज़ बोल लिया जाता।
मगर अधिकांश मिमिक्री कलाकार सिनेमा के कलाकार बनने में असफल ही रहे। स्टेज पर अधिकांश मिमिक्री कलाकार सिनेमा सितारों द्वारा बोले गए संवादों की नकल करते हैं। अधिक से अधिक हुआ तो एक ही संवाद अलग-अलग एक्टर किस प्रकार बोलेंगे, उसकी नकल करके दिखा देते हैं। मगर उनकी पहुँच बहुत सीमित होती है। उसमें सृजनात्मकता की कमी महसूस होती रहती है।
जावेद जाफ़री ने कुछ अलग अंदाज़ में मिमिक्री करने के प्रयास किए, मगर मिमिक्री की दुनिया में कहीं कुछ ऐसा नहीं हो रहा था जो मिमिक्री आर्टिस्ट को एक कलाकार के रूप में भी प्रतिष्ठित कर सके। सुदेश भोसले ने मिमिक्री की कला को इतनी ऊँचाई दी कि जब हिन्दी सिनेमा के महान अदाकार संजीव कुमार की मृत्यु हो गई, तो उनकी फ़िल्म के लिए डबिंग करने के लिए सुदेश भोसले को याद किया गया।
बात वर्ष 1993 की है, जब फ़िल्म ‘प्रोफेसर की पड़ोसन’ को पूरा करने से पहले संजीव कुमार की मृत्यु हो गई थी। उनकी मृत्यु के बाद सुदेश भोसले ने इस फ़िल्म को पूरा किया। उनकी ख़ासियत यह भी है कि उन्होंने अमिताभ बच्चन की आवाज़ में ओरिजिनल गीत भी गाए हैं। मिमिक्री का अर्थ तो होता है- जो पहले किया जा चुका है उसकी नकल, मगर सुदेश भोसले अमिताभ की आवाज़ में नए गीत गाते हैं, यानी कि उन्हें अमिताभ बच्चन की आवाज़ की गहरी पकड़ है। वे तमाम गायकों की आवाज़ में पूरे गीत गा सकते हैं।
गायकों की मिमिक्री करने में सोनू निगम, शान और सुगंधा मिश्रा के नाम प्रमुख हैं। वैसे कहा जाता है कि इन दिनों भारत के सबसे महंगे मिमिक्री आर्टिस्ट हैं- कीकू शारदा, संकेत भोसले (सुगंधा मिश्रा के पति), निनाद कामत और सुमेध शिंदे। वैसे जॉनी लीवर की बेटी जेमी लीवर भी आजकल मिमिक्री कलाकारों की सूची में शामिल हो चुकी है।
अगर आप निनाद कामत की सिर्फ आवाज़ सुन लें, तो यह पहचानना मुश्किल हो जाएगा कि अमिताभ बच्चन बोल रहे हैं या फिर वे स्वयं। दरअसल, निनाद कामत अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर, संजय दत्त और सलमान खान तक हर स्टार की मिमिक्री करने में माहिर हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि निनाद कामत ने ‘अवेंजर्स: एंडगेम’ और ‘अवेंजर्स: इन्फिनिटी वॉर’ में थानोस की मिमिक्री की थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी नेट वर्थ करीब 5.5 करोड़ रुपये है।
अब बात करते हैं सुनील ग्रोवर की, जो हरियाणा के एक छोटे से शहर से उठकर मुंबई आए और निरंतर संघर्ष करते हुए आज मिमिक्री की दुनिया का बड़ा नाम बन गए हैं। सुनील की ख़ासियत केवल यह नहीं है कि वे किसी की आवाज़ की नकल हूबहू कर सकते हैं, बल्कि उनकी विशेषता यह है कि वे अपने आप को पूरी तरह ट्रांसफ़ॉर्म करके वह व्यक्तित्व बन जाते हैं, जिसकी वे नकल कर रहे होते हैं। उनके हाव-भाव, चलने का ढंग, हाथों की मूवमेंट- सब उस व्यक्ति की तरह हो जाते हैं।
हाल ही में नेटफ्लिक्स ने अपने यूट्यूब अकाउंट पर ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ के ग्रैंड फ़िनाले का एक प्रोमो शेयर किया है। इस ग्रैंड फ़िनाले के खास मौके पर शो में पिता-बेटे यानी डेविड धवन और वरुण धवन की जोड़ी नज़र आई। इस अवसर पर सुनील ग्रोवर ने कादर ख़ान बनकर पूरे विश्व के हिन्दी सिनेमा प्रेमियों का दिल जीत लिया। उन्होंने कादर ख़ान की फ़िल्म के एक मशहूर सीन ‘इधर आओ’ को भी रीक्रिएट किया। जिस तरह से सुनील ग्रोवर ने कादर ख़ान को अपने अंदर पूरी तरह उतारा और उनकी आवाज़ की बारीकियों को इस तरह पकड़ा कि जैसे साक्षात कादर ख़ान सामने आकर खड़े हो गए हों, उससे डेविड धवन भी काफ़ी प्रभावित हुए। उन्होंने सुनील ग्रोवर की तारीफ़ करते हुए कहा, “कादर भाई याद आ गए।”
दरअसल, सुनील ग्रोवर ने जब ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ के एक एपिसोड में आमिर ख़ान की शानदार मिमिक्री की, तो उन्होंने तमाम दर्शकों के साथ-साथ आमिर ख़ान को भी हैरान कर दिया। उनकी हूबहू नकल, आवाज़ और हाव-भाव देखकर दर्शक और खुद आमिर ख़ान भी दंग रह गए। सोशल मीडिया पर लोग सुनील के इस परफ़ॉर्मेंस की जमकर तारीफ़ कर रहे हैं और आमिर ख़ान को तो ऐसा महसूस हुआ जैसे वे अपने आप को ही देख रहे हों। सच तो यह है कि आमिर इस परफ़ॉर्मेंस से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सुनील ग्रोवर को अपने घर बुलाकर एक स्वतंत्र एपिसोड शूट किया। आमिर के चेहरे पर ख़ुशी साफ़ महसूस की जा सकती थी।
सुनील ग्रोवर जब भारत के महान क्रिकेटर कपिल देव के सामने कपिल देव बनकर आ खड़े हुए, तो कपिल लगातार हँसते रहे। उन्हें लगा जैसे उनके सामने एक आईना रखा है और वे अपने आपको देख रहे हों। कुछ ऐसा ही सुनील ने शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान, राजामौली और नवजोत सिंह सिद्धू का रूप धरकर सबका मन मोह लिया। शाहरुख़ वाले एपिसोड में तो कृष्णा कह उठते हैं, “अबे तू इतना बढ़िया कर जाता है कि बाद में हमें सुनना पड़ता है कि हम अच्छा काम नहीं करते।”
अमिताभ बच्चन के मामले में तो सुनील ग्रोवर ने ऐसा अद्भुत काम किया कि पूरा का पूरा ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का एक एपिसोड ही बदल गया। उन्होंने अमिताभ बच्चन को ‘हॉट सीट’ पर बिठाया और खुद अमिताभ के अंदाज़ में सवाल पूछने लगे। उस पूरे एपिसोड में अमिताभ बच्चन सुनील ग्रोवर के अभिनय और स्वाभाविकता से पूरी तरह प्रभावित दिखाई दिए। यानी कि सुनील ग्रोवर के प्रशंसकों की सूची में अमिताभ बच्चन का नाम भी शामिल है।
फ़िल्म कलाकारों की नकल उतारना या उनका रूप धरना तो तुलनात्मक रूप से आसान होता होगा, मगर जिन लोगों को दर्शक या श्रोता लगातार नहीं देखते, उनका रूप धरना बहुत ही मुश्किल होता है। मैं निजी तौर पर सुनील ग्रोवर के गुलज़ार अवतार वाले एपिसोड का सबसे बड़ा प्रशंसक हूँ। मैं गुलज़ार साहब से मिल चुका हूँ और उनके बोलने के अंदाज़ से परिचित हूँ। सुनील ग्रोवर ने जिस परफ़ेक्शन के साथ गुलज़ार साहब को ‘फ़ुल जार’ बनकर पेश किया है, उसके लिए उन्हें सर्वोत्तम कलाकार का अवार्ड मिलना ही चाहिए। गुलज़ार साहब का शेर पढ़ने का अंदाज़, आँखों की हरकत, हाथों से माइक पकड़ना और उनका विट……तमाम महीन बिंदु उस परफ़ॉर्मेंस में मौजूद थे।
आज सुनील ग्रोवर से अधिक अमीर और सफल हास्य कलाकार और मिमिक्री आर्टिस्ट हो सकते हैं, मगर यह सच है कि सुनील ग्रोवर एक ऐसा चमकता हुआ सितारा हैं, जिसके सामने तमाम अन्य मिमिक्री कलाकार बौने दिखाई देते हैं। वे केवल मिमिक्री कलाकार नहीं, बल्कि एक बहुरूपिया हैं, जो किसी का भी रूप धर सकते हैं।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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24 टिप्पणी

  1. वाह ! गहन गंभीर और समीचीन संदर्भों को संपादकीय कलम की जद में लेने के बाद इस बार मिमिक्री और मिमिक्री के इतिहास ,मिमिक्री कलाकारों के प्रयासों को बताते और पाठकों बांधते हुआ संपादकीय ।
    बॉलीवुड में इतना कठिन काम करने के बाद भी कलाकार का कोई मुकाम न पाना एक अजीब सी विडंबना है।इस पर बॉलिवुड और समाज को सोचना ही होगा। सुदेश भोंसले की भूमिका और हाल ही में सुनील ग्रोवर ,किकू ,,,सभी पर कलम की रौशनाई से रौशन कलाकारों के लिए आदरणीय संपादक साहब ने एक शमां सी रौशन कर दी है।अब देखें कि स्वयं मिमिक्री कलाकार और बॉलीवुड इसे कैसे समझता है यह तो भविष्य ही बता सकता है।
    पुरवाई पत्रिका परिवार को बधाई।
    एक सुझाव क्या ही अच्छा हो कि नवोदित कलाकारों पर भी एक कॉलम आरम्भ हो और उनके बारे में या साक्षात्कार के माध्यम से पुरवाई एक पुल की भूमिका निभाह सकती है।
    क्या

    • भाई सूर्य कांत शर्मा जी आपने सबसे पहले संपादकीय को पढ़ा और उस पर एक सार्थक टिप्पणी की… इस के लिये विशेष धन्यवाद।

  2. नमस्कार वैसे तो मैं भारतीय सिनेमा और भारतीय सीरियल्स बहुत कम देखती हूँ पर हाँ जब कपिल शर्मा के शो में सुनील ग्रोवर आते हैं तो ज़रूर देखती हूँ वह बहुत ही खूबसूरत तरीके से हर किरदार को निभाते हैं । यही कला कलाकार को कलाकार बनाती है। आपने मिमिक्री शब्द का अर्थ समझा कर इस कला के इतिहास से हमें अवगत कराया । अधिकांश लोग इस कला को उस धैर्य और मेहनत से नहीं सीखते जैसे सुनील ग्रोवर ने इस अपनाया और दर्शकों तक पहुंचाया । मुझे वह गुत्थी के रूप में भी बहुत अच्छे लगे और जब वह अभिताभ बनते हैं तब भी उनकी कला दर्शकों को प्रभावित करती है । इसके लिए उनका उस चरित्र को जानने के लिए की गई मेहनत है जो उनके साथी कलाकारों में बहुत कम दिखाई देती है । जब वह किसी किरदार को निभाते हैं तो वह उसे शुरू से लेकर अंत तक उसे निभाते है। यही सबसे बड़ी बात है वह बीच बीच में हँस कर या किसी और ढंग से उसे छिछला या हल्का नहीं होने देते । आपने फिर से एक महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान केंद्रित किया आपका बहुत-बहुत आभार

  3. सही आकलन किया है आपने, सुनील ग्रोवर
    बेहद मेहनती और कला के प्रति समर्पित हैं
    गहरे डूबकर मोती उठा लाते हैं ।
    उन्हें राष्ट्रीय स्तर का सम्मान मिलना ही चाहिए ।
    Dr Prabha mishra

  4. द कपिल शर्मा शो देख कर मैं कहती थी, कॉमेडी की दुनिया का बादशाह कपिल शर्मा नहीं सुनील ग्रोवर है तो मेरे श्रीमान जी विश्वास नहीं करते थे। बहुत दिनों तक दोनों के बीच कड़वाहट की वजह से सुनील ग्रोवर की अनुपस्थिति एक रिक्तता की तरह थी।

  5. तेजेन्द्र जी, इस बार आपने मिमिक्री कला के विकास और उसके बदलते स्वरूप पर एक रोचक जानकारी दी है। मिमिक्री की शुरुआत से लेकर वर्तमान समय तक की यात्रा को आपने सहज भाषा में समझाया है। ग्रीक शब्द ‘मिमिक्री’ से आरंभ करते हुए हिन्दी सिनेमा के कलाकारों तक की चर्चा संपादकीय को संग्रहणीय बना देती है। पुराने मिमिक्री कलाकारों की सीमाओं के साथ ही नए कलाकारों, विशेषकर सुनील ग्रोवर, को एक ऐसे कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो केवल आवाज़ ही नहीं, बल्कि पूरे व्यक्तित्व को आत्मसात कर लेते हैं। आपने मिमिक्री को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक कला के रूप में बताया है। कुल मिलाकर संपादकीय मिमिक्री कला की बदलती पहचान को समझने में अत्यंत सहायक है।

    • ज्ञानवर्धक,रोचक जानकारी। कपिल शर्मा के प्रोग्राम में सुनील ग्रोवर हमेशा कपिल पर भारी पड़े हैं। वास्तव में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए। उनकी मिमिक्री में नवीनता, रोचकता, संजीदगी और मर्यादा रहती है।एक बेहतरीन सम्पादकीय के लिए साधुवाद

  6. आपने फिर से एक जनप्रिय विषय को रोचक शैली और ज्ञानवर्धक अंदाज में अपने पाठकों के साथ साझा किया है, उसके लिए आभार। फिल्मों से जुड़े मिमिक्री कलाकारों में सुदेश भोसले के वरिष्ठ हैं गायक अमित कुमार जो स्वर्गीय किशोर कुमार के बेटे हैं। उनको भी कई टेलीविजन प्रोग्राम में फिल्मी दुनिया के दूसरे मशहूर अदाकारों, संगीत निर्देशकों और गायकों की बड़ी खूबसूरती से नकल उतारते देखा है। मिमिक्री का एक पहलू और भी है जहां इंसान जानवरों और पक्षियों की हूबहू आवाज निकाल लेते हैं। ऐसे कलाकारों की कला और कलाकारी को भी सलाम।

  7. बहुत शुक्रिया लिखा है आपने बिलकुल समसामयिक और चर्चित विषय पर। जब सुनील ग्रोवर औरत बनते थे तो मैंने कपिल शो देखना बंद कर दिया था। फिर एक दिन सलमान बन कर कृष्णा के साथ आएं तो हँसा हंसा कर लोटपोट कर दिया। तब से मैं फिर से देखने लगी ये शो। करोड़पति के सेट पर भी कमाल कर दिया था ।

  8. बढ़िया संपादकीय कपिल शर्मा सुनील ग्रोवर वर्तमान समय के बहुत अच्छे हास्य कलाकार हैं।

  9. नमस्कार जी
    सुनील ग्रोवर सचमुच कमाल के कलाकर हैँ l …. और कमाल इस बात का ख़ास है कि आप की पैनी नजर वहां गईं और उसे पुरवाई जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादकीय में स्थान दिया l
    हालाकि देखते सभी हैं, तारीफ़ भी करते हैं, पर उसे कलम बद्ध करना, सचमुच ये महान कार्य आप ही कर सकते हैं l
    सुनील ग्रोवर को सभी रूपों में देखा,चाहे वह सलमान खान हो शाहरुख हो या अमीर खान हो या फिर गुलजार l
    गुलजार के फुल जार ने तो मिमिक्री को आसमान की ऊंचाई पर पहुंचा दिया l कह्ते हैं न कला की कदर कलाकार जानते हैं l वह आपने सिद्ध कर दिया l अब तक मिमिक्री के मामले में इतना ही होता था, कुछ कलाकार, बड़े नेता या अभिनेता के डायलाग बोलते या फिर उन्हें तोड मरोड़कर हास्य के रूप में रख देते थे और तालियां बटोर लेते थे l लेकिन सुनील ग्रोवर जो कर रहे हैं वह मिमिक्री से बहुत अलग है l इसमें डायलाग के साथ उनके हाव – भाव, आंखों की भाव – भंगिमा चेहरे पर उतार – चढाव सब कुछ शामिल l
    सचमुच ! सुनील ग्रोवर एक सफल बहुरूपिया ही हैं l
    धन्यवाद जी l

    हर एक विषय के लिए आप बहुत गहन अध्ययन करते हैं l नमन है आपको l

  10. सही है, बहुत सुंदर, मैंने भी उनकी मिमिक्री देखी है। निःसंदेह बेहद प्रभावित करती है। आपकी संपादकीय से मिमिक्री को बेहतर ढंग से समझने में सहूलियत हुई।
    हमेशा की तरह एक और महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद

  11. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    हम भी कपिल शर्मा शो अवश्य देखते थे । एक लंबे समय से टीवी देखना बंद है लेकिन फिर भी यूट्यूब में कपिल शर्मा शो देख लेते हैं।

    इत्तेफाक से ही यह एपीसोड हमने भी देखा।, जिस पर इस बार का संपादकीय लिखा है आपने। वाकई कमाल किया है सुनील ग्रोवर ने,किंतु कल्पना में भी नहीं था कि इसे संपादकीय में भी पढ़ने को मिलेगा।

    आपके संपादकीय कहानियों की ही तरह, पर शायद उससे अधिक समृद्ध कर रहे हैं। शुक्रिया कहने के लिये शब्द नहीं।

    इस बार आपने मिमिक्री से जुड़ी हुई हर बारीक से बारीक जानकारियों से समृद्ध किया।

    हम इस कला को सरल नहीं मानते।यह बहुत कठिन है। नकल करने के लिए सिर्फ आवाज को ही नहीं बदलना पड़ता बल्कि उस किरदार को , जिसकी नकल आप उतारने जा रहे हैं,अपने आप में पूरी तरह से उतारना पड़ता है।स्वयं को पूरी तरह से भूलकर उस चरित्र में ढलना पड़ता है, मानो उस किरदार की आत्मा का प्रवेश आप में हो गया हो।

    यह बात भी सही है कि जिन कलाकारों से श्रोता परिचित नहीं होते हैं ,उनकी मिमिक्री अगर की जाए तो परिचय न होने के कारण लोगों में उतनी रुचि नहीं रह जाती।

    हम भी सुनील ग्रोवर की एक्टिंग के प्रशंसक हैं।बीच में जब उन्होंने स्त्री का किरदार किया था तो सच में अच्छा नहीं लगा था, लेकिन फिर भी बाद में उन्होंने अपनी कला से सभी को अपनी ओर आकर्षित करती किया।

    हमे याद आ रहा है कि एक एपिसोड में अमिताभ बच्चन आए थे। और अपनी ही मिमिक्री देख नाराज होकर स्टेज छोड़कर चले गए थे। बाद में पता चला कि वह कपिल शर्मा शो का ही एक हिस्सा था।

    गुलजार एक संतुलित व्यक्तित्व के गंभीर इंसान हैं। हमें नहीं लगता कि उनकी मिमिक्री करना बहुत आसान रहा होगा।
    पर आपकी तारीफ बताती है कि उन्होंने अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम दिया।

    निश्चित ही वे एक बेहतर मंजे हुए कलाकार हैं। अपने जैसे सिर्फ एक; सर्वश्रेष्ठ!

    पुनः एक अनोखे संपादकीय के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई!

  12. मिमिक्री कला पर इतिहास और वर्तमान के कलाकारों का उल्लेख करते हुए सुप्रसिद्ध मिमिक्री कलकार सुनील ग्रोवर पर बहुत ही अच्छा लिखा है सही भी है धन्यवाद सादर अभिनन्दन

  13. आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
    इस बार का आपका संपादकीय हर बार से अलग हटकर एक नई दृष्टि देता है। आपने मिमिक्री की दुनिया को केवल मनोरंजन या नकल के सतही चश्मे से न देखकर उसे एक सूक्ष्म कला और साधना के रूप में प्रतिष्ठित किया है। अक्सर हम कलाकारों की नकल को हंसी-मजाक तक सीमित कर देते हैं, लेकिन आपने जिस गहराई से जॉनी व्हिस्की से लेकर सुनील ग्रोवर तक के सफर को पिरोया है, वह इस विधा के प्रति एक सम्मानजनक नजरिया विकसित करता है। विशेष रूप से 1667 से इस शब्द के इस्तेमाल और ग्रीक मूल के अर्थ को स्पष्ट करते हुए हास्य के पुट की अनिवार्यता को रेखांकित करना विषय पर आपकी गहरी ऐतिहासिक पकड़ को दर्शाता है।
    आपने जिस प्रकार सुनील ग्रोवर के ‘गुलज़ार अवतार’ का विश्लेषण किया है, वह बेहद प्रभावशाली है। किसी सिनेमाई सितारे की नकल करना, जिसकी छवियां हर जगह मौजूद हैं, फिर भी सरल हो सकता है, परंतु गुलज़ार साहब जैसी अंतर्मुखी और बौद्धिक शख्सियत की शारीरिक भंगिमाओं, उनकी आंखों की हरकत, शेर पढ़ने का अंदाज और उनके विशिष्ट ‘विट’ को पकड़ना वाकई असाधारण है। आपकी यह टिप्पणी कि वे केवल मिमिक्री कलाकार नहीं बल्कि एक ‘बहुरूपिया’ हैं, सुनील ग्रोवर के शिल्प को एक नया आयाम देती है। यह लेखनी का ही जादू है कि पाठक उस परफॉरमेंस की उन महीन बारीकियों को भी महसूस करने लगता है जिनसे आपने रूबरू करवाया है।
    संपादकीय में सुदेश भोसले और निनाद कामत जैसे महारथियों का जिक्र करना इस विधा की रचनात्मकता और आवश्यकता को सिद्ध करता है। आपने बहुत ही तार्किक ढंग से स्पष्ट किया है कि कैसे मिमिक्री केवल नकल नहीं, बल्कि संकट के समय एक विकल्प और मौलिक सृजन का माध्यम भी बन सकती है। संजीव कुमार की मृत्यु के बाद ‘प्रोफेसर की पड़ोसन’ की डबिंग को पूरा करने का उदाहरण और निनाद कामत द्वारा ‘अवेंजर्स’ जैसी वैश्विक फिल्मों में थानोस जैसे चरित्र को आवाज देना यह बताता है कि यह कला कितनी अनिवार्य और आर्थिक रूप से भी सुदृढ़ है। कीकू शारदा, संकेत भोसले और जेमी लीवर जैसे नामों का उल्लेख वर्तमान समय में इस विधा की व्यापकता और सफलता की पुष्टि करता है।
    आपका यह अवलोकन अत्यंत सटीक है कि अधिकांश मिमिक्री कलाकार केवल संवादों तक सीमित रह जाते हैं, जिससे उनमें मौलिकता का अभाव खटकता है। इसके विपरीत, आपने सुनील ग्रोवर की जिस ‘ट्रांसफॉर्मेशन’ क्षमता की चर्चा की है; चाहे वह आमिर खान के सामने खुद आमिर बन जाना हो, अमिताभ बच्चन के सामने ‘हॉट सीट’ पर बैठकर उन्हीं से सवाल पूछना हो या कपिल देव के लिए आईना बन जाना हो; वह अभिनय की पराकाष्ठा है। आमिर खान द्वारा उन्हें घर बुलाकर स्वतंत्र एपिसोड शूट करना और डेविड धवन का भावुक होकर यह कहना कि “कादर भाई याद आ गए”, इस बात की पुष्टि करता है कि जब कला अपनी शुद्धता और परफेक्शन पर होती है, तो वह मूल व्यक्तित्व को भी नतमस्तक कर देती है।
    आपका यह संपादकीय केवल सुनील ग्रोवर की प्रशंसा नहीं है, बल्कि उस पूरी यात्रा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसने मिमिक्री को मंचों से उठाकर कला के ऊंचे पायदान पर खड़ा किया है। आपने जिस आत्मीयता और बारीकी से इन कलाकारों के योगदान और उनकी सफलता के पीछे के संघर्ष को शब्दों में ढाला है, वह न केवल जानकारी देता है बल्कि पाठकों के भीतर कला के प्रति एक नई संवेदना भी जगाता है।

  14. ‘मिमिक्री कलाकार या बहुरुपिया ‘ शीर्षक से लिखे गए संपादकीय में फिल्मी कलाकारों से लेकर टीवी कलाकारों तक की मिमिक्री पर बात की गई है। मिमिक्री के इतिहास को खंगालकर पाठकों के सामने रख दिया गया है।
    कला मूलतः जन्मजात होती है। बस उसे निखारने की जरूरत होती है। यदि सही मंच मिल जाता है तो वह दुनिया के सामने आ जाती है। फिर लोग उससे प्रभावित होकर उस पर चर्चा शुरू कर देते हैं। कला जब रोजगार देने लगे तो फिर उसमें प्रयोग शुरू हो जाते हैं। सफल प्रयोग की यात्रा प्रवर्तक होने तक की गवाही दे जाती है। कपिल शर्मा शो के मिमिक्री कलाकार सुनील ग्रोवर की मिमिक्री को आपने जितनी बारीकी से पकड़ा है वह शानदार है। इस बारीकी को वही समझ सकता है जो इस कला में माहिर हो। मनोरंजन के लिए तो अधिकांश लोग शो देखते हैं। इतनी बारीकियों पर ध्यान कौन देता है। ध्यान देने का औचित्य ही क्या है! जिंदगी में न जाने कितनी समस्याएं हैं। अपना काम देखे कि उन समस्याओं की बारीकियां!
    लेकिन एक दृष्टा ऐसा भी होता है जो कलाकार के हाव-भाव , शैली एवं प्रस्तुति को गहराई से पकड़ता है। उसकी कला के हर आयाम का सूक्ष्मता से निरीक्षण करता है। इसे कला की पारखी दृष्टि कही जाती है। इस संपादकीय में यह दृष्टि दिखाई दे रही है।
    मैं सोचता हूं कि टीवी के प्रचलन ने गांव गिरांव के कलाकारों को उत्तम मंच दे दिया है। आज वे नेम-फेम के साथ धन अर्जन भी कर रहे हैं।
    बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक मैंने गांवों में अनेक बहुरुपिए कलाकार देखे हैं, जो अपनी लोकभाषा और सहज अभिनय से जीवन व समाज की सच्चाइयों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करते थे। तीज-त्योहार तथा विशेष उत्सवों में उनकी मिमिक्री बहुत दिनों तक याद रखी जाती थी। मतलब स्मरण मात्र ही मन को आनंदित करता रहता था।आज उनमें से बहुत कम लोग इस दुनिया में है। उनकी कला किसी कैमरे में कैद नहीं है। वह तो ब्रह्माण्ड में स्वतंत्र रूप से विचरण कर रही है।
    संपादक के बहुआयामी व्यक्तित्व को सिद्ध करने वाली यह संपादकीय मुझे विशिष्ट लगी। विषय को अपने नजरिए से देखने की कला पाठक को प्रभावित करती है।

  15. बहुत अलग विषय पर लिखे इस सटीक और सारगर्भित संपादकीय को पढ़कर बहुत अच्छा लगा। सुनील ग्रोवर ने समय के साथ सच में अपनी कला और अपने अंदर के कलाकार को और भी अधिक मांजा है और लगातार अपने नए नए अवतारों से वे अपने दर्शकों को चमत्कृत ही करते आ रहे हैं।

  16. वास्तव में मिमिक्री करना बहुत कठिन है पर फिर भी कला के क्षेत्र में उसे वह दर्जा प्राप्त नहीं जो उसे मिलना चाहिए। आपके संपादकीय के द्वारा विशद जानकारी प्राप्त हुई।
    निश्चय ही सुनील ग्रोवर मिमिक्री को नई ऊंचाइयों तक ले गए हैं। एक कार्यक्रम में मैंने साक्षात् उनकी कला देखी है।

  17. संपादकीय के लिये एकदम मौलिक विषय का चयन आपकी खूबी है। मिमिक्री कलाकारों पर यह एक दस्तावेजी संपादकीय है। सुनील ग्रोवर की प्रतिभा का कायल भला कौन नहीं है। गुलजार की मिमिक्री में तो इस खास अभिनय विधा की बड़ी ऊंचाई छू लिया उन्होंने।

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