शिक्षक से संवाद : ‘नई शिक्षा नीति’ निश्चित रूप से देश को आगे ले जाएगी – प्रो. सत्यकाम 5

किसी भी देश के विकास और सशक्तिकरण की कुंजी वहाँ की शिक्षा व्यवस्था में निहित होती है। उत्तम शिक्षा से ही एक श्रेष्ठ नागरिक और महान देश का निर्माण होता है। आज जब भारत अपनी स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष पूरे कर अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है और सौ वर्ष का होते-होते एक विकसित देश बनने की दिशा में बढ़ रहा है, तब इस बात की पड़ताल आवश्यक हो जाती है कि देश के शिक्षकों और शिक्षातंत्र की स्थिति कैसी है। यह भी समझना जरूरी है कि 2020 में आई देश की नई शिक्षा नीति देश को आगे ले जाने में कितनी सक्षम है। इन सब प्रश्नों को समझने के उद्देश्य से आपकी अपनी पत्रिका पुरवाई द्वारा ‘शिक्षक से संवाद’ नामक इस साक्षात्कार शृंखला की शुरुआत की जा रही है। इसके तहत हम देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों से संवाद करते हुए भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भूत, वर्तमान और भविष्य सहित देश-समाज-संस्कृति से सम्बंधित और भी अनेक विषयों को समझने का प्रयास करेंगे।

इस शृंखला की पहली कड़ी में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के सम-कुलपति तथा वरिष्ठ लेखक-समीक्षक प्रो. सत्यकाम से युवा लेखक पीयूष कुमार दुबे ने बातचीत की है। इस बातचीत में प्रो. सत्यकाम के निजी जीवन से लेकर उनके अकादमिक अनुभवों एवं भारतीय शिक्षा व्यवस्था के प्रति उनके दृष्टिकोण तक अनेक विषय समाहित हैं। प्रस्तुत है

सवाल – नमस्कार सर, पुरवाई से बातचीत में आपका स्वागत है। बातचीत की शुरुआत मैं आपके निजी जीवन से करना चाहूंगा। हिंदी के मूर्धन्य आलोचक गोपाल राय जी का पुत्र होने का आपके जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ा ? क्या इससे आपने कभी किसी तरह का दबाव महसूस किया ? 
सत्यकाम – पीयूष जी, आपने ये बहुत ही अच्छा सवाल किया है। एक बड़े आलोचक और बड़े विद्वान का पुत्र होने के नाते यह प्रश्न स्वाभाविक है। मैं अभी जिस जगह से बात कर रहा हूँ वो मेरे पिता की मातृभूमि है। आज मैं अपने गांव चुन्नी, जिला बक्सर, बिहार में बैठा हुआ हूँ। यहीं मेरे पिता का जन्म हुआ था।
जहां तक मेरे पिताजी का मेरे जीवन पर प्रभाव पड़ने की बात है, तो निश्चित रूप से मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं जो कुछ भी आज हूँ, मनसा-वाचा-कर्मणा अपने पिता की प्रतिच्छवि हूँ। यद्यपि पिताजी ने जो कुछ किया उससे आगे मैं कुछ कर नहीं पाया बल्कि ये कहूं कि उससे आगे कुछ करने के मैं काबिल ही नहीं हूँ। पिताजी ने जो ऊँचाई छू ली है, मैं उसे नहीं छू सकता। मेरे पिता एक बहुत बड़े आलोचक थे, उतना बड़ा आलोचक मैं नहीं बन सकता। लेकिन ये दबाव मुझ पर हमेशा रहा कि मैं प्रोफेसर गोपाल राय का पुत्र हूँ; और ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते उनकी विरासत को आगे ले जाने का जिम्मा भी मेरा ही था। मैंने अपनी ओर से प्रण लिया और प्रयास किया कि उनकी विरासत को आगे ले जाऊं। हालांकि मेरे और उनके बीच कई बार मतभेद भी होते थे। लेकिन वो वैचारिक मतभेद ऐसे नहीं थे जैसे कि कोई पॉइंट ऑफ फ्रिक्शन होता है। वो अपनी दृष्टि से सोचते थे और मैं अपनी दृष्टि से सोचता था।
सवाल – आपने कहा कि आपके और आपके पिताजी के बीच मतभेद होते थे, तो क्या कभी ऐसा भी हुआ कि उन्होंने अपना कोई निर्णय आप पर आरोपित करने का प्रयास किया हो ?
सत्यकाम – नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पिताजी बहुत लोकतांत्रिक थे। वो मुझे सुझाव देते थे। लेकिन यह भी कहते थे कि सोचो स्वतंत्र रूप से। वे इस बात के लिए मुझे हमेशा प्रोत्साहित करते थे कि मैं अपना स्वयं का व्यक्तित्व बनाऊं, जबकि मैं उनसे हमेशा कहता था कि बाबूजी, मैं आपकी प्रतिच्छवि हूँ। इसपर वो कहते थे कि नहीं, तुम मेरे बेटे होने के नाते मेरी प्रतिच्छवि जरूर हो, लेकिन हमारे इस वृक्ष की छाया से अलग होकर तुम अपना वातायन बनाओ, अपना जीवन बनाओ। ये देखकर मुझे ख़ुशी मिलेगी।
किशोरपन में मैंने दो प्रतिज्ञाएँ ली थीं। एक कि मैं प्रोफेसर नहीं बनूंगा और दूसरी कि हिंदी नहीं पढूंगा। क्योंकि, पिताजी को इतनी मेहनत, इतना संघर्ष करते देखता था तो सोचता था कि अफसरी करना बहुत बड़ी बात है। हालांकि आज हिंदी के ही कारण मुझे अफसरी और प्रोफेसरी दोनों चीजें मिल गई हैं। खैर! बी.ए. में मैंने इतिहास मुख्य विषय के रूप में लिया। लेकिन बी.ए. में मेरे जो अंक आए वो इतिहास में कम और हिंदी में ज्यादा थे। तब पिताजी ने मुझे बस यही कहा कि तुम अपना मूल्यांकन करो और ये सोचो कि तुम क्या कर सकते हो। इतिहास में तुमको अपेक्षित अंक नहीं आए जबकि तुमने इसमें सबसे ज्यादा मेहनत की थी। वहीं हिंदी में तुमने कम मेहनत की लेकिन इसके बावजूद तुम्हें बहुत अच्छे अंक मिले हैं। इसके बाद एम.ए. में मैंने हिंदी ले लिया। बी.ए. ऑनर्स भी मैंने हिंदी में किया। बी.ए. और एम.ए. में मैंने टॉप किया। गोल मेडलिस्ट रहा। फिर आदरणीय स्वर्गीय प्रोफेसर रामखेलावन राय जी के मार्गदर्शन में मैंने पीएचडी भी की। लेकिन मेरी पीएचडी के दौरान भी पिताजी ने कभी हस्तक्षेप नहीं किया। मैं अपने गाइड के अतिरिक्त बाबूजी को भी अपने थीसिस के चैप्टर देता था। वे देखते थे और सुझाव-सलाह देते थे। अब चूंकि, मेरे पिताजी और मेरे गाइड के दृष्टिकोण में अंतर था, सो शोध-कार्य के दौरान मुझ पर दोनों का ही प्रभाव पड़ा। मेरे जीवन पर पिताजी का जो प्रभाव है उससे तो मैं कभी उऋण ही नहीं हो सकता। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने कभी किसी बात के लिए मुझपर कोई दबाव नहीं डाला।

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सवाल – अकादमिक जगत में आने के बाद आपकी जो समीक्षा/आलोचना की दृष्टि विकसित हुई, क्या उसपर पिता का कोई प्रभाव रहा ? 
सत्यकाम – मैं न कभी आलोचक रहा हूँ न अपने को आलोचक समझता हूँ। मैंने समीक्षाएं, शोध-पत्र, आलोचनात्मक पुस्तकें जरूर लिखी हैं, लेकिन आलोचनात्मक पुस्तकें लिखने से कोई बड़ा आलोचक नहीं हो जाता है। आलोचनात्मक दृष्टि होनी चाहिए। बहुत-से आलोचक लिखते रहते हैं, लेकिन सबको पढ़ा नहीं जाता। लोग ऐसे आलोचकों को पढ़ते हैं जिन्होंने कोई छाप छोड़ी, मैंने आलोचना के क्षेत्र में कोई छाप नहीं छोड़ी है। साहित्य-जगत में मेरा प्रवेश एक समीक्षक के रूप में हुआ और मैं अपने को समीक्षक मानता हूँ। किताबें पढ़ना और उनपर लिखना आज भी मुझे बहुत अच्छा लगता है। हाँ, यह जरूर है कि समीक्षा/आलोचना को लेकर मैंने एक दृष्टि विकसित की है कि समीक्षा हो या आलोचना, पाठ आधारित होनी चाहिए। मैं अपने को ऐसा समीक्षक/आलोचक नहीं बनाना चाहता जो कभी मार्क्सवादी सिद्धांत तो कभी किसी और सिद्धांत के आधार पर अपनी बात कहे और उसमें से पाठ नदारद हो। मैंने हमेशा पाठ को महत्त्व दिया और पाठ के ऊपर ही समीक्षा/आलोचना लिखी।
मैं जब रिसर्च एसोसिएट हुआ तो अपने प्रोजेक्ट के अंतर्गत मैंने ‘गणदेवता और गोदान’ शीर्षक से एक शोध-पत्र लिखा था। इसमें मैंने गोदान और गणदेवता उपन्यासों के बीच एक तुलना की थी। यह लेख ‘भाषा’ पत्रिका में छपा था और तब इसकी बहुत चर्चा हुई थी। गोदान आजादी के पहले का उपन्यास था तो गणदेवता आजादी के आसपास आया था। इन दोनों की तुलना में पाठकों को एक नई दृष्टि दिखाई दी थी। आज तक मैं इसी लीक पर चल रहा हूँ। वस्तुतः मैं भारतीय उपन्यास को भारतीय दृष्टि से देखने वाले एक समीक्षक के रूप में स्वयं को देखता हूँ। अब मेरा क्षेत्र हिंदी उपन्यास नहीं रह गया है, बल्कि भारतीय उपन्यास हो गया है और आगे अब जो किसी प्रोजेक्ट पर मैं काम करूंगा तो वो भारतीय उपन्यास पर ही होगा। ये जो अवधारणा है कि भारत में उपन्यास पश्चिम से आया, इसको मैं नहीं मानता हूँ। भारतीय उपन्यास पढ़ने के बाद मुझे लगा कि ये विधा, रामायण, महाभारत, कथासरित्सागर जो ग्रंथ हैं, उनका ही आधुनिक रूप है। ये भारतीय विधा है। यह मेरी दृष्टि है और इसीके आधार पर मैं काम करता हूँ। पिताजी ने भारतीय उपन्यास पर काम नहीं किया, इसलिए इस मामले में मेरी लीक उनसे थोड़ी-सी अलग तो हो ही गई है।
सवाल – अपने अबतक के अकादमिक जीवन का मूल्यांकन आप किस रूप में करते हैं ? 
सत्यकाम – अकादमिक जीवन का मूल्यांकन यदि पद की दृष्टि से किया जाए तो इस क्षेत्र का सबसे बड़ा पद यानी प्रोफ़ेसर का पद एक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय इग्नू में मुझे समय से (2004 में) मिल गया। ये मुझे मेरे पढ़ने-लिखने की बदौलत ही मिला। मेरी दिलचस्पी हमेशा से लिखने-पढ़ने में रही। 2008 में पिताजी ने ‘समीक्षा’ पत्रिका का संपादन पूर्ण रूप से मुझे सौंप दिया। पत्रिका के संपादन के क्रम में मैंने बहुत कुछ सीखा, बहुत लोगों ने मुझे जाना। मैंने पिताजी से कहा था कि जब पचास वर्ष हो जाएंगे तो मैं पत्रिका को विराम दूंगा, सो अब मैंने उस पत्रिका को विराम दे दिया है। अब मैं उसका एक नया रूप ई-समीक्षा के रूप में शुरू करने की सोच रहा हूँ, लेकिन उसमें अभी समय लगेगा।  अबतक की अकादमिक यात्रा में यही सब चीजें रही हैं।
वास्तव में, मैं बहुत संतुष्ट व्यक्ति हूँ। मेरा  एक मित्र कहा करता था कि – भाई, तुम जब रिसर्च एसोसिएट बने तब भी तुम संतुष्ट थे; जब लेक्चरर हुए तब भी संतुष्ट हो। अब आज मैं प्रो-वाईस-चांसलर हूँ, तब लोग कहते हैं कि आपको अभी वाईस-चांसलर बनना है। मैं कहता हूँ कि हाँ, बनूंगा; लेकिन अभी भी मैं संतुष्ट हूँ। संतुष्टि मेरी प्रकृति का हिस्सा है। मैंने जो कुछ किया है उससे संतुष्ट हूँ, लेकिन और काम करने की इच्छा जरूर है।
सवाल – आपके अकादमिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा इग्नू में कई वरिष्ठ पदों पर रहते हुए बीता है। इस दौरान भारत में दूरस्थ शिक्षा की स्थिति को लेकर आपके क्या अनुभव रहे हैं ? 
सत्यकाम – जब मैंने इग्नू ज्वाइन किया तब मैं इस शिक्षा पद्धति (दूरस्थ शिक्षा) को नहीं जानता था। मुझे लगता था कि ये शांति निकेतन जैसा होगा। रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे बच्चों को पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाते थे, मैं भी उसी तरह पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाऊंगा। इसे लेकर मैं अत्यंत उत्साहित था। इंटरव्यू में जब मुझसे दूरस्थ शिक्षा को लेकर पूछा गया तो जो मुझे आता था, मैंने बता दिया। इग्नू में जब आया तब मेरे सामने जो समस्या आई वो थी पढ़ाने की दृष्टि को बदलना। यह 1988 का समय था। तब मुझे थोड़ी-सी दुविधा अवश्य हुई लेकिन हमें ट्रेनिंग दी गई कि आपको किस तरह विद्यार्थी तक पहुंचना है। यह समझाया गया कि जो दूरस्थ शिक्षा है, वो शिक्षक केन्द्रित नहीं, विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा पद्धति है। इस बदलाव ने हमारी स्थिति को 360 डिग्री उलट दिया। अब मैं कितना विद्वान् हूँ, ये महत्वपूर्ण नहीं रह गया बल्कि विद्यार्थी को क्या चाहिए, ये महत्वपूर्ण हो गया। फेस टू फेस टीचिंग और डिस्टेंस टीचिंग में ये बहुत बड़ा दार्शनिक अंतर है। हम केवल विद्यार्थी नहीं कहते, हमारा विद्यार्थी ‘लर्नर’ होता है, शिक्षार्थी होता है। वो क्या सीखना चाहता है, वो हम सिखाते हैं। न कि हम जो चाहते है, वो सीखने को दे देते हैं। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही हमने शिक्षण सामग्री बनाना, टेलीविज़न पर व्याख्यान देना आदि शुरू किया। उस समय मैं युवा था और मुझे बड़ा अच्छा लगता था कि लोग मुझे दूरदर्शन पर देखते हैं। अब तो इग्नू के पास पांच-पांच चैनल हैं। चार स्वयंप्रभा के चैनल हैं और एक ज्ञान-दर्शन का चैनल है। इन चैनलों पर हमारे शिक्षक साथी नजर आते हैं।
2020 में आई नई शिक्षा नीति में तय किया गया है कि 2030 तक 50 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा प्राप्त कर लें। अब यदि इस लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो एकमात्र इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ही है, जिसके माध्यम से उच्च शिक्षा का जो प्रसार है वो गाँव-गाँव तक किया जा सकता है। यहाँ मैं बताना चाहूँगा कि इग्नू के जो विद्यार्थी हैं, उसमें 50 प्रतिशत महिलाएं हैं, 50 प्रतिशत ग्रामीण हैं और 50 प्रतिशत अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थी हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हम ही ऐसे विद्यार्थियों तक पहुँच सकते हैं, क्योंकि हमारी पढ़ाई बहुत अफोर्डेबल है। इन दिनों हम नई शिक्षा नीति को लेकर काम कर रहे हैं और हमारी लगातार ट्रेनिंग चल रही है। अभी हम लोग अपने सभी भाषणों और टेक्स्ट का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं। अभी तक जो सामग्री सिर्फ हिंदी-अंग्रेजी में थी, अब वो सभी भारतीय भाषाओं में होगी।
इग्नू का विस्तार अब अंतर्राष्ट्रीय हो गया है। आज 54-55 देशों में इग्नू की शिक्षा पहुँचने लगी है। आज हम भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के साथ मिलकर विदेशी विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ा रहे हैं। कुल मिलाकर बात यही है कि (इस नए दौर की आवश्यकताओं के अनुरूप) इग्नू ही मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
सवाल – सर, अब मैं समझना चाहूँगा कि क्या भारत में दूरस्थ शिक्षा के कुछ ऐसे नकारात्मक पहलू भी हैं, जिन्हें दूर करने के लिए काम करने की जरूरत है ? 
सत्यकाम – पीयूष जी, आरंभ में जरूर दिक्कतें थीं। न केवल शैक्षिक एवं बौद्धिक जगत में बल्कि लोगों के बीच भी बात उठती थी कि क्या दूरस्थ शिक्षा की पढ़ाई मान्य है ? शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी द्वारा मान्य है कि नहीं ? धीरे-धीरे यह भ्रांतियां दूर हुईं। शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी ने इस संबंध में नोटिफिकेशन जारी किए कि इग्नू की डिग्री भी सभी डिग्रियों की तरह मान्य है। तब लोगों में थोड़ा भरोसा पैदा हुआ और जब हम लोगों ने शिक्षा में उच्च गुणवत्ता को महत्त्व दिया तो उससे ज्यादा भरोसा पैदा हुआ। अब मान्यता की समस्या नहीं रह गई है बल्कि अब तो हम पढ़ाने के साथ-साथ नई शिक्षा नीति में स्किल की जो संकल्पना है, उसके आधार-स्तंभ हैं। ऑनलाइन स्किल डेवलपमेंट की दिशा में बढ़ रहे हैं। हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का जो लक्ष्य है कि गाँव-गाँव तक कौशल का विकास हो, इग्नू उस दिशा में भी अग्रसर है। स्पष्ट है कि अब मान्यता की बात नहीं रह गई है, बल्कि इग्नू अब उससे आगे की चीजों में जुड़ने लगा है।
हम अपना कोई प्रचार नहीं करते लेकिन फिर भी हर वर्ष पांच से सात लाख विद्यार्थी इग्नू में दाखिला लेते हैं। अभी 35 लाख के करीब विद्यार्थी इग्नू से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहीं 38 लाख विद्यार्थी डिग्री ले चुके हैं। ये दिखाता है कि लोगों में इग्नू के प्रति कितना भरोसा है और यह भरोसा इग्नू ने अपनी मेहनत, उच्च गुणवत्ता की शिक्षा और पाठ्य सामग्रियों से अर्जित किया है।
सवाल – देश में लगभग साढ़े तीन दशक बाद नई शिक्षा नीति आई है। आपके विचार में यह शिक्षा नीति देश के शिक्षातंत्र को निकट एवं दूर भविष्य में किस तरह से प्रभावित कर सकती है ? 
सत्यकाम – नई शिक्षा नीति, पिछली शिक्षा नीतियों से इसलिए अलग है कि इसमें ज्ञानात्मक बोध और कौशल को जोड़ दिया गया है। सोच ये है कि यदि व्यक्ति को रोजगार ही नहीं मिलेगा तो केवल ज्ञानात्मक बोध से क्या होगा। हम देख सकते हैं कि बी.ए., एम.ए. करके हर तरफ कितने ही बेरोजगार लोग घूम रहे हैं। ऐसे लोगों के साथ समस्या ये है कि वे (उच्च शिक्षा के कारण) गाँव में भी नहीं रह पाते और बाहर उन्हें नौकरी नहीं मिलती। इस स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी की नई शिक्षा नीति में लोगों को हाथ से काम करना सिखाकर हुनरमंद बनाने पर जोर दिया गया है। समाज में यह मानसिकता रही है कि हाथ से काम करने से आदमी छोटा हो जाता है। मोदी जी ने नई शिक्षा नीति में इस अवधारणा को बदलने का काम किया है। नई शिक्षा नीति का इस मायने में बड़ा महत्त्व है।
दूसरा, अपनी भाषा में शिक्षा का प्रावधान भी इसमें किया गया है। सभी शिक्षाविद् यह कहते हैं कि बच्चे की आधी सृजनात्मकता तो किसी गैर भाषा में पढ़ाई करने से चली जाती है। अंग्रेजी माध्यम की जो परम्परा देश में शुरू हुई है और आज बहुत ऊँचाई पर पहुँच चुकी है, उसमें बच्चा अंग्रेजी ही सीखता रह जाता है, विषय नहीं पकड़ पाता। हिंदी आदि भारतीय भाषा में जो लोग पढ़े हैं या पढ़ते हैं, उनका विषय का आधार बहुत मजबूत होता है। मोदी जी ने इसी तथ्य को पहचाना है और अपनी भाषा में शिक्षा के माध्यम से विषय को मजबूत करने पर बल दिया है। तो भारतीय भाषाओं में शिक्षा, कौशल और भारतीय संस्कृति को जानना-पहचानना ये नई शिक्षा नीति की कुछ ऐसी चीजें हैं, जो भारत को पहचानने और आगे बढ़ाने में मदद देंगी। लेकिन इसमें हम अध्यापकों की बड़ी भूमिका है कि हम इसे कैसे लागू करते हैं। एक लीक पर चलने में बड़ा आराम रहता है, वहीं उस लीक को छोड़कर किसी पहाड़ी पर चढ़ने को कहा जाए तो वो थोड़ा मुश्किल हो जाता है। मैं सारे शिक्षकों व अध्यापकों से अपील करना चाहता हूँ कि मोदी जी ने इस शिक्षा नीति के द्वारा भारत को आगे बढ़ाने का जो लक्ष्य रखा है, वे उसे अपनाएं, छात्रों तक पहुँचें और नए तरीके से पढ़ाना शुरू करें। पिष्टपेषण अब नहीं चलेगा। और अंत में, मुझे यह विश्वास है कि नई शिक्षा नीति, निश्चित रूप से इस देश को आगे ले जाएगी, मजबूत बनाएगी और हम अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे; स्वावलंबी हो सकेंगे।
सवाल – विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध की स्थिति को आपने करीब से देखा है तथा आपके मार्गदर्शन में कई शोध-कार्य हुए भी हैं। मेरा प्रश्न इसी से जुड़ा है कि विशेषकर हिंदी भाषा-साहित्य के संदर्भ में विश्वविद्यालयी शोध को आप कैसे देखते हैं ? 
सत्यकाम – पीयूष जी, ये तो आपने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया। मैं आज विश्वविद्यालयों में होने वाले अधिकांश शोधों से असंतुष्ट हूँ; नाराज़ हूँ। अपने शिक्षकों से भी और अपने आप से भी। शोध का प्रमुख आधार होता है कि आप मूल स्रोतों तक जाइए, सेकेंडरी स्रोतों पर आधारित शोध मत कीजिये। लेकिन आज के शोधार्थी और आज के शिक्षक प्राइमरी सोर्स तक जाना ही नहीं चाहते। मैंने एक विद्यार्थी से कहा कि भाई, तुम बनारस के एक विद्वान व्यक्तित्व पर शोध कर रहे हो तो बनारस उनके घर चले जाओ। वे नहीं हैं तो उनके परिवार वालों से मिल लो। उनके घर में देखो कि कौन-कौन सी किताबें हैं, उनकी डायरी देख लो। इसके बाद उनके व्यक्तित्व के बारे में लिखो। मेरे इतना कहने के बाद भी वो बच्चा नहीं गया और फिर उसने जो शोध लिखा, वो अच्छा था; लेकिन प्राइमरी सोर्स के आधार पर नहीं था। बिना प्राइमरी सोर्स को देखे आप शोध में नवीनता नहीं ला सकते। कुछ नया नहीं जोड़ सकते। प्राइमरी सोर्स को देखने के बाद आपके मन में अबतक जो कुछ लिखा जा चुका है, उससे अलग भाव आएगा। अनुसंधान में हम यही देखते हैं कि जो पीछे नहीं हुआ है, वैसा कुछ उजागर किया जाए।
वास्तव में, अब शोध यानी कि पीएचडी तो नौकरी पाने का साधन मात्र बन गया है। किसीके लिए प्रतिष्ठा का भी हो सकता है, लेकिन ऐसे लोगों का प्रतिशत कम है। नौकरी से इसे जोड़ देने के कारण इसका वजन भले थोड़ा बढ़ गया हो, लेकिन इसका नुकसान बहुत बड़ा है। नुकसान ये है कि अब नौकरी के लिए जल्दी-जल्दी पीएचडी करने के चक्कर में इधर-उधर से सामग्री डालकर, विद्वानों का कोट डालकर, टेक्स्ट भरकर किसी भी तरह थीसिस तैयार कर ली जाती है। पहले की बात मैं नहीं कर रहा, इस समय की स्थिति बता रहा हूँ। और, सभी परीक्षाओं में लोग फेल हो सकते हैं, लेकिन यही एक परीक्षा है जिसमें डिग्री के लिए कोई फेल नहीं करता।
कुल मिलकर कहने का आशय यही है कि हिंदी में शोध की बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। हालांकि कुछ अच्छे संस्थान हैं जैसे कि इग्नू (वो मेरा दही है, इसलिए मीठा नहीं कह रहा हूँ; वो वास्तव में है।), दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, हैदराबाद यूनिवर्सिटी सहित और भी कई यूनिवर्सिटी हैं, जहां अध्यापक गुणवत्ता का ध्यान रखते हैं।
सवाल – आपने दशकों तक समीक्षा पत्रिका का संपादन किया है। सो यदि आपसे आज से दशकों पूर्व की समीक्षा/आलोचना की स्थिति तथा वर्तमान समीक्षा/आलोचना की स्थिति का एक तुलनात्मक मूल्यांकन करने को कहा जाए तो आपकी क्या राय होगी ? 
सत्यकाम – एम.ए. पास करने के बाद, लगभग 1986 से मैं समीक्षा से जुड़ गया। पिताजी ने मुझे अपना सहायक संपादक बना लिया। समीक्षा में मेरी एडिटिंग और प्रूफ रीडिंग की जो ट्रेनिंग हुई उसका इग्नू में मुझे बहुत लाभ मिला। जब इग्नू में ये काम दिए गए तो मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। जो मेरे प्रोफेसर थे, निदेशक थे प्रोफ़ेसर जगन्नाथन उन्होंने कहा कि अरे, तुमने ये सब कैसे सीख लिया तो मेरा जवाब था कि पिताजी की पत्रिका समीक्षा में मैं यह काम किया करता था। समीक्षा के सम्पादकीय अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि एक संपादक को सबसे पहले भाषा-संपादन और प्रूफ रीडिंग आनी चाहिए।
दूसरा, कुशल संपादक को किसी समीक्षा को छापते हुए यह देखना चाहिए कि समीक्षक ने किताब पढ़ी है या नहीं। ये बहुत बड़ी दिक्कत हो जाती है कि जो बहुत धाकड़ लिखने वाले लोग होते हैं, वे पूरी किताब नहीं पढ़ते। आगे-पीछे पुस्तक की फ्लैप सामग्री देखकर समीक्षा के नाम पर ‘बतोल’ कर देते हैं, जिसे पढ़ने पर पता ही नहीं चलता कि समीक्षित पुस्तक में है क्या! समीक्षा का सबसे बड़ा दायित्व होता है कि वो पाठक में उत्सुकता जगाए। मैं ये नहीं कहता कि किसी पुस्तक को पढ़ने या न पढ़ने को लेकर समीक्षक को कोई बहुत स्ट्रोंग रेकमेंडेशन देना चाहिए। समीक्षक को बस अपने विचार रख देने चाहिए और पाठक के विवेक पर भरोसा करना चाहिए। जो पहले के (70-80 के दशक के) समीक्षक थे, वे किताब पढ़कर पाठ आधारित समीक्षा करते थे। मेरी पीढ़ी, मेरे बाद वाली पीढ़ी और आज की पीढ़ी बहुत तेजी से भागती है। वे लोग किताब पढ़े बिना समीक्षा कर देते हैं।
और तीसरी बात विचारधारा की है। जो पुस्तक कुछ लोगों की विचारधारा से मेल नहीं खाती उसे वे कूड़ा कह देते हैं। मैं यहाँ विष्णुकांत शास्त्री जी और विद्यानिवास मिश्र जी का उल्लेख करना चाहूंगा। ये दोनों धाकड़ निबंध लेखक, आलोचक थे। लेकिन इनको हिंदी साहित्य के आलोचकों ने वो स्थान नहीं दिया जिसके ये हकदार थे। क्यों ? क्योंकि, मार्क्सवादी आलोचकों का दबाव था और मार्क्सवादी आलोचकों ने मार्क्सवाद को छल-प्रपंच व धोखा मानने वाले विष्णुकांत शास्त्री (ये शब्द मैंने उन्हीके मुंह से सुने हैं) और बड़े भारी पंडित विद्वान् विद्यानिवास मिश्र को कभी साहित्यकार माना ही नहीं। लेकिन उन्होंने अपने बल पर हिंदी साहित्य में अपना खूंटा गाड़ा। विचारधारा के नाम पर भी यदि आप गांधीवादी विचारधारा, अरविन्द दर्शन, चार्वाक दर्शन, शंकराचार्य आदि की बात करें तो ठीक लगता है, लेकिन विदेश से आई मार्क्सवादी विचारधारा के आधार पर यदि आप भारतीय संस्कृति से पगे साहित्य की आलोचना करेंगे तो वो आलोचना सही नहीं हो सकती। दुर्भाग्यवश मार्क्सवादी आलोचकों ने यही किया। हमें भी उन्हीं अध्यापकों द्वारा पढ़ाया गया, इसलिए हमारी साहित्यिक समझ भी वैसी ही बनती गई। लेकिन बाद में जब हमने खुद मूल्यांकन करना शुरू किया तो समझ में आया कि इस तरह से तो मूल्यांकन हो ही नहीं सकता। अब ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कृति का मूल्यांकन मार्क्सवादी दृष्टि से करिए और कहिये कि इसमें शोषक और समाजवाद की संकल्पना हुई है, तो इसका क्या अर्थ है ? ये कृति राम-रावण के संघर्ष को व्यक्ति के अंदर के संघर्ष के रूप में रखती है। इसमें निराला के अपने अंदर का संघर्ष है। अतः मेरा ये कहना है कि रचना को ठीक से समझिये और समझाइये लेकिन अपनी विचारधारा के द्वारा आलोचना को विकृत मत करिए।
आलोचना का मतलब है कि लेखक ने क्या कहा है वो तो सामने लाइए ही, उससे इतर भी कोई अर्थ निकलता हो तो उसे समझिये-समझाइये। प्रेमचंद की एक सुप्रसिद्ध कहानी है – नमक का दारोगा। इस कहानी के विषय में हमें यही पढ़ाया गया है कि इसमें प्रेमचंद ने ह्रदय-परिवर्तन की बात की है। मैं प्रेमचंद की कहानियों पर किताब लिख रहा था। इस क्रम में जब मैंने एकबार पुनः इस कहानी को पढ़ा तो अंत होते-होते मुझे लगा कि ह्रदय-परिवर्तन वाली बात तो इसमें है ही नहीं। इसमें तो ये दिखाया गया है कि एक व्यापारी कैसे एक व्यक्ति की सच्चाई और ईमानदारी को खरीद लेता है जो कि आज भी हो रहा है। व्यक्ति आईआईएम से एमबीए करता है और फिर एक बड़ा व्यापारी उसे खरीदकर उससे कोलगेट बेचवाता है। मार्केटिंग हेड की पोस्ट, लाखों में कमाई सब मिलता है, लेकिन जो पढ़ाई उसने की उसका क्या इस्तेमाल कर पा रहा है ?
खैर! मेरा केवल यह कहना है कि कहानियों का, रचनाओं का अर्थ बदलता है और आलोचक का यह धर्म होता है कि सम्बंधित पाठ को अलग-अलग संदर्भों में लोगों को समझाए। ये नहीं कि जो एकबार  कह दिया गया है उसीको रट रहे हैं। अध्यापकों और आलोचकों को लगातार मूल टेक्स्ट को पढ़ना चाहिए और उसको अलग-अलग संदर्भों व अर्थों में छात्रों एवं पाठकों तक पहुँचाना चाहिए। यही समीक्षक/आलोचक का धर्म है और जो इस तरह से ज्यादा काम करेगा, वो दीर्घजीवी होगा। आप कुछ फतवे जारी कर थोड़े समय तक चर्चा में रह सकते हैं, लेकिन स्थायी नहीं हो सकते।
सवाल – आप विश्व हिंदी सम्मेलन में इग्नू की तरफ से उपस्थित होते रहे हैं। आपकी दृष्टि में विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी के विकास और विस्तार में क्या कोई ठोस योगदान दे पाया है ? 
सत्यकाम – विश्व हिंदी सम्मेलन एक बहुत ही प्रशंसनीय कार्य-व्यापार है, जहां बहुत-से विद्वान् जुटते हैं, एकदूसरे से अपनी बात कहते हैं और पूरी दुनिया में हिंदी की स्थिति के बारे में जानते हैं। मैं भी इग्नू की तरफ से दो-तीन विश्व हिंदी सम्मेलनों में गया हूँ और वहाँ मैंने देखा है कि एक बड़ा मंच होता है, जिसपर बड़े-बड़े राजनेता आते हैं और हिंदी का प्रचार-प्रसार होता है। इस दृष्टि से यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।
सवाल – आपने सोफिया विश्वविद्यालय, बल्गेरिया में बतौर विजिटिंग प्राध्यापक अध्यापन किया है। इस दौरान भारत की तुलना में वहां की शिक्षा प्रणाली को आपने कैसा पाया ? 
सत्यकाम – मैं यूरोप में था और यूरोप-भारत में बहुत अंतर हैं। मैं ईस्टर्न यूरोप में गया था। वहाँ के लोग अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने देश के प्रति बहुत ही जागरूक हैं। हम भी अपने देश और अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक हैं, लेकिन अपनी भाषा के प्रति जागरूक नहीं हैं। हमें अंग्रेजी भाषा ही चाहिए। वहाँ किसी को अंग्रेजी नहीं आती थी। इस कारण विश्वविद्यालय से बाहर निकलने पर मुझे दिक्कत होती थी, सो कागज़ पर कुछ बातें नोट करके रखता था। धीरे-धीरे कुछ बल्गेरियाई भाषा सीख गया। वहाँ विद्यार्थी भाषा के प्रति बहुत जागरूक हैं। वे एक ही साथ हिंदी, फ्रेंच आदि कई भाषाओं के कोर्स करते रहते हैं। नई शिक्षा नीति में जो बात आई है कि एक साथ दो डिग्री ले सकते हैं, वो वहाँ पहले से है। वहाँ भारत के बारे में बड़े जिज्ञासु विद्यार्थी हैं। वे हिंदी इसलिए पढ़ते हैं कि भारत को जान सकें। इस संबंध में एक बार का वाकया मैं सुनाता हूँ। हुआ यूं कि जॉन सोर्स की एक पुस्तक ‘Beneath a Marble Sky’, जिसमें शाहजहाँ की पुत्री और ताजमहल के आर्किटेक्ट की प्रेमकथा कहते हुए ताजमहल को उनके प्रेम का प्रतिफलन बताया गया है, का बल्गेरियाई में अनुवाद हुआ। इस पुस्तक का लोकार्पण मुझे करना था। मैं गया और अपनी बात रखी। वहाँ एक महिला जिनका सारा शरीर झुर्रियों से भरा हुआ था। उनकी उम्र नब्बे वर्ष जरूर रही होगी। वे हाथ में स्टिक पकड़े मेरे पास आईं।
उन्होंने बल्गेरियाई में पूछा – आपने ताजमहल देखा है ?
मैंने कहा – जी, मैम।
इसपर उन्होंने कहा कि – आप ताजमहल के अंदर भी गए हैं और छुआ भी है ?
मैंने कहा – हाँ, मैम।
इसके बाद उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया और कुछ देर तक पकड़े रहीं जैसे कि मुझमे ताजमहल को महसूस करना चाहती हों। जब भी यह घटना मैं बताता हूँ, मेरी आँखों में आंसू आ जाते हैं और मेरे रोएँ खड़े हो जाते हैं। भारत के प्रति वहाँ बहुत आकर्षण है। लोग भारत और भारतीय संस्कृति से बहुत प्रेम करते हैं। सो वहाँ रहते हुए मुझे बहुत अच्छा लगा, पूरा वातावरण भारतीय लगा और अच्छी बात यह भी हुई कि मैं आसपास के यूरोपीय देशों को देख पाया।
पढ़ने में भी वहाँ के बच्चों ने बहुत दिलचस्पी दिखाई। एकबार एक बच्चा सिगरेट पीता हाथ में कॉफी लिए मेरी क्लास में आ गया। मैंने उसे कहा कि बेटा, कॉफी तो ला सकते हो लेकिन गुरु के सामने सिगरेट पीना भारतीय संस्कृति में मान्य नहीं है। मेरे इतना कहते ही वो लड़का तुरंत बाहर गया और सिगरेट फेंककर वापस आया। इसके बाद फिर उसने कभी मेरी क्लास में सिगरेट नहीं पी। इसी क्रम में अगर बल्गेरिया की अपनी एक बड़ी उपलब्धि की बात करूँ तो वो एलिन पेलिन नामक बल्गेरियाई लेखक की खोज है। इनका जिक्र मेरी पुस्तक में भी है। एलिन पेलिन प्रेमचंद के समकालीन थे और दोनों के साहित्य में इतनी समानताएं हैं कि आश्चर्य होता है। यहाँ प्रेमचंद दो बैलों की कथा लिख रहे थे, तो वो व्यक्ति बल्गेरिया में ‘वाचुका’ नामक बैल के बारे में लिख रहा था। ‘कफ़न’ जैसी कहानी प्रेमचंद यहाँ लिख रहे हैं, तो वहाँ भी एलिन पेलिन द्वारा वैसी ही कहानी लिखी जा रही। सो, एलिन पेलिन के लेखन से परिचित होना मैं बल्गेरिया की अपनी उपलब्धि मानता हूँ।
भारतीय सिनेमा के प्रति भी वहाँ रुझान है। पहले के बल्गेरियाई बच्चे राज कपूर को पसंद करते होंगे, आज के बच्चों की पसंद शाहरुख़ खान है। उन्होंने मुझसे कहा कि शाहरुख़ खान की फिल्म आप दिखाइये तो मैंने उन्हें ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ दिखाई। इसे देखकर उन्होंने सवाल उठाया कि जब लड़का-लड़की दोनों राजी हैं, तो फिर लड़की के पिता क्यों विरोध कर रहे हैं ? फिर मैंने उन्हें इससे सम्बंधित पूरी स्थिति बताई तो उनका समाधान हुआ। बल्गेरिया के यही सब अनुभव और उपलब्धियां रही हैं।
सवाल – सर, विदेशी शिक्षा की बात हो रही है, तो इसीसे जुड़ा एक सवाल और है कि अभी हाल ही में यूजीसी ने ऐसी घोषणा की है कि अब भारत में भी विदेशी शिक्षण संस्थान खोले जाएंगे। आपको क्या लगता है कि इसका हमारी शिक्षा व्यवस्था पर कैसा प्रभाव पड़ेगा और विदेशी विश्वविद्यालयों के आने से कहीं हमारे विश्वविद्यालय पिछड़ तो नहीं जाएंगे?
सत्यकाम – मेरा यही कहना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में आने दीजिये। हम भी तो अपने शिक्षण संस्थान वहाँ खोलते हैं। इग्नू भी तो पचास-साठ देशों में पढ़ाई करवाता है। अतः उनको आने दीजिये, पढ़ाने दीजिये और अपने को प्रतिस्पर्धी बनाइये। हम शिक्षकों-अध्यापकों का यह कर्त्तव्य है कि खूब पढ़ें, खूब पढ़ाएं और अपने को योग्य बनाएं। डरते क्यों हैं ? आप अच्छा पढ़ाइये, अपने विश्वविद्यालय का स्तर ऊपर उठाइये। विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आएँगे तो उससे हमारे बच्चे समृद्ध होंगे।
एक लाभ यह भी है कि जो बच्चे विदेशी विश्वविद्यालय में पढ़ने के इच्छुक है, वे यहीं रहकर पढ़ेंगे तो हमारा धन भी बाहर कम जाएगा। अभी अगर कोई बच्चा विदेश में एक साल के लिए एम.ए. करने जाता है, तो कम से कम एक करोड़ का खर्च आता है। वो पूरा पैसा विदेश जाता है। यहाँ पढ़ने पर शायद पचास लाख ही लगे तो इस तरह एक विद्यार्थी पर पचास लाख तो बच जाएगा। अतः अकादमिक और आर्थिक दोनों तरह से यह एक स्वागतयोग्य कदम है। इसे नकारात्मक रूप में नहीं लेना चाहिए। लेकिन हमें सचेत अवश्य रहना चाहिए कि दोयम दर्जे के विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आकर हमारे देश को और हमारे विद्यार्थियों को ठगें नहीं।
सवाल – हिंदी के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे ?
सत्यकाम – हिंदी के विद्यार्थियों के लिए यही संदेश है कि केवल हिंदी पढ़कर ही संतुष्ट न हों, बल्कि ऐसी योग्यता भी अर्जित करें जो रोजगारपरक हो। हिंदी के विद्यार्थियों को कम्यूटिंग जरूर सीखनी चाहिए तथा मीडिया के जो अन्य क्षेत्र हैं, उनके गुर भी जरूर सीखें। इसके साथ ही, संकोचों को छोड़कर स्वयं को आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोड़ें।
शोधार्थियों से तो यही कहूँगा कि शोध के क्षेत्र में नया सोचें, नया करें और कम से कम एक चैप्टर उनके थीसिस में ऐसा रहे जिसे पढ़ते हुए लगे कि शोधार्थी ने जो लिखा है, वो भाषा, तथ्य आदि किसी न किसी दृष्टि से नवीन है और अबसे पहले किसी ने नहीं कहा है। नयी खोज के साथ नयी बात कहने की मैं शोधार्थियों से अपील करता हूँ। मुझे विश्वास है कि जो भी शोधार्थी मेरी बात को पढ़ेंगे, वे इस दिशा में बढ़ने के लिए प्रवृत्त होंगे।
पीयूष – हमसे बातचीत के लिए समय देने हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद, सर।
सत्यकाम – पुरवाई का और आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद।  
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला स्थित ग्राम सजांव में जन्मे पीयूष कुमार दुबे हिंदी के युवा लेखक एवं समीक्षक हैं। दैनिक जागरण, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, पाञ्चजन्य, योजना, नया ज्ञानोदय आदि देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में समसामयिक व साहित्यिक विषयों पर इनके पांच सौ से अधिक आलेख और पचास से अधिक पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरवाई ई-पत्रिका से संपादक मंडल सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं। सम्मान : हिंदी की अग्रणी वेबसाइट प्रवक्ता डॉट कॉम द्वारा 'अटल पत्रकारिता सम्मान' तथा भारतीय राष्ट्रीय साहित्य उत्थान समिति द्वारा श्रेष्ठ लेखन के लिए 'शंखनाद सम्मान' से सम्मानित। संप्रति - शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय। ईमेल एवं मोबाइल - sardarpiyush24@gmail.com एवं 8750960603

1 टिप्पणी

  1. एक व्यक्ति आमतौर पर अपनी पैतृक संपत्ति में और सायद पैतृक कर्म में रुचि रखता है , परंतु जैसा कि उपरोक्त बताया गया की मनसा , वाचा , कर्मणा वो पैत्रिकी से जुड़े हुए है , इसी क्रम में लेखक ने स्वयं को छायामात्रा बताया जो की सराहनीय है ।

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