कविता लोक से निकलती है, लोक तक जानी भी चाहिए – सोनरूपा विशाल 3

गत वर्ष पुरवाई पर चली साक्षात्कार श्रृंखला को पाठकों का बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला था। अब पुनः इसकी शुरुआत कर रहे हैं। इस साक्षात्कार श्रृंखला में मुख्यधारा के साहित्य और मंचीय कविता के साथ-साथ  समाज, शिक्षा, संगीत, सिनेमा आदि विविध क्षेत्र के लोगों से भी संवाद किया जाएगा। आज इसकी पहली कड़ी में प्रस्तुत है – मुख्यधारा और मंच दोनों की लोकप्रिय कवयित्री सोनरूपा विशाल से युवा लेखक-समीक्षक पीयूष द्विवेदी की बातचीत।   

सवाल – नमस्कार सोनरूपा जी,  स्वागत है आपका।  सबसे पहले तो अपनी अबतक की जीवन-यात्रा के विषय में कुछ बताइए जिससे हमारे पाठक आपसे बेहतर ढंग से से जुड़ सकें।

सोनरूपा – नमस्कार पीयूष जी,  समस्त पाठकों को नमस्कार।

मेरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छोटे से ज़िले बदायूँ में जन्म हुआ। जन्म से लेकर अब तक मेरा यहीं निवास है। एक छोटे ज़िले की बड़ी सामाजिकता को जिया है मैंने।

पिता डॉ उर्मिलेश बदायूँ के महाविद्यालय में हिंदी के रीडर थे और ख्यातिलब्ध कवि भी। समाज से ख़ूब जुड़े हुए रहे लोक और साहित्य में दोनों रूप में ज़बरदस्त स्वीकृति मिली उन्हें।  यूँ तो मैंने दयालबाग विश्वविद्यालय एवं रुहेलखंड विश्वविद्यालय से हिंदी के साथ-साथ संगीत में भी उच्च शिक्षा ली है।  लेकिन मैं किताबी पढ़ाई से ज़्यादा जीवन के अनुभवों की पढ़ाई से कनेक्ट कर पाई ख़ुद को।  वही लेखन का प्रमाण भी है। माँ सीधी सरल स्वभाव की गृहिणी हैं।

बदायूँ में ही विवाह हुआ है। पति व्यवसायी हैं और  मेरे लायक साहित्य से लगाव रखते हैं। दो बेटों की माँ हूँ। आकाशवाणी एवं ICCR से ग़ज़ल गायन में अधिकृत हूँ।  समय समय पर शब्दों के साथ सुरों की यात्रा पर भी निकल कर जाती हूँ।

सवाल – साहित्य की तरफ रुझान किस प्रकार हुआ?

सोनरूपा – साहित्यिक परिवार में जन्मी थी इसीलिए ये रुझान तो वंशानुगत  ही था।  घर में जितनी जगह हमारे लिए थी उतनी ही किताबों के लिए भी।  लेकिन यहाँ आप मेरे लेखन के बाबत भी पूछ रहे हैं तो मैं कहना चाहूँगी कि लेखन का बीज मनोभूमि में बहुत पहले से था लेकिन सुप्त था।

पिछले आठ दस साल कुछ उर्वरक रहे और कुछ रचनात्मकता के फूल खिलकर आपके सामने आए और शायद यही कारण है कि आज आप मेरा साक्षात्कार कर रहे हैं।

सवाल – अतीत के बरक्स हिंदी कविता का वर्तमान परिदृश्य कैसा है?

सोनरूपा – हिन्दी कविता का अतीत सुनहरा था।कविता अनुभव के पक जाने पर स्वतः फूटती थी।जीवन मूल्य उच्च थे, व्यवहार समावेशी था। वर्तमान भी अच्छा है लेकिन अब वो धैर्य नहीं, जल्दबाज़ी है। ये अधीरता मैं ख़ुद के अंदर भी पाती हूँ। कुछ रचनाओं के साथ मैं न्याय कर पाती हूँ कुछ के साथ नहीं। यही जल्दबाज़ कविता पाठकों ज़हन से भी जल्दी विस्मृत हो जाती है।

तत्कालीन समय की घड़ी की तरह आज के समय की घड़ी के जैसे टिक टिक तो उसी अंतराल पर करती है।लेकिन वक़्त जैसे पल भर में ओझल हो जा रहा है।सूचनाओं का ओवरफ्लो है कोई फिल्टर ही नहीं लगा है।इससे हमारा साहित्य भी कैसे अछूता रह सकता है।

सिवाय इसके पारिवारिक,सामाजिक, राजनैतिक संरचना का बदलाव भी कविता पर प्रभाव डालता है।ये स्वाभाविक भी है।
इधर कुछ बहुत बढ़िया लिखने वालों को मैं देख रही हूँ जिनके अध्ययन भी है,चिंतन भी,मनन भी और रचन भी। आज की हिंदी कविता की दूसरी विशेषता या सहूलियत कह लीजिए कि अब इसे पाठकों तक पहुँचने के लिए किसी सम्पादक की या किसी मंच पर पाठ की दरकार नहीं अब यह मीडिया के विभिन्न माध्यमों से अपना पाठक वर्ग स्वयं तैयार कर रही है।अब उसमें से कितनी कविता है देखना ये है।

मुझे मौजूदा दौर में कविता की आलोचना की कमी खलती है हालाँकि कहने वाले ये भी कहते हैं कि अभिव्यक्ति किसी के प्रमाणपत्र की मुखापेक्षी नहीं होती।लेकिन नीर क्षीर विवेकी विवेचन का दस्तावेज़ होना ज़रूरी है भविष्य के लिए।

सवाल – मंच की कविता और कथित मुख्यधारा की कविता के बीच रचना-प्रक्रिया,  शिल्प और कथ्य के स्तर पर कैसा अंतर देखती हैं आप?

सोनरूपा – दोनों की रचनाप्रक्रिया एक है लेकिन परिणाम अलग अलग।जब हम कहीं छपते हैं तब हमारे सामने प्रबुद्ध पाठकों का वर्ग होता है और जब कहीं कुछ सुनाने को हम लिखते हैं तब हमारे सामने प्रबुद्ध से लेकर आम श्रोता होता है।मंच पर चढ़ कर हमें आम आदमी की भाषा और ज़िन्दगी से जुड़े तमाम अनुभवों को सरल ढंग से अपनी कविता के माध्यम से कहने होते हैं।

जहाँ मंच से पढ़ी जाने वाली होठों से होंठों तक जाकर जनमानस तथा अनपढ़ लोगों को भी आंदोलित करने में सक्षम है और अधिक सामाजिक होने के कारण पूरे समाज तक पहुँचती है बदलने में वहीं कथित मुख्य धारा की कविता में लोक का अभाव लगता है उसमें उदाहरण के लिए प्रेम जैसे सलोने से भाव को भी शिल्प में इतना जटिल कर दिया जाता है कि उसकी अपील आम जन तक नहीं जा पाती।

उसके पाठक उसके आस्वादक कुछ ही लोग हैं मास तक जाने का माद्दा नहीं इस विधा में।हर कोई नहीं समझ सकता। ये एक ऐसी कविता है जो जिसके लिए लिखी जाती है उस तक ही नहीं पहुंच पाती। इस बात के संदर्भ में मुझे एक शेर याद आता है –

ख़ुशबू को फैलने का बहुत शौक है मगर
मुमकिन नहीं हवाओं से रिश्ता किये बग़ैर

सवाल – मंचीय कविता और कवियों के प्रति हिंदी की कथित मुख्यधारा के कवियों और आलोचकों में एक उपेक्षा का भाव रहा है. कितने तो इसे कविता मानते भी नहीं हैं. क्या कहना चाहेंगीं?

सोनरूपा – देखिए कहा भी गया है कि वाक्यं रसं काव्यम अर्थात रसमय वाक्य ही काव्य है।  परंतु रस तो जन जन के ह्रदय को आप्लावित करने वाला दिव्य तत्व है फिर कविता किताबों में ही क्यों सीमित हो?

कविता लोक से ही मिलती है तो लोक तक नहीं जानी चाहिए क्या?मेरे अनुसार कविता विशेष वर्ग के लिए आरक्षित थोड़ी न होती है। तुलसी, कबीर आज भी ख़ूब गाये जाते हैं। इसीलिए किसी के कहने से किसी का अस्तित्व न रहे, ऐसा कभी हुआ है क्या?

बचा वही रहेगा जो लोगों के ह्रदय में जिंदा रहेगा। कविता के प्रति जन सामान्य में रुचि जाग्रत करने और भावनाओं को कविता के माध्यम से प्रचारित और प्रसारित करने में कवि सम्मेलनों  की उपयोगिता असंदिग्ध है। मुख्य धारा के कवि मानें या न मानें।

सवाल – वैसे क्या आपको नहीं लगता कि मंचीय कविता के प्रति उपेक्षित दृष्टि के लिए उसके बहुत-से कवि भी जिम्मेदार हैं, जो मंच पर कविता के नाम पर चुटकुलेबाजी करने में लगे रहते हैं?

सोनरूपा – भारतीय काव्य में वाचिक संस्कार सदा से था और है भी।  कविता की वाचिकता लोक में आदर भी पाती है क्योंकि लोक स्वयं को वाचिक कविता के निकट पाता है। लेकिन बेझिझक मैं कह सकती हूँ कि वाचिकता का जो रिश्ता अनुष्ठान की पवित्रता से था,  वह अब ख़त्म सा हो गया है। पहले लोग रस लेकर वाचिक काव्य को सुनते थे।  इसका एक बड़ी वजह ये थी कि कवि सम्मेलनों के आयोजक साहित्यकार होते थे उन्हें बुलाये जाने वाले कवियों की रचनात्मकता का पूरा पता होता था। अब कवि सम्मेलन में पैसे और ग्लैमर का वर्चस्व हो गया है।  आयोजक भी अब उद्योगपति हैं। जो कवि सम्मेलन में केवल मनोरंजन चाहते हैं और उनका मनोरंजन हास्य प्रस्तुतियों से ज़्यादा होता है। हालाँकि कुछ अच्छे व्यंग्यकार इसी बहाने समाज की विसंगतियों पर करारी चोट भी करते हैं।

यहाँ एक बात और मैं कहना चाहूँगी कि सारा दोष कवियों के मत्थे मढ़ना ग़लत होगा,  आज हमारा हिंदी समाज भी आत्मविश्लेषण से बचता है।  उसका अपनी कलाओं,  साहित्य से जैसे दिली रिश्ता नहीं रह गया है।  ध्यान दें मैं यहाँ सबकी बात नहीं कर रही।  अगर आपकी सांस्कृतिक और संवेदनात्मक प्रक्रियाएं ही क्षीण हो गईं हों तो ऐसे में मंच पर क्या हावी होगा आप समझ ही सकते हैं। बदलते परिवेश में मंच पर कविता की गुणवत्ता कम हो गयी। मंच अपने प्रति ईमानदारी चाहता है। बेशक आप कवि सम्मेलनों से कमाएं लेकिन कविता और प्रस्तुति से समझौता न करें।

हालांकि इधर कुछ समय से फिर से विशुध्द काव्य मंच संयोजित किये जाने लगे हैं लेकिन ये संख्या अभी बहुत कम है। कवि सम्मेलन में फिर से कविता का वर्चस्व क़ायम होगा यदि फिर से साहित्यकारों के हाथों आयोजनों की कमान आये हालाँकि आर्थिक पक्ष देखते हुए ऐसा होना मुमकिन तो नहीं लगता और दूसरा बड़ा क़दम मंच के स्थापित कवियों की ओर से बढ़ना चाहिए वे अकवियों के साथ मन्च न साझा करें। आयोजकों को मार्गदर्शन दें कि वे यदि कवि सम्मेलन आयोजित कराएं तो उसमें उनका चुनाव कैसा हो।

यहाँ एक बात मैं और जोड़ना चाहती हूँ। पिछले कुछ वर्षों से लिटरेचर फेस्टिवल्स के आयोजन बढ़ने लगे हैं यहाँ जो कविता का सेगमेंट होता है वो प्रशंसनीय है,  दूसरी बात कुछ नए और बढ़िया लिखने लोग अपना मंच स्वयं तैयार कर रहे हैं वहाँ भी अच्छी कविता को सुनने की क्षुधा शांत हो पा रही है।

मंचीय कविता श्रोताओं को रस आनंदित करते हुए वैचारिक धरातल पर संदेश का सम्प्रेषण करती है यही मंचीय कविता के सार्थक उद्देश्य हैं।

सवाल – खैर,  कविता से अलग,  समग्र हिंदी साहित्य के परिदृश्य को कैसे देखती हैं आप?

सोनरूपा – हर काल का साहित्य अपने समय का आख्यान होता है।  मनुष्य बदला,  परिस्थितियां बदलीं,  हमारे जीवन में इंटरनेट ने बड़ा ज़बरदस्त बदलाव किया।  पल लगते हैं और पिक्चर बदल जाती है ऐसे में हर पल कुछ नया रचने का अनदेखा दबाव है लेखन पर कि अब नया क्या रचा जाए ऐसे में हमारे काल का साहित्य भी अपने समय का बयान कर रहा है। लेकिन न जाने क्यों अब साहित्य पथ प्रदर्शक नहीं मालूम होता।

तमाम तनावों, विसंगतियों से दो चार पाठक भी गम्भीर पाठ के लिए अब तैयार नहीं है।  एक कारण और भी है वर्तमान समय मे जनांदोलन और जन – संगठन कमजोर हुए हैं,  आज जो अर्थनीति चली है,  उसके चलते तरह – तरह के राजनीतिक दल आ गए हैं,  एक परिवर्तन आया है जिसमें बाज़ार का वर्चस्व बढ़ा है,  उसका असर हमारी भाषाओं और साहित्य पर भी पड़ रहा है. अब कहानियों व उपन्यासों में गाँव के पात्र हैं लेकिन वो परिवेश नहीं। समय परिवर्तन शील है आज एक नई अर्थव्यवस्था है,  वही साहित्य पर भी असर डाल रही है जैसे भोजन स्वादिष्ट बनाने के तरह तरह के मसाले प्रयोग में आते हैं वैसे ही अब साहित्य को पापुलर बनाने की कवायद में कई प्रयास दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं सबके बीच  आज भी साहित्य की उँगलियों में निरन्तर अच्छे लेखन के नगीने भी नज़र आते हैं।

सवाल – कवि-सम्मेलनों,  कार्यक्रमों और निजी जीवन के बीच तालमेल बिठाना कितना आसान या मुश्किल रहा है?

सोनरूपा – कोई मुश्किल नहीं रहती।  क्योंकि चुनिंदा मंचों पर जाती हूँ इसीलिए बहुत व्यस्त नहीं होती।  घर पर होती हूँ तो कुछ न कुछ रचनात्मक करती रहती हूँ।  अभी पिता जी पर एक संकलन पर काम कर रही हूँ।  सामाजिक कार्यों में भी समय देती हूँ।  घर से हमेशा सहयोग मिला है तो कोई परेशानी नहीं होती।

सवाल – नए लेखक जिनके लिखे ने आपका ध्यान खींचा हो?

सोनरूपा – बहुत सारे नए नाम हैं, जिनका लेखन इन दिनों मुझे बहुत प्रभावित कर रहा है। थोड़े नामों में काम नहीं चल सकता इसीलिए रहने दीजिए।

सवाल – आप जब मंच पर होती हैं,  तो उसके प्रति आपके मन में कैसा दायित्वबोध और महत्व-भाव होता है?

सोनरूपा – मेरी नज़र में कविता मनोविनोद के साथ  मनोचिकित्सक का काम भी करती है,  मन की पीड़ाओं को हरना,  विचार शक्ति सौंपना,  नए और सार्थक नज़रिये देना कविताओं से मनोचिकित्सा करना ही तो है!

सबका अपना एक जॉनर होता है।  मैं अपनी बात करूँ तो कहूँगी कि मेरा मंच पर आना अनायास ही हो गया और जब हो गया तो जो लिखते समय मेरे मन में एहसास और ज़िम्मेदारियाँ रहती हैं बिल्कुल वैसी ही मंच पर भी।

यहाँ प्रस्तुति भी मायने रखती है।  मेरी प्रस्तुति  शिष्ट और गरिमापूर्ण रहे इसका मुझे ख़याल नहीं रखना पड़ता क्योंकि ये मेरे व्यक्तित्व में ही शामिल है।

दूसरा हमारे यहाँ आत्मतुष्टि से अधिक दूसरों की तुष्टि और रुचि परिष्कृत रखने को काव्य का प्रमुख प्रयोजन माना गया है। इस बात का भी ध्यान रखती हूँ और ऐसे वक़्त में तो कवियों की ज़िम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती है जब जीवन से मानवीयता, संवेदनशीलता, सुकून, प्रेम, अपनेपन का प्रतिशत लगातार घट रहा हो।  हम स्त्रियों को प्रेममयी स्वभाव ईश्वरप्रदत्त है। ये तत्व मेरी कविता में होते हैं।

सवाल – छंद-तुक-लय से युक्त कविता और इनसे रहित आज की नयी कविता में किसे आप बेहतर मानती हैं? छंदमुक्त ने कविता की गुणवत्ता को नुकसान नहीं पहुंचाया है?

सोनरूपा – यूँ तो मुझे किसी भी विधा को बेहतर या कम बेहतर कहना उचित नहीं लगता क्योंकि सबके अपने पाठक और श्रोता होते हैं और जिसे जो ग्रहण करना होता है,  कर लेता है।

लेकिन मुझे छन्दोबद्ध कविता ही पसन्द है।  साँस से लेकर हमारे क़दम तक एक लय में चलते हैं।  प्रकृति की हर शय में लय है। इसीलिए हम इस स्पंदन से अलग जा ही नहीं सकते। ये भी मैं जानती हूँ कि नई कविता के लोग भले ही छन्दोबद्ध कविता की उपेक्षा कर लें लेकिन उसकी क्षमता, सर्वव्यापकता को अस्वीकार नहीं कर सकते।

नुकसान वाली बात पर मैं बस ये कहना चाहूँगी कि ये नुकसान बस अकादमियों तक ही सीमित है।  वहाँ नई कविता वाले लोग ही सरदार हैं।  लेकिन लययुक्त कविता के प्रति चहुँओर से मिलते प्रेम को ये अकादमियाँ कम नहीं करवा सकतीं।

सवाल – मंच के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में भी आपके गीत-ग़ज़ल आते रहते हैं।  इन दोनों माध्यमों में आपके लिए कौन अधिक महत्वपूर्ण है?

सोनरूपा – कविता को जन जन तक पहुँचाने का माध्यम हैं पत्र पत्रिकाएं और  कविसम्मलेन। मेरी नज़र में दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं। छपे हुए शब्दों का अपना महत्व होता है।  मुद्रित रचनाएँ सदा के लिए हो जाती हैं।  आपको स्थापन देती हैं। उनका अपना बौद्धिक वर्ग होता है, विशुद्ध पाठक होते हैं। मंच की उपयोगिता के विषय में मैं पहले बता ही चुकी हूँ।

पीयूष – हमारे साथ बातचीत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

सोनरूपा – आपका भी धन्यवाद, पीयूष।

1 टिप्पणी

  1. सोनरूपा विशाल का साक्षात्कार अच्छा लगा क्योंकि उनके विचार धरातल से जुडे हैं ।

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