Wednesday, June 12, 2024
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विद्या सिंह की दो लघुकथाएँ

1 – उधड़ा ब्लाउज़

“अरे काव्या ज़रा सुई में धागा डाल दो बेटा”

“तुम डाल दो ममा, मुझे वैसे ही देर हो रही है 5:00 बजे बुलाया था आद्या ने, घर में ही पांच ‌बज गए।”

“रख दीजिए मम्मी जी मैं पार्क वाले दर्जी से सिलवा लाऊंगी।”

बहू ने कहा किंतु शारदा देवी आश्वस्त नहीं हो सकीं। वह फिर एक बार आंखों को सुई के छेद पर केंद्रित करने की असफल कोशिश करने लगीं। मुझे मालूम है बहू ने कह तो दिया है लेकिन ब्लाउज को दरजी तक पहुंचाने में15 दिन लग जाएं, महीना लग जाए, कुछ निश्चित नहीं है। शारदा देवी को अपने पुराने दिन याद आने लगे होली हो, दिवाली हो या जन्मदिन उन्होंने हमेशा अपने बच्चों को अपने हाथ के सिले नए कपड़े पहनाए।

उम्र के चौथे पड़ाव पर उन्हें सबसे अधिक सुकून है तो यही कि उन्होंने अपनी गृहस्थी बहुत अच्छी तरह संभाली। नौकरी करके धन भी कमाया और अपने परिश्रम से घर को भी अच्छी तरह सजाया। शारदा देवी सोफे के हत्थे पर हाथ रख कर उठीं और बालकनी में आ गईं ‘बस सुई में धागा नहीं जाता, इतना सा कोई कर देता तो अभी के अभी ब्लाउज की मरम्मत कर देती। मैंने कभी अपना काम नहीं टाला’ बड़बड़ाती हुई शारदा देवी सूरज की रोशनी में एक बार फिर कोशिश करने लगीं। उन्हें विश्वास था इस बार वह जरूर सफल हो जाएंगी।

2 – सहज समाधान

दो जून की रोटी जुगाड़ने में सुगिया को न जाने कितने दरवाजे अगोरने पड़ते! क्या पता कहीं से कुछ काम मिल जाए। आज उसे मेरे घर में काम मिल गया था, गोबर से ओसारा लीपने का। पीतल की गगरी में पानी ले कर वह गोबर को गगरे के पानी से पतला करती और ओसारा लीपती हुई पीछे-पीछे खिसकती जाती। अचानक उसकी लार गगरी में टपक गई। चश्मदीद गवाह बने राघव भैया। उन्होंने गगरी भुसौरे में छिपा दिया। शाम को पानी भरने के लिए जब गगरे की ढूंढ़ शुरू हुई तो हड़कंप मचा। अड़ोस पड़ोस में पूछने पर भी कुछ पता नहीं चला।

अंततः भैया ने भुसौरे से निकाल कर गगरा प्रत्यक्ष कर दिया साथ ही एक विस्फोट भी किया, “अब यह गगरा कुएं में डालने लायक नहीं है। इसमें सुगिया का लार गिरते मैंने अपनी आंखों से देखा।” स्थिति भांपते हुए मां ने भैया को आंखें तरेरीं ,”ई तोहें धोखा भयल हौ। एतना छोट मुंह के गगरा में लार कइसे गिर जाई?” खैर! मां रसोई से उपली के ऊपर रख कर जलते हुए अंगारे लाई और उन अंगारों को गगरे में डाल दिया,”आग सबके पवित्तर कइ देले। मनई ल्या एके मांजि के पानी भरा ।अब गगरा फेंकि थोड़ो जाई”। अति की हद तक छुआछूत मानने वाली मां का समाधान भैया को चकित कर रहा था।

विद्या सिंह
विद्या सिंह
कविता, कहानी, समीक्षा स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।'चंद्रिका बाबू की गुमटी' कहानी संग्रह तथा नरेश मेहता का साहित्य एक अनुशीलन समीक्षात्मक पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न संकलन में सहयोगी लेखन। पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एमकेपी कॉलेज देहरादून।
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