आज साहित्य लेखन में अतीत से निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है - रत्नेश्वर सिंह 5

रत्नेश्वर सिंह हिंदी के लोकप्रिय लेखक हैं। अबतक उनके दो कहानी-संग्रह और दो उपन्यास सहित मीडिया आदि विषयों पर भी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका पहला उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ बेस्टसेलर रहा और अपने विषय के साथ-साथ अनुबंध राशि को लेकर भी चर्चित हुआ। पत्रकारिता साहित्य के लिए इन्हें प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1998 ई. के लिए ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार’ प्रदान किया गया। हाल ही में इनका नया उपन्यास ‘एक लड़की पानी पानी’ राजपाल एंड सन्ज से प्रकाशित हुआ है। आज साक्षात्कार श्रृंखला की पंद्रहवीं कड़ी में रत्नेश्वर सिंह से युवा लेखक/समीक्षक पीयूष द्विवेदी ने बातचीत की है।

सवाल – आपका नया उपन्यास ‘एक लड़की पानी पानी’ भावी जल संकट पर केंद्रित है, इसकी विषय-वस्तु और रचना-प्रक्रिया के विषय में हम जानना चाहेंगे।

रत्नेश्वर सिंह – 2003 ई. में ही मेरे मन में पानी पर काम करने की इच्छा बन गई थी। 2004 ई। से इसपर सामग्री जुटाने का काम कर रहा हूँ। नदियों पर किताब जुटाने से लेकर पानी पर लिखी गई हर किताब की तलाश करता रहा। इस बीच अखबारों में जितनी ख़बरें निकलतीं, वह भी मैं जमा करता जाता। इस दौरान कई कवियों की कविताएँ भी मिलीं।

उपन्यास लिखने केलिए सिर्फ़ पानी की वैज्ञानिक या तथ्यात्मक जानकारी ही काफ़ी नहीं थी। तब मैंने अपने अध्ययन को सात हिस्से में वर्गीकृत किया। और फिर उस तरीके से सामग्री जुटानी शुरू की।

अध्ययन का पहला हिस्सा हमारे प्राचीन ग्रन्थ थे। जिनमें हमने यह तलाश करने की कोशिश की कि पानी पर वहाँ क्या चर्चा है या कौन-कौन से किस्से-कहानियाँ हैं। इस संदर्भ में वेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण आदि-आदि ग्रन्थों में तलाश शुरू की। कई मित्रों-विद्वानों ने भी इसकी जानकारी दी, जिससे पुस्तक या सामग्री उपलब्ध करने में आसानी हुई।

अध्ययन का दूसरा हिस्सा ब्रम्हांड का था। हमें यह अध्ययन करना था कि पानी आने से पहले की पृथ्वी कैसी थी? सौरमंडल क्या है? जीवन केलिए पानी का महत्त्व क्या है? इसमें जीवों का क्या महत्त्व-मतलब है? पृथ्वी पर पानी कैसे आया? इसमें भी मुझे मित्रों साथियों का भरपूर सहयोग मिला। गूगल और यूट्यूब से इसमें ख़ूब मदद मिली। साथ ही भरतीय वैज्ञानिक सहित स्टीफ़न हॉकिंग तक की भौतिकी की किताबों को पढ़ने-पलटने का मौक़ा मिला।

अध्ययन का तीसरा हिस्सा पंचतत्त्वों के अध्ययन का था। अग्नि, पानी, हवा आदि को वैज्ञानिक और आध्यत्मिक दोनों दृष्टि से समझने की कोशिश की। इसमें भी मैंने गूगल और यूट्यूब से जानकारी हासिल करने के आलावा धर्म ग्रन्थ और रसायन शास्त्र की कई किताबें पढ़ीं।

अध्ययन का चौथा हिस्सा भारतीय इतिहास का था। हमने यह तलाशने की कोशिश की कि भारत में सूखे की वजह से कब-कब अकाल पड़े और उसका जन-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा। पानी की कमी ने कब-कब भारतीय-जन को हजारों-लाखों की संख्या में मौत के मुँह तक पहुँचाया!

अध्ययन का पांचवाँ हिस्सा वर्तमान स्थिति का था। इसमें मैंने आज के समय का अध्ययन किया। आज भारतीय उपमहाद्वीप सहित वैश्विक स्तर पर पानी की क्या स्थिति है? समाज किस कदर इससे प्रभावित हो रहा है? विश्व के संदर्भ में भारत कहाँ है? पड़ोसी देशों की स्थिति के साथ उसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। भारत में पानी केलिए कौन-कौन से उपाय किए जा रहे हैं? क्या भारत एक साल के पूर्ण सूखे को झेलने की तैयारी कर चुका है?

छठा हिस्सा स्त्रियों की मनोस्थिति का है। गर्ल्स हॉस्टल और वहाँ रहनेवाली लड़कियों के माध्यम से मैंने उनकी जीवन शैली सहित सोच पर अध्ययन किया। यह रिसर्च इसलिए जरूरी था क्योंकि कथानक स्त्री नेतृत्त्व पर केन्द्रित रखने की योजना थी। साथ ही आज के समय में एक लड़की प्रेम, देह आदि को किस तरह से देखती है, इसकी भी पड़ताल की ।

अंत में सातवाँ हिस्सा भविष्य और चौथे काल का है। वैज्ञानिक दृष्टि से, भौगोलिक दृष्टि से, सामजिक दृष्टि से पानी की क्या स्थिति होने वाली है? इसकी कमी के कारण समाज पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है? क्या पानी केलिए हम कुछ प्रयास कर सकेंगे? क्या दुनिया को हम बचा पाएँगे? क्या पानी की समस्या का हल हम ढूंढ़  पाएँगे?

अब मेरे पास सामग्री इतनी ज्यादा थी कि क्या रखूँ और क्या छोड़ूं इसकी समस्या थी। जमा किये गए लगभग दस हज़ार से भी अधिक पन्नों की जुगाली करनी थी।

16 जनवरी से मैंने इसकी कहानी की रूपरेखा तैयार करनी शुरू की। इसमें कई महीने लग गए। 20 अप्रैल को कहानी की रूपरेखा तैयार हो पाई। 24 अप्रैल की रात को लेखन की शुरुआत करते हुए मैंने अपने उपन्यास का नाम रखा – ‘एक लड़की पानी पानी’। 28 मई को मैंने लगभग नब्बे हज़ार शब्दों का उपन्यास पूरा किया। इस दौरान मैंने प्रत्येक दिन औसतन 13 से 14 घंटे काम किये।

मैंने सोचा कि कुछ दिनों बाद उपन्यास का संपादन के साथ अंतिम रूप दूंगा। …पर ऐसा कर न सका। उपन्यास की कहानी मुझमें ऐसे समायी हुई थी कि मैं स्वयं पात्र में तब्दील हो गया था जैसे! फिर मैं उपन्यास को अंतिम रूप देने में लग गया। 30 अगस्त की सुबह मैंने उपन्यास को अंतिम रूप दिया। अब मेरे उपन्यास में पचासी हज़ार शब्द रह गए। मैंने बड़ी निर्ममता से कुछ किस्से हटाए पर कुछ दृष्टांत जोड़े भी।

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सवाल – हिंदी उपन्यास के पारंपरिक विषयों की अपेक्षा इस तरह के गैरपारंपरिक विषय पर रचनाकर्म की क्या चुनौतियां रहीं?

रत्नेश्वर सिंह सबसे बड़ी चुनौती सामग्री जुटाने की थी। इतने वर्षों में जितनी सामग्री जुटाई उसमें बहुत सी सामग्री मिलती या जुटती चली गई। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे उपन्यास की योगन मेरी मदद कर रही। कई ऐसी जानकारी मेरे पास स्वतः चली आई जिसके बारे में मैं जानता ही नहीं था। यहाँ तक की किताब का नाम भी मुझे मेरे ध्यान में मिला। इस तरह के गंभीर उपन्यास में दूसरी चुनौती भाषा की थी। मजेदार बात यह है कि मेरे सामने मेरे पाठक दृश्यमान हो गए और उन पाठकों की भाषा नए शब्दों के निर्माण के साथ बनती चली गई।

सवाल – ‘रेखना मेरी जान’ ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पर केंद्रित है। रेखना और ‘एक लड़की पानी पानी’ की रचना-प्रक्रिया में क्या कोई अंतर रहा और एक लेखक के तौर पर आपने स्वयं में कोई मानसिक विकास अनुभव किया?

रत्नेश्वर सिंह दोनों उपन्यासों की रचना प्रक्रिया एक जैसी ही है। दोनों के लिए रिसर्च सामग्री जुटाने में दस वर्षों से भी अधिक समय लग गया। हाँ मानसिक विकास के तौर पर ‘रेखना मेरी जान’ से ‘एक लड़की पानी पानी’ ज्यादा विकसित है। रेखना में जहाँ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ज्यादा प्रभावी है वहीं एक लड़की में वैदिक पृष्ठभूमि ज्यादा प्रभावी है। दोनों में इतिहास है, दोनों में विज्ञान है, दोनों में प्रेम है, दोनों में पर्यावरण है, पर रेखना मेरी जान हमारे सामज की विविध रेखाओं पर प्रहार के साथ ग्लोबल वार्मिंग की यात्रा करता है और एक लड़की पानी पानी स्त्री-नेतृत्त्व की कथा-पृष्ठभूमि के साथ पुरुषवादी मानसिकता पर प्रहार करते हुए पानी की यात्रा करता है।

सवाल – इन उपन्यासों से काफी पूर्व आए आपके कहानी-संग्रह ‘लेफ्टिनेंट हडसन’ की कई कहानियों में भी एक वैज्ञानिक चेतना दिखाई देती है। यही चेतना उपन्यासों में विकसित रूप में नजर आती है। हिंदी में इस तरह के लेखन का बहुत माहौल अब भी नहीं है, फिर दस साल पूर्व अपनी कहानियों में ऐसे प्रयोग का विचार कैसे आया?

रत्नेश्वर सिंह दरअसल 1999 में वाणी प्रकाशन से मेरा कहानी संग्रह आया ‘सिम्मड़ सफ़ेद’। इसका लोकार्पण देश के प्रतिष्ठित विद्वान आलोचक डॉक्टर नामवर सिंह ने किया था। अपने भाषण के दौरान उन्होंने मेरी किताब की धज्जियाँ उड़ा दी। भाषा को बेहद ख़राब बताया। उसकी कथा-वस्तु से लेकर शिल्प तक पर उन्होंने कड़ा प्रहार किया। अंत में बस इतना ही मेरे पक्ष में कहा कि रत्नेश्वर के पास कहानी कहने का मसाला है। इसकी किताब के लोकार्पण केलिए जो ये हाथ उठे हैं, उसको यह सार्थक करे, यही शुभकामनाएँ हैं।

कार्यक्रम के बाद बिहार के अनेक लेखकों-विद्वानों के चेहरे पर ख़ुशी के भाव दिखे। चर्चित कवि आलोकधन्वा ने मेरे चेहरे को छूकर दया भाव दिखाया। चर्चित कथाकार मधुकर सिंह ने कहा कि एक नए-उभरते लेखक की हत्या हो गई। कुछ वरिष्ठ और युवा लेखकों की बाछें खिली दिखीं। सीढ़ियों से उतरते हुए नामवर जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा- ज्यादा तो नहीं हो गया? मैं लजाया-सा मुस्कराया और ‘नहीं’ में सिर हिलाया। फिर उन्होंने कहा- मैंने जानबूझ कर यह किया है। मैंने ऐसा क्यों किया यह तुम्हें बाद में समझ में आएगा।

यह मेरे लिए पीठ पर साँसे अटका देने वाले धमक्के से कम नहीं था। 1999 के बाद मैंने साहित्य-जगत को समझने की कोशिश की। अपने चर्चित निबंध संग्रह को ध्यान करते हुए मैं ऐसे विषय की तलाश में जुट गया जिसपर हिन्दी साहित्य में काम नहीं हो रहा है। कई वर्षों के गैप के बाद 2003 में मेरी कहानी निर्मनु दोआबा में छपी जो इंडिया टुडे के फीचर संपादक अशोक कुमार से मैंने वापस ले ली थी क्योंकि उन्होंने एक साल तक उस कहानी को पढ़ा ही नहीं था। दरअसल 2002 के साहित्य वार्षिकी के लिए मैंने वह कहानी पत्रिका के संपादक प्रभु चावला को भेजी थी। बाद में मैं उनसे मिलने दिल्ली के दफ्तर गया और उन्होंने मेरी कहानी अशोक जी को देते हुए उनसे मेरा परिचय करवाया। खैर दूसरी कहानी 2005 में हंस में ‘लेफ्टिनेंट हडसन’ छपी। दोनों कहानी वैज्ञानिक परिवेश और ऐतिहासिक रिसर्च के साथ लिखी गई थीं। दोनों कहानियों की खूब सराहना हुई। लेफ्टिनेंट हडसन का उर्दू अनुवाद भी हुआ।

सवाल – आप अपनी रचनाओं में भाषाई प्रयोग भी खूब करते हैं। नए-नए और कई बार व्याकरण के धरातल पर बेढब लगने वाले शब्द तक आपके उपन्यासों में मिलते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि ऐसे शब्दों से हिंदी भाषा के सौंदर्य और गाम्भीर्य की क्षति होती है? क्या इनकी बजाय व्याकरणसम्मत शब्दों के निर्माण का प्रयत्न नहीं होना चाहिए?

रत्नेश्वर सिंह – हा हा हा… जरूर व्याकरणसम्मत शब्दों का निर्माण होना चाहिए, पर शब्दों का निर्माण तो हो! हिंदी में शब्दों का निर्माण नहीं के बराबर लेखक करते हैं। शब्दों का प्रयोग लोक में जहां से भी शुरू होता है, वह भाषा व्याकरण के माध्यम से नहीं होता। वह प्रयोग पर निर्भर है। बस मैं भी प्रयोग कर लेता हूँ। मेरे विषय के अनुरूप मुझे शब्दों की जरूरत पड़ती है इसलिए।

सवाल – अब बात वर्तमान साहित्य की। हिंदी के वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य को आप कैसे देखते हैं?

रत्नेश्वर सिंह सबसे पहले तो हर विधा को मैं साहित्य मानता हूँ। हाल के दिनों में हिन्दी में विविधता बढ़ी है। नए तरह के विषयों पर काम होने लगा जिसको पाठकों ने भी सराहा। यदि आप कथा-साहित्य की बात कहना चाहते हैं, तो आज भी हम रिश्ते से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। इस कारण आपको साहित्य में नब्बे प्रतिशत दुहराव ही दिखेगा। पर नए प्रयोग शुरू हो चुके हैं। हमेशा यही होता है। जिस तरह अस्सी वर्षों में नदियों का पाट बदलता है और एक सौ बीस वर्षों में बांस के पौधे में फूल खिलते हैं उसी तरह साहित्य भी नब्बे वर्षों में अपना चक्र बदलता है। …और वह वक्त अब आ गया है।

सवाल – आजकल नयी वाली हिंदी के रूप में साहित्य की एक लोकप्रिय युवा धारा प्रस्फुटित है। इसके विषय में आपकी क्या राय है? क्या इस धारा के साहित्य में कोई टिकाऊपन देखते हैं आप?

रत्नेश्वर सिंह नयी वाली हिन्दी को एक मुहावरे के तौर पर पेश किया जा रहा है। क्या मेरे उपन्यास या मेरी कहानियों की हिन्दी नई नहीं है? वैसे यह धारा नई नहीं है। साहित्य में एक समानांतर धारा हमेशा चलती रहती है और उनका भी साहित्य में उतना ही महत्त्व होता है। कालजयी साहित्य तो गंभीर कहे जाने वाले अधिकांश साहित्य में भी नहीं होता है! वैसे यह समय तय करेगा कि कौन साहित्य कालजयी है। आज जब हम सिर्फ बिहार के ही सन्दर्भ में देखें तो अपने समय के बड़े-बड़े लेखक भी काल के गाल में समाते जा रहे हैं। हिमांशु श्रीवास्तव का उपन्यास लोहे के पंख ने उनकी तुलना प्रेमचंद से करा दी थी और आज वे साहित्य-पटल से गायब हो रहे हैं। इसलिए टिकाऊपन किसके पास है, यह खुद ही बड़ा सवाल है! ऐसे साहित्य हिन्दी का भला इस रूप में करते हैं कि उस भाषा की जीवन्तता बनी रहती है। नए पाठकों को जोड़ने में उनकी भूमिका अहम होती है।

सवाल – आज के साहित्य लेखन की क्या चुनौतियां हैं?

रत्नेश्वर सिंह – बहुत अच्छा सवाल है। दरअसल अपने अतीत से निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है आज साहित्य लेखन में। हम उससे बाहर लिख ही नहीं पा रहे हैं। विश्व पटल पर अनेक तरह के प्रयोग हो रहे हैं। पर हम कथा-साहित्य की दुनिया में परम्परा को ओढ़े चल रहे हैं।

सवाल – हिंदी में पूर्णकालिक लेखक यूं ही कम रहे हैं, उसपर  वर्तमान समय में लिखने के साथ-साथ लेखक बेचने के काम में भी लगे हैं। इस स्थिति पर आपकी क्या राय है? आपको नहीं लगता कि इसका प्रभाव साहित्य की गुणवत्ता पर पड़ रहा है?

रत्नेश्वर सिंह नहीं, मुझे नहीं लगता। कम से कम मार्केटिंग के बहाने लेखक आमजन के बीच तो जाता है। उसके सामने यह भी चुनौती होती है कि उसकी किताब नहीं बिकेगी तो कल को कोई प्रकाशक भी उसे छपने को तैयार नहीं होगा। तुलसीदास भी घूम कर कथा सुनाया करते थे। हम भी अपनी कथा सुनाते फिरते हैं। हा हा हा… और इसी बहाने आप पाठकों की रुचि भी जान लेते हैं।

सवाल – प्रवासी साहित्य और साहित्यकारों के विषय में आपकी क्या राय है?

रत्नेश्वर सिंह सच पूछिए तो मैंने प्रवासी साहित्य बहुत कम पढ़ा है। जो एक-दो लेखक लिंक भेज देते हैं उनको पढ़ा है। इसीलिए उसपर टिप्पणी उचित नहीं होगी। हाँ, तेजेंद्र शर्मा की कुछ कहानियाँ बहुत अच्छी जरूर लगीं। तेजेंद्र शर्मा कुछ अलग परिवेश की कहानियाँ लिखते हैं। संवेदनाओं से भरा उनका कथ्य वैश्विक होता है। प्रियंका ओम की एक दो कहानी अलग तेवर की जरूर लगी।

सवाल – युवा लेखकों के लिए कोई संदेश?

रत्नेश्वर सिंह – शब्द-साधना बहुत जरूरी है। धैर्यपूर्वक विषयों के चुनाव में उन्हें ध्यान देना चाहिए। और वर्तमान समय की नब्ज को पकड़ना बेहद जरूरी है। साहित्य लेखन एक योग है। इसीलिए साहित्य ही संसार की सर्बोच्च सत्ता है। दुनिया इसे परम संविधान के तौर पर लेती है। बड़ा साहित्य वही जो इस दुनिया को खूबसूरत बनाता है।

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