लेखक को उसके लेखन की उत्कृष्टता के सिवाय कोई और चीज स्थापित नहीं कर सकती - रूपा सिंह 1
रूपा सिंह

रूपा सिंह हिन्दी जगत का एक ऐसा नाम है जिसे आप नकार नहीं सकते हैं। या तो आप सीधे सीधे उनसे जुड़ जाते हैं या फिर उनके लिये मन में नकारात्मक भाव बना बैठते हैं। वैसे राजेन्द्र यादव के बारे में भी कहा जाता था “Either you love him or you hate him. You can’t ignore him.” मगर रूपा सिंह को जैसे इस सब से कोई सरोकार नहीं है। वह अपनी धुन में अपनी राह चलती रहती हैं। वैसे उनका प्रिय क्षेत्र आलोचना का है, मगर जब कविता उतरती है तो कविता लिख लेती हैं और जब “दुखाँ दी कटोरी : सुखाँ दा छल्ला” जैसी कहानी लिख देती हैं तो फ़ेसबुक पर तहलका मचा देती हैं। उनका व्यक्तित्व बिंदास है… अपने में मस्त। रूपा सिंह  से उनकी रचनाओं, रचना-प्रक्रिया एवं स्त्री-विमर्श आदि विषयों को लेकर पुरवाई की प्रतिनिधि नीलिमा शर्मा की बातचीत की। लीजिये आपके लिये भी पेश हैं नीलिमा जी के प्रश्न और रूपा सिंह के खरे-खरे उत्तर।

प्रश्नः  रूपा जी आपकी शख़्सियत ऐसी है कि हिन्दी साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति को लगता है कि जैसे वह आपको जानता है। दिल्ली आपको अपना समझती है और अलवर अपना। यह दिल्ली और अलवर की जो दो रूपा सिंह हैं, उन्हें समझना हो तो उनके बारे में क्या कुछ जानना ज़रूरी है?
उत्तरः सुन्दर प्रश्न! कितनी अद्भुत बात कही है आपने कि हिन्दी साहित्य से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति मुझे जानता है। हिन्दी के एक आदमी की हिन्दी जानती समझती हूं तो यह मेरे लिये गौरव की बात है। मेरे पाठक जानते हैं कि मेरा जन्म स्थान दरभंगा बिहार है और बचपन के दिन विद्वान कवि नागार्जुन की छत्रछाया में बीते हैं। आपने दिल्ली की बात कही है जहां 1993 से मैं दरभंगा छोड़कर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की दुनिया में दाख़िला लिया और तब से दिल्ली मेरी नगरी बन गयी। मेरा घर, द्वारा, बाल-बच्चे, दोस्तों, साहित्य, नाटकों और व्यवस्थित समृद्ध पुस्तकालयों की दुनिया।
दिल्ली राजनीति और साहित्य का प्रमुख केन्द्र है। लेकिन जिस दरभंगा और अलवर (राजस्थान) से मेरे जीवन का गहरा तादात्म्य रहा वह दूर तक प्रभावित करने वाला भी हुआ। जैसे दरभंगा बंगद्वार था तो अलवर को राजस्थान का सिंहद्वार माना गया।
दरभंगा के लोहिया सराय, जहां मेरा जन्म हुआ था, ‘बालक’ पत्रिका का संपादन आरंभ हुआ था जिसे रामवृक्ष बेनीपुरी जी और शिवपूजन सहाय जी ने मिलकर शुरू किया था। वहां ‘पुस्तक भण्डार’ जैसा नामी पुस्तक केन्द्र था। मंडन मिश्र और भामती जैसे प्रकांड विद्वान हुए जिनके बारे में किंवदन्ती प्रचलित है कि उनका तोता भी संस्कृत बोलता था। हमारे विद्यापति, जिनकी सेवा में साक्षात शिव उगना बनकर आठों पहर खड़े रहते। ऐसी बहुत सी महिमा है हमारे दरभंगा की… शायद आपको मालूम न हो कि काशी नागरी प्रचारिणी की स्थापना होने लगी तो दरभंगा नरेश ने आर्थिक सहयोग दिया था। दरभंगा महाराज ने मदन मोहन मालवीय जी को भी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये लाखों रुपये की आर्थिक सहायता दी थी।
प्रश्नः और फिर अलवर…
उत्तरः हाँ, अब अलवर के बारे में जानिये कि अलवर नरेश ने शुक्ल जी को बुलाया था। शुक्ल जी यहां आये और रहे थे। कुछ दिनों पश्चात वे वापिस गये। अलवर प्राचीन इमारतों, राजसी किले, और महारानी की छतरियों के लिये तो मशहूर है ही, सरिस्का महल और सफ़ेद बाघ परियोजनाओं के लिये भी जाना जाता है। लेकिन मुझे सबसे अधिक मोहता है यह अलवर से जुड़ाव का कारण। देवताओं की यह नगरी के चप्पे-चप्पे मुझे दरभंगा के छुट गये विद्यापति के संयोग श्रृंगार और नचारी पदों की याद तो दिलाते ही हैं, आगे की यात्रा की अनासक्त उड़ान को भी प्रेरित करते हैं। भर्तृहरि के तीनों शतक – शतकत्रयी (श्रृंगार, नीति और वैराग्य) तक की यह यात्रा अद्भुत है, जिसमें दिल्ली एक ऐसा ठौर है जो मुझे वापिस अपनी भौतिक दुनिया से ला जोड़ता है। यहां सब रूपा सिंह को पहचानते हैं लेकिन यह पहचान स्वयं रूपा ने दरभंगा और अलवर की उन्नत और प्रखर भूमि से ग्रहण की है।
प्रश्न: रूपा जी, पहले एक कहावत मशहूर थी कि पाठ्यक्रम का हिस्सा बनने के लिये पहली शर्त होती थी लेखक का न रहना। यानि कि जीवित लेखक पाठ्यक्रम में शामिल नहीं होते थे। अब साहित्य को लेकर नयी शुरूआत हुई कि बहुत से विश्वविद्यालयों ने जीवित साहित्यकारों की रचनाओं को पाठ्यक्रम में जोड़ा। विश्वविद्यालयों में जो कहानियाँ पाठ्यक्रम में लगाई जाती हैं, उनके चयन का मानदण्ड क्या रहता है?
उत्तरः प्रश्न के पहले भाग के बारे में मैं कहूंगी कि भई मेरी समझ में इसका कोई विशेष तात्पर्य नहीं है। रचना को हमें चुनना है या रचनाकार को? क्या आपके कहने का तात्पर्य यह लिया जाए कि मृत रचनाकार महान हो जाते हैं? या महान रचनाकार अल्पायु होते हैं या फिर रचनाकार के जीवित या मृत होने से रचनाओं की उत्कृष्ठता के मापदण्ड की कोई इकाई तय होती है?… नहीं ना?
देखिये मुझे लगता है कि यह फ़िज़ूल बात है। रचना का मूल्यांकन इन थोथी बातों से नहीं किया जाना चाहिये। हाँ, इसमें इक बात अवश्य सिद्ध होती है – वह है रचना परिपक्वता। नये-नये रचनाकार लिख कर ही परिपक्व होते हैं और रचनाएं भी क्रमशः व्यक्ति से समष्टिगत होती जाती हैं। लेकिन फिर भी यह कोई नियम या फ़ॉर्मूला नहीं है कि किसी रचना को हम इसलिये नकार देंगे कि उसका रचनाकार अभी जीवित है।
आपके प्रश्न के दूसरे अंश से गन्ध आती है इस बात की, कि कहीं रचनाकार पाठ्यक्रम में अपनी रचनाएं लगवाने के लिये अपनी राजनीतिक पैठ या रसूख़ का प्रयोग भी करता है? तो यह तो जगजाहिर बात है। इसमें संदेह की गुंजाइश क्या? हालांकि पाठ्यक्रमों में रचनाओं का चुनाव, रचनाओं के अंतर्पाठ की सोद्देश्यता को ध्यान में रखते हुए उसे पढ़ने और पढ़ाने योग्य छात्रों के भविष्य निर्माण को देखकर किया जाता है। पाठ्यक्रम निर्धारण पैनल में सावधानीपूर्वक चुनाव इस ओर संकेत भी करता है, जिसके अनेक मुद्दों में राष्ट्र-निर्माण की भावना के अतिरिक्त सही ब्यौरों का दिया जाना भी एक कसौटी है। आपके संकेत मैं समझ रही हूं और यह संकोच के साथ कहती हूं कि इसमें पूरी कोशिश की जाती है कि रसूख़दार हस्तक्षेप कर अपनी कृतियों का चयन करा सकें। कई बार यह संभव नहीं भी होता है। चयन-प्रक्रिया, चाहे कोई भी इसे गुप्त रखने का यथासंभव प्रयास हम सबका दायित्व है।
लेखक को उसके लेखन की उत्कृष्टता के सिवाय कोई और चीज स्थापित नहीं कर सकती - रूपा सिंह 2
रूपा सिंह और नीलिमा शर्मा
प्रश्नः आप कविता भी लिखती हैं और कहानियां भी मगर आपकी प्रकाशित कृतियों में अधिकतर साहित्यिक आलोचना की पुस्तकें ही दिखाई देती हैं। आपका कहानी संग्रह और कविता संग्रह कब तक आने की संभावना है?
उत्तरः ऐसा है कि, आप पता कीजिये तो आपको हैरत भरी प्रसन्नता होगी कि जिस कविता को प्रजापति अर्थात ब्रह्मा के वरदान जैसी विधा माना जाता है या फिर ललित कलाओं में सबसे सूक्ष्म कला कविता कला को माना गया है। साथ ही यह भी बता दूं कि हिंदी साहित्य की सभी विधाओं… यहां तक कि आलोचना के धुरंधर आलोचकों ने भी लिखने की शुरूआत कविताओं से ही की थी। न केवल नामवरसिंह जी ने बल्कि रामविलाश शर्मा जी ने भी शुरू में कविता लिखने से ही अपनी रचनात्मक यात्रा आरंभ की। शायद धीरे-धीरे बाद में आपको अपनी रुचि और कौशल – दोनों का ज्ञान होता है। फिर भी मैंने कविताओं को अपने वजूद से बाहर की विधा नहीं माना। आलोचना और अब कहानी की दुनिया में आने के बाद भी मुझे कविताएं पढ़ने और लिखने में अद्भुत आनंद आता है। दरअसल कविता लिख कर ही मुझे एक मुकम्मल रचना का संतोष प्राप्त होता है। कह सकते हैं कि ‘कविता मेरे अंदर की तमाम बेचैनियों को जो समाज और साहित्येतर कशमकश से पैदा होती है उसका संचार कविता में करके मुझे तनिक मुक्ति का अहसास होता है।
संग्रहों की तैयारियों में जैसे अन्य लोग लगते हैं, मैं उतनी तत्परता से सपने संवारने की प्रक्रिया में उन्हें क्रमवार नहीं रख पाई अब तक, लेकिन आप सभी मित्रों का इतना आग्रह है तो अवश्य जल्दी ही आप मेरे किसी नये संग्रह से वाबस्ता होंगे। दुआएं चाहियें!
प्रश्नः कृष्णा सोबती जी पर आपने काफ़ी काम किया है। एक साहित्यकार के रूप में आप कृष्णा जी को किस रूप में देखती हैं?।।। क्या ‘ज़िन्दगीनामा’ जैसी रचनाएं हिन्दी साहित्य को समृद्ध करती हैं या पंजाबी न जानने वाले पाठकों के लिये समझने में कठिनाई उत्पन्न करती हैं?
उत्तरः कृष्णा सोबती हिन्दी की एक ऐसी कथाकार हैं जिन्होंने हिन्दी को नये ताज़े झोंकों से भर दिया। ये प्रायोगिक नवीन झोंके कथ्य, शिल्प के स्तर पर तो थे ही, भाषा के स्तर पर भी थे। उनके बारे में प्रचलित है कि उन्होंने विमर्शों की दुनिया में नया तूफ़ान ला दिया। स्त्री-विर्मश को एक ठोस आधार दिया और स्त्री की स्वतन्त्रता के साथ-साथ उसकी मूलभूत आवश्यकताओं जिनमें दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्वयं स्त्री का उठा हुआ हाथ भी शामिल है, को एक ठोस आधार प्रदान किया। आर्थिक स्वतन्त्रता, शारीरिक स्वतन्त्रता के साथ उन्होंने स्त्री-भाषा की भी वकालत की। इस रूप में उन्हें सचमुच एक बोल्ड लेखिका के रूप में जो स्वीकृति मिली वह जायज़ है।
पंजाबी शब्दों के प्रयोग की बात जहां तक आती है, यह प्रश्न आंचलिक भाषा-प्रयोग से हिन्दी समृद्ध होती है या दुरूह – इस प्रश्न से जुड़ जाता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का कहना था कि ऐसी भाषा और लोकशब्दों से हिन्दी का वास्तविक स्वरूप बिगड़ता है। जबकि फणीश्वरनाथ रेणु, कुर्रतुल-एन-हैदर और कृष्णा सोबती के यहां प्रयोग किये गये लोकभाषा के शब्द और तेवर हिन्दी को न केवल समृद्ध करते हैं बल्कि भारत के विविध कस्बों, प्रदेशों की संस्कृति को पूरे गंध, रस के साथ सामने ले आते हैं। इस रूप में मुझे लगता है कि इससे हिन्दी समृद्ध ही होती है। दूसरे, यदि रचना उत्कृष्ठ होगी तो चाहे कोई जटिलता क्यों न हो, कुछ पन्नों के बाद उसका रस पाठकों को मिलना शुरू हो जाएगा और वह अपने को पढ़वा लिये चली जाएगी।
प्रश्न: कहानियां तो आपने पहले भी लिखी हैं मगर आपकी कहानी ‘सुखां दा छल्ला’ सोशल मीडिया पर ख़ासी लोकप्रिय रही। आपकी पृष्ठभूमि बिहार की है जबकि ‘सुखां दा छल्ला’ पंजाबी पृष्ठभूमि पर है। एक कहानी के भीतर उतरने के लिए सबसे पहले एक लेखक को क्या कुछ करना पड़ता है?
उत्तर: दरअसल मेरा जन्म बिहार में हुआ लेकिन मेरे पूर्वज विभाजन पूर्व मुल्तान के थे। विभाजन की त्रासदी के बाद भारत सरकार ने रिहायशी दरों पर उन्हें जमीन मुहैय्या कराई और जिनके जो रिश्तेदार जहां आ चुके थे, उन्होंने वहीं की बाशिन्दगी चुनी। बिहार में भी कुछ मोहल्ले ऐसे बसे जिनमें से एक में मेरा जन्म हुआ। बाहरी शिक्षा का बंदोबस्त होने तक हम सभी बच्चे उस मोहल्ले के रीति-रिवाजों, भाषा-व्यवहार, त्योहारों आदि को उसी रूप में मनाते थे, जिसमें मेरी पृष्ठभूमि एक मिनी पंजाब की तरह बनी रह गयी। यहीं इन उजड़े लोगों के फिर से बसने के बीच छूट गए ज़िन्दगी के किस्सों को सहेजने की जद्दोजहद ने मुझे कहानी लेखन से भी जोड़ा और ‘दुखां दी कटोरी, सुखां दा छल्ला’ से भी जोड़ा।
प्रश्न: आपकी कहानी के पात्र निर्बाध रूप से पाठकों से संवाद स्थापित करते हुए कहानी को आगे बढ़ा ले जाते हैं। पाठक जानना चाहेंगे कि कहानी लेखन के समय यह पात्र आपको कितना परेशान करते हैं? क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने किरदार को किसी राह पर ले जाना चाहें और वह आपकी कहानी को बिल्कुल दूसरी ओर मोड़ दे?
उत्तर: मेरी कहानियों में, मुझे लगता है किरदारों की जिद्द बाद में नहीं उतरती है जिससे वे मुझे अपने साथ बहा ले जाएं बल्कि मुझे लगता है कि वे किरदार और उनकी कोई जिद्द पहले ही भूत की तरह मुझे जकड़ी रही है जिन्हें लिखने के बाद शायद उनकी भी मुक्ति उसमें निहित हो और मेरी भी। लेखक का इसमें ज्यादा हाथ नहीं होना सिवाय यह कि वह घटनाओं को कुछ तरतीब दे दे। इधर से उधर बैठाकर इमारत का ढांचा दुरुस्त कर दे। इतना मात्र। लिखते समय आप केवल उस कथा में धंसे रहते हैं।
प्रश्न: किसी भी लेखक को स्थापित करने में किसी आलोचक का कितना हाथ रहता है? क्या आम पाठक किसी आलोचक की लिखी आलोचना को कभी पढ़ता है?
उत्तर: देखिये, लेखक को उसके लेखन की उत्कृष्टता के सिवाय कोई और चीज स्थापित नहीं कर सकती। इस बात को आप गाँठ बाँध लें। एक तो किसी आलोचक का यह धर्म नहीं है कि वह रचनाकार की स्थापना के लिए आलोचना कर्म में प्रवृत्त हो और यदि ऐसा होता भी है तो वे आलोचक और रचनाकार बरसाती मेंढक की तरह कुछ समय के लिए शोर मचा सकते हैं। आपका दूसरा प्रश्न महत्वपूर्ण है कि पाठक किसी आलोचना को पढ़कर प्रभावित होता है क्या ? तो आपके समय में यह संदर्भ तनिक बदला है। विज्ञापनों और तकनीकी के इस युग में साहित्य भी मोहताज हुआ है और कुकुरमुत्ते की तरह उग आए आलोचक अपने स्वार्थ के तहत कुछ की बड़ाई और कुछ की बुराई करते हैं लेकिन यह सब बेहद सतही है। इन सबसे साहित्य और साहित्य पढ़ने वाले जल्दी-ही वाकिफ हो जाते हैं।
प्रश्न: आज हिन्दी में बड़ी पत्रिकाएं तो तमाम बन्द हो चुकी हैं। एक पीढ़ी थी जो धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं में छप कर परवान चढ़ी। साहित्यिक पत्रिकाओं की पहुंच आम पाठक तक है नहीं। तो क्या आज मान लिया जाए कि लेखक ही पाठक है और पाठक ही लेखक?
उत्तर: ये दो अलग-अलग प्रश्न हैं। यह सच है कि प्रायः सभी बड़ी पत्रिकाएँ बंद हो रही हैं या बंद होने की कगार पर हैं। यह दुखद है। लेकिन इन सबके बीच उम्मीद की किरण वे सूचनाएं हैं कि छोटे शहरों से प्रकाशित होने वाली कई पत्रिकाएँ कई वर्षों से न केवल अबाध गति से प्रकाशित हो रही हैं बल्कि अपने विशेष विशेषांकों से उनकी कद्र बढ़ी है। पहल, तद्भव, अलरव जैसी अनेक ऐसी पत्रिकाएँ हैं। ऐसे में आपके दूसरे प्रश्न कि ‘क्या लेखक ही पाठक बन गया है या पाठक ही लेखक ?’ के उत्तर में मुझे कहना है कि हम ऐसा आकलन नहीं कर सकते। प्रत्येक साल विश्व पुस्तक मेला में लाखों पाठक होते हैं, किताबों को खरीदते हैं। न केवल अमेज़न से मंगाते हैं, बल्कि Kindle रीडर, Audible लिसनर भी हैं। आशा की किरण झिलमिलाती है कि किताबों के पाठक सदा-सर्वदा बने रहेंगे और किताबों से जो सुख मिलता है, उन्हें लिखकर भी, रचकर भी और पढ़कर भी वह ब्रह्मानंद सहोदर आनंद और किसी चीज में नहीं है।
प्रश्न: आप तो समय समय पर बहुत से रिसर्च की परियोजनाओं से जुड़ी रहती हैं। आपको बहुत से लेखकों की रचनाओं को पढ़ने का अवसर भी मिलता होगा। आप उन लेखको को क्या कहना चाहती है या कहते कहते रुक जाती हैं ?
उत्तर: मेरी पढ़ने-लिखने की हैसियत ऐसी नहीं है कि मैं लेखकों को कोई राय दे सकूं। मुझे हर तरह के विषय पसंद आते हैं और कुछ भी लिखे हुए शब्द मुझे बाह्य और आंतरिक तौर पर समृद्ध ही करते हैं, इसलिए मैं लिखे गए शब्दों की हर प्रकार से पुजारिन हूँ। लेखकों में मुझे वैसा लेखक पसंद आता है जो सहजता से जटिल बातें या जीवन की गूढ़ व्यंजना को सामने ले आता है न कि सहज, सरल जीवन को गूढ़ और जटिल बनाकर प्रस्तुत करता है। बस इससे ज्यादा इस बाबत कुछ नहीं कहना उचित समझती हूँ।
प्रश्न: कुछ लोगों का कहाना है कि वर्तमान काल स्त्री-रचनाकारों का काल है। नोबेल पुरस्कार में भी स्त्रियों को स्थान मिला है, क्या भारत में महिला साहित्यकार आपसी ख़ेमेबाज़ी में ही उलझी रहती हैं? क्या कभी हिंदी साहित्य विश्व साहित्य में जगह बना सकेगा?
उत्तर: मुझे लगता है, प्रायः सभी काल स्त्री-रचनाकारों से भरे हुए हैं। हाँ, यह अवश्य है कि हमें नोटिस करना या मान्यता या महत्ता मिलना आधुनिक में अधिक सशक्त रूप से हुआ। ।।। गाथाओं से लेकर रामायण और महाभारत तक में स्त्री की सबलताओं और रचनात्मक ऊर्जा से भरे किरदारों की मौजूदगी हमें मिलती है। भक्तिकाल में तो तेजस्वी स्त्रियों और उनकी रचनाओं के खूब संग्रह दृष्टिगोचर हुए। बाद में, स्त्रियों द्वारा ही लिखे गए शोधपरक इतिहास से ज्ञात होता है कि पितृसत्ता ने अपने एकांगी दृष्टिकोण के कारण विभिन्न कालों में सृजनशील स्त्रियों की रचनाओं और उनके नाम तक शामिल नहीं किए जबकि एक बड़ा संसार स्त्री रचनाओं का मौजूद रहा है। आधुनिक युग और अब उत्तर आधुनिक युग में जब हाशिये की छानबीन हुई तो स्त्रियों का यह पक्ष मजबूती से सामने आया।
भारत में अभी सामंतवादी दृष्टिकोण और स्त्रियों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण के कारण स्त्रियों को उतना सृजनात्मक अवकाश नहीं मिल पाता है, लेकिन यह भी उतना ही सच और सटीक है कि इन्हीं जद्दोजहद से लेखन को पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। सोशल मीडिया ने भी स्त्रियों को ऐसा मंच मुहैय्या कराया है कि वे घर के सभी कार्य करते हुए भी अपनी रचनात्मकता को बिना दबाए लेखन से जुड़ी हैं। एक बड़ी तादाद सामने आई है जिनमें उनकी प्रारंभिक दबी इच्छाओं से लेकर सुनहरे संसार के दबावहीन समाज और जीवन का उत्सवी चित्रण है।
‘रुकैया के स्वप्न’ से लेकर अपने को ‘मरजाणी’ घोषित किए जाने तक उनकी कलम लगातार चल रही है और मुझे चूंकि सपने देखने की आदत है और मैं स्त्रियों की उस जिजीविषा से वाकिफ हूँ कि कैसे वे प्रसव-पीड़ा सहकर नये को जन्म देती हैं, उनकी सृजनात्मकता और रचनात्मकता में विश्वास रखते हुए समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता के नए वितान को सलाम करती हूँ।
नीलिमा : हमसे बातचीत करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार।
रूपा सिंह : धन्यवाद।

2 टिप्पणी

  1. रूपा सिंह ने जितनी सहजता और स्पष्टता से उत्तर दिए, वह शानदार है। अमूमन ऐसा होता नहीं। अच्छा साक्षात्कार है। प्रश्न भी अच्छे किए गए।

    राजा अवस्थी, कटनी

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