स्त्री-मुक्ति का अर्थ पुरुष का प्रतिद्वंद्वी होना क़तई नहीं है – दिव्या विजय 1

दिव्या विजय हिंदी की चर्चित युवा कहानीकार हैं। हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश आदि हिंदी की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी कहानियाँ प्रकाशित होती रही हैं। दो कहानी संग्रह ‘अलगोज़े की धुन पर’ और ‘सगबग मन’ प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें से ‘अलगोज़े की धुन पर’ को हाल ही में स्पंदन सम्मान मिलने की घोषणा हुई है। इस मौके पर पुरवाई के लिए युवा समीक्षक पीयूष द्विवेदी ने दिव्या विजय से उनकी कहानियों के कथ्य, रचना-प्रक्रिया, भाषा सहित उनमें मौजूद स्त्री-विमर्श के विविध पहलुओं पर बातचीत की है।  

सवाल – नमस्कार दिव्या, पुरवाई से बातचीत में आपका स्वागत है। आपके कहानी-संग्रह ‘अलगोज़े की धुन पर’ को हाल ही में ‘स्पंदन’ सम्मान मिलने की घोषणा हुई है, उसके लिए बधाई। इस संग्रह में प्रेम कहानियाँ ही अधिक हैं या यूँ कहें कि हर कहानी के केंद्र में प्रेम है। कैसे तैयार हुआ ये संग्रह?
दिव्या – धन्यवाद पीयूष। छपने के पश्चात ‘अलगोज़े की धुन पर’ को पहला सम्मान मिला है।
जब यह कहानियाँ लिखी गयीं तब छपने के उद्देश्य से बिल्कुल नहीं लिखी गयीं थीं। इन्हें लिखना था क्योंकि मुझे मुक्त होना था। कोई गहन संवेदना थी जो हृदय बींधे रहती थी। अलग-अलग समय पर लिखी गयीं ये कहानियाँ जीवन को जिए चले जाने के लिए लिखी गयीं थीं। दरहक़ीक़त कुछ पल इतने चमकीले होते हैं कि बरसों साथ रहने पर भी उनकी चमक फीकी नहीं पड़ती और कुछ क्षणों की निर्जनता जीवन-भर व्याकुल करती है। ऐसे ही क्षणों का लेखा-जोखा हैं ये कहानियाँ। जो बातें यूँ ही आँखों के आगे से गुज़र जातीं वही इन कहानियों को लिखते वक़्त यूँ साकार हो उठतीं ज्यों वे घटी ही मेरी कहानी का हिस्सा होने के लिए थीं। उन्हीं से कल्पना की शाखें निकलकर कहानी का आगा-पीछा बुनतीं। एक शब्द, एक स्पर्श, एक लकीर-भर तो बहुत है कहानी को जन्म देने के लिए।
जंगली फूल की तरह उग आये प्रेम की तरह हैं इस संग्रह की कहानियाँ और इनके पात्र। संग्रह में दस कहानियाँ हैं जिनमें प्रेम केंद्रीय तत्त्व है परंतु तब भी जैसे वृत्त के केंद्र से परिधि तक दस रेखाएँ खींची जायें तो वे केंद्र पर मिलती ज़रूर हैं पर परिधि पर उन रेखाओं के बीच दूरी और अंतर देखा जा सकता है, वैसे ही ये सभी कहानियाँ प्रेम पर आधारित होते हुए भी भिन्न आस्वाद लिए हैं।
सवाल – इसी संग्रह की एक कहानी मुझे याद आती है – प्रेम पथ ऐसो कठिन। इसमें एक स्त्री चार पुरुषों के प्रति आसक्त होती है और प्रेम में इसे ठीक भी मानती है। ऐसी कहानी लिखने का का ख्याल कैसे आया? और क्या आप कहानी की नायिका से सहमत हैं?
दिव्या – प्रेम एक ऐसा विषय है जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। मनुष्य के मन की संरचना सीधी-सरल नहीं कि तय परिस्थितियों में वह एक-सा व्यवहार करे। एक से अधिक लोगों से प्रेम होने को आज की पीढ़ी सामान्य मानती है। बहुत से लोगों के एक से अधिक पार्टनर्स हैं भी किंतु क्या सभी से प्रेम है? अथवा प्रेम है भी या नहीं? यह जानना दुष्कर है। सम्बन्धों में होना तथा प्रेम में होना दो अलग बातें हैं। इसको कैसे विभाजित करेंगे, वह कौन सा बिंदु है जहाँ उँगली रख देने पर दोनों का अंतर मालूम होगा यह जानना संभवतः असम्भव है। प्रेम किसी अन्य व्यक्ति से करने पर भी हम स्वयं की खोज में रहते हैं। यह खोज कहाँ तक ले जाए क्या मालूम! विज्ञान की दृष्टि में यह मात्र कुछ केमिकल्ज़ और हॉर्मोन्स का खेल-भर है पर काश प्रेम को परखने का कोई फ़ॉर्मूला भी हमें विज्ञान ने दिया होता।
मेरी एक और कहानी ‘परवर्ट’ में पुरुष कई स्त्रियों से प्रेम करता है हालाँकि कथ्य के तौर परवर्ट से यह कहानी बिल्कुल अलग है। पुरुष बहुप्रेम करे तो चलता है किंतु स्त्री भी करे तो यह प्रश्न क्यों उठता है? यही प्रश्न कहानी का मूल कथ्य है। बुद्धिलब्धि जाँचने का तरीक़ा तो मौजूद है पर प्रेमलब्धि को कैसे मापा जा सकता है, कहानी के अन्त में ऐसी परिस्थिति को ही रचा गया है। लड़की अपने बहुप्रेम के कारण कहीं भी उच्छृंखल नहीं  हैं, किसी नैतिकता-अनैतिकता की पसोपेश में नहीं हैं। कहीं भी उसमें अपराध-बोध नहीं पनपता। वह प्रेम में स्वच्छंदता नहीं अपितु स्वतंत्रता की हामी है। वह स्वतंत्रता जो दोनों तरफ़ बरती जाये, प्रेम बन्धन न हो और इस बात में मैं नायिका से सहमत हूँ।
स्त्री-मुक्ति का अर्थ पुरुष का प्रतिद्वंद्वी होना क़तई नहीं है – दिव्या विजय 2
दिव्या विजय के कहानी संग्रह
सवाल – आपका एक और कहानी-संग्रह ‘सगबग मन’ भी आया है। इसकी कहानियों में ‘अलगोज़े की धुन पर’ की तरह प्रेम केंद्र में नहीं है, अपितु अन्य जीवन-संघर्ष आ गए हैं। इन दोनों कहानी-संग्रहों के बीच एक लेखिका के तौर पर किस तरह का परिवर्तन महसूस करती हैं आप? क्या ‘अलगोज़े की धुन पर’ की लेखिका ‘सगबग मन’ पर आते-आते अधिक परिपक्व हो गयी है?
दिव्या – समय अपनी छाया सब पर छोड़ता चलता है और एक व्यक्ति के तौर हम सब बदलते जाते हैं। जो कल थे वह आज नहीं हैं और अगले ही क्षण ज़रा और बदले हुए मिलेंगे। अनुभव व्यक्ति को महीनता से बदल देते हैं। किसी लेखक की जीवन यात्रा का अनुमान उसकी लेखन यात्रा से बख़ूबी लगाया जा सकता है।
लेखक भी बदलता है, इस बदलाव को आप अनुभव की प्रगाढ़ता कह लें या परिपक्वता। परंतु परिपक्वता का अर्थ प्रेम कहानियों से दूरी नहीं है। प्रेम कहानियों से इतर लिखने का यह अर्थ नहीं कि प्रेम जीवन से अनुपस्थित हो गया अथवा प्रेम पर अविश्वास हो गया। इसका अर्थ मात्र इतना है कि जीवन दृष्टि विस्तृत होने से और बहुत-सी बातें फलक में शामिल हो जाती हैं।
‘सगबग मन’ में भी दो प्रेम कहानियाँ हैं क्योंकि वह भी जीवन के अनुभवों में से ही एक है। हाँ यह अवश्य है कि ‘अलगोज़े की धुन पर’ को पाठकों से मिली प्रशंसा और प्रेम के कारण एक लेखिका के रूप में यह अंतर आया कि अब ख़ुद को मैं अधिक ज़िम्मेदार पाती हूँ। यही वजह है कि मैंने इसमें पिछले संग्रह से अलग विषयों को कहानी के लिए चुना। विषय कोई भी हो, कहानी मूल रूप में जीवनानुभव ही है, अपना या पराया। साहित्य का रास्ता जाता जीवन से ही है।
सवाल – ‘सगबग मन’ की एक कहानी है – यूँ तो प्रेमी पचहत्तर हमारे। यह एक साधारण घरेलू स्त्री के बैंकॉक में जाने के बाद उसके व्यक्तित्व में आए खुलेपन की कहानी है। जहां तक मेरी जानकारी है, आप भी बैंकॉक में रही हैं, तो क्या ये कहानी वहां घटित किसी घटना या प्राप्त अनुभव से उपजी है?
दिव्या – आपका अंदाज़ा सही है। बैंकॉक की नाइट लाइफ़ मशहूर है। कहानी में वर्णित मुजराघर मैं जब गयी थी तो एक ऐसी रोचक बात दिखी कि मेरी दृष्टि वहीं जम गयी। एक पति-पत्नी अग्रिम पंक्ति में ही बैठे थे। पत्नी एकदम चमत्कृत ढंग से सब देख रही थी जिससे पता लगता था कि वह पहली बार यह सब देख रही थी। आइटम नंबर बजते ही उसके भीतर बैठे-बैठे ही नृत्य की लहर लहराती दिखने लगी, पैर हिल रहे थे। स्त्री की आँखों की पुतलियाँ, सिर, पैर सब कुर्सी पर ही थिरक कर नाचनेवालियों के संग ताल दे रहे थे। पति ने उसकी बाँह मजबूती से पकड़े रखी, उसकी लास्येषणा उस बंध से छूट मंच पर पहुँचने को छटपटा रही थी। वहाँ उपस्थित अन्य पुरुषों के केंद्र में भी मंच पर नाचने वाली स्त्रियों के स्थान पर अब वह थी। उसके पति को सम्भवतः यह बात बर्दाश्त नहीं हुई कि उसकी स्त्री को इस तरह देखा जाए जबकि स्त्री के लिए यह कोई समस्या थी ही नहीं।  अंत हुआ यह कि पुरुष क्रोध और शर्मिंदगी से भरा उसे अपने साथ लेकर बाहर चला गया। यह बात अलग है कि वह जाना नहीं चाहती थी। उसी घटना से इस कहानी का बीज पड़ा। उस स्त्री की अधूरी इच्छा मेरी कहानी की नायिका रेखा ने पूरी कर दी और मुझे ख़ुशी है कि पाठकों को कहानी पसंद आई।
सवाल – आप घूमती काफी हैं और मैंने सुना है कि यूँ घूमते-घूमते ही अलग-अलग जगहों से कहानियाँ भी चुरा लेती हैं (हँसते हुए)। तो अबतक कितनी कहानियाँ चुरा चुकी हैं आप या यूँ कहूं कि अमुक विषय पर कहानी बन सकती है या नहीं, ये कैसे तय करती हैं?
दिव्या – हाँ, घूमना मुझे बेहद पसंद है। यात्राएँ न सिर्फ़ हमारे अनुभवों को विस्तार देती हैं बल्कि हमारे विकास का साधन भी बनती हैं। हर यात्रा से मैं कुछ न कुछ सीखती हूँ। यह मेरा दृढ़ मत है कि एक लेखक को जितना सम्भव हो उतना घूमना चाहिए। लौटने पर अनुभवों की पोटली भर जाती है, स्मृतिकोष समृद्ध हो जाता है। इस शब्द के पारम्परिक रूप से हटकर देखा जाए तो यात्राएँ दैहिक ही नहीं, मानसिक भी होती हैं। कल्पना पर सवार होकर भी बहुत-से स्थानों की सैर की जा सकती है।
किंतु रचनात्मक मूड को सचेष्ट पैदा नहीं किया जा सकता है। केवल छन्द का नियम पूरा होने भर ही से तो कविता नहीं बनती। सुंदरतम स्थानों पर जाकर भी कई बार मन तथा आँखों को रचनात्मक सोबता नहीं मिलता और कई बार रोज़मर्रा की बातों ही से कहानी अँखुआ जाती है। यक़ीनन नये स्थानों पर पहुँच मेरी ऑब्ज़र्वेशन अधिक सक्रिय हो उठती है, कोई नया भाव, कोई दृश्य, कोई चरित्र यादों में जमा हो जाता है और बाद में कभी नुमायाँ होता है। परिवेश बुनने में मदद मिलती है।  शब्दकोश में इज़ाफ़ा होता है।
कोई दिन इतना लस्टम-पस्टम होता है कि किसी जगह पहुँच ख़ुद से बात करते-करते ही आइडिया क्लिक कर जाता है और लगता है कि मेरा यहाँ पहुँचना अकस्मात नहीं था। आइडिया मुझे भाता है तो एक ड्राफ़्ट मैं ज़रूर लिखती हूँ फिर एक पाठक के रूप में उसे कसती हूँ। एक लेखक से अधिक पाठक रूप की सुन कर ही कतर-ब्योंत करती हूँ। जैसे ‘स्केटिंग रिंक’ की नींव मसूरी में पड़ी। ‘काचर’ का वातावरण राजस्थान के सुदूर शहर की रेल-यात्रा का नतीजा था। ‘मग़रिबी अँधेरे’ में गोवा जीवंत हो उठा है वहीं ‘भय मुक्ति भिनसार’ बंगाल से बटोर लायी थी।
सवाल – आपकी कहानियों में स्त्री-विमर्श भी मिलता है। साहित्य के स्त्री-विमर्श में एक चीज दिखती है कि स्त्री-मुक्ति के नाम पर उसे पुरुष के सामने मुकाबले में खड़ा कर दिया जाता है। क्या स्त्री का मुक्ति पाने के लिए पुरुष को प्रतिद्वंद्वी या शत्रु बना लेना उचित है?
दिव्या – लिखना केवल समाज के आदर्श रूप को प्रस्तुत करना तो है नहीं। वहाँ कुंठाएँ भी आकार लेकर ठोस रूप में आ खड़ी होती हैं। सदियों से जिस कष्ट को स्त्रियाँ भोगती आ रही हैं उसकी छाया उनके लेखन में दीख पड़े, जीवन की कटुता यदि शब्दों में झलके तो अचरज जैसी क्या बात! और ग्रे शेड्ज़ कहाँ नहीं होते? क्या पुरुषों की रचनाओं में ऐसे पात्र नहीं मिलते? उनकी रचनाओं में जहाँ स्त्री पात्रों के साथ कुछ अनुचित घटा है वह क्या पुरुषों की शत्रुता कहाएगी?
स्त्री लेखकों पर इस आरोप से मैं सहमत नहीं। लिखते समय बजाय प्रतिशोध लेने के, वे रचना की उत्कृष्टता का विचार करती हैं। पात्रों की, घटनाओं की बुनावट रचना की आवश्यकता के अनुरूप होती है न कि वैमनस्यता से ग्रस्त। लिखते समय लेखक की भूमिका एक पंच की होती है और अपने जाने वह किसी किरदार से शत्रुता नहीं निभाएगा। उस पर तो न्याय का दारोमदार रहता है।  स्त्री-मुक्ति का अर्थ पुरुष का प्रतिद्वंद्वी होना क़तई नहीं है। स्त्रियाँ सिर्फ़ समानता चाहती हैं, उन के साथ हुए/हो रहे अन्याय का प्रतिशोध नहीं।
फिर यह पाठक के दृष्टिकोण पर भी निर्भर है कि किसी रचना में उपस्थित परिदृश्य को वह कैसे ग्रहण करता है। पढ़ने वाला पुरुष है तो हो सकता है वही घटना उसे अनुपयुक्त लगे जबकि स्त्रियाँ उसे दूसरे रूप में परखें। उदाहरण के लिए ‘यूँ तो प्रेमी पचहत्तर हमारे’  को ही लीजिए। नए देश में रेखा का पति से हाथ छुड़ा कर जाना पुरुषों को हज़म नहीं हुआ था। वहीं स्त्रियों ने इसे खुले मन से स्वीकार किया था।
सवाल – आपकी नजर में स्त्री-मुक्ति की व्यावहारिक दृष्टि क्या है?
दिव्या – स्त्री को मुक्त किस से होना है? पुरुष की सत्ता से। जहाँ सत्ता है, ज़ाहिर है वहाँ राजा है, प्रजा भी। अर्थहीन नियम, निरर्थक परम्पराएँ, घृणित बेड़ियाँ सत्ता के पीछे आप चले आते हैं।
समानता चाहिए तो सबसे पहले पुरुष को समझना होगा कि स्त्री के ऊपर उसने बंधन लादे हैं, वह उनके साथ कोई अन्याय कर रहा है। पहला क़दम पुरुष का स्वीकार होगा कि क्योंकि जब तक वह नहीं समझेगा तब तक अगली सीढ़ी पर हम नहीं पहुँचेंगे। समाज में जो असमानता व्याप्त है वह पुरुषों द्वारा प्राकृतिक मान ली जाती है। वे इसे सामान्य व्यवहार मानते हैं।
समानता यह तो नहीं है स्त्रियों की स्वतंत्रता दूसरे लोग परिभाषित करें, कोई और उनके लिए नियम बनाए बल्कि यह है कि बिना किसी प्रतिबंध के जीवन को दिशा देने का उन्हें अधिकार हो। अपना हर निर्णय वे स्वयं लेने में सक्षम हों। उस निर्णय के प्रति जवाबदेही भी उनकी हो…बग़ैर निर्णय के ग़लत होने के भय या ग्लानि के।
हमारे संविधान में भले ही हर नागरिक को बराबरी का दर्जा दिया गया है लेकिन औरतें आज भी बराबरी के लिए तरसती नज़र आती हैं। वे पढ़ रही हैं, काम के लिए बाहर भी निकल रही हैं किंतु कितनी स्त्रियाँ हैं जिन्हें परिवार की ख़ुशहाली के नाम पर अपने निजी जीवन और प्रसन्नता का त्याग करने का उपदेश नहीं दिया जाता। जो स्त्रियाँ समाज के विरुद्ध जाकर अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीती हैं समाज उनके लिए निष्ठुर बना रहता है। जो अधिकार है उसके लिए संघर्ष क्यों?  जिस दिन यह संघर्ष समाप्त हो जाएगा उस दिन इस प्रश्न की ही आवश्यकता नहीं रहेगी।
सवाल – आजकल अधिकांश  युवा लेखकों/लेखिकाओं के लेखन में कमोबेश अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग दिखाई दे जाता है। आप भी इसी पीढ़ी की लेखिका हैं, लेकिन आपकी भाषा में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग लगभग नहीं मिलता तथा एक साहित्यिकता भी नज़र आती है। यह स्वतः होता है या भाषा के प्रति आप विशेष रूप से सचेत रहती हैं?
दिव्या – मुझे और मेरी हिन्दी दोनों ही को अंग्रेज़ी शब्दों से कोई गुरेज़ नहीं है परंतु ‘भाषा बहता नीर’ का जस्टिफ़केशन दे कर पात्रों द्वारा शब्दों का वाग्विलास भी मैं नहीं करना चाहती। साहित्यिक प्रक्रिया के तीनों पक्षों लेखक, रचना और पाठक के बीच भाषा ही सेतु है अतः भाषा पात्र व परिस्थिति अनुकूल होनी चाहिए जो दुर्बोध न हो। अंग्रेज़ी शब्दों का स्वीकार हिन्दी जन में है और कुछ तो ऐसे हैं जिसका स्थानापन्न हिन्दी शब्द नहीं हो पाते। किसी को ‘पावरफ़ुल’ कहने में जो अर्थ है वो हिन्दी उल्था करने पर शारीरिक बल या शक्ति तक ही जा पाएगा, उससे आगे नहीं। और कई बार हिन्दी के उपसर्ग-प्रत्यय अंग्रेज़ी शब्दों में व्यंजना का चमत्कार ले आते हैं, जैसे ‘लीडरी’। मुझे तो जिस भाषा से मेरे पात्रों और कथा का उद्देश्य सधता हो, पाठक तक पहुँचता हो, स्वीकार है, भाषा का भेद-अभेद मैं सयत्न नहीं रखती। हालाँकि हिन्दी और उसमें भी, कम प्रचलित हिन्दी शब्दों के प्रयोग के प्रति मेरा आकर्षण अवश्य है।
सवाल – आपका जुड़ाव थिएटर से भी रहा है। इस जीवन के विषय में कुछ बताइए और यह भी कि थिएटर और लेखन में कला के स्तर पर क्या कोई समानता पाती हैं?
दिव्या – बचपन में जब प्रसाद और कालिदास के नाटकों को पढ़ा तब पहली बार मंच पर होने की इच्छा जागी थी किंतु पढ़ाई में व्यस्त रहने के कारण कभी अवसर नहीं मिला। जीवन अपनी गति से चलता गया किंतु कुछ बातें यथावत रहती हैं। यह चाहना भी वैसी ही थी। इसलिए वर्षों बाद बैंकॉक से भारत लौटने पर एक समूह के साथ नाटक करना आरम्भ किया। बाद में  नाट्यशास्त्र में स्नातकोत्तर किया। इस दौरान बहुत से नाटकों में काम किया। अंधा युग की गांधारी, नटी बिनोदिनी की बिनोदिनी, सारी रात का स्त्री पात्र मेरे मन के बहुत निकट रहे।  मंच पर होकर अपनी ही देह में रहते हुए कोई और हो जाना एक जादुई अनुभव है। लोग हमें देखते हुए, लेकिन हम लोगों को नहीं देखते। हम तो वह पात्र हैं, एकदम नए। नया जीवन जीने में व्यस्त। यह अनुभव कहानियाँ लिखने के दौरान अपने पात्रों को गढ़ने में काम आता है। नाटक को मंच पर अभिनीत करने से पहले उसके एक-एक पात्र की मनः स्थिति की पड़ताल की जाती है। छोटे-से-छोटे संकेत का अर्थ समझा जाता है। हर बात का, फिर चाहे वह संवाद हो अथवा चुप, एक कारण होता है। इसी बात की कोशिश कहानी लिखते हुए करती हूँ।
कला का कोई भी फ़ॉर्म हो, वह मानव जीवन और उसके व्यवहार से ही रूपाकार प्राप्त करता है। कार्य-प्रकृति और माध्यम में अन्तर भले हो पर मैंने अपने तईं कोई वर्गीकरण नहीं किया। पहले अभिनय और अब लेखन दोनों ही का उद्देश्य सौन्दर्यानुभूति , रसास्वादन प्रदान करना है। मंच पर जीवन की मूर्त सजीव प्रतिलिपि हो या किताब के पन्नों पर अक्षरों के द्वारा पाठक के मन में अमूर्त्त रंगमंच बना देना, कला का अंतिम लक्ष्य तो मानव जीवन ही है।
सवाल – लेखन में क्या आपकी कोई प्रेरणा है?
दिव्या – मैं क्लासिक, समकालीन हिन्दी-अंग्रेज़ी सब पढ़ती हूँ परन्तु प्रेरणा जीवन से ही लेती हूँ। सदाक़त यह है कि रचनात्मक मन एक बुझते हुए कोयले जैसा होता है। रोज़मर्रा की निष्प्रयोजन-सी जिए चली जाने वाली ज़िंदगी में अचानक से हवा का एक झोंका उस बुझते कोयले को सुलगा जाता है, एक मद्धिम आलोक-सा लिए वह क्षण ही प्रेरणा बन जाता है। और फिर वह विशिष्ट अनुभव व्यक्त होने के लिए लिखने पर विवश कर देता है। जो स्थिति बिल्कुल माइंड ब्लॉक की लग रही होती है उसमें शब्दों के झरने से स्नात मन में प्रबल प्रेरणा का संचार होने लगता है।
सवाल – आजकल क्या कुछ पढ़ और लिख रही हैं?
दिव्या – मेरी टेबल पर एक साथ तीन-चार किताबें पठन-पाठन के लिए रहती हैं और मैं एक दिन में सभी को थोड़ा-थोड़ा पढ़ती हूँ। अपने मूड के हिसाब से। सुबह जल्दी उठकर एक घंटा पढ़ने के लिए तय है। तब मैं कुछ नया पढ़ने को प्राथमिकता देती हूँ।दोपहर को समझने में आसानी हो ऐसी किताब लेती हूँ या पढ़ी गयी किताबें ही पलटती हूँ। रात को अक्सर एक अथवा एकाधिक कहानियाँ पढ़ने के बाद ही सोती हूँ। पता नहीं कैसे पर एक समय में एक से अधिक किताबें पढ़ने की टेव मुझे बचपन ही से पड़ गयी। फ़िलहाल यशपाल का ‘झूठा सच’, इन्दिरा गोस्वामी की ‘लाल नदी’, विवेक शानभाग का ‘घाचर-घोचर’ पढ़ रही हूँ। हाल ही में एक चीनी उपन्यास झील और पहाड़ का रोमांच पढ़ा था। शिवेंद्र का ‘चंचला चोर’ मेज़ पर प्रतीक्षा कर रहा है। काम कर रही हूँ अपनी अगली किताब पर जो लगभग पूरी है। आख़िरी ड्राफ़्ट बाक़ी है।

1 टिप्पणी

  1. दिव्या विजय का पीयुष द्विवेदी द्वारा लिया गया साक्षात्कार बगुत अच्छा लगा। दिव्या की इस बात से में पूर्णत: सहमत हूँ कि नारी स्वातंत्र्य का अर्थ पुरुष से प्रति द्वंद्विता नहीं है। दिव्याजी ने अपनी लेखन प्रक्रिया के माध्केयाम से पठन, अनुभवों की विविधता पर ज़ोर दिया है। पीयुष जी को इतना अच्छा साक्षात्कार लेने और दिव्या जी को देने और तेजेंद्र जी को छापने के लिये बधाई

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